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प्रचार खिडकी

रविवार, 2 मार्च 2014

आईने खुद बखुद संवर जाएंगे





किताबों में बनके रहे , सूखे हुए गुलाबों की तरह ,
सिर्फ़ देखना , जो छूने की कोशिश की , टूट के बिखर जाएंगे ॥

सिमटा रहने दे हमें , अपनी यादों के बंद एलबम में ,
जो पलट के देखा तस्वीरों को , अश्क बनके आंखों में उतर जाएंगे॥

एक तू, एक मैं ही नहीं , जिस पर समय ने ढाए सितम ,
तुझे ये लगा ही क्यूं , कि  अबकि वक्त के ये पहिए ठहर जाएंगे ॥

गरीब सो न सका जो फ़ुटपाथ पर , रहा रात इस फ़िक्र में ,
हाकिम ने भेजा संदेशा, नए सपने दिखाने , उसके घर आएंगे ॥

अब तो मौसम हुआ है , सडकों , मैदानों , दालानों का ,
रुत बदलते ही फ़िर टीवी , या बाइस्कोप में ही नज़र आएंगे ॥

कुछ अब भी जद्दोज़हद में है , जांच और परख की ,
मगर कशमकश भी बची है कहां , इधर जाएंगे या उधर जाएंगे ॥

क्यूं कोसते रहें आइनों को , कि जब चेहरे खुद बेइमान हैं ,
पहले हटाया जाए निशानों को तेज़ाब से , आइने खुद बखुद संवर जाएंगे ॥

सुनो सियासत में हंगामा क्यूं है बरपा , ऐसी क्या अलग कयामत होगी,
या बिगडों के साथ वो बिगड जाएंगे , या बिगडे हुए खुद सुधर जाएंगे ॥

हम बेशक बना लें वक्त से तेज़ भागती हुई चमकती लहकती हुई सडकें ,
सोचता हूं ,मौत सी रफ़्तार थामे स्कूटियों पे बैठे ये बच्चे कल किधर जाएंगे  ॥
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