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प्रचार खिडकी

गुरुवार, 28 जून 2012

शहरों में आंसुओं का अब स्वाद नमकीन नहीं होता...







उन्हें शक है कि उजले , चमकीले ,
शहरों में ,शायद कभी कोई नहीं रोता
कह दो है वो, इतना है हर रात ,रोता ,
पता चल गया होता कबका जो ,तुमने चख लिया कहीं होता 
शहर में आंसुओं का स्वाद , अब नमकीन नहीं होता



हर दरख्त की जड मिट्टी में होती है ,
हर पेड की मंज़िल आसमां हो बेशक ,
लकडी का कोई टुकडा बनने कुर्सी सियासत की ,
यकायक ही कभी नामचीन नहीं होता ,


शहर में आंसुओं का स्वाद , अब नमकीन नहीं होता

वो जो फ़र्क जानते हैं मान और अपमान का ,
वही तो चापलूसी बेइज़्ज़ती महसूस करते हैं ,
गरीब की बस रोटी ही इक आखिरी औकात है ,
भूखे  का किसी दम भी तौहीन नहीं होता ..

शहर में आंसुओं का स्वाद , अब नमकीन नहीं होता



उसूलों कानूनों की एक फ़ौज़ है फ़िर भी ,
हादसों अपराधों के लिए हुआ मशहूर मेरा देश ,
है इक दस्तूर अब यहां बहुत मजबूत सा हो चला ,
काबिल वकील साथ में हो , जुर्म कोई सा भी हो ,संगीन नहीं होता

शहर में आंसुओं का स्वाद , अब नमकीन नहीं होता


खुली बंद हर जोडी आंखो को है , हुक्म कि सपना देखें ,
फ़िर ताउम्र उस सपने को पाने में , न वक्त बेवक्त अपना देखें ,
बेशक शहर भी सपने देखता होगा , मगर स्याह और सफ़ेद ही ,
इतनी चकाचौंध उजियारी रातों में , कोई सपना रंगीन नहीं होता

शहर में आंसुओं का स्वाद , अब नमकीन नहीं होता



सोमवार, 18 जून 2012

ज़िंदगी के पन्नों पर ,बिखरे आखर .....


चित्र , गूगल इमेज खोज इंजन के परिणाम से , साभार





ये न पूछ मुझसे कि ये आज मुझे हुआ क्या है ,
जो ज़िंदगी ही मर्ज़ है तो बता इसकी दवा क्या है

पत्थर के इस शहर में जाने हर ईंट क्यूं पराई है
धधक रहा है कुछ भीतर , किसने ये आग लगाई है


चल माना दस्तूर अदला बदली का है , द्स्तूर निभाया ही जाए जरूरी तो नहीं
जो देते रहे ताउम्र इस ज़िदगी को ,वही ज़िंदगी से पाया भी जाए जरूरी तो नहीं


कतरों और किश्तों में बंटी जिंदगी ,तकदीर, जो तेरी यही रज़ा है ,
जो जिंदगी आसान ही होती जाए , तो ये मौत भी बेमज़ा है ...

तू अब न मुझे डराया कर जिंदगी,बता क्या नहीं अब तक खोया हूं मैं ,
गीली आंखों को भी रोने दे ज़रा, बहुत हंसती आंखों से रोया हूं मैं


ज़िन्दगी , क्यूं तुझसे कोई शिकायत करूं , इक मुझसे ही तू खफ़ा तो नहीं ,
तेरी वफ़ा पर होते रहे शुबहे , मौत मेहबूबा ही कभी हुई बेवफ़ा तो नहीं

छूटा गांव , बिछडे अपने , पकडी जो , उस रेल को कोसता हूं मैं ,
जीतने की ज़िद थी जिंदगी के खेल की , उस खेल को कोसता हूं मैं ...

जिंदगी को बहुत अच्छे से महसूसता रहा , कि इस देश का अवाम हूं मैं ,
जो यूं करता हूं ज़िक्र जिंदगी मौत का , बस इसलिए कि आदमी आम हूं मैं


जिंदगी यूं न कटेगी , इसे जीने का पहले ,दस्तूर समझ लो ,
सज़ा कबूलने में आसानी होगी ,इक बार अपना कसूर समझ लो

मत रोक मुझे , मत टोक मुझे , आज तो जी की कहने दे ,
कब तलक मुस्कुराती रहेंगी आंखे , आज अश्कों को बहने दे


मुझे नाहक ही दर्द महसूस हुआ , ये शाम ही है कुछ उदास उदास ,
जिंदगी इर्द गिर्द थी होठों के आजकल बसेरा है उसका आंखों के आसपास


दिन काट लेते हैं तपिश में जलाते खुद को ,क्यूं ये रात अच्छी नहीं लगती ,
कैसे मिलने का वादा करूं तुमसे जब खुद से मुलाकात अच्छी नहीं लगती

मुहब्बत से झूठी कोई शै नहीं ,इश्क से बडा और कोई व्यापार नहीं
जिंदगी तो हमेशा से बेवफ़ा रही है , मौत भी अपना यार नहीं ....


हर बार मैं तुझसे मिला के आंखें , मुस्कुरा दूं , ऐसा कोई करार नहीं है ,
जो तुझे मेरी कद्र नहीं , तो जा जिंदगी , मुझे भी तुझसे अब प्यार नहीं है
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