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प्रचार खिडकी

सोमवार, 31 दिसंबर 2007

नए साल के लिए कुछ संकल्प

यूं तो मैं ऐसी योजना बना कर कभी नहीं चलता हूँ कि भैव्हिश्य में एक्साक्ट्ली क्या करना है क्योंकि काफी हद तक प्लान की हुई बातें ठीक वैसे नहीं पूरी हो पाती हैं। मगर फिर भी ब्लोग्गिंग से संबधित कुछ बातें और योनायें तो सोची ही हैं।

सबसे पहला तो ये कि ब्लोग नहीं लिखूंगा , अरे अरे नहीं नहीं आप गलत समझे । मेरा कहने का मतलब ये है कि अब कैफे में बैठ कर नहीं करूंगा बल्कि जल्दी ही अपना कंप्युटर ले कर बाकायदा धमाल मचाने कि तैयाती है.

एक नया ब्लोग :- सोचता हूँ कि अदालत से संबधित एक नया ब्लोग "कोर्ट-कचहरी " बनाऊँगा। हालांकि अभी ठीक ठीक फैसला नहीं कर पाया हूँ पर कुछ अलग सा होगा ये ब्लोग। इसमें अदालत से संबधित आम जानकारियाँ , नई तब्दीलियाँ, विवाह, तलाक, गुजारा भत्ता, गिरफ्तारी, जमानत, जमानती, आरोप। गवाही, फैसला, अपील, आदि के बारे में सिलसिलेवार जानकारी देने की कोशिश करूंगा॥

मौजूदा ब्लोग्स को लेखन की विधाओं के अनुसार बात्नें की कोशिस करूंगा- जैसे, हास्य, काव्य, लेख, कहानी आदि। मगर फिर सोचता हूँ कि क्या ये उनके लिए थोडा अनुचित नहीं हो जाएगा जो सिर्फ एक ब्लोग पड़ना चाहेंगे। देखता हूँ कि क्या होता है।

मंदाकिनी - एक ऐसी लडकी की कहानी जिसके पूरे जीवन का एक एक पल आज की हरेक औरत, हरेक युवती के जिन्दगी के किसी ना किसी पहलू और अनुभव को कहीं ना कहीं जरूर चूएगा। मंदाकिनी की कहानी कब शुरू होगी ये भी जल्द ही पता चल जाएगा।


किसे एक ब्लोग पर लघुकथाओं की शूरूआत भी करने की कोशिश करूंगा ।

फिलहाल तक तो ये सब सोच चुका हूँ बाकी आगे आगे तो मुझे भी देखना है कि होता क्या सब है.

रविवार, 30 दिसंबर 2007

अरिंदम को मोहल्ला पर नया फ्लैट मिलने की बधाई.

अरिंदम-- छोटा सा ब्लॉगर, कक्षा च्छ में पढ़ने वाला, पहला चिटठा बच्चों पर बनी फिल्म तारे ज़मीन पर पर की। और क्या धमाकेदार चर्चा की। सचमुच कमाल का लेखन और प्रतिभा है। बिल्कुल फिल्म के बाल कलाकार दर्शील की तरह चर्चित हो रहा है अरिंदम भी। कहते हैं होनहार के पूत के पाँव पालने में दिख जाते हैं। सो दिख ही रहे हैं॥ चलिए अच्छा है, इस से लगता है कि ब्लोग्गिंग का भविष्य बहुत उज्ज्व्वल होने वाला है।


लेकिन इससे अलग जिस एक बात पर मेरा ध्यान ज्यादा गया वो था कि अरिंदम को अविनाश जी के मोहल्ले में , ब्लोग जगत में कदम रखते ही , एक नया फ्लैट मिल गया और ये उसके लिए सोने पर सुहागा वाली बात हो गयी ॥ बधाई हो अरिंदम।

एक हम हैं नसीब के मारे , खानाबदोश के खानाबदोश ही हैं अब तक, मोहल्ला तो दूर कोइ गली तक में घुसने नहीं देता.

शनिवार, 29 दिसंबर 2007

टैलेंट शोव्स : प्रतिभाओं को निखार रहे हैं या कुंठित कर रहे हैं?

पिछले कुछ सालों से टेलीवीजन पर बहुत सारे टैलेंट शोव्स कि मनो एक बाढ़ सी आ गयी है। कभी इंडियन आइडल से शुरू हुआ ये सिलसिला ऐसा चल निकला है कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। इन टैलेंट शोव्स ने जहाँ एक तरफ मनोरंजन के क्षेत्र में एक विविधता सी भर दी है वहीं दुसरी तरफ गीत संगीत अभिनय के क्षेत्र में युवाओं का झुकाव और जबरदस्त संभावनाओं को पैदा कर दिया है । इससे अलग एक और बात जो अब पुरी तरह साबित हो गयी है वो ये कि इस देश में प्रतिभाओं की भरमार है बस यदि कमी है तो उन्हें तलाशने और तराशने की।





इन टैलेंट शोव्स की सफलता और बढ़ती लोकप्रियता तथा सार्थकता के साथ ही एक और सवाल जो इन दिनों चर्चा में है वो है इनके चुनाव कि प्रक्रिया और उनका परिणाम। अब तो जैसे ये भी एक प्रथा से बन गयी है कि कोई भी प्रतियोगिता बिना विवाद , बिना आलोंचना के पूरा ही नहीं होता। हालांकि इसके पीछे दो मुख्य कारण तो हैं ही एक तो जान बूझ कर किसी भी विवाद को पैदा करना ताकि उसको लोकप्रिया और चर्चित बनाया जा सके दूसरा है व्यापारिक दबाव में मोबाईल द्वारा वोटों से किसी का चुनाव। इस वोटिंग प्रणाली की हकीकत क्या है ये तो इश्वर ही जाने मगर इतना सच है की इससे कभी भी किसी प्रतियोगिता का भला होते हुए मैंने नहीं देखा। उलटा जो प्रबल प्रतिद्वंदी होता है जो वाकई जी का हक़दार लगता है वो बेचारा जरूर बाहर हो जाता है । दुःख और चिंता कि बात ये है कि अब ये टैलेंट शोव्स बच्चों के लिए भी आयोजित किये जाने लगे हैं और अपनी आदत के अनुरूप वहाँ भी यही सब कुछ चल रहा है ।



इसलिए अब तो ये सोचना पडेगा कि ये टैलेंट शोव्स वाके बच्चों का भला कर रहे हैं उन्हें प्रोत्साहित करने में मददगार साबित होंगे या फिर ये उनमें असफलता कि एक ऐसी कुंठा को जन्म दे देंगे जो ता उम्र उन्हें बेहद दुःख देती रहेगी।

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2007

कठिन और दुखदाई रहा २७ देसmber २००७

कल से जो दोनो दुख्दाए खबरें सूनी उसके बाद किसी और चीज़ सुनने पढ़ने देखने का मन ही नहीं किया। अब तो ऐसा लगने लगा है कि जितनी जल्दी हो ये साल बीत जाये तो अच्छा।


पहली खबर थी भारत की पहली महिला पुलिस ओफ्फिसर किरण बेदी का वी आर अस लेकर पुलिस फोर्स से सेवा निव्रत्ती ले लेना। इससे बड़ी बदकिस्मती और इस देश कि क्या हो सकती है कि किरण बेदी जैसी महिला अधिकारी के साथ इस हद तक नांशाफी हो सकती है । कमाल कि बात है न कि कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं है , वो भी तब जब राष्ट्रपति महिला है , प्रधानमंत्री से शक्तिशाली भी एक महिला है । ये तो तभी पता चल गया था कि किरण बेदी को अब जबरन ही रास्ते से हटा दिया जाएगा जब दिल्ली पुलिस कमिश्नर के पद पर उमको नहीं बैठने दिया गया। यही तो फर्क है और हमेशा रहेगा हममें और पच्शिमी देशों में । अव्वल तो वहाँ कि सरकार और प्रशाशन इतनी हिम्मत ही नहीं कर पाते और यदि गलती से कर भी लेते तो वहाँ की जनता उन्हें चैन नहीं लेने देती। कहिर किरण बेदी ने जो करना है वो तो करेंगी ही और ऐसे लोग कभी किसी बात के मोहताज नहीं होते।


दूसरी खबर इतनी अप्र्तायाषित और झकझोर देने वाली थी कि समझ ही नहीं पाए कि आकहिर ये क्या सुन रहे
हैं । बेनजीर कि असमय हत्या ने इंदिरा गांधी और राजीव जी की हत्या की बात याद दिला दी। लेकिन सबसे मुश्किल बात तो ये है कि आने वाले समय में पाकिस्तान कि हालत और भी बदतर होने वाली है । और ये बहुत बड़ी चिंता कि बात है कि हमारे पड़ोस में एक ऐसा देश पनप रह तो बहुत जल्दी जलने वाला है । देर सबेर उसकी लपटें हम तक भी पहुचने वाली हैं ही। मेरी मानें तो भारत सरकार और भारतीया सेना को अभी से पूरी तरह सतर्क हो जाना चाहिए । खैर हमें उस देश के लोगों से गहरी संवेदना है जो बेचारे ये सब झेलने को ना जाने कब से अभिशप्त हैं।

आज इससे अलग कुछ लखन को मन नहीं कर रहा है

गुरुवार, 27 दिसंबर 2007

कल bbc सूना tha क्या?

आपने कल बीबीसी रेडियो कि हिन्दी सेवा सुनी थी क्या? अरे अरे, ये क्या पूछ बैठा मैं , खासकर शहर में रहने वाले अपने मित्रों से । हाँ शहर में अव्वल तो कोई रेडियो सुनता नहीं यदि सुनता भी है तो सिर्फ अफ ऍम रेडियो पर गाने ही सुनता। शहर में तो मुझ जैसे एक आध मूढ़ ही शोर्ट वाव रेडियो पर बीबीसी हिन्दी सेवा सुनते होंगे। खैर मुझे तो ये आदत बरसों पुरानी है । लेकिन यहाँ ये बात मैंने इसलिए पूछी है क्योंकि ये उनके लिए बेहद यादगार शाम साबित हो सकती थी जो कविता हिन्दी काव्य के प्रेमी लोग हैं।


बीबीसी हिन्दी ने प्रत्येक वर्ष कि भांति इस बार भी वर्षांत पर अपनी विश्सेश प्रस्तुतियों कि श्रंखला जारी राखी है । कल बीबीसी के वरिष्ट संपादक शिवकांत जी ने एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया था। जी नहीं ये कोई मामूली काव्य गोष्ठी नहीं थी । इसमें सुमित्रा नंदन पन्त, दिनकर, बच्हन, त्रिलोचन, अगेयेया, फैज़ अहमद, जयशंकर प्रसाद, और बेकल उत्साही कि प्रमुख रचनाओं का पाठ किया गया। और ये भी तो सुनिए कि काव्य पाठ खुद इन महान कवियों ने ही किया । आप खुद ही सोच सकते हैं कि इन महान काव्य विभूतियों को खुद उनकी आवाज़ में सुनना किसी सुखद अनुभव से कम नहीं। ऐसा संभव हो सका बीबीसी की अनमोल औडियो लिब्ररी के कारण। इनमें से कोई आवाज़ २८ साल पहले तो कोई आवाज़ १७ साल पहले अलग अलग महफिलों में रेकोर्ड की गयी थी।

आप निराश ना हों यदि आप अब भी उन्हें सुनना चाहते हैं तो बीबीसी हिन्दी .कॉम पर जाकर उन्हें सुन सकते हैं। यकीन मानिए आपको निराशा नहीं होगी।


और जब कविता कि बात चली है तो सोचा मैं भी कुछ लिखता चलूँ:-

जाने तेरी इन काली,मोटी,गहरी, आखों में,
कभी क्यों मेरे सपने नहीं आते,

तू तो ग़ैर है फिर क्यों करूं तुझसे शिक़ायत,
जब पास मेरे, मेरे अपने नहीं आते।

उन्हें maalom है कि हर बार में ही माँग loongaa maafi,
इसलिए वो कभी मुझसे लड़ने नहीं आते।

जो shammaaon को पद जाये पता,कि उनकी roshnee से,
parwaane lipat के देते हैं जान, वे कभी jalne नहीं आते।

jabse पता चला है कि यूं जान देने वालों को sukun नहीं मिलता,
hum कोशिश तो करते हैं पर कभी मरने नहीं पाते।

जो कभी किसी ने पूछ लिया होता, मुझसे इस कलाम्जोरी का राज़,
खुदा कसम हम कभी यूं लिखने नहीं पाते।


पर किसी ने कभी पूछा नहीं इसलिए लिखी चले जा रहे हैं .

मंगलवार, 25 दिसंबर 2007

चिट्ठाकारी के कुछ खास नुस्खे

अपने कुछ दिनों कि ब्लोग्गिंग के अनुभव के बाद जो चंद बातें मैंने महसूस कि सोचा कि वे आपको बताता चलूँ, लेकिन कुछ भी लिखने से पहले से पहले मैं ये स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि ऐसा बिल्कुल नहीं है कि ये सारे नुस्खे कोई बडे तगडे या कि बहुत प्रामाणिक हैं । हाँ मगर इतना जरूर है कि मेरी तरह आनेवाले नए और नौशिकिये चिट्ठाकारों के लिए शायद ये जरूर फायदेमंद साबित हो सकते हैं।:-


अपना चिटठा आप यथासंभव सुबह छपने का प्रयास करें। ( ये बात मैं उन के लिए कह रहा हूँ जो भारत में रह कर ब्लोग्गिंग कर रहे हैं। ) इसकी वज़ह ये है कि मैंने महसूस किया है कि चिट्ठों को लोग तभी पढ़ते हैं जब वे अग्ग्रेगातोर्स के पास दिखाए देते हैं। यदि आपने देर रात कुछ लिख कर पोस्ट कर दिया है तो बहुत अधिक संभावना है कि सुबह तक उसकी जगह कोई और पोस्ट ले ले और इस तरह आपकी पोस्ट बिना पढे ही साइड लग जायेगी। ऐसा तब तक करना जरूरी है जब तक आप इतने पाठक ना बना लें जो आपको पढ़ने के लिए तत्पर रहे।


जरूरी नहीं कि हमेशा गंभीर बातें ही लिखी जाएँ , या कि सिर्फ गंभीर विषयों पर ही कुछ लिखा जाये । कभी कभी थोडे बदलाव के लिए कुछ हल्का फुल्का भी लिखते रहना चाहिए। या फिर ऐसा भी कर सकते हैं कि उन्ही बातों को कुछ हलके फुल्के तरीके से कहा जाये।

ज्यादा फिलासफी ना झाडें तो अच्छा , क्योंकि शायद आज के जमाने में किसी के पास इतना वक़्त नहीं होता कि वो आपके आदर्शों को झेलने के लिए समय निकाल सके।

यदि कविता -ग़ज़ल आदि लिखते है तो ऐसी लिखने कि कोशिश करें उसका मजमून कुछ ऐसा हो कि एक आम पाठक भी आराम से पढ़ कर उसे समझ सके। कहीं ऐसा ना हो कि उसे समझाने के लिए खुद आपको ही सामने आना पड़े या फिर कि खुद मिर्ज़ा घलिब साहब को कोई नया ब्लोग लिख कर उनके मतलब बतानें पडें।

एक जरूरी बात यदि आप चाहते हैं कि लोग आपको पढ़ कर टिप्पणी करें तो आप ये जान लें कि दुसरे भी यही चाहते हैं इसलिए पहले आप खुद टिप्पणी करने की आदत डालें । अब जाहिर है कि कम से कम अपने ब्लोग पर अपनी टिप्पणी डालने का काम तो आप नहीं करेंगे।

एक आख़िरी बात ,यदि एक ही स्टाइल आपको थोडा बोर करने लगे तो ब्लोग के रंग-रुप,टेम्पलेट, फॉण्ट आदि में कभी कभी थोडा बहुत परिवर्तन आपको और आपके ब्लोग को ताजगी का एहसास कराएगा।

तो हे, चिट्ठाकार मित्रों आप मेरे इन अनुभवों से कितना इत्फाक रखते हैं ये तो नहीं जानता, ना ही ये जानता हूँ कि इससे सचमुच नए आगंतुकों को कोई लाभ होने वाला है मगर इतना तो सच है ही कि इस naacheez ने जो जाना समझा वो बता दिया।

एक आख़िरी से भी आख़िरी बात यदि आपकी पोस्ट पर कोई टिप्पणी नहीं आ रही है तो भी उदास होने कि कोई बात नहीं यार आफ्टर आल आप कोई आमिर खान तो हो नहीं सो डोंट वोर्री बे हैप्पी

सोमवार, 24 दिसंबर 2007

किताबों से दोस्ती

क्या आपको वे दिन याद हैं , अपने बचपन के जब हम सब शायद आप भी चंदामामा, चंपक , बालभारती, चीतु-नीतू ,और पता नहीं कौन कौन से सबके कितने दीवाने हुआ करते थे । उसके बाद दौर आया कॉमिक्स का वेताल, मेंद्रक, लंबू छोटू, नागराज , और भी ढेर सारे हाँ चाचा चौधरी भी, इस कॉमिक्स के दौर ने तो जैसे सभी बच्चों को बाँध कर रख दिया था। स्कूल की लिब्ररी तक में ये पुस्तकें और कॉमिक्स मंगाये जाती थी।
सोचता हूँ कि काश आज के बच्चों को भी वही सब मिल पाटा , लेकिन क्या ये आज कल के बच्चे जो मोबाईल और इंटरनेट से चिपके रहते हैं उन्हें कॉमिक्स बाँध सकते थे अपने मोह में मगर ये भी तो एक कड़वा सच है कि आज बाल साहित्य के बारे में किसी को कोई चिंता नहीं है , कौन आज सोच रहा है कि बच्चों को क्या मिलना चाहिए और क्या नहीं मिलना चाहिए । हाँ हाल ही में स्कूल शूट आउट वाले हादसे के बाद थोडे दिनों तक ये शोर जारूर मचेगा और फिर सब शांत ।


खैर , मैं इससे अलग एक बात और ये करने आया हूँ कि आज आप हम में से कितने लोग ऐसे हैं जो किताबें पढ़ने का शौक रखते हैं। मैंने शौक सह्ब्द इसलिए इस्तेमाल किया है क्योंकि किताबें पढ़ने का जूनून या आदत तो अब सिर्फ उन लोगों में ही बची है जो या कि जिनका लगाव साहित्य जगत के साथ है। हालांकि कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि ये सारे शौक या आदतें खुद बा खुद आती हैं इन्हें पैदा नहीं किया जा सकता लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता । मैं जब कोल्लेज में था तो जानते हैं मेरी पसंद की किताबें कौन सी होती थी, जी हाँ वही २० -२० रूपये में मिलने वाली वेदप्रकाश शर्मा जी, कर्नल रणजीत के उपन्यास, यदि आप खरीद कर नहीं पढ़ना चाहते तो उन दिनों ये किताबें १ रूपये प्रतिदिन के किराए पर मिल जाया करती थी। नहीं ऐसा नहीं है कि ये किताबें कोई गलत किताबें थी या कि मुझे उन्हें पढ़ने का कोई अफ़सोस है। मगर कालांतर में जब मेरा दायरा बढ़ा तो मेरा परिचय हिन्दी साहित्य ,जिसे विशुद्ध हिन्दी साहित्य ,अंगरेजी साहित्य ,से हुआ। संयोग ऐसा था कि जो पहली किताब मुझे पढ़ने को मिली वो थी धर्मं वीर भारती कि "गुनाहों का देवता" , मेरे ख्याल से यदि किसी को हिन्दी साहित्य के प्रति शुरुआत करवाने हो तो इस से बेहतर किताब दूसरी कोई और नहीं हो सकती । इसके बाद तो जैसे ये एक अनथक सिलसिला शुरू हो गया। राजधानी में रहने के कारण एक ये फायदा और भी हुआ कि शुरू से अब तक सभी दिल्ली पुस्तक मेलों में मैं शामिल हो सका। आज मेरी अपनी लाईब्ररी में लगभग ४०० हिन्दी अंग्रेजी कि पुस्तकें हैं । शिवानी ,प्रेमचंद , हरिवंस्रै बच्हन,नागार्जुन, खुस्वंत सिंह और भी बहुत सारे लेखकों की किताबें हैं।



मैंने ये भी अनुभव किया है कि आपकी कताब पढ़ने की आदत का प्रभाव आपके चरित्र ,आपकी भाषा, आपकी लेखनी, आपके माहौल सब पर पड़ ही जाता है । किसी यात्रा पर निकलूं या कभी घर पर अकेला रहूँ तो किताबें मेरा अच्छा साथ निभाती हैं। हालांकि मैंने हमेशा यही कोशिश की है कि मेरे आसपास जो लोग हैं उन्हें भी पढ़ने का शौक हो मगर कभी कभी तब तकलीफ होती है जब लोग किताबें माँग कर ले तो जाते हैं मगर वापस ही नहीं करते। कुछ एक किताबें तो मुझे दोबारा कह्रीद्नी पडी हैं।

तो आप क्या करते हैं, क्या आप भी किताबें पढ़ते हैं.

रविवार, 23 दिसंबर 2007

एक और saal ख़त्म होने को है

जब से पढाई लिखाई के बाद होश सम्भाला और इस नौकरी चाकरी के चक्कर में पड़े ,उसके बाद जैसा कि हेमेशा होता आया है शादी फिर बच्चे और सब कुछ वैसा ही, तभी से ना जाने ये समय कम्भाक्त जैसे पंख लगा के उड़ता चला जा रहा है । या फिर मुन्हे ऐसा इसलिए लग रहा है क्योंकि मेरी जिन्दगी में एक निश्चिन्तता तो आ ही गयी है , और ऐसा उन्हें ना लगता हो जो अभी भी जीवन के संघर्ष में लगे हों । उन्हें तो शायद इस समय को बिताना ही कठिन लग रहा होगा। जो भी हो इतना तो तय है कि समय तो खिसक खिसक कर नयी नयी तारीखों की तरफ बढ़ता चला जाता है हमेशा।

सोचता हूँ कि साल के अंत आते आते हम क्या सोचने लगते हैं यही ना कि यार देखते देखते ये साल भी बीत गया इस साल में ये नहीं हो पाया या फिर कि चलो इस साल ये काम तो निपट गया। अब अगले साल ये काम भी हो जाएगा या फिर कि अगले साल से ये काम बिल्कुल नहीं करना है , या ये भी चाहे कुछ भी हो जाये इस आने वाले साल में कम से कम ये काम तो करना ही है। सब के मन में यही सब तो चलता रहता है और ये तो हमेशा से चलता आ रहा है।


इस बार मैं सोच रहा था कि हम में से कितने लोग सोचते हैं कि यार इस बार कुछ ऐसा कर पाए जिससे हमारे समाज को हमारे अपनों जो हमारे अपने नहीं थे उन्हें भी कुछ ऐसे मिल पाया जिसके लिए वे हमें याद रख सकते हैं। दरअसल अब हम सबकी जिन्दगी उस जगह पर पहुंच गयी है जहाँ शायद इन सब बातों के लिए किसी के पास फुरसत ही नहीं है, या फिर ये कि ये साड़ी बातें सिर्फ बातों में ही अच्छी लगती हैं। चलिए मान लिया यदि ऐसा भी है तो क्या हम इतना भी नहीं कर सकते कि वे बातें वे काम करने से खुद को बचा सकें जो या जिससे किसी को दुःख या चोट पहुंचे । हाँ ये थोडा मुश्किल जरूर है मगर कोशिश करने से शायद संभव तो है ही।

मुझे ये तो नहीं पता कि अगले साल मैं क्या सब करने वाल हूँ या कि कि मेरे साथ क्या सब होने वाला है मगर इतना तय है कि अपना काम पूरी इमानदारी से करता रहूंगा जैसा करता आ रहा हूँ। घर पर और बाहर भी जो जितना कर सकूंगा वो सब भी करता रहूंगा । हाँ कुछ पुराने रिश्तों कुछ पुराने दोस्तों को दूंध्ने कि कोशिश करूंगा क्योंकि ये ज़िंदगी जितनी दिखाई देती है उससे भी छोटी होती है।


कहिये आप लोग क्या सब करने वाले हैं?

सोमवार, 17 दिसंबर 2007

भाड़ mein जाये धर्म और जाति

मैं सोचता हूँ कि अब वो समय आ ही गया है जब धर्म और जाति जैसी चीजों को हमें अपने बीच से ख़त्म कर देना चाहिए। देखिए ना चारों तरफ आज उसकी वज़ह से सारी मुश्किलें आ रहे हैं। वैसे भी सोचता हूँ कि यार इस धर्म और जाति ने आख़िर क्या ऐसा अनोखा दे दिया आज तक जो यदि मैं इस धर्म और जाति का नहीं होता तो मुझे नहीं मिल पाता।

आज दुनिया में नज़र दौडा कर देखिए जितने भी लफड़े झगडे चल रहे हैं उनमें से ८० प्रतिशत का कारण या तो ये धर्म होगा या जाति होगी। अपने यहाँ गुजरात के चुनाव की बात हो या फिर बार बार आरक्षण के नाम पर होने वाली राजनीती और दंगा फसाद। इस्रैल-फिलिस्तीन का झगडा हो या हाल फिलहाल में चल रह मलासिया में हिन्दू लोगों के साथ होने वाला प्रकरण।

अपने यहाँ तो इस जाति और धर्म को सदियों से पीस पीस कर ऐसा लेप तैयार किया जाता रहा है कि जिसका लेप लगा कर हर कोई अपना मतलब निकालने में लगा हुआ है । चाहे किसी क्स्षेत्र कि राजनीति हो या पूरे देश की बात घुमा-फिरा कर वही धर्म जाति पर आ जाती है। मरा विषय ऐसा है कि आप जब भी इस पर बात करने कि कोशिश करेंगे इतने सारे हिमायती और दुश्मन एक साथ आपके आगे पीछे खडे नज़र आएंगे कि आपको लगेगा कि आपने जरूर इस युग कोई महत्वपूर्ण बात उठा दी है।

हाँ मगर सबसे बड़ी मुसीबत तो ये है कमबख्त इसकी शूरुआत कैसे और कहाँ से की जाये । कहने को मैं ए भी कह दिया है मगर अपने बेटे का सुर्नामे भी तो वही का वही रखा हुआ है । लेकिन सोचता हूँ कि चलो उनके समय तक जब वे भी ऐसा ही सोचेंगे तो कम से कम उन्हें ये दर तो नहीं रहेगा कि पिताश्री क्या सोचेंगे?

वैसे आप क्या सोचते हैं इस बारे में?

रविवार, 16 दिसंबर 2007

टिप्पणियों में कंजूसी क्यों ?

जब से ब्लोग लिखना शुरू किया है एक बात समझ आती है की शायद सब मेरी तरह सबसे पहले यही देखते हैं की जो लिखा था उस पर कोई टिप्पणी आयी या नहीं । और यकीन मानिए जब कोई भी टिप्पणी नहीं आती है तो थोडी सी मायूसी तो सबको होती ही होगी। फिर मैंने सोचा की आख़िर इसकी वजह क्या होती है ।

जहाँ तक मुझे लगता है की इकी कुछ खास वजह तो जरूर होती हैं। पहली ये की जो ब्लॉगर मेरे जैसे कैफे में बैठ कर ब्लोग लिखता होगा उसका पहला काम होता होगा कि जल्द se जल्द अपना चिटठा लिख कर उसे पोस्ट कर दे । उसके बाद यदि समय बचे तो फिर दुसरे का ब्लोग पढ़ कर उसमें टिप्पणी करे। मगर जैसा कि मैं भी पहले टिप्पणी कर ही नहीं पाता था । मगर अब उसका हल निकाल लिया इसलिए अब ब्लोग्गिंग से मैं उतना समय जरूर बचा लेता हूँ कि टिप्पणी कर सकूं।

दूसरी बात लगती है कि इतने सरे ब्लोग में से किसे पढा जाये किस पर टिप्पणी की जाये , किसी किसी का ब्लोग तो खुलने में ही बहुत समय ले लेता है। और फिर चिट्ठे भी थाभी तक दिखाई देते हैं जब तक आपके छिट्ठे को रेप्लास करने के लिए नया चिट्ठा ना आ जाये। इसके लिए अग्ग्रेगातोर्स को कोई ऐसे व्यवस्था करनी चाहिए की एक समय की बाद वही सारे ,या उनमें से कुछ खास अलग से दिखाई दें।

एक सबसे जरूरी बात ये भी की हम सबको ये कोशिश करनी चाहिए की जब भी ब्लोग्गिंग करने आयें कुछ ना कुछ टिप्पणियाँ भी जरूर करें । जरूरी नहीं कि टिप्पणी बहुत लम्बी हो .फिर चाहे वो मात्र एक शब्द ही क्यों ना हो ।

मैं तो कम से कम यही करने वाला हूँ

शनिवार, 15 दिसंबर 2007

में aur meri ईमानदारी

में ऊस जगह पर काम करता हूँ जहाँ के लिए कहा जाता है कि वहाँ की तो दीवारें भी पैसे मांगती हैं, जी हाँ सही समझे आप -अदालत। आसपास पाटा हूँ देखता हूँ जिससे भी पूछता हूँ तो वही कहता है सच तो है अदालत में कोई काम बिना पैसे के होता है। में पिछले दस वर्षों से वहीं तो काम कर रहा हूँ। और यकीन मानिए मेरा अनुभव तो कुछ और ही कहता है ।

मेरी ईमानदारी पैसे ना लेने की तो सभी को पसंद है ,उससे किसी को कोई दिक्कत भी नहीं है ,हाँ जहाँ ये ईमानदारी किसी के लिए गलत काम करने से मना करती है वहीं से लोगों को परेशानी शुरू हो जाती है। लोग गुस्स्से में कभी मुझे nakchada ,जिद्दी ,अखाद्द, तो कोई दूसरा गाँधी कहता है। लोगों की खीज सिर्फ इस बात को लेकर रहती है कि में उनके गलत काम को करने से मना क्यों कर देता हूँ विशेषकर तब जब सभी ये मज़े से कर रहे हैं।

लेकिन सबसे जरूरी बात तो ये है कि ईमानदारी के जज्बे से दिल के अन्दर जो उर्जा होती है, आत्मा के भीतर जो प्रकाश होता haiहै, वो आपको खुद पर फक्र करने का एहसास दिलाता है। यदि आप सब जैसे हैं तो सभी में शामिल हैं यानी सब में से एक हैं किन्तु यदि आप सिर्फ खुद जैसे हैं और खुद्दार भी तो यकीन जानिए सबको लगता है कि आप कुछ खास हैं। मेरे दोस्तों,साथ काम करने वालों, मेरे अधिकारियों और मेरे मातहतों को भी पता है मेरे प्रकृति। तिस पर यदि कोई अपना काम भी विशेषज्ञता से पूर्ण करे तो सोने पे सुहागा है। में तो अपनी ईमानदारी से खुश हूँ।

बुधवार, 12 दिसंबर 2007

कुछ बातें ब्लोग पर

इन दिनों ब्लोग लेखन पर काफी कुछ पढ़ने सुनने को मिल रहा है। ज़ाहिर है कि हर नई चीज़ पर आने वाली प्रतिक्रियाओं की तरह ब्लोग लेखन पर भी सबकी मिश्रित राय आ रही है। इसे जानने समझने वाले लोग इसकी ताक़त और प्रभाव को अभिव्यक्ती के क्षेत्र में एक नई क्रांति के रुप में देख व परख रहे हैं। उन्हें भरोसा है कि आने वाले समय में ब्लोग जगत , संचार, अभिव्यक्ति , साहित्य, व स्राज्नात्मक्ता का एक ऐसा संगम बन चुका होगा जिसकी उपेक्षा करना असंभव होगा। और तब शायद ब्लोग लिखने वालों को ये अफ़सोस भी नहीं होगा कि ब्लोगियों को कोई गंभीरता से नहीं लेटा और ना ही उन्हें अपने ब्लोग पर टिप्पिनियोंके आने का इंतज़ार तथा टिप्पणियों के ना मिलने पर दुःख होगा।



वहीं दुसरी तरफ ब्लोग को आलोचनात्मक दृष्टिकोण से देखने वालों के पास भी बहुत से कारण हैं। पहली शिक़ायत ये कि बहुत से लोगों विशेषकर बड़ी हस्तियों पर ये आरोप लगता है कि वे ब्लोग का इस्तेमाल किसी अन्य हितों या पुब्लिसिटी स्टंट के लिए कर रहे हैं , ऊपर से ये भी कि ब्लोग पर नाम सिर्फ उनका होता है ,विचार और लेखनी किसी और की। छित्थाकारी की दूसरी आलोचना ये की जाती है कि प्रसार और पाठक के लिहाज़ से इसकी पहुंच बहुत सीमित है। तीसरा ये कि ब्लोग पर आने वाली सामग्री बिखरी हुई, अनियंत्रित एवं निरर्थक होती है।

किन्तु इन आलोचनाओं के बावजूद कुछ बातें तो निश्चित हो चुकी हैं। ब्लोग और ब्लोग जगत की लोकप्रियता और दिनानुदिन बढ़ता जा रहा है। इसका प्रमाण ये है कि मीडिया के विभिन्न माध्यमों में इसकी निरंतर चर्चा होने लगी है। यदि बड़ी और नामी शाख्शियातें किसी भी रुप में और किसी भी उद्देश्य से ब्लोग्गिंग से जुड़ती हैं तो इससे अंततः ब्लोग जगत को यदि फायदा न हो तो नुकसान भी नहीं ही होगा। रही बात इस पर आने वाली सामग्री की तो ये तय कौन करेगा की कौन सी सामग्री स्तरीय है कौन सी बेकार स्वयम ब्लोगिए ही न। तो फिर जब उन्हें ही ये सब तय करना है तो व्यर्थ में इसके अन्यत्र चर्चा क्यों?

जो भी हो अन्तिम सत्य यही है कि छित्थाकारी एक विधा के रुप में स्थापित हो रही है और भविष्य में शासक्त संचार माध्यम के रुप में मान्यता पा ही लेगी.

रविवार, 9 दिसंबर 2007

उफ़ ये क्रिकेट कथा

इस देश में कुछ न कुछ ऐसा चलता रहता है कि मन करता है कि अब तो साल के ३६५ दिन, २४ जानते कमेंट्री करने वाला संजय (महाभारत के लाईव कमेंटेटर ) टाईप कमेंटेटर चाहिए होगा। यार खेल तो खेल ये बोर्ड और इसे चलाने वाले ब्लैक बोर्ड महारथी भी गुलातियाँ मार-मार कर क्रिकेट को ख़बरों में रखते हैं। कभी कोच, कभी कैप्टेन कभी खिलाडियों के एड पर नाराजगी तो कभी सेलेक्टर के कोलौमं लिखने पर पाबंदी।


अभी पवार साहब , वेंग्सर्कार साहब पर बिगड़ गए। उनका कहना था कि भाई आप सेलेक्टर हैं तो कोलौमं नहीं लिख सकते , ये आपका मुख्य काम नहीं है।

इस संबंध में मुझे सिर्फ दो बातें कहनी हैं पहली वेंगसरकर साहब से- अजी कर्नल साहब ,छोडिये कोलौमं-शोलौमं का झंझट, अजी आप भी हमारी तरह ब्लोग लिखिए। दूसरी बात पवार साहब के लिए- " सर जी , कर्नल साहब का मुख्य काम क्रिकेट है कोलौमं लिखना नहीं , बिल्कुल सही फरमाया आपने। मगर हुज़ूर फिर आपका भी मुख्य काम तो पोलिटिक्स में गंद फैलाने का है। तो महाशय , वहीं पर ये फैलाये ना, क्रिकेट जगत से आपका क्या लेना-देना। तो जब आप यहाँ घुसे हुए हैं तो कर्नल से कोलौमं के कनेक्शन पर ये कोम्प्लैंत क्यों?

सोमवार, 3 दिसंबर 2007

काके भैया नहीं रहे

दोपहर ढाई बजे अचानक फ़ोन बजा, " हेलो , सुन रहे हो काके भैया नहीं रहे ।"

क्या बकवास कर रही हो , मैंने अपनी पत्नी से यही कहा। बात इतनी अप्र्ताषित थी कि मेरे मुँह से यही निकला।

काके भैया , नहीं कोई बहुत बड़ी हस्ती नहीं थे, ना ही सीधे तौर पर हमारा कोई संबंध था। दरअसल वो मेरे साडू साहब के छोटे भाए साहब थे । हमसे उनका वाकिफाना कुछ इस लिए था क्योंकि हमारे सभी विशेष पलों ,खास समारोहों को उन्होने ही सहेज कर हमें सौंप दिया था। उनका फोटोग्राफी /विदेओग्रफी का काम था।

मगर मेरी हैरानी का कारण कुछ और था, ये कैसे हो सकता था, अभी पिछले शनिवार को तो उनके पिताजी का निधन हुआ था। अभी तो उनकी कीरिया भी नहीं हो पायी थी और फिर अभी कल ही तो उनसे मुलाक़ात हुई थी , पैरों का प्लास्टर उतर गया था , और टांका भी काट दिया था डाक्टर ने और कहा था कि अब हलकी हलकी कसरत करवाते रहे पैरों कि। दरअसल पिताजी कि बीमारी के समय ही उनके लिए दवाई लाते समय उनका एक्सीडेंट हो गया था, मगर सब कुछ तो ठीक हो गया था। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया।

घर पहुंचा तो पता चला कि हार्ट अटैक हुआ था , इससे पहले कि कोई कुछ समझ या कर पाटा सब कुछ ख़त्म हो चुका था। डॉक्टरों का कहना था कि हॉस्पिटल लाने से पहले ही वे जा चुके थे।

उफ़, मगर उन्हें मरने का अभी कोई हक नहीं था , घर की रीढ़ की हड्डी टूट गयी। किसी ने कहा कि पिताजी को अन्तिम समय में पाकर भी वे उनके लिए कुछ ना कर पाए यहाँ तक कि शमशान घात तक भी उन्हें बड़ी मुश्किल से गाडी में ले जाया जा सका था , इस बात को वे दिल से लगा बैठे थे । मगर के पिटा के प्रति इतनी आसक्ति ने उनको इतना परेशान कर दिया कि वे अपने जुद्वान बच्चों को अनाथ छोड़ चले गए।

उनकी मौत ने सचमुच हिला कर रख दिया। मैं इश्वर से सिर्फ यही कह रहा था कि हे इश्वर यदि यूं ही अकाल मौत देनी है तो कम से कम उसे आने वाली मौत का अहसास तो दे दिया कर और इतना वक़्त भी कि वो कम से कम वो काम कर ले जो उसके अपनों को थोडा सुकून दे सकें,
मगर इश्वर मेरी सुनता कहाँ है। किसी अपने का जाना वो भी इस तरह , बहुत दर्द देता है।

शनिवार, 1 दिसंबर 2007

दिल्ली : बेहतर या बदतर ?

इन दिनों चारों तरफ यही चर्चा है कि दिल्ली सुन्दर बन रही है, सज सवांर रही है और जल्दी ही दिल्ली-दिल्ली नहीं रहेगी । चाहे लंदन बन जाये या हो सकता है कि परिस जैसी लगे मगर यकीनी तौर पर दिल्ली नहीं रहेगी। यार, आख़िर ऐसा हो क्या रहा है ? ठीक है मेट्रो बन रही है, फ्लाई ओवोरों का जाल बिछाया जा रहा है। बडे बडे मुल्तिप्लेक्स और शोप्पिं मॉल्स बन रहे हैं। रिलायंस फ्रेश और एप्पल फ्रेश में फ्रेश लड़के-लड़कियां सबकुछ बेच रहे हैं। मोबाईल,कोम्पुटर से तरकारी-भाजी तक। हमारी दिल्ली में अब तो विदेशों तक से लड़कियां आ रही है सेक्स रैकेट चलाने। लोग सड़कों पर गाडियाँ भी इसी स्पीड से दौडा रहे है मानो पैरिस -लंदन हों।

हाँ मगर अब भी दिल्ली का कोई चौराहा ऐसा नहीं है जहाँ पर भिखारी ना मिलते हों। अब भी दिल्ली का कोई कोना ऐसा नहीं है जहाँ बिजली पानी कि किल्लत ना हो रही हो। अब भी कोई हफ्ता ऐसा नहीं बीतता जब किसी ना किसी सड़क पर घंटों जाम ना लगता हो । अब भी कोई ऐसी जगह नहीं है जहाँ पर गाडियाँ
चोरी ना हो रहीं हों , महिलायें बिल्कुल सुरक्षित महसूस करती हों, कोई ऐसी सड़क नहीं है जहाँ पर रोड एक्सीडेंट ना हो रहे हों। कोई ऐसा ऑफिस नहीं है जहाँ पर बिना सिफारिश या बिना पैसे के आपका काम हो जाये , कोई ऐसा हॉस्पिटल नहीं है जहाँ जाते ही आपका इलाज हो जाये ?

तो ऐसे में तो दो ही बातें हो सकती हैं कि या तो ये सारी बातें पैरिस -लंदन में भी होती होंगी , या फिर
सब झूठ कह रहे हैं और दिल्ली दिल्ली ही रहेगी। आपको क्या लगता है ?
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