इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

प्रचार खिडकी

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

लिव इन रिलेशनशिप : क्या तैयार है समाज (नई दुनिया में प्रकाशित मेरा एक आलेख )

नई दुनिया भोपाल संस्करण में दिनांक ,9/11/2009, को प्रकाशित एक आलेख


(आलेख को पढने के लिए उस पर चटका लगा दें )

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

एक गधे की कथा और एक लघुकथा ...



एक बार एक गधा एक बड़े से गड्ढे में गिर गया। धोबी देखता है कि गड्ढा काफी गहरा है और उसमें से गधे को निकालना मुश्किल है फ़िर चूँकि वो बूढा भी हो चुका है इसलिए अच्छा है कि इस गड्ढे के ऊपर मिटटी दाल कर उसे बंद कर दे और उसकी जान छूटे। वो गड्ढे में मिटटी डालने लगा ।पहले तो गधे के समझ में कुछ नहीं आया । मगर जब उसे समझ में आया है तो वो दुखी भी हुआ और चकित भी । फ़िर अचानक ही गधे को कुछ सूझा , जैसे ही धोबी उसके ऊपर मिटटी डालता वो अपने आप को हिला कर उस मिटटी को झाड़ लेता और उस मिटटी पर चढ़ जाता। इस प्रकार धीरे धीरे गधा ऊपर आने लगा। उस धोबी के आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं रहा जब उसने देखा कि गधा धीरे धीरे ऊपर आकार बाहर निकल जाता गया । कहने का मतलब ये कि


जीवन में इस तरह सबके ऊपर बहुत सारी मुश्किलें मिटटी के तरह आ पडती हैं जिन्हें झाड़ते हुए और उनके ऊपर कदम रखते हुए जो आगे और ऊपर चढ़ता जाता है वो हर मुश्किल से बहार निकला जाता है। गधे तुझे सलाम......



अब एक लघुकथा

बचत

लीना और टीना शौपिंग मॉल में खरीददारी कर रही थी।

पर्स का दाम सुनकर लीना ने टीना से कान में चुपके से कहा , टीना , यार ये तो खुल्लम खुल्ला लूट रहे हैं इस पर्स का बाहर किसी भी दुकान में इससे आधा ही होगा, रहने दे चल निकल यहाँ से।

टीना ने उसे फुसफुसा कर समझाया , क्या बोल रही है तू, पागल अब जो है ले ले , ऐसी जगह पर कोई मोल भाव करता है क्या कितनी शर्म आयेगी।

सो पर्स खरीद लिया गया ।

मॉल से बाहर निकलते ही दोनों सहेलियां एक रिक्शा करने लगी,

बड़े चौक का कितना लोगे भाई,

जी मेम साहब दस रुपैये लगेंगे।

अरे जाओ जाओ वहां के तो आठ ही लगते हैं, हम तो रोज़ जाते हैं।

जी बीबीजी, मगर ये भी तो देखिये की कितनी तेज धुप है।

चलो चलो आठ में चलना है तो बताओ।

ठीक है बीबीजी, चलिए।

"देखा ये रिक्शे वाले बदमाश होते हैं, बचा लिए न दो रुपैये, लीना से टीना ने कहा.

ये हुई न बचत ????







मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

हुआ जो , हादसा, मेरे साथ, जमाने भर , के लिए, वो बस, एक ख़बर थी

हुआ जो ,
हादसा,
मेरे साथ,
जमाने भर ,
के लिए,
वो बस,
एक ख़बर थी॥

मैं तो,
सतर्क था,
और ,
सचेत भी,
मगर जिसने ,
हमें रखा,
अपनी ठोकरों पर,
शायद उसकी ही,
कहीं और ,
नज़र थी॥

मैंने छोड़ दिए,
कई रास्ते,
और कई,
मंजिलें भी,
जिसके लिए,
वो तो,
पहले ही,
किसी और की,
हमसफर थी॥

मैं ढूँढ ,
रहा था,
अपनी किस्मत को,
आकाश की,
बुलंदियों पर,
पाया तो ,
गर्दिशों में,
दर बदर थी॥

इक छटपटाहट,
सी थी,
जीवन चक्र
को चूमने की,
जब छुआ ,
तो जाना,
ये झील ।
में घूमती,
भंवर थी...


रविवार, 21 फ़रवरी 2010

जाने किस ओर से, ये खुश्क हवा सी आई है


परेशान है हर,
आदमी आज,
क्यों इतनी,
बदहवासी सी छाई है॥

शुष्क है आंखें और,
सूखी-सूखी आत्मा भी,
जाने किस ओर से,
ये खुश्क हवा सी आई है॥

मोहब्बत के मायने बदले,
प्रेम प्यार का फलसफा भी,
आज इश्क में, वो बात कहाँ,
कहीं गुस्सा, कहीं धोखा, कहीं पर रुसवाई है॥

ये मुमकिन है कि ,
वक्त अलग हो और जगह अलहदा,
बस तय है इतना कि,
हर दिल ने चोट खाई है॥

हर तरफ़ नफरत की आंधी,
राग द्वेष यूं पसरा है,
ख़ाक होने को घर भी नहीं उतने,
जितने हाथों में दियासलाई है




शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

तेरे बिना.........


तेरे बिना,
मेरे घर को,
रोशन नहीं,
करतें हैं,
दिन के,
उजाले भी॥

तेरे बिना,
मुझ से,
नहीं संभलती,
खुशियाँ,
मेरे संभाले भी॥

तेरे बिना,
कहाँ सुरूर,
दे पाते हैं,
पैमाने और,
प्याले भी॥

तेरे बिना,
मुमकिन नहीं था,
कि कहलाते , कभी,
बेवफा भी,
दिलवाले भी॥

तेरे बिना,
कहाँ दस्तक
देती है खुशी,
कहाँ टलते हैं,
गम, मुझ अकेले ,
के टाले भी..

तेरे बिना,
पानी का सोता,
प्यास नहीं बुझाता,
भूख नहीं मिटाते,
रोटी के,
निवाले भी॥

मुझे मंज़ूर है,
उससे ,
बगावत भी ,
तेरे बिना,
नहीं करूंगा,
मैं ख़ुद को,
खुदा के,
हवाले भी॥

हाँ सच, तेरे बिना मेरा वजूद ही कहीं नहीं है.........................

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

मैं खुद ही खुद को प्यार करने लगा ....


जब लगे,
दुत्कारने,
मुझको सभी,
परित्यक्त ,
सा हर कोई,
व्यवहार करने लगा॥

खुद को,
उठाया,
गले से,
लगाया,
में खुद ,
खुद को,
ही प्यार करने लगा॥

जीता रहा,
जिस दुनिया को,
अपने,
सीने से लगाए,
मुझे अपने से,
दूर जब ये,
संसार करने लगा॥

खुद को,
सम्भाला,
संवारा-सराहा,
स्नेह से,
पुचकारा,
खुद को ही,
लाड करने लगा॥

उसने इतना,
दिया नहीं मौका,
कि उसे,
कह पाता,
मैं बेवफा,
तो खुद ,
आईने में,
अपने अक्स से,
मोहब्बत का,
इजहार करने लगा।

क्या करता सोचा चलो कोई तो होना ही चाहिए प्यार करने वाला तो मैं खुद ही क्यों ???


गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

कलम उनकी, कातिल है........


कलम उनकी,
कातिल है ,
हम रोज मरते हैं॥

कुछ कही,
और अनकही,
हम रोज पढ़ते हैं॥

कभी दोस्त,
कभी दुश्मन बनके,
हम रोज मिलते हैं॥

कभी दिखने को,
कभी बिकने को,
हम रोज सजते हैं॥

एक जगह पर,
रुक कर भी,
हम रोज चलते हैं॥

मैल बनी चमड़ी , उतरती नहीं,
वैसे तो ख़ुद को ,
हम रोज मलते हैं।

कभी अपनों से,
कभी अपने आप से,
हम रोज जलते हैं॥

नींद ख़राब है, कि सोच हमारी,
अब तो सपनो में,
हम रोज़ डरते हैं.

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

दर्द बेचो , या नंगापन, अच्छी पैकिंग में सब बिकता है..........


जो दिखता है, वो बिकता है, और,
जो बिकता है, वही दिखता है।
दर्द बेचो , या नंगापन,
अच्छी पैकिंग में सब बिकता है॥

मोहब्बत-नफरत, घटना-दुर्घटना,
हत्या-आत्महत्या, व्यापार ,व्याभिचार,
सब खबरें हैं इस मंडी की,
ये गर्म ख़बरों का है बाज़ार ..

नाबालिग़ की अस्मत लुटना, एक्सक्लूसिव है,
आन्तंक-अपराध, रोज़ के आकर्षण,
भूत-प्रेत , नाग-नागिन, डायन-चुडैल,
जाने किसे-किसे, है आमंत्रण॥

पत्रकारिता की ना जाने,
ये कौन सी मजबूरी है,
सब कुछ ख़बर बन ही जाए,
क्या ये बात जरूरी है ?

काश कि हमारा मीडिया ये बात समझ पाता !

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

खामोशियों से, बतियाता हूँ मैं........


अब तनहाइयों को ,
सुनता हूँ,
और कभी खामोशियों से,
बतियाता हूँ मैं॥

जो लगता है असंभव,
खुली आंखों से,
बंद कर आँखें , उन्हें सच,
बनाता हूँ मैं॥

छाँव में छलनी,
होता है मन,
अक्सर धूप में,
सुस्ताता हूँ मैं॥

बारिश की मीठी बूँदें,
मुझे तृप्त नहीं करतीं,
इसलिए समुन्दर से ही,
प्यास बुझाता हूँ मैं॥

उसको जिताने की ख़ुशी,
बहुत भाती है मुझे,
इसलिए हमेशा उससे,
हार जाता हूँ मैं॥

दर्द से बन गया है,
इक करीबी रिश्ता,
जब भी मिलता है सुकून,
बहुत घबराता हूँ मैं॥

मैं जानता हूँ कि,
मेरे शब्द कुछ नहीं बदल सकते,
फिर भी जाने क्यों ,
इतना चिचयाता हूँ मैं॥

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

आंखों में मंजर यही, हर बार रहता है........



माहौल कुछ ऐसा है,
या कि, अपनी,
आदत बन गयी है ये,
अब तो,
हर घड़ी,
इक नए हाससे का,
इन्तजार रहता है,
हकीकत है ये,
कि बेदिली की इंतहा,
देखते हैं, पहला,
दूसरा पहले से,
तैयार रहता है,

घटना- दुर्घटना ,
हादसे-धमाके,
प्रतिरोध-गतिरोध,
बिलखते लोग,
चीखता मीडिया,
बेबस सरकार,
आंखों में मंजर यही,
हर बार रहता है........

हाँ, शायद आज यही हमारी हकीकत बन चुकी है , कि एक के बाद एक नयी नयी घटनाएं, सामने आती जाती हैं, पिछली हम भूलते जाते हैं, और अगले का इंतज़ार करते हैं, यदि दूसरों पर बीती तो ख़बर, अपने पर बीती तो दर्द....

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

सेलिब्रिटीज़ हैं ,हिंदी ब्लोग्गर्स


कल जैसे ही बेटे को स्कूल से लेकर निकला, उसने प्रश्न दागना शुरू कर दिया (वैसे यहाँ बता दूँ की मुझे अब तक ठीक ठीक नहीं पता चल है की दागने में वो आगे रहता है या उसकी अम्मा, बस इतना पता है की दोनों मिलकर मुझे पर दागते हैं )पापा, मेरे स्कूल के सारे बच्चों के पापा सेलेब्रेटीज हैं, आज मुझसे टीचर ने पूछा तो मैंने कहा की कल बताउंगा , वैसे मुझे इतना पता है की वे कोई गर हैं, शायद अजगर नहीं बाजीगर .........



अबे चुप, क्या बक रहा है तुझे कितनी बार तो बताया है की ब्लॉगर हैं, ये अजगर और बाजीगर से बिल्कुल अलग होता है बेटे, और क्या कहा सेलेब्रेटी , बेटा सही मायने में तो सबसे बड़ा सेलेब्रेटी आज ब्लॉगर ही है।



ठीक है पापा, लेकिन हो तो आप गर नस्ल के ही प्राणी न , और सेलेब्रेटीज कैसे हो ?



मैंने उसके गर -मगर पर बिना ध्यान दिए, बताना शुरू किया, देख, आज भारत की जनसख्या कितनी है, सवा अरब से भी ज्यादा, उसमें से हिन्दी बोलने, पढने, लिखने और समझने वाले कितने होंगे, करोड़ों में , उसमें से ब्लॉग्गिंग करने वाले कितने हैं सिर्फ़ हजारों में, अबे, हजारों में क्या सिर्फ़ कुछ हजार, और नियमित लिखने वाले, सिर्फ़ पाँच सौ, उसमें से एक तेरे पापा भी हैं। और ये जो तेरे, अमिताभ बच्चन, आमिर खान , जैसे लोग हैं न , वे तो सिर्फ़ अपने कुत्ते बिल्लियों के नाम बताने के लिए ब्लॉग्गिंग कर रहे हैं, हम उनमें से नहीं हैं। हम लिखते है, उसे पढ़ते हैं, लोग हमारी प्रशंशा करते हैं, फ़िर हम प्रशंसा करते हैं, और ये सिलसिला चलता रहता है। और तो और ये तेरे सेलेब्रिटीज लोग तो एक दूसरे से कैसे लड़ते हैं, खुलमखुल्ला, सबके सामने, यहाँ हम किसी की आलोचना भी बड़ी ही शिष्टता से करते हैं, और कई लोग तो बेचारे इतने भद्र हैं की यदि किसी को गलियाने का मन करे तो बेनाम बन कर गलियाते हैं, ताकि दुःख न हो ये जान कर की अमुक आदमी गरिया रहा है।



बेटा बिल्कुल शुक मुनो की तरह ध्यान लगा कर सुन रहा था, " लेकिन पापा आप लोगों की चर्चा तो कहीं नहीं होती "

बेटा गए वो दिन जब हम ख़ुद ही लिखते थे और ख़ुद ही पढ़ते थे, अब तो हरेक समाचार पत्र, कोई प्रतिदिन, तो कोई साप्ताहिक रूप से हमारी और हमारे पोस्टों की चर्चा कर रहा है ,(मैंने उसे बिल्कुल भी नहीं बताया की कभी किसी ने भी मेरी चर्चा नहीं की,) और यहाँ ब्लॉगजगत पर तो हमारे पाठक कितने हैं कह ही नहीं सकते।



लेकिन हमेशा ही मैंने देखा है की जब आप पाठकों की संख्या देखते हो तो वो तो महज ४ या ५ होती है



क्या बात कर रहा है, तुझे नहीं पता, कंप्युटर हमेसा लास्ट वाला जीरो नहीं दिखाता, मतलब पचाससाठ लोग रोज पढ़ते हैं, और पसंद भी करते हैं (यहाँ भी मैंने उसे बिल्कुल नहीं बताया की हम कुछ दोस्तों ने कसम खा राखी है की एक दूसरे की पोस्ट छपते ही उसपे पसंद का घंटा जरूर बजा कर आयेंगे , फ़िर बाद में उसे खूब बुरा भला कहें। )


तो बता अब कोई कह सकता है की तेरे पापा सेलेब्रिटीज़ नहीं हैं।


बिल्कुल ठीक कहा पापा , कम से कम कहने पर कोई चाहे कुछ न समझे इतना तो समझ ही जायेगा की आप भी अजगर और बाजीगर की तरह के कुछ भारी भरकम और अनोखे हो.


डिस्क्लेमर विद मिस्क्लेमर :- ये पोस्ट ...निर्मल हास्य के लिए है , इसे अन्यथा ले कर अपनी और हमारी व्यथा न
बढाएं

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

अंगना मोरे बुलबुल गाए ......



अंगना मोरे बुलबुल गाए,
फ़िर मन मोरा काहे न इतराए॥





तोहर रूप ये देख सलोना,
गमकत घर का कोना कोना ॥


तन चंचल , मन चंचल, अंखियन से मुस्कावत है,
तोहरे दरस की अद्भुत तृप्ति , जाने मन क्या पावत है ॥


आज आप हमारी बिटिया बुलबुल से मिलिए , इसकी चंचलता के लिए सिर्फ़ इतना ही कहना काफ़ी होगा कि ये हमारे साथ ही हमारे कंप्यूटर पर बैठी रहती है , और जरा सा नज़र इधर उधर हुई कि बस की बोर्ड पर ठक ठक और जो ज्यादा मन किया तो एक आध की ..कभी आर , कभी एम , कभी एच को उखाड के मुट्ठी में भर के चल देती है अपनी खिलौने की टोकरी में भरने ॥

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

बदल रहा है ज़माना, या कि, रिश्ते बदल रहे हैं

बदल रहा है ज़माना,
या कि,
रिश्ते बदल रहे हैं॥

अब तो लाशें,
और कातिल ,
एक ही,
घर के निकल रहे हैं॥


पर्त चिकनी , हो रही है,
पाप की,
अच्छे-अच्छे,
फिसल रहे हैं॥

बंदूक और खिलोने,
एक ही,
सांचे में ढल रहे हैं॥


जायज़ रिश्तों के,
खून से सीच कर,
नाजायज़ रिश्ते,
पल रहे हैं॥

मगर फिक्र की,
बात नहीं है,
हम ज़माने के,
साथ चल रहे हैं...

बदल रहा है ज़माना,
या कि,
रिश्ते बदल रहे हैं॥

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

खुशियों की खुरचन

कोशिश तो,
हमने भी की,
अपनी झोलियाँ,
भरने की,
किस्मत अपनी,
कि हर बार,
खुशियों की,
खुरचन ही मिली।

जब कर लिए,
सारे प्रयास,
और ढूंढ लिए,
कई प्रश्नों के,
उत्तर भी,
हर जवाब से,
इक नयी,
उलझन ही मिली॥

चाहा की तुम्हें,
रुसवा करके,
सिला दूँ, तुम्हें,
तुम्हारी बेवफाई का,
तुम्हें दी ,
हर चोट से,
अपने भीतर इक,
तड़पन सी मिली॥

मैं मानता था,
अपने अन्दर,
तुम्हारे वजूद को,
मगर न जाने क्यों,
हर बार , बहुत,
दूर तुम्हारी,
धडकन ही मिली ॥

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

उसको कहां खुद से अलग देखा

होगा कई,
शहरों -कस्बों ,
मैदानों-सड़कों,
का मालिक,
फ़िर भी,
चला वो,
सड़क किनारे,
नहीं बीच में,
चलते देखा॥

कहते होंगे,
उसे सभी , वो,
है बड़े,
दिल का मालिक,
पर वो तो,
हाथ मिलाता सबसे,
कभी किसी से,
नहीं गले मिलते देखा॥

मुझको लगता था,
मैं ऐसा हूँ,
दोस्तों से भी,
चिढ जाता हूँ,
पर उसको भी,
अक्सर,
यारों की,
कामयाबी पर,
जलते देखा॥

सूखी ही सही,
रोटी ही सही,
पर माँ , मुझको,
ख़ुद देती है,
उसके बच्चों ,
को तो ,
आया के हाथों,
पलते देखा॥

मुझको लगा की,
कमजोरी ने,
मुझको बूढा बना दिया,
देखा तो,
कुछ,
झुर्रियां ही,
थोड़ी कम थी,
उम्र के उस मोड़ पर,
उसको भी,
ढलते देखा॥

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

क्या मैं पत्थर हो गया हूँ ?


सड़क पर,
हादसे देखता हूँ,
और पड़ोस में,
हैवानियत।

कूड़े में अपनी,
किस्मत तलाशते बच्चे,
कहीं प्यार, अपनापन,
और आश्रय तलाशते बड़े (बुजुर्ग) ।

सूखी तपती धरती,
लूटते- मरते किसान,
कच्ची मोहब्बत में,
कई दे रहे अपनी जान।

व्यस्त मगर,
बेहद छोटी जिंदगी,
चुपके से , कभी अचानक ,
आती मौत।

और भी,
कई मंजर ,
देखती हैं,
मेरी आंखें .

मगर मौन,
हैं , मन भी,
और नयन भी,


क्या मैं पत्थर हो गया हूँ ?
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