प्रचार खिडकी

गुरुवार, 6 सितंबर 2018

इक चुटकी इश्क




                                      चंद अल्फाज़ हैं ये
                                     मेरा कल आज हैं ये
















रविवार, 30 जुलाई 2017

ख़्वाब करेंगे गुफ्तगू अब .....



 चंद बिखरे सिमटे से आखर , कुछ बेतरतीब उनींदी उंघती सी पंक्तियाँ









रविवार, 23 जुलाई 2017

बहुत गहरी हैं ये आँखें मेरी



चंद बिखरे सिमटे आखर , बेतरतीब ,बेलौस से , बात बेबात कहे लिखे गए , उन्हें यूं ही सहेज दिया है ........




दो दरखत एक शाख के , एक राजा की कुर्सी बनी दूसरी बुढापे की लाठी 







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