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प्रचार खिडकी

गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

बैंक की परीक्षा और नैनीताल की यात्रा -२ (यात्रा वृत्तांत )



जैसा कि कल की पोस्ट में बताया कि लखनऊ रेलवे स्टेशन पर पहुंचने के बाद सभी साथी अपने अपने रास्ते निकल पडे । मुझे वहां से आगे नैनीताल के लिए निकलना था , समय शाम के चार बज चुके थे और अगले दिन यानि रविवार को मेरी परीक्षा थी । जब वहां पता किया कि आगे नैनीताल कैसे पहुंचा जा सकता है । पूछने पर जो बात पता चली उससे मेरे पांव तले धरती खिसक गई । वहां पर सुरक्षा में तैनात के पुलिस कर्मी ने बताया कि वहां का रास्ता इतना है कि यदि पहुंचने में थोडी सी भी चूक हुई तो फ़िर परीक्षा भी छूट सकती है । उसने पूछा कि परीक्षा कितने बजे से है ,मैं थोडा सा आशंकित और थोडा सा आश्वस्त भी कि हमेशा की तरह परीक्षा तो पहली पाली की ही होगी यानि सुबह साढे नौ बजे से । मगर जब परीक्षा प्रवेश पत्र देखा तो शुक्र मनाया कि दूसरी पाली में परीक्षा थी , यादि दोपहर दो बजे से ।

उस पुलिस कर्मी ने बताया कि , बस फ़ौरन लपक लो , उत्तर प्रदेश परिवहन की कोई भी बस पकड लो जो नैनीताल से ठीक पहले हल्द्वानी तक आपको पहुंचा देगी । अभी ट्रेन के चक्कर में पडे तो मुश्किल हो सकती है । वैसे भी ट्रेन का नाम सुनकर ही मुझे चक्कर आने लगे थे । कम से कम बस में सीट मिलने की गुंजाईश तो थी ही उसमें । भागते हुए बस स्टैंड पहुंचा तो पता चला कि एक बस बिल्कुल तैयार खडी है । और जब भी बसें बिल्कुल तैयार खडी हों तो इसका साफ़ मतलब होता है कि आपको उसमें बैठने के लिए बडी मुश्किल से जगह मिल पाएगी । अंदर पहुंचा तो लगा कि ये क्या पूरी बस परीक्षार्थी बच्चों से भरी हुई थी । ये देख कर ही लग रहा था कि सभी एक ग्रुप के और बाद में पता चला कि सभी एक ही स्कूल या कौलेज के थे । मुझे भी एक सीट मिल गई , मैं भी आराम से दुबक लिया । शाम होने लगी थी और बस नैनीताल की ओर आगे बढी ।

जैसे ही बस लखनऊ शहर को पार करने के बाद बाहर निकली दोनों तरह घिरे लंबे लंबे वृक्षों ने दो बातें का ईशारा कर दिया । एक तो ये कि आगे प्रकृति का वो अनुपम नज़ारा देखने को मिलने वाला है जो उस समय मैं शायद सिनेमा के पर्दे पर देखा करता था ।दूसरी ये कि मौसम के ठंडेपन का बिल्कुल भी अनुमान न होने के कारण कोई भी गर्म कपडा न रखना मेरी एक बडी भूल साबित होने वाली थी । कब आंख लगी पता ही नहीं चला । एक हिचकोले के साथ बस जब किसी स्थान पर रुकी तो आखें अपने आप ही खुल गई । रात में ठंड और बढ चुकी थी । हिम्मत नहीं हो रही थी कि बाहर निकल कर झांकने तक की मगर भूख ने ठंड को मात दी और मैं बस से बाहर निकला । पहली बात जिसने आकर्षित किया वो था साफ़ चमकता आकाश और उसमें से कुछ ज्यादा ही करीब दिखते चकमक करते तारे , एक पल को तो ऐसा लगा जैसे हाथ बढा कर उन्हें छुआ जा सकता है । मगर जल्दी ही एक सिहरन सी हुई और पेट ने फ़िर अलार्म बजा दिया । मैं उस छोटे से ढाबेनुमा होटल पर जाकर ठीक उनके तंदूर के पास जाकर खडा हो गया । वो कालेज का बच्चों का झुंड  भी खूब शोर शराबे के साथ खाने पर टूट पडा था । मैंने भी पहले चाय सुडकी और फ़िर कुछ खाना खाया । खाते समय गर्म गर्म रोटी को खाने से पहले जोर से दोनों हथेलियों के बीच भींचना बडा अच्छा लगा ।

बस में वापस पहुंच कर कुछ ज्यादा ही सिकुड कर बैठने की कोशिश की मगर सिकुड कर यदि ठंड कम की जा सकती तो क्या बात थी । खैर नींद ने फ़िर भी कुछ देर के लिए ध्यान तो भटका ही दिया था । बीच बीच में सोते उठते साथ बैठे बच्चों से बातचीत भी होती रही । उन्हें ये जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि एक उन्नीस बीस साल का लडका घर से अकेले ही इतनी दूर सिर्फ़ परीक्षा देने के लिए आया है । जैसे जैसे पौ फ़टने लगी, आखों की चमक बढने लगी । सुबह बस शायद साढे छ; या सात बजे तक हल्द्वानी पहुंच गई थी । सब बस से उतर गए । चूंकि वो समूह बडा था और शायद उन सबको लाने वाले कुछ शिक्षक या उनके बडे भी उनके साथ थे सो वे सब चल दिए आगे । मैंने पूछा तो पता चला कि वहां से छोटी छोटी मारुति गाडियां भी चलती हैं सवारियां लेकर जो नैनीताल पहुंचा देती हैं , और जल्दी भी । मैं लपक लिया ऐसी ही एक मारुति की ओर ।


मैंने बहुत बार सुना देखा है कि बहुत से लोगों को बस , गाडी आदि में चक्कर मितली वैगेरह आने लगती है । और खासकर तब तो जरूर ही जब रास्ता पहाडी और घुमावदार हो , मगर खुशकिस्मती से हम ऐसी किसी भी परिस्थिति के बिल्कुल ही अनुकूल थे , यदि गाडी पूरे दिन भी गोल गोल घूमती रहती तो भी मुझे तो चक्कर आने से रहा । अपन मजे में बाहर नैन लगा के भिडे रहे , प्रकृति के उस अनुपम सौंदर्य को निहारने में । लग ही नहीं रहा था कि परीक्षा की कोई टैंशन भी बची थी । और फ़िर जब गाडी नैनीताल पहुंची तो बस नजरें जैसे चिपक कर रह गई थीं । सामने नैनी झील में पड रही धूप की चमक से पूरी घाटी ऐसे चमक रही थी जैसे चांदी का वर्क लगा दिया हो प्रकृति ने ।

मैं फ़टाफ़ट बस स्टैंड के पास ही लगे हुए एक सुलभ कौंप्लेक्स में पहुंचा और सभी नित्य क्रिआओं से निवृत हुआ । वहां काम कर रहे मोहन जी ने बात बात में बताया कि नैनीताल में शीतकालीन उत्सव की शुरूआत कल शाम से ही शुरू हुई है । पूरे नैनीताल को खूब सजाया संवारा गया था । समय बारह बज चुके थे । परीक्षा दो बजे से थी , सो कुछ और सोचे किए बगैर हम सीधा चल दिए अपने परीक्षा केंद्र की तरफ़ । मोहन जी ने बता दिया था कि यदि पैदल भी चले तो आधे घंटे में ही उस विद्यालय तक पहुंचा जा सकता है । हम पैदल ही चल दिए । और थोडी ही देर में पता चल गया कि अच्छा ही किया जो पैदल चले । नैनी झील के किनारे किनारे सडक पर चलते हुए , जो रंगा रंग उत्सव के नज़ारे देखने को मिले तो बस आंखों में बसते जा रहे थे । काश उस वक्त मोबाईल वाला कैमरा हुआ करता और हमारे पास हुआ करता ।

परीक्षा दे कर निकले तो सुकून था कि चलो आना सफ़ल रहा । परीक्षा अपेक्षा के अनुरूप ही रही और बाद में जब उसका परिणाम आया तो अंदाज़ा दुरूस्त निकला । परीक्षा देने के बाद फ़िर से पेट पूजा की तरफ़ ध्यान गया । और जो भी सामने गर्मागर्म मिला उसे उदरस्थ किया गया । अब तो ठीक ठीक याद भी नहीं कि पूरी कचौडी पहले खाई थीं या कि आमलेट मगर खाया खूब सारा । शाम होते होते फ़िर से ठंडी हवाओं ने अपना घेरा बढाना शुरू कर दिया था । सबसे पहले वहीं माल रोड पर स्थित एक दुकान से एक गर्म स्वेटर लेकर उसे पहना और दोबारा से घूम कर मोहन जी के पास पहुंच गया । मेरे पास यूं तो अब वक्त ही वक्त था मगर उस समय परीक्षाओं में शामिल होना और वापस आ जाना यही रिवाज था हम लोगों का । मगर मैं तय कर चुका था कि अब तो कल रात की बस ही पकड कर वापस लखनऊ निकलना है । मोहन जी ने पास ही स्थित एक लौज का पता बता दिया और साथ में एक परिचित का नाम भी ।


रात में बिस्तर पर पहुंचने से पहले शाम और देर रात तक पहाडों की चकाचौंध में घूमता रहा । नैनी झील में   उन हजारों बल्बों की रोशनी और ऊपर तारों की अनुपम छटा , कुल मिला कर दृश्य ऐसा मानो स्वर्ग की कल्पना साकार होती दिख रही हो । लौज में ही मुझ पर कुछ खास कृपा करके एक मोटे कंबल की व्यवस्था कर दी थी उन्होंने । अगले दिन सुबह उठ कर एयर बैग कंधे पर लाद कर सबसे पहले मोहन जी के पास पहुंचा और उन्हें स्पष्ट बता दिया कि मैं शाम चार बजे तक जो जो जगह देख सकता हूं आज ही वो बता दें । और उन्हीं के बताए स्थानों पर , जिनका नाम अब मुझे याद भी नहीं है शायद कोई भीमताल या जाने कोई और था , और एक मंदिर , बस यही सब घूमते घामने पुन: बस अड्डे की ओर वापस और वहां से लखनऊ की वापसी हो रही थी ।


इस सफ़र ने कुछ चुनिंदा यादों के साथ एक सीख ये दी कि अब जब भी कहीं जाने के बारे में सोचता हूं तो सबसे पहले वहां के मौसम के बारे में पूरी जानकारी ले लेता हूं और उसीके अनुसार तैयारी करके निकलता हूं । आगे की पोस्टों में , हैदराबाद, दार्जलिंग, डलहौजी, चंडीगढ, भोपाल, जनकपुर(नेपाल ) , कलकत्ता, मुंबई , और जिन जिन शहरों में घूमा हूं वो सब यादें समेटने की कोशिश की जाएगी ।

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

बैंकिंग परीक्षा और नैनीताल का सफ़र (यात्रा संस्मरण )


बहुत दिनों से सोच रहा था कि अभी तक जीवन के सफ़र में की गई सारी यात्राएं अपने आप में एक कहानी , एक फ़साने से कम नहीं हैं । और ये भी तय है कि समय के साथ साथ उनमें से यदि सभी को भूल न भी जाऊं तो कुछ तो वो यादें होंगी ही जो धीरे धीरे मेरा साथ न दें । तो ऐसे में उन्हें हमेशा के लिए अपने लिए और भविष्य के लिए भी सहेजने के लिए इससे बेहतर और क्या हो सकता था कि उन्हें ब्लोग पोस्टों के रूप में दर्ज़ कर दिया जाए । मैंने कभी यात्रा संस्मरण नहीं लिखा , पढा भी बहुत ज्यादा नहीं है । इसलिए जो जितना याद है उसे बिल्कुल ठीक वैसा ही शब्दों के रूप में रखता जाऊंगा ।

ये शायद साल १९९२ का रहा होगा , महीना सितंबर का । ये वो साल था जब अचानक ही स्नातक करते करते ही हमारे पूरे ग्रुप पर अलग अलग प्रतियोगिता परीक्षाओं में भाग लेने का शौक चर्रा गया था । शौक इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उस समय हम सब न तो उन परीक्षाओं के लिए शायद उतने गंभीर थे न ही उस स्तर की हमारी तैयारी थी कि हम उन परीक्षाओं को पास कर पाते , मगर जैसा कि हमारे सीनीयर बताया करते थे कि ऐसी परीक्षाओं में भाग लेते रहने का अनुभव ही आगे काम आएगा । हम भी अनुभव बटोरने में जुट गए जो आगे जाकर सचमुच ही बहुत काम आया । उन दिनों बैंकिंग में अवसरों  की भरमार थी और उनके लिए परीक्षाओं में भाग लेना हमारे लिए देशाटन के अवसर से कम नहीं था । खैर तो मैं बात कर रहा है उत्तर प्रदेश बैंकिंग सर्विसेज़ द्वारा ली जाने वाली बैंकिंग परीक्षा में भाग लेने की ।

 मेरे सभी मित्र और सहपाठी अक्सर ये ध्यान रखते थे कि परीक्षा केंद्र वो होना चाहिए जो , घर के नजदीक हो , ऐसा करने के पीछे सिर्फ़ और सिर्फ़ एक तर्क रहता था । नजदीक परीक्षा केंद्र होने से आने जाने का कम किराया और शायद वहां पहले पहुंच कर रुकने की मजबूरी भी खत्म हो जाती थी । मगर मैं जाने किन कारणों से हमेशा ऐसा नहीं कर पाता था , सो मैंने परीक्षा केंद्र भर दिया था नैनीताल । प्रवेश पत्र जब हाथों में पहुंचा तो सिर्फ़ इतना समय मिला कि , जो भी धुले हुए कपडे थे उनमें से दो जोडी कपडे, और ढेर सारी टिप्स और प्रतियोगिता परीक्षा वाली किताबें एक एयर बैग में ठूंस कर , नकद नारायण ले कर घर से निकल जाना होता था । हर सफ़र की शुरूआत मधुबनी से निकलने वाली बस से हुआ करती थी चाहे उससे दरभंगा के लिए निकलना हो या फ़िर पटना के लिए । पटना से आगे की यात्रा रेल द्वारा । मधुबनी में जो कुछ सुविधाएं दुविधाओं जैसी स्थिति में हमेशा से रहे हैं उनमें से एक मधुबनी का बस स्टैंड भी है । बस थोडे से स्थान किसी तरह ठूंस ठास कर दस बसों को खडा करने की जगह थी उसमें । बरसात के दिनों में तो नीचे कीचड की लथपथ के बीच चमकती बसें किसी भी आधुनिक कलाकार को प्रेरित कर सकती थीं नई तरह की चित्रकारी के लिए । अब शायद सुना है कि ये किसी नई जगह पर बनाया जाने वाला है । सरकारी बस स्टैंड और उसकी बसें देखे तो एक युग बीत चुका था लोगों को ।


मधुबनी से बस ली , उन दिनों शाही तिरुपति ट्रैवेल्स की धूम थी जिसका नाम एक इस बात के लिए भी था कि उसकी बसें पटना का कह कर बीच रास्ते यानि मुज्फ़्फ़रपुर या दरभंगा में नहीं उतार देती थीं । सो सुबह सुबह ही पटना वाली टू बाई टू , नहीं शायद टू बाई थ्री थी , में बैठ कर निकल लिए पटना की ओर । सितंबर में पडने और महसूस होने वाली चिपचिपी गर्मी अपने उफ़ान पर थी । मधुबनी से निकल कर पटना जाने वाली बसों का एक प्रचलित रिवाज था । सवारी के लिए दरभंगा में दस मिनट रुकना , मुजफ़्फ़रपुर के किसी लाईन होटल पर खाने पीने के लिए रुकना , सो इस परंपरा को निभाते हुए हम भी बस में लदे हुए पटना पहुंच गए । उन दिनों का रेल का सफ़र भी कम रोमांचक नहीं होता था । सब कुछ रोमांच ही था , न ये पता होता था कि किस रेल से निकलना है न ये पता होता था कि बैठ कर जाना या खडे होकर ।

सीधा पटना से लखनऊ तक का जेनरल टिकट खरीदा गया । स्टेशन पर पहुंचे सैकडों परीक्षार्थियों के आने से से ये दुविधा तो समाप्त हो गई थी कि अब आगे कैसे निकलना है , किस ट्रेन से जाना है । जो भी ट्रेन मिली पहली लखनऊ की सब के सब उसी में लद गए । ऐसा लगा जैसे किसी टिड्डी या मधुमक्खी दल ने ट्रेन पर चिपक मार दी हो । ट्रेन में पटना से लखनऊ तक का वो सफ़र जिंदगी भर नहीं भुलाया जा सकता । पूरी ट्रेन में रत्ती भर भी जगह नहीं थी । बस पांव जमाने की जगह मिल गई तो बस वो अंगद का पांव बन गई जैसे , अजी चाह कर भी उसे हिलने हिलाने की जुर्रत नहीं की जा सकती थी । मगर उससे आगे निकलने वाला अपने साथियों में मैं शायद  अकेला ही था । लखनऊ पहुंच कर सबसे विदा लेकर आगे बढा ॥


    वहां पूछने पर पता चला कि , एक गलती कर चुका था, शनिवार की शाम तक वहां पहुंचा था और अगले दिन यानि रविवार को मेरी परीक्षा थी , तो यदि अब जरा भी देर किसी भी वजह से मुझे होती नैनीताल पहुंचने में तो निश्चित रूप से उस परीक्षा से मैं वंचित रह सकता था । अब उलटी गिनती शुरू हो गई थी .............

यदि आज ही पूरी पोस्ट लिख दी तो आप बोर हो जाएंगे ..इसलिए इसका अगला भाग कल । और अभी इस ब्लोग पर आगे कुछ दिनों तक यात्रा संस्मरण ही लिखने की कोशिश करूंगा , मेरा मतलब बस यही जो अभी लिख रहा हूं ॥

रविवार, 25 अप्रैल 2010

क्रिकेट पर एक ललित निंबंध (व्यंग्य )


ये बरसों की परंपरा रही है कि जो त्यौहार जो , नजदीक हो चलन में हो उसीपर अक्सर बच्चों से निबंध लिखने को कहा जाता है । और पिछले कुछ सालों में अब ये सिद्ध हो चुका है कि भारत का सबसे बडा और सदाबहार त्यौहार सिर्फ़ एक ही है क्रिकेट । सबसे अच्छी बात तो ये है कि आज देश का हर वर्ग , हर संप्रदाय और हरेक समूह इस त्यौहार को मनाने के लिए तत्पर रहते हैं । तो इसी के अनुसार इस बार बच्चों को परीक्षा में क्रिकेट पर एक ललित निबंध लिखने को कहा गया ।

बालक गुल्लीनंद सबसे होशियार और अपडेटेड बालकों में से एक था , सो सबसे पहले उसीने इसकी शुरूआत की । उसने शीर्षक को भलीभांति समझते हुए लिखा । क्रिकेट और ललित का साथ पिछले कुछ समय में बहुत ही प्रगाढ हो गया है । वैसे तो ललित का संबंध शुरूआत में कला के साथ हुआ करता था , जैसे ललित कला , मगर कालांतर में जब क्रिकेट में ही कलाकारी की तमाम गुण व्याप्त हो गए और इसीलिए विभिन्न कलाकार भी इससे जुड गए तो ऐसे में ललित भी क्रिकेट के काफ़ी नजदीक हो गए । इनके आने से क्रिकेट का मतलब ही बदल गया पूरी तरह से । जिस क्रिकेट में सिर्फ़ फ़िक्सिंग नामक व्यापार वाणिज्य का स्कोप दिखाई देता था उस क्रिकेट में सट्टेबाजी का बढता हुआ शेयर बाजार टाईप का उगते हुए सूरज समान संभावनाओं से भरा हुआ क्षेत्र खोल दिया ।

बालक बैटुकनाथ साथ में ताका झांकी कर रहे थे , कोहनी मार कर उन्हें बताया गया कि , गलत जा रहे हो गुल्ली , निंबंध की दिशा भटक रही है ललित पर नहीं क्रिकेट पर कंस्ट्रेट करो । गुल्ली ने कलम का स्टेयरिंग मोडा और क्रिकेट ड्राईव की ओर चले । क्रिकेट में अब पहले वाला ब्लैक एंड व्हाईट इफ़्फ़ेक्ट नहीं रहा है , सबकी ड्रेस भी रंगीन हो गई है । इतना ही नहीं बौलीवुड की सारी रंगीनी भी सिमट के इसमें आ गई है । आज क्रिकेट में कौन नहीं है , प्रीती जिंटा, शिल्पा शेट्टी, सुनंदा पुष्कर , शाहरूख खान और भी कई सारे अभिनेता अभिनेत्री हैं । और इतना ही नहीं , खिलाडी भी अब खिलाडी नहीं मौडल हो गए हैं ,चाहे किसी की फ़िटनेस खेलने लायक हो या न हो , मगर विज्ञापन के लिए वे हमेशा ही फ़िट रहते हैं ।बालक बैटुकनाथ की कुहनी फ़िर चलती है ।

  आज क्रिकेट में करोडों अरबों का मुनाफ़ा हो रहा है । पहले ये खेल सीज़नल होता था , मगर अब जबकि सीज़न का ही कोई खुद का सीज़न नहीं रहा ( आखिर कौन सा सीज़न अब समय पर आता जाता दिखता है ) तो ऐसे में क्रिकेट ही क्यों बंधा रहता । इसलिए चौबीस गुना सात की तर्ज़ पर बार बार लगातार एक ही चमत्कार के लिए क्रिकेट को बाय डिफ़ाल्ट गेम बना दिया गया है । पहले खेलों के माध्यम से सिर्फ़ खिलाडियों को उनकी फ़ीस या ज्यादा से ज्यादा थोडा आऊट इनकम को ध्यान में रखते हुए वे बेचारे मैच फ़िक्सिंग से कुछ कमा धमा लिया करते थे । मगर बदले हुए समय में अब ये सिर्फ़ खिलाडियों तक सीमित नहीं रहा है । आज अल्प वयस्क बच्चे तक सट्टे लगा लगा कर इस खेल से पैसे कमाने के मौलिक सूत्र को अपना रहे हैं । यदि सरकार सट्टेबाजी को वैधानिक दर्ज़ा देकर उस पर टैक्स वसूले तो गरीबी दूर करने में ये बहुत सहायक हो सकती है । बैटुकनाथ जी की कुहनी ...।

हुंह ...अब क्या ..बालक गुल्ली फ़ायनली लिखते हुए निबंध को समाप्त करते हैं कि , क्रिकेट का खेल भी इन सारे उपर वर्णित कार्यक्रमों के बीच ही कभी कभी खेला जाता है जिसे लोग अब हौकी , फ़ुटबाल , से ज्यादा पसंद करते हैं , मगर जाने क्यों अब तक बच्चों को यही पढाया जा रहा है कि हाकी राष्ट्रीय खेल है जबकि उसमें तो एक भी गुण नहीं पाए जाते हैं ॥

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

कोई नया मुद्दा दीजिए प्लीज : आज हरिभूमि में प्रकाशित मेरा व्यंग्य

                                               व्यंग्य को बडा करके पढने के लिए उस पर चटका लगाएं                                                                  औन लाईन पढना चाहते हों तो इस लिंक पर क्लिक करके पढ सकते हैं ।

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

ब्लोग पोस्ट की ब्लोग पोस्ट और आलेख का आलेख (कुछ प्रकाशित पोस्ट्स/आलेख )

ब्लोग्गिंग में जब से आया था तभी से प्रिंट के लिए आलेख , व्यंग्य आदि के लिए कम समय मिल पा रहा था। जब शिकायत ज्यादा हो गई तो पुन: वहां भी अपनी सक्रियता बढानी पडी। मगर फ़िर यकायक एक आईडिया और मेरे मन में आया कि सोचा क्यों कुछ इस तरह से लिखा जाए कि वो ब्लोगपोस्ट की ब्लोग पोस्ट बनें और प्रकाशित होने के लिए एक लेख भी बस आईडिए पर अमल करते हुए उसे प्रयोग में लाया गया नतीजा आपके सामने है ये देखिए मेरी दो ब्लोग पोस्टें जो आलेख के रूप में आपके सामने हैं

दिल्ली से छपने वाले एक दैनिक " महामेधा" टाईम्स में प्रकाशित आलेख






आलेख को बडा करके पढने के उस पर चटका लगा सकते हैं आप ,


यदि आपको लगता है कि आप भी ऐसा करना चाहते हैं और कर सकते हैं तो फ़िर देर किस बात की है , कोशिश करिए और हां यदि मेरी कोई मदद चाहिए तो फ़िर मैं हूं चलते चलते ये बता दूं कि "ब्लोग बातें "के तीसरे अंक के लिए विषय है थरूर प्रकरण, आप बेहिचक बेझिझक इस पर लिखी गई अपनी और किसी की भी पोस्ट का लिंक मुझे भेज सकते हैं मेरे मेल बक्से में बहुत जल्द ही ब्लोग बातें की प्रति आप ब्लोग औन प्रिंट पर देख सकेंगे ।तो आप सबको बहुत बहुत शुभकामनाएं

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

किसका दु:ख , सबसे बडा ?????



पिछले साल जब अचानक मां की मृत्यु हुई तो मुझे लगा कि इससे बडा दुख कोई नहीं हो सकता । और सच भी है जीवन मां का चले जाने से बडा शायद कोई दुख होता भी नहीं है ॥

कुछ दिनों बाद जब पिताजी को लेकर यहां चला आया तो अक्सर उन्हें दुखी पाता था ये कहते हुए कि तुम लोगों के साथ ईश्वर ने अच्छा नहीं किया , अभी तुम लोगों को मां की बहुत जरूरत थी । हम भी गमगीन हो जाया करते थे ।

कुछ ही दिनों बाद पता चला कि गांव में साथ में रह रहे चचेरे भाई का इकलौता जवान पुत्र अचानक ही चल बसा । आघात इतना जबर्दस्त था कि सहसा तो विश्वास ही नहीं हुआ क्योंकि गांव में पूरी पूरी रात अपने उस भतीजे से बातें करते हुए बिताई थी मैंने । अब उस दुख को देखकर पिताजी भी मौन और स्तब्ध थे । शायद उन्हें लग गया था कि इससे बडा दुख और कोई नहीं होगा ॥

थोडे दिन भी नहीं बीते होंगे कि , एक खबर सुनने को मिली , पास में ही रह रहे एक मोहल्ले में एक परिवार रहता था । एक दिन पहले किसी सडक दुर्घटना में सिर्फ़ एक मासूम बच्चे को अकेला छोड कर उसके मां बाप दोनों की ही मृत्यु हो गई । अब वो बिन मां बाप का बच्चा और उसके सामने पडा हुआ पूरा जीवन । मैं और पिताजी फ़िर सोच रहे थे कि दुख इसका ही सबसे बडा है निश्चित रूप से ।

और कुछ समय बाद ही समाचार पत्र में एक दिल दहला देने वाला समाचार देखने पढने को मिला । पश्चिमी दिल्ली के एक परिवार के कुछ लोग किसी शादी समारोह में भाग लेने के हरियाणा , शायद सोनीपत या पानीपत गए थे । वापसी में एक ट्रक से हुई दुर्घटना में कार में बैठे सारे लोग मारे गए । अगले दिन अखबार में तस्वीर छपी थी , सात विधवा महिलाओं की । एक परिवार की मुखिया की पत्नी , दो थी उसकी बहुएं और दो थी उसकी बेटियां । और साथ खडे दर्जन भर बिलखते बच्चे । पिताजी , मैं , पत्नी और जिस जिस ने भी ये खबर सुनी पढी सब अवाक रह गए थे । उस दिन के बाद पिताजी कभी नहीं कहते कि मेरा दुख सबसे बडा है ।

ये तो सिर्फ़ वो चंद घटनाएं थीं सो मैंने अपने आसपास घटते हुए महसूस की थीं , तब से सोच रहा हूं कि शायद सबको अपना दुख तभी तक बहुत बडा लगता है जब तक उसे सामने वाले का उससे भी कहीं बडा दुख न दिख जाए ।

ये तस्वीर प्रतीक मात्र है ,असल नहीं , गूगल से साभार

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

बुरा मान गए .......



दो घडी,
चांद से ,
गुफ़्तगू क्या कर ली,
सितारे बुरा मान गए ॥

कभी नकाबों में रहें,
कभी परदों में ,
कितनी ही कर ली कोशिश ,
आईने हर बार पहचान गए ॥

ये सोच कर कि,
जीत ही है जो ,
उस उस द्वेष की शुरूआत तो ,
हम खुद ही हार मान गए ॥

उन्हें जीतने की , 
कुछ आदत सी ऐसी पडी ,
वक्त बेवक्त वो , 
रार नई ठान गए ॥

हमने कहा कि , 
चलो अब परदा गिराएं ,
इसपर , वो सफ़ेद सी ,
हमपर चादर एक तान गए ॥

दोस्तों में दुश्मनी की ,
खबर , खबर न बने ,
बहुत की कोशिश हमने,
जाने फ़िर भी कैसे लोग जान गए ॥

बस आज कुछ और नहीं लिखा जाएगा .....हां ब्लोग्गिंग के वर्तमान हालातों पर फ़िर कुछ तल्ख लिखने जा रहा हूं ....उसे आप कुछ भी कभी भी पर पढ सकेंगे ..कुछ देर बाद ....॥

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

हैप्पी स्वास्थ्य डे : हरिभूमि में प्रकाशित मेरा एक व्यंग्य


व्यंग्य को पढने के लिए उस पर चटका लगाएं , अलग खिडकी में खुलने पर उसे बडा करके पढा जा सकता है । अन्यथा औन लाईन पढने के लिए यहां जाएं ॥

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

सानिया मुद्दा इज द रियल मुद्दा : आज हरिभूमि में प्रकाशित मेरा व्यंग्य

                                         व्यंग्य को बडा करके पढने के लिए उसके उपर चटका लगाएं या औन लाईन पढने के लिए यहां जाएं        

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

आखिरकार सानिया ने मना कर ही दिया .....अब पडी न कलेजे में ठंडक ब्लोग्गर्स के







आखिरकार जिस बात का डर था वही हुआ । सानिया मिर्ज़ा ने लगातार चल रही चकचक से तंग आकर अब अचानक मना कर ही दिया कि वो शोएब से शादी वादी नहीं करने जा रही है । हां हां आप कहेंगे कि क्या अनाप शनाप फ़ेंक रहे हैं झाजी ..जब इंडिया टीवी वालों को इसकी खबर नहीं हुई जबकि उन्हें तो ये तक पता है कि सानिया के बाद शोएब ,...शायद किसी अन्य टेनिस खिलाडी से भी निकाह कर सकते हैं । क्या बात करते हो यार अब एक सानिया ही अकेली भारतीय टेनिस खिलाडी तो नहीं है ..महेश भूपति भी हैं , पेस भी हैं ..किसी से भी कर सकते हैं । हम कौन कम थे पूरी बात पता करके चले ही आए , आखिर ब्लोग रिपोर्टर हैं जी ...कोई आम बात है क्या ।


        पूरी बात और असली सच्चाई ये है कि सानिया मिर्जा ने कहा है कि भाड में जाओ अब मैं नहीं कर रही शादी शोएब से , बल्कि अभी क्या ,मैं तो कभी भी उससे शादी नहीं करना चाहती थी । ये तो मेरा और और आप ही में से एक हैं न वो जिनसे मेरा चक्कर चल रहा है उनकी योजना थी कि सबको उधर उलझाया जाए और इधर सब निपट जाए आराम से । हम चौंके हमारे में से कौन हैं भाई .....उन्होंने शर्माते सकुचाते हुए बताया .......मियां महफ़ूज़ अली ही हैं वो ...जिनकी बाहों में ये कली महफ़ूज़ रहेगी । हमें बडे जोर का झटका ..बडे ही जोर से लगा ...। ओह तो ये राज था मियां ,महफ़ूज़ के पिछले दिनों से गायब रहने का । सानिया ने आगे खुलासा कि , देखिए झाजी आपको तो पता ही है कि हमारे शौहर जी की कविता के लिए अमरीका में टीशर्ट बनाई जाने लगी है ..इधर हमारी स्कर्ट भी काफ़ी फ़ेमस है ही । सो फ़ायनली सैटल होने के बाद हम और हमारे महफ़ूज़ दोनों जन "एक टीशर्ट के साथ एक स्कर्ट फ़्री " वाली डिस्काऊंट स्कीम की दुकान खोलेंगे । एक ब्रांच लखनऊ और दूसरी हैदराबाद । अब मचाईये हल्ला ....आप ब्लोग्गर लोग बहुत चिचिया रहे थे । हमने कहा हुर्रे ये तो गोया डबल फ़ायदा हो गया । अब सानिया को का बताते कि महफ़ूज़ भाई से तो पहले ही वादा ले चुके हैं सब कि उनकी शादी में सारे ब्लोग्गर्स ही बाराती बन के जाएंगे । तो प्रेम से बोलिए महफ़ूज़ भाई और सानिया भौजाई की जय ।   


शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

अभिव्यक्ति ......


अभिव्यक्ति ......

मन के भाव ,
स्नेह और ताव,
अभिव्यक्ति...

नयन बचन,
क्रुद्ध क्रंदन ,
अभिव्यक्ति ,

मौन कभी ,
कभी प्रखर मुखर ,
अभिव्यक्ति ,

कभी राग द्वेष,
कभी स्नेह क्लेश,
अभिव्यक्ति ,

संताप कभी ,
प्रलाप कभी ,
अभिव्यक्ति ,

परिभाषित कर
पाया कहां इसे,
अभी व्यक्ति .....


अभिव्यक्ति ..अभिव्यक्ति ..अभिव्यक्ति ....॥
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