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प्रचार खिडकी

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

मैं और मेरी एक दुविधा



अपने हालिया ग्राम प्रवास के दौरान इस बार मन में एक उत्सुकता थी कि इधर कुछ समय से बिहार में विकास की बहती बयार की खूब चर्चा हो रही थी ।सच कहूं तो अपने होशो हवास में पहली बार इतने बडे पैमाने पर यातायात के क्षेत्र में निर्माण होते देख मैं इतराया भी खूब ।हालांकि मेरी इतराहट जब यथार्थ के नुकीले पत्थरों से टकराई तो पूछिए मत (इसका पूरा जिक्र तो मैं अपने दूसरे ब्लोग कुछ भी कभी भी , में तफ़सील से करूंगा ) मगर जब लंबी चिकनी सडकों को देख कर मैं इतरा रहा था , तभी मेरा मोबाईल कैमरा जैसे मुझ से बगावत करके पता नहीं कौन सा सच ढूंढ रहा था । आप तस्वीर देखिए और बताईये कि क्या मेरी दुविधा वाकई ठीक है .............??
क्या मोबाईल कैमरे ने मुझ से कुछ अलग देखा ..........?????


रविवार, 20 दिसंबर 2009

वैश्विक आतंकवाद की बढ़ती चुनौती (नई दुनिया में प्रकाशित एक आलेख )







नई दुनिया में प्रकाशित एक आलेख (आलेख को पढने के लिए इस पे चटका लगाएं )

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

एक कथा या सच (शीर्षक आप रखें )-ब्लोग की २०० वीं पोस्ट



निर्मला की कराह सुन के विनोद बाबू दौडे आए ," क्या हुआ क्या दर्द फ़िर बढ रहा है , आज ही रोहित को कहता हूं कि जल्दी से तय करके किसी अस्पताल में दाखिल करवा दे । इस तरह से मर्ज़ को देर तक पालने से आगे मुश्किल बढ जाएगी , मोहित भी आता ही होगा उसे भी खबर कर दी है , रास्ता ही कितनी देर का है , तुम चिंता मत करो "।

"नहीं नहीं मुझे चिंता इस बात की नहीं है कि अस्पताल में मुझे कब भर्ती होना है , मैं सोच रही हूं कि दोनों बेटे नाहक मेरे कारण इतना परेशान हो रहे हैं । बडी बहू (रोहित की पत्नी ) भी कितनी परेशान होती है मेरे कारण , मुझे तो डर लग रहा है अब मोहित के आने से फ़िर कोई बखेडा न खडा हो । वैसे भी उसकी प्राईवेट नौकरी है , हमेशा एक तलवार लटकी ही रहती है ।" बीमार निर्मला ने हांफ़ते हुए एक ही सांस में विनोद बाबू से सब कह डाला ॥

"अरे तुम तो खामख्वा चिंता करती हो , ऐसा कुछ नहीं होगा अब मतांतर किन भाईयों के बीच नहीं होता । दोनों समझदार हैं अपने आप सुलट लेंगे । तुम बेफ़िक्र रहो ..जल्दी ही भली चंगी हो जाओगी । " अब चुप हो जाओ और आराम करो , देखो कैसे चेहरा पीला पडता जा रहा है .." विनोद बाबू ने कहा , मगर वे मन ही मन निर्मला की गिरती सेहत को लेकर चिंतित थे और निर्णय ले चुके थे कि आज ही दोनों भाईयों के आने पर निर्मला की बाबत बात करेंगे ॥

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"अरे मोहित आ गया , चल अच्छा हुआ , मैं और तेरी भाभी तो पिछले कुछ दिनों से परेशान हो गए थे । देख मां की हालत दिन पर दिन बिगडती जा रही है ..उन्हें अस्पताल में दिखवाना जरूरी है । तुझे तो पता है कि हम दोनों की नौकरी है , बच्चे भी पीछे से कोई और ही संभालता है , ऐसे में मां की तीमारदारी कौन करेगा । चल अब तू आ गया है , मैं आज ही गाडी बुक करवा देता हूं , तू मां को ले के वहीं चला जा ", रोहित अपने छोटे भाई मोहित से मिलते ही बोला ।

"नहीं भैय्या , मैं मां को ले के नहीं जा सकता, आपको पता नहीं है , रेवती की कभी भी मां से नहीं बनी , वो तो इस हालत में मां को देखेगी तो और भी बिगड जाएगी कि क्यों ले कर आ गया । आप तो मां का इंतजाम यहीं करवाओ, कल किसी अस्पताल में दिखाते हैं चल के फ़िर देखते हैं कि आगे क्या कैसे होगा , वैसे भी आपने इतनी बार बार फ़ोन किया कि मुझे आना पडा , मेरे पास तो छुट्टी भी नहीं है । आप तो खुद ही संभाल सकते थे , " मोहित तल्ख स्वर में बोला ।

इससे पहले कि बात आगे बढती , विनोद बाबू जो अब तक चुप दोनों भाईयों की बात सुन रहे थे , कातर स्वर में बोल पडे , देखो बेटा , अभी इन बातों के लिए ठीक वक्त नहीं है , तुम्हारी मां की तबियत दिन पर दिन खराब होती जा रही हैं मुझे तो डर लगने लगा है कि कहीं कुछ हो न जाए ,और बेटा थोडा धीरे बोलो बगल के कमरे में तुम्हारी मां बीमार पडी है सुनेगी तो दुख होगा "।,

"आप चुप रहिए पिताजी , पहले भी मोहित ऐसे ही बहाने बनाता रहा है जब भी जरूरत पडती है इसकी , हमेशा ही इसकी अपनी समस्या आ जाती है । कोई न कोई बहाना बना देता है ..आखिर ये भी तो आपका बेटा है क्या इसका कोई फ़र्ज़ नहीं बनता , मुझे भी तो थोडा सा आराम चाहिए , शांति चाहिए मैं कुछ कहता नहीं तो ......." रोहित लगभग चीखता हुआ बोला । मैं सुबह तक का इंतज़ार कर रहा हूं , मोहित तू फ़ैसला कर ले क्या करना है , और फ़ैसला क्या , तुझे तो इस बार मां को लेकर जाना ही पडेगा । रोहित झटके से कमरे से बाहर निकल गया । मोहित भी बडबडाता हुआ , अपनी पत्नी को फ़ोन मिलाते हुए बाहर निकल गया ।
विनोद बाबू बुझे मन से अपनी पत्नी के कमरे में पहुंचे ," लो निर्मला, अब तो मोहित भी आ गया, अब चिंता की कोई बात नहीं , अरे सो गई क्या ,,...? " विनोद बाबू ने देखा तो चौंक गए ..निर्मला के आखों के कोर से आंसू की धार बह रही थी । वो मौन की भाषा समझ रहे थे ,और जैसे जैसे पढ रहे थे उनका दिल डूबता जा रहा था ।
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भोर की पहली किरण के साथ ही जब विनोद बाबू की नींद खुली तो वो निर्मला की ओर लपके । एक दम शांति कोई हलचल नहीं , ...धक से रह गए वे । गले से घुटी घुटी सी चीख निकली ....निर्मला....आ...आ...आ..। रोहित ...मोहित .......

पूरा परिवार इकट्ठा हो गया पल भर में और बहूओं का रोना धोना भी । बच्चे भी साथ साथ अवाक रो रहे थे । मोहित अपने मोबाईल से अपनी पत्नी को पहुंचने के निर्देश दे रहा था । रोहित सुबकियों के बीच चुप खडा था । धीरे धीरे ..आस पडोस के लोग भी इकट्ठा होने लगे । बीच में ही थोडी देर के लिए दोनों भाई सबसे पीछे जाकर बातें करने लगे । वहां कोई नहीं था, ॥

"देख मोहित मां तो चली गई , और अब पिताजी बचे हैं उनकी सेवा करनी है हमें , तेरी तो प्राईवेट नौकरी है , और फ़िर पिताजी की कौन ज्यादा देखभाल करनी है वे मेरे पास ही रहेंगे ( रोहित के मन में पिताजी की मोटी पेंशन चमक रही थी ) "

"वाह अभी मां को रखने के लिए तो तुम्हारे पास समय ही नहीं था अब पिताजी के लिए सब ठीक हो गया , ये कहो न कि पेंशन मिलेगी उसी के चक्कर में तैयार हो गए , मैं सब समझ रहा हूं ..पिताजी मेरे साथ ही जाएंगे । मैं खुद बात कर लूंगा पिताजी से । "मोहित तमतमाया हुआ बोला । और चल दिया वहां से ॥

दोनों भाईयों ने ये नहीं देखा कि वहीं ओट में खडे विनोद बाबू ,सब सुन चुके थे । वहां से निकल कर दोनों भाईयों को ईशारे से बुलाया और कहा, "बेटे तुम दोनों भाईयों ने अपनी शक्ति और श्रद्धा के अनुसार हमारी खूब सेवा की , तुम्हारी मां को तो मुक्ति मिल गई , अब संस्कार के बाद मुझे भी मुक्ति दो । मैं भी गांव चला जाऊंगा वहीं रहूंगा , उम्मीद है कि इससे तुम दोनों को आगे कोई कठिनाई नहीं होगी । विनोद बाबू, सख्त और सपाट स्वर में बोले ॥

गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

कुछ पंक्तियाँ .......बस और क्या



(
)

बेशक मुझे मालूम नहीं,
जवाब इसका,
मगर इतना तो है कि ,
तुम्हारा सवाल अच्छा है॥

कहते
हैं कि रात के बाद,
सवेरा तो आता ही है,
जाने कितनी लंबी होती है वो रात,
जिनके बाद सवेरा आता है,
जो भी हो दिल बहलाने को,
ये ख्याल अच्छा है

नहीं
पता, हां ये तो नहीं पता,
कि आज भरेगा ,
मजदूर का पेट,
या कि किसी ,
गरीब के घर,
पहुचेगा खुशियो का पैकेट,
ये हो हो, मगर,
बाजार में उछाल अच्छा है॥

क्या करूं कि,
गीत तुम्हें मेरे,
अच्छे नहीं लगते,
मेरा सुर ,बेसुरा सही,
मगर तबले पे ,
तुम्हारा ताल अच्छा है

बेशक उस गरीब के,
पास खाली झोली,
और याचक आखें हैं,
मगर मंदिर में जाने का,
पहला हक तुम्हारा है,
तुम्हारी पूजा का थाल अच्छा है



(
)

इबादत को बहुत मिलेंगे,
मगर जिनके नाम पे हो सके सियसत,
चलो आज करें कोशिश,
एक ऐसा भी भगवान तलाशा जाए॥

खालों से सजी दीवारें,
चकाचौंध अट्टालिकाओं के जंगल में
गेंदे की खूशबू और सोंधी महक वाला,
इक मिट्टी का मकान तलाशा जाए॥

टीवी से चिपके चिपके से,
काल्पनिक पात्रों में खोए बच्चे खूब मिले,
तितली के पीछे दौडता, चींटे को पकडता,
आज कोई नादान तलाशा जाए

बडे भारी उपहारों से लदे-फ़दे
और मुस्कान नकली सी ओढे ओढे,
उन अपनों के बीच, साथ फ़ाकाकशी करने वाला,
कोई मेहमान तलाशा जाए॥

सोमवार, 14 दिसंबर 2009

कर्ज (एक लघु कथा )

"मालिक थोडे से पैसे उधार दे दो , अबकी बार फ़सल अच्छी हुई तो सब चुकता कर दूंगा "भुवन गिडगिडाया ॥

"चल चल, जब देखो मुंह उठाए चला आता है कभी किसी बहाने तो कभी किसी बहाने । तेरा पिछला ही कर्जा इतना है कि उसका सूद ही तू नहीं चुका पाएगा मूल तक की तो बात ही क्या । कितनी बार कहा तुझे कि अपनी वो बलका वाली जमीन दे दे , बेच दे उसे , तेरा सारा कर्जा उतर जाएगा । वो भी तू नहीं मानता ।"

" मालिक , वो जमीन कैसे दे दें , एक वही तो टुकडा बचा है आखिरी सहारा बच्चों को पेट भर खिलाने के लिए । अगर वो भी दे दें तो करेंगे क्या मालिक । मालिक मेरी मां बहुत बीमार है ...इलाज के लिए शहर के अस्पताल ले जाना होगा ....उसी के लिए बस बीस हजार रुपए चाहिए थे मालिक ....." भुवन कहते कहते मालिक के पांव पकड चुका था ॥

तभी उसका छोटा बेटा बबलू दौडता आता दिखा ," बापू, जल्दी चलो दादी कुछ बोलती नहीं "

भुवन झटके से उठा और घर की ओर सरपट दौड लिया । मां दम तोड चुकी थी । मां की लाश से लिपट लिपट के रो रहा था भुवन दहाडें मार मार के । सभी आस पडोस से इकट्ठे हो रहे थे घर के आंगन में । भुवन को अपनी बेबसी पर एक आत्मग्लानि सी हो रही थी जो उसका दर्द और बढा रही थी । पत्नी भी वहीं साथ ही बैठ कर भुवन के साथ रो रही थी । भुवन को ज्यादा विलाप करता देख , धीरे से उसके कान में कह उठी ," सुनो , इश्वर की यही मर्जी थी शायद , मां के जाने से तुम पर आने वाला कर्जा तो बचा । भुवन को अचानक ही एक अनचाहा संतोष सा हो गया था ॥ पहले की अपेक्षा अब उसका रोना थोडा कम था ॥

तभी मालिक भी आ पहुंचे ," देखो भुवन , अब भगवान जैसा चाहता है वैसा ही होता है ...उसकी मर्जी के आगे कहां किसी की चलती है , तुम घबराओ मत । समाज तुम्हारे साथ है , मैं तुम्हारे साथ हूं । माता जी के श्राद्ध कर्म और भोज के लिए तीस चालीस हजार की जरूरत तो पडेगी ही तुम्हें , मगर मैं हूं न , कहीं जाने की जरूरत नहीं है , सब इंतजाम हो जाएगा ॥"

मालिक को बलका वाली शानदार जमीन दिख रही थी और भुवन को शहर में भटकता हुआ अपना परिवार और वो खुद ॥

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