प्रचार खिडकी

शुक्रवार, 18 जनवरी 2008

सिर्कोजी बन गए सिरदर्द

हाँ भैया, ये भारत की राजनीती की भी अजीब अजीब मुसीबतें हैं । अब देखिए ना इस साल गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर फ़्रांस के राष्ट्रपति हमारे मुख्य अतिथि हैं । हैं तो हैं , मगर मुसीबत तो ये है कि उनके साथ उनकी पत्नी नहीं बल्कि उनकी ताजी प्रेमिका आ रही हैं। और यही बात तो सबसे बडे दुविधा की है । हमारे अधिकारी हमारे मंत्री और हमारी सरकार तक परेशान हो गयी है कि यार ये तो कभी सोचा ही नहीं था नहीं तो पत्नी वाली सभी जगह पर एक एक्स्ट्रा ओप्शन की गुंजाईश छोड़ देते । अब सब के सब इस सारकोजी के सिरदर्द यानी इनकी प्रेमिका कार्ला को किसी कोलेरा बीमारी की तरह भागेने के चक्कर में हैं।

मगर मुझे ये समझ नहीं आता कि भाई इसमें बुराई क्या है। एक बात बताइये आज जब पूरा देश पूरे देश की जनता , पूरे देश के लाखों परिवार, पूरा महिला समाज बडे मजे से सारे धारावाहिक ( जिसमें सभी में कोई भी ऐसा पुरुष और महिला नहीं हैं जिसके कम से कम चार पांच चक्कर नहीं हैं ) देख रहे हैं , ना सिर्फ देख रहे हैं बल्कि पसंद कर रहे हैं हज़म कर रहे हैं तो इसका मतलब तो यही हुआ ना कि किसी को कोई ओब्जेक्शुं नहीं है। और फिर हे सरकार और उसके अधिकारियों इस देश की परम्परा रही है अतिथि देवो भव , तो भए देव कभी कभी देवी के बगैर अपने दरबार की किसी अप्सरा के साथ आ गए तो इसमें बुराई क्या है यार।

गुरुवार, 17 जनवरी 2008

एक्सपो hai या एक्सपोज

इन दिनों राजधानी में चल रहे ऑटो एक्सपो की खूब चर्चा हो रही है । क्यों ना हो भाई आख़िर इस बार सालों से प्रतीक्षित टाटा की लाख्ताकिया कर नानो जो बाज़ार में उतर गयी है । ऐसा लग रहा कि अब तो राजधानी से लेकर मेरे गाँव के ढोलू चरवाहे तक के पास ये कार दिखाई देगी । खैर ये तो पता नहीं कब होगा और जब होगा तब होगा मगर इस बार जिस एक बात से मुझे थोडी निराशा हुई वो है मोदेल्स की चर्चा।

जी नहीं आप नहीं समझे , मैं गाड़ियों या कारों के मॉडल की चर्चा की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं उन मॉडल की बात कर रहा हूँ जिन्हें पता नहीं किन कारणों से उन गाड़ियों के आसपास कम से कम कपडों में खडा कर दिया जाता है । उन नयी गाड़ियों के या पुरानी भी गाड़ियों के मोदेल्स के साथ उन युवतियों को खडे करने के पीछे का अजीब सा समीकरण मुझे आज तक नहीं समझ आया। हाँ हाँ पता है आप में से कुछ लोग यही सोचेंगे कि जब आजकल शेविंग करें के साथ युवतियों का चित्र और उनकी छवि रहना अनिवार्य है तो सिर्फ कारों के साथ उनके खडे होने पर इस तरह की बातें क्यों।

भाई साहब दरअसल इसमें भी दो बातें हैं । पहली ये कि जहाँ तक शेविंग करें में युवतियों की मौजूदगी की बात है तो वो तो विज्ञापन की चकमक दुनिया है और फिर टी वी सिनेमा पर कौन सा हमारा जोर चलता है । मगर यदि इस तरह मेला लगा कर खुलम खुल्ला कारों के बहाने मॉडल को और मॉडल के बहाने कारों को देखा और दिखाया जाएगा तो फिर वही होगा। अभी परसों ही तो ऑटो एक्सपो देखने के लिए लाखों की भीड़ पहुंच गयी थी जिसमें मेरे पड़ोस के सुलतान चाचा का बेटा राधे और नाथू काका का लाडला बंटी भी था जिन्होंने कार तो दूर कभी बाईक को भी हाथ नहीं लगाया था।

मैं जानता हूँ कि बहुत से लोगों खासकर महिला जागरण और उठान ,समानता की बड़ी बड़ी बातें करने वाली हमारी नारी जगत की शक्तिशाली महिलाओं को मेरी ये बात शायद नागवार गुजरे मगर मैं क्या करूं मुझे जब तक कोई ये नहीं समझायेगा कि आख़िर खुद को एक उत्पाद कि तरह पेश करने वाली महिलाओं और युवतियों को कोइ क्यों कुछ नहीं कहता तब तक मैं माफी चाहूँगा मगर ये पुरुश्वादी दृष्टिकोण वाली दलील बिल्कुल नहीं मानूँगा।

वैसे चाहे तो आप भी जाकर नैनो के दर्शन कर सकते हैं या नैनो से दर्शन कर सकते हैं.

मंगलवार, 15 जनवरी 2008

अरे हमी को दे दो भारत रत्न भैया

लीजिए अब विवाद तो एक नया फैशन बन कर रह गया है , किताबें हों पिक्चर हो या फिर कोई पुरूस्कार हो और इस फेहरिस्त में अब तो भारत रत्न का नाम भी जुड़ गया है । वैसे तो पुरुस्कारों में , उनके चयन में , चयन करने वालों पर हमेशा कोई ना कोई प्रश् चिन्ह लगता ही रहा है विशेषकर भारत में तो ये एक अवाशय्म्भावी तत्त्व हो गया है मगर भारत रत्न जैसा सर्वोच्च समान भी यदि विवादों में पड़ता है तो ये तो बेहद शर्म की बात है।

जैसे जैसे दिन बीतते जा रहे हैं वैसे वैसे लिस्ट में नए नए नाम जुड़ते जा रहे हैं । सबसे मजे की बात तो ये है कि सब के सब ये तो चाहते हैं कि फलां फलां को भारत रत्न कि उपाधी मिले मगर किसी के पास ये जवाब नहीं है कि आख़िर सिर्फ उन्हीं को ये सम्मान क्यों मिलना चाहिए । खैर इस पर तो राजनीती अभी और गर्म होगी और मुझे तो लगता है कि काफी लें दें भी चलेगा, मागर भारत का एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते मेरा भी ये फ़र्ज़ बँटा है कि इस लिस्ट में कुछ और नाम सुग्गेस्ट करूं ताकि भारत सरकार बिल्कुल सही चयन कर सके। तो मैंने नीचे कुछ नाम सुझाए हैं ,

अनिल कपूर और जैकी श्राफ :- आप कहेंगे ये क्यों भाई , तो उसकी मेरे पास एक ठोस वज़ह है । इन्ही के लिए सबसे पहले पूरे देश ने ये गाना गाया था कि "मेरे दो अनमोल रतन , एक है राम तो एक लखन" तो भाई हमारा ये फ़र्ज़ बनता है कि इन दोनो रतानों में से एक रत्न को भारत रत्न दिलवाया जाये।

मेलु राम : जी आप इन्हें नहीं जानते होंगे शायद , मैं इनके बारे में आपको बताता हूँ ये हमारी गली में भाजी की दुकान चलाते हैं और ये सिर्फ और सिर्फ इनकी महर्बने है कि इतनी मेहेंगाई के जमाने में भी ये हमें हमारे इसी तनख्वाह में हरी हरी सब्जी खिलाते हैं मेर प्रति इनका विशेष प्रेम है तीन तीन महीने तक कभी पैसे का तकादा नहीं करते और चाहे किसी और को दे ना दे मगर मुझे सब्जियों के सात धनिया और हरी मिर्च जरूर देते हैं । कम से कम मेरे नज़र में तो एक भारत रत्न के हक़दार तो ये हैं ही।

अजी आपका ये खाकसार यानी कि मैं खुद: अब जब मुझे ये चांस मिलेगा कि मैं नाम सुझाऊँ तो फिर यदि मैं अपना नाम ना लूं तो ये तो सरासर नाइंसाफी होगे ना । वैसे अपना नाम सुझाने के पीछे भी कारण तो है ही। पहला ये कि में माँ हमेहा से यही कहती रही है कि हीरा है मेरा पूत तो , दूसरा कारण ये कि एक मैं हे एकलौता ऐसा वो शक्ष हूँ जिसके नाम पर किसी को भी कोई आपत्ति नहीं हो सकती अजी मुझे जानता कौन है जो दोस्ती और दुश्मनी का सवाल आयेगा वास मैं बारे बारी से सबको वोट दिया हुआ है।

तो कहिये आप क्या सोचते हैं अपने इस रत्न के बारे मैं।

आपका
अजय कुमार झा
फोन 9871205767

रविवार, 13 जनवरी 2008

आईये ब्लोग जगत को सार्थक बनायें

मैं जानता हूँ कि शायद शीर्षक को पढ़ कर बहुत से लोगों के मन में कुछ इस तरह की बातें आ सकती हैं । ब्लोग जगत को सार्थक बनाने का क्या तात्पर्य , क्या अभी चिट्ठाकारी जो हो रही है या की जा रही है वो सार्थक नहीं है , यदि ऐसा है तो कैसे है , या फिर ये भी कि यदि ब्लोग जगत को भी सार्थकता की कसौटी पर ही कास कर देखना है तो फिर इसकी स्वन्त्रन्ता और इसकी असिमित्ता क्या अर्थ रह जाएगा। मगर यकीन मानिए मेरा इस सब से कोई सरोकार नहीं हैं , मैं सिर्फ कुछ बातों पर कुछ खास लोगों का ध्यान दिलवाना चाहता हूँ । ये एक कटु सत्य है कि आज चिट्ठाकारी की इतनी चर्चा और इतनी लोकप्रियता होने के बावजूद अब भी कुल पंद्रह सौ लोग भी नियमित ऐसे नहीं हैं जो चिट्ठाकार कर रहे हैं या फिर कि हम जिन्हें चिट्ठाकार के रुप पहचानते हों। आज भी चिट्ठाकार की दुनिया बहुत से लिहाजों से सीमित जान पड़ती है । तो मैं कुछ लोगों से ये बातें ,ये गुजारिश तो जरूर करना चाहूँगा:-

बडे और चर्चित ब्लोग्गेर्स से : - हमारे सभी बडे ब्लोग्गेर्स और लेखकों से मेरा यही आग्रह है कि वे अन्य जिस भी माध्यम से जुडे हैं वहाँ ये प्रयास करें कि ब्लोग्गिंग के प्रति लोगों कि रूचि बढे कम से कम हिन्दी भाषा में ब्लोग्गिन करने के लिए तो जरूर ही प्रेरित करने की जरूरत है । जैसे कि मोहल्ला वाले अविनाश भाई रविवार को जनसत्ता के परिशिष्ट में एक विशेष स्तंभ ब्लोग पर लिखते हैं जिसमें चित्थाकारे और चिट्ठाकारों कि चर्चा रहती है , ऐसे ही नवभारत तिमेस के रविवार संस्करण में भी ब्लोग्गेर्स का कोना के नाम से शायद एक स्तंभ रहता है। इतना तय है कि चिट्ठाकारी से जितने ज्यादा लोग जुडेंगे उतनी ही यह समृद्ध होगी । मैं खुद अपने स्तर पर ये काम कर रह हूँ और अपने आगामी आलेख के अलावा मैंने बीबीसी हिन्दी रेडियो सेवा को ब्लोग्गिंग विशेषकर हिन्दी ब्लोग्गिंग पर एक प्रस्तुति पेश करने का आग्रह किया है ।

अग्ग्रेगातोर्स से :- यूं तो ब्लोग अग्ग्रेगातोर्स आज की तिथि में बेहद प्रशंन्शिनीय कार्य कर रहे हैं मगर मेरा उनसे आग्रह है कि वे दो बातों पर थोडा और ध्यान दें पहला ब्लोग्गेर्स को उनसे जुड़ने का और सरल तरीका ताकि कोई भी आसानी से अपने चिट्ठे को उनकी साईट पर दिहा सके । दूसरा प्रोत्साहन का काम । हालांकि बहुत से अग्ग्रेगातोर्स अपनी तरफ से कई तरह की प्रतियोगिताएं आयोजित करते हैं मगर जरूरत है इसे थोडा और ज्यादा विस्तार देने कि । मेरे कहने का मतलब है कि कोई एक ऐसी व्यवस्था जरूर बनाए जाने चाहिए जो नए लोगों के लिखने को प्रोत्साहित करने का काम करे। मेरा मतलब सप्ताह का अच्छा लेख , अच्छा व्यंग्य , अच्छा ब्लोग, अच्छा ब्लोग , नया ब्लॉगर , सबसे ज्यादा टिप्पणी करने वाला । रुचिका टिप्पणी करने वाला आदि जैसी तालिका भी बनाने कि कोशिश करें तो और बेहतर हो सकता है ये सब।

चिट्ठाकार मित्रों से ;- ये ठीक है कि चिट्ठाकार करने का मतलब है कि जो हमारे मन में है वो सब कुछ इस पर उकेर देना चाहे जिस भी रुप में हो जिस भी विधा में हो ,शुद्ध हो या अशुद्ध हो , तार्किक हो या अतार्किक हो , सही मायने में यही तो चिट्ठाकारी है। ठीक है मगर मैं उन लोगों को बता दूं कि भविष्य में ऐसा नहीं रहने वाला है बहुत जल्दी चिट्ठाकार और चिट्ठाकारी एक शाशाक्त और प्रबाव्कारी भूमिका में नज़र आएंगे तो ये तो उन्हें समझना ही होगा कि यदि वे भी इस जिम्मेदार समूह के सदस्य हैं तो उनकी भी कुछ ना कुछ तो जिम्मेदारी तो बंटी ही है । इसलिए मेरे कहने का मतलब ये है कि अपनी लेखनी को जहाँ तक हो सके धारदार बनाने का प्रयास जारी रखें।

फिलहाल इतना ही ,

आपका अपना
अजय कुमार झा
फोन 9871205767

शुक्रवार, 11 जनवरी 2008

हर कोई सब कुछ नहीं कर सकता

मेरी पत्नी उस दिन अचानक गुनगुनाने लगीं, दरअसल वो जब भी कोई काम कर रही होती हैं और पूरी तसल्ली से कर रही होती हैं तो स्वाभाविक रुप से कुछ ना कुछ गुनगुनाने लगती हैं। और खुदा का लाख लाख शुक्र है कि उनका गला भी काफी अच्छा है । वैसे सुरों कि कोई समझ नहीं है मुझे मार इतना तो पता चल ही जाता है कि वे बेसुरा और नीरस नहीं गा रही हैं। उन्होने मुझे बताया था कि किस प्रकार उनके स्कूल के दिनों में उनके गायन कि रूचि को देखते हुए और उनकी आवाज़ को देखते हुए उन्हें उनकी टीचर ने संगीत कोअपना एक विषय बनाने को कहा था , और किस प्रकार बाद में कुछ कारणों से वो इसे जारी ना रख पायीं। अब जबकि पिछले कुछ सालों से लगातार टी वी पर संगीत, गायाँ आदि कि टैलेंट हंत प्रतियोगिताओं का आयोजन हो रहा है तो ऐसे में उन्हें इस बात का अफ़सोस ज्यादा होता है। यदाकदा वे इनमें अपनी दावेदारी पेश करने के लिए जोर आज्माएश भी करती रहती हैं। एक बार तो उनकी जिद पर मैं उन्हें संगीत की शिक्षा दिलवाने को भी तैयार हो गया, मगर थोडे ही दिनों में उन्हें वास्तविकता का पता चल गया। फिर मैंने उन्हें समझाया कि हर इंसान में बहुत सारी खूबियाँ होती हैं और ये इश्वर की देन होती है।


मेरा मानना ये है कि हर इंसान एक साथ सब कुछ नहीं कर सकता। हाँ , हो सकता है कि ऐसा सब के साथ ना हो और कुछ लोगों के लिए वो सब कुछ कर पाना संभव हो जो वे चाहते हों या फिर कि जो वे कर सकते हों। मगर आम तौर पर तो ऐसा ही होता है कि इंसान बहुत कुछ वैसा नहीं कर पाटा जैसा करना चाहता है तो मुझे तो लगता है कि आदमी को चाहिए कि बिना इसकी परवाह किये उसे वो करना चाहिए जो उसके बस में हो और उसमें अपना सब कुछ झोंक देना चाहिए परिणाम निश्चित ही सकारात्मक निकलेगा। और फिर निराश होने से पहले उनके बारे में सोचना चाहिए जो शायद जिन्दगी में बहुत कुछ करने कि चाहत और काबिलियत रखने के बावजूद कुछ भी नहीं कर पाते। मेरे कहने का मतलब ये है कि जिन्हें इस बात का अफ़सोस होता है कि वे महंगे जूते नहीं खरीद पाए नहीं पहन पाए उन्हें उनके बारे में सोचना चाहिए जिनके पास जूते पह्नने के लिए पाँव ही नहीं होते ।

शायद ये नज़रिया आदमी को ज्यादा सुकून दे ।

अगली पोस्ट :- आईये ब्लोग जगत को सार्थक बनायें .

रविवार, 6 जनवरी 2008

क्या पुरानी पोस्टों ko दोबारा पढ़ कर देखा है कभी ?

ये बात मैं उन लोगों से कह रहा हूँ जो काफी समय से इस चिट्ठाकारी में मशगूल हैं और अक्सर नयी नयी बातें और विचार लिख कर उन्हें ब्लोग जगत पर डालते रहते हैं। यदि कभी कोई पुरानी पोस्ट देखता भी है तो जहाँ तक मेरा ख्याल है कि सिर्फ ये देखने के लिए कि कोई नयी तिप्प्न्नी तो नहीं आ गयी। मगर मेरा कहना कुछ और है यहाँ , आपको याद है वो जाना जब हम चिट्ठियां लिखा करते थे हमें चिट्ठियाँ आया करती थी। या फिर वो ज़माना जब आप या हम नियमित रुप से डायरी लिखा करते थे , बहुत से लोग तो शायद अब भी लिख रहे होंगे।


कभी अचानक कुछ ढूँढ़ते धान्दते अचानक कोई पुराने डायरी कोई पुरानी चिट्ठी पढ़ने को मिल जाये तो कैसा सुखद एहसास होता है । ऐसा लगता है जैसे कोई ठंडी हवा , चुपके से आकर मन को उन्ही दिनों कि यादों में ले कर चली गयी है । वे दिन वे सुख या कि दुःख , वे दोस्त , वो प्यार, वो फाकाकाशी, या कि वो दोस्तों कि मनमौजी महफिल सब कुछ अचानक ही आंखों के सामने चलचित्र कि तरह आ जाता है । है ना ?

चलिए छोडिये ये सब आप में से कितने लोगों ने कभी पलट कर अपनी पहली पोस्ट को देखा है या फिर कि कभी उन पोस्टों पर दोबारा नज़र डाली है जो बहुत पहले लिख कर छोड़ दिया। यदि भूले भटके कभी ऐसा हो जाता है तो मेरे क्या से यही सारे बातें होंगी हो आपके मन में आ सकती हैं :-

--- यार, ये थी मेरी पहली पोस्ट । कमाल है इतना थोडा सा लिखा था वो भी ऐसा बच्चों जैसा , इतना बचकाना, यार इसको यदि ऐसे लिखता तो ये पोस्ट और बढिया बन सकती थी। या फिर ये कि , यार, इतना बुरा तो नहीं लिखा था जब कि ये मेरी पहली पोस्ट थी भाई, और फिर लोगों कि टिप्पणियाँ भी तो आये थी।

---- जो पोस्टें या वे पोस्टें जिन पर आपको प्रशंशा मिली हो या फिर कि खूब सारी टिप्पणियाँ मिली हों वे तो हमेशा ही सबसे पसंदीदा पोस्टों में से एक रहती है । कई बार तो लगता है कि कमाल है यार कितना अच्छा लिख गया था और इतना पसंद आया था लोगों को । कम्बक्त बहुत दिनों से कुछ खास लिख ही नहीं पा रहा हूँ।

---- कभी कभी कोई पुराने पोस्ट , उसका विषय , या फिर कुछ और आपको कोई नया विचार , कुछ नया करने को प्रेरित कर सकते हैं आप लगेगा कि यार इसपर तो लिखना रह हे गया है , या फिर कि अभी तो इस पर और भी बहुत कुछ और लिखा जा सकता है ।

और आप बडे प्यार से थोडी देर तक उसे निहार सकते हैं जैसे कोई माँ अपने बच्चे को निहारती है । कम से कम ये काम उस दिन तो हो ही सकता है जिस दिन आप का मूड लिखने को ना कर रहा हो ।

कहिये आप क्या सोचते हैं ?

शनिवार, 5 जनवरी 2008

ये ब्लोगिए चाहते क्या हैं ............

पिछले कुछ दिनों तक ब्लोग जगत पर समय बिताने के बाद जो महसूस किया वही लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। आप सबको कैसा लगेगा मुझे नहीं पता। और हाँ यदि इससे किसी को भी कोई कष्ट पहुंचता है तो उसके लिए मुझे अग्रिम क्षमा करें क्योंकि मेरा मकसद सिर्फ अपने अनुभवों को आपसे बाटना है । आप उससे कितने सहमत हैं या बिल्कुल असहमत ये तो आपकी मर्जी। मेरे ख्याल से तो नीचे लिखी यही वो बातें हैं जो कि कोई भी ब्लॉगर चाहता है :-


ब्लोग पर ढेर सारी बातें : दरअसल इतना समय बीत जाने के बाद भी ब्लोग्गिंग आज भी कम से कम भारत में तो कुछ नया और अजूबा ही है। इसलिए जो भी इससे जुडे हैं या वे जो जुड़ना चाहते हैं ये वे भी जो ब्लोग में रूचि रखते हैं वे सभी चाहते हैं कि ब्लोग्गिंग की बातें होती रहे। अब देखिए ना जब भी मैंने ब्लोग या उससे संबंधित किसी विषय पर कुछ भी लिखा है उसको पढ़ने की इच्छा सबने दिखाई है। हमारे बडे चिट्ठाकार तो इसपर भी नज़र रखे हुए रहते हैं कि ब्लोग जगत के बारे में कहाँ क्या लिखा पढा जा रहा है। यानी कि ब्लोग की बातें ब्लोग पर बातें सभी को पसंद आती हैं।


टिप्पणियाँ : अजी इसकी चाहत किसे नहीं होती । ये तो ऐसा तोनिक है कि यदि आमिर खान और बिपाशा बासु के ब्लोग को भी नहीं मिलता तो ये बेचारे कब का लिखना छोड़ चुके होते। हर ब्लोगिया चाहता है कि वो चाहे कुछ भी लिखे उसपर टिप्पणियाँ तो आनी ही चाहिए। खासकर नए और हमारे जैसे छोटे छोटे नौसिखिये ब्लॉगर तो इसी आस में अपने पुराने पोस्टों को भी कई कई बार खोल खोल कर देखते हैं। और फिर एक ये बात भी है कि यदि मेरे जैसे ब्लोगिए कि किसी पोस्ट पर अविनाश जी, आलोक जी, मीनाक्षी जी, शास्त्री जी, मिश्रा जी जैसे बडे लोग कभी टिप्पणी कर दें तो ख़ुशी के मारे मिर्गी के दौरे तक पद सकते हैं । पता नहीं उन्हें इस बात का अंदाजा है या नहीं। तो ये तय रहा कि दुसरी सबसे पसंदीदा बात जो हर ब्लोगिए को अच्छी लगती है वो है टिप्पणियाँ।

प्रशंशा :- जी हाँ प्रशंशा, मगर ये तो ब्लोगिए क्या हर इंसान बल्कि जानवर को भी पसंद आती है। मगर मेरे कहने का मतलब ये है कि आलोचना कि तुलना में प्रशंशा सबको ज्यादा भाती है । और कई लोग तो इतने जलेभुने बैठे होते हैं कि वो बेचारे कोम्प्लेक्स के मारे कभी किसी की प्रशंशा ही नहीं कर पाते हां आलोचना में उन्हें जन्मजात महारत हासिल होती है। अब मेरी एक पोस्ट पर एक मित्र ने लिखा ," वह क्या बकवास लिखा आपने मगर मैं पढ़ कर टिप्पणी कर रहा हूँ।" पढ़ने के बाद मेरे मन में जो बात आयी " वाह सरकार क्या भीगा भीगा कर मरा है , मज़ा आ गया। " मगर खबरदार आप सबकी आलोचना नहीं कर सकते , लेकिन यकीनन प्रशंशा कभी भी किसी की भी कर सकते हैं।

पैसा कमाना : - क्या कहा पैसा कमाना । तो क्या ब्लोग्गिंग से पैसा भी बनाया जा सकता है । जी हाँ , बिल्कुल यही प्रतिक्रिया थी मेरी जब मुझे ये पता चला कि ब्लोग्गिंग को एड जगत के साथ जोड़ कर उससे पैसा कमाया जा सकता है , बल्कि कई महारथी तो इसमें घुस कर इसे व्यावसायिक ब्लोग्गिंग का रुप दे चुके हैं। मगर अफ़सोस ना तो ये सभी को पता है ना ही ये सभी से संभव है। मेरे एक मित्र ने बताया कि इसके लिए आपको अंगरेजी में लिकना पडेगा। मैंने वहीं पर आत्मसमर्पण कर दिया । क्या पैसों के लिए अंग्रेजी में लिखना शूरोऊ कर दूं और फिर मेरी अंग्रेजी तो भैया अंग्रेजों को बड़ी मुश्किल से ही समझ आयेगी। खैर, कहने का मत्लन ये कि ब्लोग लिख कर पैसा कमाना भी हर ब्लोगिए को जरूर पसंद आता है।

अग्ग्रेगातोर्स के मुख्य पृष्ट पर हमेशा अपनी एक पोस्ट दिखती रहे। मुझे हमेह्सा ये लगता है कि जब भी कोई भी चिटठा संकलक का mukha पृष्ट kholoon हमेशा कम से कम एक पोस्ट तो मेरी dikhnee ही चाहिए भाई। aakhirkaar tabhee तो सब को पता chalegaa कि मैं भी ब्लोग्गिंग kartaa हूँ।


बस यही सब वे बातें हैं जो मुझे लगता है कि हरेक ब्लॉगर चाहे वो बड़ा हो या छोटा जरूर पसंद करता है । इस नए वर्ष में अपनी तो यही चाहत है कि मोहल्ला उर कस्बा बसा रहे , लिंकित मन पर मेरा प्रतिबिम्ब बँटा रहे, कहानिया बुनी जाती रहे, शास्त्री जी के नुस्खे मिलते रहे, तरकश के बानो से नुक्ताचीनी होते रहने के बावजूद विनयपत्रिका निरंतर चपटी रहे, और हँसते हुए कोई भी ब्लॉगर ब्लोग जगत के इस आलोक से नौ दो ग्यारह ना हो।

जय हो ब्लोग जगत की।
बस आपका

अजय कुमार झा
फोन ९८७१२०५७६७।

अगली पोस्ट का विषय :- कभी अपनी पुरानी पोस्टों को पढ़ कर देखा है क्या ?
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