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प्रचार खिडकी

सोमवार, 17 मार्च 2008

यार सुना है कि ........

मैं चाहता हूँ,
कि कोई मुझसे,
मोहब्बत करके ,मुझे,
ठोकर मार दे,
मैं टूट कर ,
बिखर जाऊं,
यार, सुना है कि,
दीवाने ,
अच्छा लिखते हैं॥

मैं सोचता हूँ,
कि, क्यों न,
एक बार , मैं भी,
मर कर देखूं,
यार , सुना है कि ,
मरने के बाद,
हर इंसान को,
अच्छा कहते हैं॥

मैं चाहता हूँ,
कि लिखूं,
खूब अंट-शंट ,
सनसनाता साहित्य,
यार सुना है कि,
नाम- दाम भी,
मिलता है, और यूं,
लोग खूब छपते हैं॥

काश कि मिलता,
कोई गुनी चिकित्सक,
तो उससे इलाज ,
करवाता क़ानून का,
यार सुना है कि,
इसके हाथ बड़े-लंबे,
मगर आँख-कान,
काम नहीं करते हैं...

पता नहीं, मैं भी क्या-क्या सुनता रहता हूँ।

अगला पन्ना ,:- लो जी , स्यापा पै गया (व्यंग्य )

रविवार, 16 मार्च 2008

टिपियाने का (अजी टिप्प्न्नी करने का ) अपना मज़ा है

पिछले कुछ दिनों से देख और पढ़ रहा हूँ की इधर कुछ लोगों ने टिप्प्न्नी करने को लेकर काफी कुछ लिखा है, हालांकि इससे पहले मैं भी इस विषय पर एक आध बार लिख चुका हूँ , परन्तु आज टिप्प्न्नी करने के अनुभव और उसमें मिलने वाले आनंद पर कुछ बातें आपसे बाटनें का मन कर रहा है। दरअसल इस ब्लॉगजगत में हमारी घुसुउआत ( अजी शुरू शुरू में कहीं अन्यास ही घुस जाने को ही घुसुआत कहते हैं ) बिल्कुल अप्रत्याशित और एक अनादी की तरह हुई थी, इससे पहले सिर्फ़ पत्नी के शब्दों में कहूं तो कागज़ काले करते रहते थे, फ़िर अचानक इस ब्लॉगजगत की अनोखी दुनिया का पता चला , एक मित्र की मदद से जी मेल बनी और फ़िर ब्लॉग भी।

शुरूआत में बस पोस्ट लिख कर चले आते थे , हालांकि कभी कभार दूसरों की पोस्ट भी पढ़ते थे मगर टिप्प्न्नी करने की गुस्ताखी कभी नहीं करते थे, धीरे धीरे हमें लगने लगा की यार ये खामखा ही पोस्ट बॉक्स नम्बर ले लिए कम्भाक्त डाक में एक पोस्ट कार्ड भी नहीं होता। जी हाँ हमारी सभी पोस्टें कोरी कवान्री रहती कहीं कोई तिप्न्नी नहीं रहती ऐसा लगता की हमने भी अपने आँगन में कोई अछूत कन्या पाल ली है। फ़िर ये निराशा थोड़ी नाराजगी में बदलने लगी , मैंने कहा कमाल है यार क्या मैं इतना बुरा लिखता हूँ की कोई पढता ही नहीं और यदि पढता है तो कुछ कहता ही नहीं है। मगर थोडा और सोचा तो अन्दर से आवाज़ आई की भैया आप पहले ये बताओ की क्या टिप्प्न्नी करने का ठेका दूसरे लोगों ने ही ले रखा है आप के हाथों में क्या मेहेंदी लगी है, या अपने आपको बिपासा बासु और आमिर खान समझते हो की सब यूं ही टिप्प्न्नी करते रहेंगे। बस हमने तय कर लिया की जितना समय हम लिखने पर देंगे उतना ही समय टिप्प्न्नी करने पर भी देंगे। इसमें हमें सबसे ज्यादा प्रभावित की महाराज अन्त्रिख्स के प्राणी, अपने उड़नतश्तरी , जी ने, अजी शायद ही कोई ब्लॉगर होगा जिसकी धरती पर ये उड़नतश्तरी ना उतारी हो। खैर , हमारा ये प्रयास बिल्कुल रंग लाया।

मुझे टिप्प्न्नी करने के अनेक लाभ हुए , पहला तो यही हुआ की चाहे उत्सुकतावश ही सही उन लोगों ने मेरा ब्लॉग भी पढ़ कर देखा जिनके ब्लॉग पढ़ कर मैंने टिप्प्न्नी की थी। दूसरी बात ये हुई की जल्दी ही एक दायरा सा बन गया और नित ल्नाये लोग या कहूँ की दोस्त उस दायरे के भीतर आने लगे, मुझे प्रशंशा , आलोचना, सुझाव और शिकायत भी मिलने लगी। ये क्रम अब भी जारी है और अब तो और भी बढेगा।

टिप्प्न्नी के सम्बन्ध में एक और बात , यूं तो टिप्प्न्नी कैसी भी हो , कुछ भी aछी लगती ही है , मगर कोशिश ये करनी चाहिए की टिप्प्न्नी भी मजेदार हो ऐसी की पढने वाला भी सोचे यार ये कौन है बन्दा , सिर खा रहा है , देखें इसका भी प्रोफाईल। और हाँ कई बार ऐसा होता है की हम जिस पोस्ट के लिए सोचते हैं की इसपर टिप्प्न्नी आयेगी खूब सारी आयेगी , उसपर बस एक अंडा बना रह जाता है , तो कोई बातअत नहीं ऐसा भी होता है यार। और हाँ ये वर्ड वेरीफिकेशन या फ़िर सिर्फ़ ब्लॉगर वाले ही टिप्प्न्नी कर सकते हैं, या फ़िर ये की किसी पुरानी पोस्ट पर कोई टिप्प्न्नी आए , तो इन सबके लिए हमारे aggregatars को कुछ न कुछ तो करना ही चाहिए , अन्यथा मुझे जैसे भैंसा लोटन ब्लॉगर को क्या दिक्कत आती है वो तो मुझ जैसा ही कोई जानता होगा.

शनिवार, 15 मार्च 2008

झूठ कहता है ये आईना (एक कविता या पता नहीं क्या )

मुझे शिकायत,
रहती है,
अपने,
आईने से,
जो मेरे ।
आसपास,
रहते हैं,
वो सच,
कहते हैं, कि,
मैं कितना ,
अच्छा और,
सच्चा हूँ,
मगर ये,
आईना जो,
मेरे सामने,
रहकर भी,
झूठ पर झूठ,
कहता है, कि,
मैं जो दिखता हूँ,
वो नहीं हूँ...

ये आईना मुझसे अक्सर झूठ क्यों कहता है , क्या आपको पता है ?

मेरा अगला पन्ना :- टिपयाने का (अरे त्तिप्प्न्नी करने का यार,) अपना ही मज़ा है .

शुक्रवार, 14 मार्च 2008

लादेन की मिस कॉल (व्यंग्य )

कल अचानक लादेन की मिस कॉल आ गयी। हाँ तो, आपको क्या लगता है की वो ससुरा अपना कॉल लगा कर मुझसे बात करेगा। नहीं जी, कहता है की मिस कॉल में कॉल ट्रेस करने का लफडा ज़रा कम रहता है। मैंने कहा की यार तू तो इतनी छोटी कॉल करता है की कई बार तो मैं भी ट्रेस नहीं कर पाटा, खैर। पलट कर मैंने भी फोन किया मगर अपने मोबाईल से थोड़ी , लोकल बूथ वाले सिक्के वाली कॉल से।

क्यों भाई लादेन , आज कैसे याद कर लिए, कहाँ हो, आज्ल्कल दिख्बे नहीं करते हो, ना टेप , न विडो न कोई बयान कोई धमकी भी नहीं का बात है सब ठीक है न , कहीं होली के मौसम में तबियात न न ख़राब कर बैठे हो।?

अरे का बतायें , हम त अपने टेंसन में हमको तो ई अमरीकवा वाला सब भी भूल-बिसर गया है। ससुरा सब लागल है अपना राष्ट्रपती के चुनाव में आ वाहून तालिबान , लादेन का कौनो चर्चा नहीं मुद्दा नहीं। ई एफ बी आई वाला सब भी हफ्ता में एक बार झूठ मूठ हमरे ख़बर हमरा पता के बारे में बोळ bओल कर हमको फैमस कर रहा था अब एक्दुमे चुप है।

लेकिन सुने थे की तुम तो पाकिस्तान में कहीं पर भाडा का घर में रह रहे हो ।

अरे छोड़ यार ई पाकिस्तान वाला बात, बता बेनजीर वाला इतना बडका काण्ड हुआ आ ऊ मुश्रफ्फ्वा कम से कम झूठ मूठ में ही सही हमरा नाम ले देता, पता नहीं कौन लल्लू पंजू गैंग का नाम ले लिया, अब त अपने लफडा में फंसा हुआ है, कह रहा था भैया हमरा यहाँ से रिटायर होने का टाईम आ रहा है , आका चेला बन जायेंगे।

लेकिन तुम्हरा भी तो गलती है तुम आज कल अपना टेप आ एल्बम वाला प्रोग्राम भी त नहीं pएश कर रहे हो।

यार ई में तो तुम लोग का टी वी वाला सब का बदमाशी है यार , एकदम धोखा धदी वाला बात है, अब कहता है की छोडो दादा , अब त तुम्हरा टेप से बढियां राखी सावंत का छोटा सा साक्षात्कार से हम लोग का टी आर पी बढ़ जाता है. अब त तुम्ही बताओ की का काम करें की कुछ त फैमस हो जाएँ पहले की तरह.

देखो भैया अब इतना कह रहो हो तो हमारी मनो तो तुम भी ब्लोग्गिंग शुरू कर दो , यार कम से कम हम लोग के बीच त फैमस हो ही जाओगे. और यदि तुमने अपनी बेगमों और बच्चों को pअसंद की घंटी बजाने के लिए कह दिया तो यकीन मानो यहाँ सब ब्लॉगर पिछड़ जायेंगे, सब का घंटी बज जायेगा, कहो का कहते हो.

अच्छा यार अगला बार मिस कॉल करेंगे त फ़िर बताना की ई सब कैसे होगा ?

गुरुवार, 13 मार्च 2008

हम लोग गंदगी पसंद लोग हैं या कहूँ की सूअर हैं.

कल किसी मित्र को छोड़ने के लिए स्टेशन जाना पडा, यूं तो स्टेशन की भीड़ भाड़ में सिर्फ़ एक ही बात दिमाग में घूमती रहती है वो ये की किस तरह आप ख़ुद या की जिसके लिए आप वहाँ गए है वो सुरक्षित अपनी गाडी में बैठ जाएँ, किंतु चूँकि गाडी के प्लत्फोर्म पर आने में अभी वक्त था तो अनायास ही नज़र इधर उधर दौड़ने लगी, देखा तो चारों तरफ़ भांति भांति के कुदे और कचरे का अम्बार लगा था तिस पर लोगों ने अपने गुटखे पान के पीक की आधुनिक या पुरातन जो भी आप समझें चित्रकारी कर रखी थी । मेरा ध्यान इसलिए भी आज ज्यादा उस और जा रहा था क्योंकि कुछ देर पहले ही मैं समाचारों में देख पढ़ कर आ रहा था की दिल्ली सरकार ने आज ही ये फैसला लिया था की आने वाले कुछ महीनों में सड़कों पर या कहूँ की खुली जगह पर गंदगी फैलाने वालों पर , थूकने वालों पर , या मल मूत्र करने वालों को वहीं पकड़ कर जुर्माना और दण्डित किया जायेगा। मैं सोचने लगा की क्या ये पहली बार होगा, और क्या इससे कोई फर्क पडेगा, मुझे तो कम से कम ऐसा नहीं लगा। थोड़ी देर बाद पानी भरने के लिए मैं नलके के पास गया वहाँ एक सज्जन मेरे सामने ही उस नलके से पानी ले ले कर मुंह हाथ धोने के अलावा चेहरे और नाक कान गले की सारी सफाई करने लगे, मुझसे रहा नहीं गया और सिर्फ़ मेरे नाराज़ नज़रों को भांप कर फट से उन्होंने कहा, " भइया हिन्दुस्तान में पैदा हुए हो तो gअन्दगी में रहने की aआदत डाल लो " मैं हक्का बका ये सोच रहा था की हम क्या सचमुच गंदगी पसंद लोग बन गए है, या कहूँ की सूअर बन गए है।

एक छोटी सी कहानी आपको सुनाता हूँ । एक बार एक बहुत बड़ा सेठ मरने से पहले अपने चारों बेटों को बुलाता है और कहता है की बेटा मरने के लगभग पाँच वर्षों के बाद मैं अमुक आदमी के यहाँ सूअर के रूप में जन्म लूंगा और मेरे कान के नीचे एक काला दाग होगा , तुम चारों मुझे पहचान कर वहाँ से ले आना और मार देना ताकि पुनः अगला जन्म मैं किसी अच्छे रूप में ले सकूं। जैसा उस सेठ ने कहा था वैसा ही हुआ, लगभग पांच वर्षों बाद जब उसके चारों बेटे उस व्यक्ति के पास पहुंचे और उसे सारी बात बताई तो वह व्यक्ति चकित होकर बोला आप इन्हें ले जा सकते है, जैसे ही वे चारों अपने सूअर बने पिता के पास उसे ले जाने को पहुंचे उस सूअर ने कहा, बेटा मैं तुम चारों को पहचान गया और अपनी कही बात भी मुझे ध्यान है मगर अब मुझे यहीं रहने दो मुझे इस गंदगी की आदत हो गयी है ॥ चारों बेटे वापस लौट गए।

तो ये अब आपको और हमें सोचना है की क्या वाकई हम सूअर बनते जा रहे है, सरकार के नियम और क़ानून किसी भी व्यक्ति किसी भी समाज और किसी भी देश को एक दिशा तो दे सकते है परन्तु संस्कार और व्यवहार तो हमें ख़ुद ही बनाने होंगे.

बुधवार, 12 मार्च 2008

हर आदमी कतार में है.

भीड़ से भरी ये दुनिया,
फ़िर भी है जल्दी में दुनिया,
बेचैनी सी छाई ,
संसार में है,
मैं क्यों रहूँ,
परेशान,
की जानता हूँ,
आज हर आदमी,
कतार में है॥

कोई खुशी -गम के,
कोई सुख-दुःख,
कोई लड़ रहा है,
जिंदगी से,
कोई मौत के,
इंतज़ार में है॥

कोई धारा के बीच,
कोई तूफानों में,
किसी को मिला,
मांझी का साथ,
किसी के सिर्फ़,
पतवार है हाथ,
सच है तो इतना,
हर कोई मंझधार में है॥

सबकी सीरत एक सी,
और सूरत पे,
अलग-अलग,
चढा हुआ नकाब है,
किसी एक की बात,
क्यों करें, जब,
पूरी कौम ही ख़राब है।
फर्क है तो ,
सिर्फ़ इतना कि,
कोई विपक्ष में है बैठा,
कोई सरकार में है॥

हर कोई आज किसी न किसी कतार में है , क्यों है न ?

रविवार, 9 मार्च 2008

कलम उनकी कातिल है.

कलम उनकी,
कातिल है ,
हम रोज मरते हैं॥

कुछ कही,
और अनकही,
हम रोज पढ़ते हैं॥

कभी दोस्त,
कभी दुश्मन बनके,
हम रोज मिलते हैं॥

कभी दिखने को,
कभी बिकने को,
हम रोज सजते हैं॥

एक जगह पर,
रुक कर भी,
हम रोज चलते हैं॥

मैल बनी चमड़ी , उतरती नहीं,
वैसे तो ख़ुद को ,
हम रोज मलते हैं।

कभी अपनों से,
कभी अपने आप से,
हम रोज जलते हैं॥

नींद ख़राब है, कि सोच हमारी,
अब तो सपनो में,
हम रोज़ डरते हैं.

शनिवार, 8 मार्च 2008

आओ , खेलें, महिला दिवस-महिला दिवस.

सच कहते हैं भाई की दुनिया गोल है । अजी मेरे विचार से सिर्फ़ दुनिया नहीं बल्कि सब कुछ गो है तभी टू शायद हम घूम फ़िर कर वहीं पहुँच जाते हैं। अभी तो साल ठीक से शुरू भी नहीं हुआ , बसंत खिला नहीं, गुलाल उड़ा नहीं, मगर खेल सारे शुरू हो गए हैं। अभी क्रिकेट का खेल ख़त्म हुआ और सब महिला दिवस-महिला दिवस , खेलने लगे। नहीं जी ये हमारे खो-खो और गुल्ली-डंडे जैसा छोटा मोटा खेल नहीं है , ये तो अंतर्राष्ट्रीय लेवल का खेल है। जी हां ये अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है।

हां, हाँ, हमें पता है आप कहेंगे की जब इस देश की पहली महिला आई पी एस के साथ अन्याय होते रहने के बावजूद पूद्रे देश के मौन रहने के कारण उसे अपना पड़ छोड़ना पडा, जब अत्याचार से तंग होकर एक महिला निर्वस्त्र होकर सड़कों पर दौड़ती है, जब ये देश कन्या भ्रूण हत्या और दहेज़ हत्या के नित नए रेकोर्ड बना रहा है, पूरे नारी समाज को एक उत्पाद की तरह पेश किया जा रहा है , और ये सब टैब हो रहा है जब, राजनीती, समाज ,खेल,रंगमंच, सुरक्षा, मनोरंजन, किसी भी क्षेत्र में महिला किसी और से पीछे नहीं है तो, फ़िर इस महिला दिवस का औचित्य क्या और अर्थ क्या ??

शहर से बाहर निकलिए, गाँव-कस्बों में जाकर देखिये औरत समाज की हकीकत , उनका हसला , हिम्मत और हालत जब तक वो आगे नहीं बढ़ेंगी, आगे नहीं आयेंगी। तक तक लाख खेलिए आप महिला दिवस -महिला दिवस बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं आने वाला।
ये हो सकता है हमारी महिला लेख्किकाओं को मेरा ये नज़रिया ज्यादा ही नकारात्मक लगे तो उनसे में अग्रिम क्षमा चाहूँगा, मगर मुझे लगता है की अभी भी बहुत कुछ करना है और जो हो रहा है उसकी भी दिशा ठीक करने की जरूरत है..

शुक्रवार, 7 मार्च 2008

ब्लॉगजगत और मीडिया

कुछ भी लिखने से पहले स्पष्ट कर दूँ कि, यहाँ इस पोस्ट को लिखने के पीछे मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है कि मैं मीडिया और ब्लॉगजगत को आमने-सामने कर रहा हूँ या कि कोई तुलना करने बैठा हूँ। मैं पिछले काफी समय से किसी न किसी रूप में या कहूं कि कई रूपों में जुदा हुआ हूँ और पिछले कुछ समय से यहाँ इस ब्लॉगजगत पर भी इतना समय टू बिता हे चुका हूँ कि दोनों अनुभव को साथ साथ देख सकूं। यकायक दिमाग में ख्याल आया कि देखें दोनों के बारे में यदि एक साथ सोचा जाए तो क्या कुछ बाहर निकलता है।

प्रसार - प्रसार के मामले में ब्लॉगजगत अभी मीडिया के किसी भी माध्यम से कोसों पीछे है , वहाँ पाठकों, श्रोताओं, या दर्शकों की संख्या ब्लॉगजगत से बहुत ज्यादा है। ये बात शत प्रतिशत ठीक है। मगर, हाँ मगर, एक बात तो ऐसी है जिस पर ब्लॉगजगत इतरा सकता है, वो ये कि सुदूर कसबे में बैठ कर अपने मन की लिखने वाले पाठक को अगले ही पल विश्व के बहुत से कोनो में पढा जाने लगता है।

सामग्री - दोनों में काफी फर्क है। ब्लॉगजगत पर तो श्रव्य, दृश्य, पाठ्य, और न नान कौन -कौन सी, कैसी-कैसी सामग्री एक साथ उपलब्ध है वो भी चिरकाल तक, सुंदर आकर्षक रूप में। मीडिया की सामग्री कुछ वर्गों को छोड़कर स्तरहीन हो गयी है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया की तो बात करने भी औचित्याहीन है।

महिलाओं की सक्रियता - ब्लॉगजगत पर थोड़ी देर तक रहने के बाद ही किसी को भी ये एहसास हो जाता है कि महिलाएं कितनी संजीदगी से ब्लॉगजगत पर अपनी सक्रियता से ब्लॉगजगत की सार्थकता को बढ़ा रही हैं। और अब तो इसकी चर्चा भी होने लगी है। दूसरी तरफ मीडिया के किसी भी माध्यम में महिलाओं का उतना ही शोषण किया जा रहा है जितना किसी भी अन्य संस्थान या व्यवसाय या क्षेत्र में, ये हो सकता है कि ऐसा सबके साथ न हो पर अधिकांश के साथ तो हो ही रहा है।

भविष्य - एक यही वो जगह है जहाँ आकर मुझे लगा कि दोनों ही लगभग एक जगह पर हैं, मीडिया का इतना प्रसार होने के बावजूद आज भी इसका फैलाव जारी है और जहाँ तक ब्लॉगजगत की बात है तो उसकी तो अभी शुरूआत है और अग आगे देखिये कि कितना धमाल मचने वाला है।

यानि कुल मिला कर देखूं तो यही लगता है कि देर सवेर हिन्दी ब्लॉगजगत अपनी धमक का एहसास कराने वाला है हालांकि अभी दिल्ली दूर नहीं बल्कि बहुत दूर है.

बुधवार, 5 मार्च 2008

में खुद को ही प्यार करने लगा

जब लगे,
दुत्कारने,
मुझको सभी,
परित्यक्त ,
सा हर कोई,
व्यवहार करने लगा॥

खुद को,
उठाया,
गले से,
लगाया,
में खुद ,
खुद को,
ही प्यार करने लगा॥

जीता रहा,
जिस दुनिया को,
अपने,
सीने से लगाए,
मुझे अपने से,
दूर जब ये,
संसार करने लगा॥

खुद को,
सम्भाला,
संवारा-सराहा,
स्नेह से,
पुचकारा,
खुद को ही,
लाड करने लगा॥

उसने इतना,
दिया नहीं मौका,
कि उसे,
कह पाता,
मैं बेवफा,
तो खुद ,
आईने में,
अपने अक्स से,
मोहब्बत का,
इजहार करने लगा।

क्या करता सोचा चलो कोई तो होना ही चाहिए प्यार करने वाला तो मैं खुद ही क्यों ना

मंगलवार, 4 मार्च 2008

तेरे बिना

तेरे बिना,
मेरे घर को,
रोशन नहीं,
करतें हैं,
दिन के,
उजाले भी॥

तेरे बिना,
मुझ से,
नहीं संभलती,
खुशियाँ,
मेरे संभाले भी॥

तेरे बिना,
कहाँ सुरूर,
दे पाते हैं,
पैमाने और,
प्याले भी॥

तेरे बिना,
मुमकिन नहीं था,
कि कहलाते , कभी,
बेवफा भी,
दिलवाले भी॥

तेरे बिना,
कहाँ दस्तक
देती है खुशी,
कहाँ टलते हैं,
गम, मुझ अकेले ,
के टाले भी..

तेरे बिना,
पानी का सोता,
प्यास नहीं बुझाता,
भूख नहीं मिटाते,
रोटी के,
निवाले भी॥

मुझे मंज़ूर है,
उससे ,
बगावत भी ,
तेरे बिना,
नहीं करूंगा,
मैं ख़ुद को,
खुदा के,
हवाले भी॥

हाँ सच, तेरे बिना मेरा वजूद ही कहीं नहीं है.........................

सोमवार, 3 मार्च 2008

कमजोर हिन्दी नहीं हम हैं ?

मैं ये बातें तब करना चाहता था जब देश में हिन्दी दिवस, हिन्दी पखवाडा या की हिन्दी माह मनाने का दिखावा किया जाता है, क्योंकि हमेशा इसके पीछे सिर्फ़ एक ही तर्क दिया जाता है कि ये सब हिन्दी को उसकी खोई हुई गरिमा दिलाने , या फिर की उसका सही स्थान दिलाने , या यूं कहें की उसे राष्ट्रीय भाषा के रूप में पहचान दिलाने के लिए किया जाता है और ना जाने कब से किया जा रहा है। मगर जब से मैंने होश सम्भाला है तब से तो मैं यही देख रहा हूँ , और तभी से मुझे कभी भी और कैसे भी ये नहीं लगा कि हिन्दी कमजोर है । किससे कमजोर है ? अंग्रेज़ी से , या किसी क्षेतिर्य भाषा से , या फिर अपने आप से ही। यहाँ भी हमारे कई चिट्ठाकारों ने हिन्दी भाषा की दिशा और दशा पर बहुत कुछ लिखा है और कईयों ने तो यहाँ तक उम्मीद जताई है कि एक न एक दिन हम हिन्दी को उसकी इज्ज़त दिला कर रहेंगे। भाई कैसी इज्ज़त और कौन सा स्थान। सब बेकार की बातें हैं।

आज सबसे ज्यादा अखबार किस भाषा के हैं,मनोरंजन हो या समाचार , सबसे ज्यादा टी वी चैनेल्स किस भाषा के हैं,लोग अभी भी पिक्चर देखने के लिए परिवार के साथ कौन सी भाषा की पिक्चर देखने के लिए जाते हैं, मुझे नहीं पता कि ये साक्छात्कार और बड़े बड़े mआंच पर अंग्रेज़ी झाड़ने वाले सभी नेता और अभिनेता अपने नाई से , अपने माली से, अपने धोबी से यहाँ तक कि अपने माँ बाप और बच्चों से किस भाषा में बात करते हैं। आप ख़ुद ही सोचिये कि हममें से कितने लोग ऐसे हैं जो किसी से मिलते हैं तो बात अंग्रेज़ी में करते हैं , एक दूसरे का अभिवादन अंग्रेज़ी में करते हैं , झगडा होने पर कितने ऐसे लोग हैं जो गाली अंग्रेज़ी में देते हैं। सोच कर देखिये जवाब ख़ुद बा ख़ुद मिल जायेगा।

अन्तिम सच तो सिर्फ़ ये है कि आज भी हिन्दी उतनी ही समृद्ध उतनी ही समर्थ और उतनी ही सशक्त है जितनी पहले थी। हाँ यदि कोई ये सोच या समझ रहा है या कि समझाना चाह रहा है कि हिन्दी जल्दी ही अमेरिका वाले और इंग्लैंड वाले बोलेंगे तो ये कभी सम्भव नहीं है। एक और दूसरी जरूरी बात भाषा कोई ख़राब या अच्छे नहीं होती जरूर ये है कि आपका उसके प्रत्ति ज्ञान और नज़रिया क्या है। मैंने ख़ुद अंग्रेज़ी में प्रतिष्ठा के साथ स्नातक की उपाधी ली है, और अंग्रेज़ी में भी ब्लोग्गिंग करता हूँ पर सच यही है किखुद को हिन्दी में जितना सहज पाता हूँ उतना अंग्रेज़ी में नहीं. मैं अंग्रेज़ी या और भी अन्य भाषाओं की इज्ज़त करता हूँ मगर हिन्दी से बेंथा मोहब्बत करता हूँ और ये किसी के समझाने या बताने से कम या ज्यादा नहीं हो सकती.

रविवार, 2 मार्च 2008

क्यों पैदा होती हैं बेटियाँ ?

आप सोचेंगे कि ये क्या सवाल हुआ .फ़िर तो कोई कहेगा कि क्यों निकलता है सूरज और क्यों होती है रात, क्यों बदलते हैं दिन और महीने। हाँ , हाँ हो सकता है कि आप को ये इसी तरह का एक बेतुका सवाल लगे मगर मैं ये बात यहाँ इसलिए उठा रहा हूँ क्योंकि पिछले कुछ समय से ना सिर्फ़ इस ब्लॉगजगत पर बल्कि विभिन्न माध्यमों में और बहुत से लोगों , विशेषकर महिलाओं द्वारा , ये सवाल खूब उठाया गया है, बहुत सारे तर्क-वितर्क , आकलन, विश्लेषण, आरोप खासकर पुरुषवादी मानसिकता और समाज पर हर बार उंगली उठाई जाती रही है। और कमोबेश ये कहीं ना कहीं सच तो हैं ही, मगर और भी कुछ बातें हैं जो शायद सामने नहीं आती , या कि उन्हें सामने लाया नहीं जाता।

कल यूं ही किसी ने किसी से पूछ लिया , यार ये बेटियाँ पैदा ही क्यों होती हैं, काफी देर के बहस के बाद कुछ उत्तर ऐसे मिले :-

--बेटियाँ इसलिए पैदा होती हैं, ताकि उसे पैदा करने वाली माँ को उसके पापबोध का एहसास कराया जा सके। उसे बताया जा सके कि ये उसके सभी गुनाहों की या कहें कि ख़ुद औरत के रूप में पैदा होने की सबसे बड़ी सजा है जिसकी कोई माफी नहीं है॥

बेटियाँ इसलिए पैदा होती हैं ताकि बेटों को एहसास दिलाया जा सके कि देखो इनकी तुलना में तुम्हारा महत्व हमेशा ज्यादा रहा है और रहेगा॥

बेटियाँ इसलिए भी पैदा होती हैं ताकि समाज को कोई मिल सके , कोसने के लिए, पीटने के लिए, नोचने के लिए, सहने के लिए...

बेटियाँ , और बेटियों के बाद फ़िर बेटियाँ इसलिए पैदा होती हैं कि , काश किसी बार बेटा पैदा हो जाए .....

उत्तर मिल ही रहे थे कि बीच में किसी ने टोक दिया , क्यों फालतू की मगजमारी कर रहे हो । तुम्हें नहीं पता अब बेटियाँ कहाँ पैदा हो रही हैं, उन्हें तो गर्भ में ही मारा जा रहा है।

दूसरे ने कहा , तुम हर बार ये बात उठाते हो और वही पुराना राग अलापते हो मगर किसी बार ये नहीं कहते कि बेटियोंके जन्म पर सबसे ज्यादा दुःख और अफ़सोस कौन जताता है, माँ, सास , चाचे, मामी और ये कन्या बरुन हत्या करने वाली दोक्टोर्स के अन्दर क्या किसी पुरूष का दिल और दिमाग लगा रहता है। ये बहस चलती ही जा रही है और आगे भी चलती रहेगी। बेटियाँ पैदा होती रहे इसी में इस संसार का अस्तित्व बचा है अन्यथा कहीं कुछ भी नहीं बचेगा.....

सोचिये आप भी सोचिये ......

मेरा अगला पन्ना :- कमजोर हिन्दी नहीं हम हैं .

शनिवार, 1 मार्च 2008

ब्लॉगजगत का प्रथम विश्वयुद्ध

मुझे उम्मीद नहीं थे की इतनी जल्दी ब्लॉगजगत पर इतना बड़ा और घमासान युद्ध शुरू हो जायेगा। ये तो लग रहा था की किसी अन्य भाषा के ब्लोग्गेर्स एक दूसरे से इतने ज्यादा नहीं जुड़ते हैं या कहूँ की एक दूसरे के प्रति इतने ज्यादा भावुक नहीं होते जितने हिन्दी ब्लॉग जगत के , और इसलिए देर सवेर इस अन्दर तक घुसने की प्रवृत्ति का कुछ दुष्परिणाम तो निकलना ही था। खैर, मुझे ये भी मालूम है की आप कहेंगे की मरा मारी तो चलती ही रहती है। मगर हुज़ूर, इतनी हिंसा, इतनी उठा-पटक , आमने सामने का चैलेन्ज तो फ़िर आप ही बताइये की युद्ध कैसे नहीं हुआ ? नहीं भाई ये सा रे गा माँ पा संगीत की प्रथम विश्वयुद्ध टाईप का कोई तलेंट शोस नहीं है। ये तो हमारे बहुत से बुद्धिजीवी भाईयों का मानसिक द्वंद है। हाँ , ये अलग बात है की विचार इतना आक्रामक और आलोचनात्मक है की ब्लॉगजगत पर कारगिल वाली स्थिति हो गयी है। लोग इधर उधर भाग रहे हैं, चिचिया रहे हैं, बौखला रहे हैं,। एक दूसरे को धकिया रहे हैं, लतिया रहे हैं, । नोंच खसोट जारी है । कहने का मतलब लोग अपनी भडास निकाल रहे हैं और सीधे सीधे कहूं तो उबकाई कर रहे हैं।

अब तक मैं यही सोचता था की यार, बताओ , एक हम ही खानाबदोश की तरह अपने ठिकाने के लिए भटक रहे हैंह। ना कोई मोहल्ले में बुलाता है ना ही कसबे में घुसने देता है, ना कोई लिंक बानाता है ना ही कहीं हमारी चर्चा होती है। अजे लानत है हम पर । मगर आजकल ब्लॉगजगत पर जो आपातकाल वाली स्थिति है उससे तो लगता है की यार चलो अच्छा हुआ अपना कोई कस्बा या मोहल्ला नहीं है और हम अपने बंकर में bइल्कुल सुरक्षित बैठे हैं। भैया अच्छा है की अपनी तो नेपाल और श्रीलंका वाली स्थिति है तो बड़े बड़े इन अमेरिकी ब्लागरों के बीच क्यों पिसे।

तो भइया लोग आप लोग दूर दूर से इस विश्वयुद्ध का दर्शन किजीइए और इंतज़ार किजीये की कब इसकी समाप्ति की घोषणा होगी। अजी तभी तो कुछ नया पढने को मिलेगा।

मेरा अगला पन्ना - क्यों पैदा होती हैं बेटियाँ ?
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