बहुत पहले किसी ने कहा था, की साहित्य असल में सिर्फ़ साहित्यकार के लिए होता है, और ठीक उसी तरह शायद ब्लॉग भी सिर्फ़ ब्लोग्गेर्स के लिए होता है, सिर्फ़ उन्ही के पढने और उन्ही के लिखने के लिए। पिछले छः सात महीनों तक यहाँ ब्लॉगजगत पर समय बिताने के बावजूद ब्लॉगर के रूप में मेरी क्या कितनी पहचान बन पायी है न इस बारे में कभी सोचा है न सोचना चाहता हूँ, मगर इतना जरूर है की आज जिन ब्लोग्गेर्स का नियमित तिप्प्निकारों के रूप में मैं आभारी हूँ , मैं चाहता हूँ की एक दिन मैं ख़ुद उस कतार में शामिल हो जाऊं। अहलंकी कुछ दिनों पहले जब मुझे मौका मिला था या कहूँ की ऑफिस में कम्पूटर और थोडा समय भी मिल गया था टू मैंने उसका पूरा फायदा उठाते हुए खूब सारी टिप्पणियाँ की थी, मगर यहाँ कफे में बैठ कर वो सम्भव अनाहीं हो पा रहा है और जैसे ही मैं अपना ख़ुद का कंप्युटर ले लूंगा तो जरूर ही भाई उड़नतश्तरी,डॉक्टर अनुराग आर्य, भाई महेंद्र, मित्र द्विवेदी जी मेहेक्क जी, और भी जो नियमित टिप्पणी करने वाले हैं उनमें से एक बन पाऊँगा और ऐसा जल्दी ही होगा ये मेरा विश्वास है। तब शायद ही कोई ऐसा ब्लॉग बचेगा जहाँ में घूम कर पढ़ कर और लिख कर नहीं आऊंगा।
अपने अगले पन्ने में आप सब ब्लॉगर से कुछ ख़ास बात या निवेदन या सलाह-मशवरा करने वाला हूँ, इस बारे मं की आप सब में से जो भी जानकार लोग हैं किसी एक विशेष ब्लॉग के माध्यम से हम सभी ब्लोग्गेर्स के प्रश्नों का कठिनाएइयों का समाधान कर सकें तो बड़ा उपकार होगा।
Wednesday, May 21, 2008
ब्लॉगर के रूप में पहचान न बने , न सही, मगर.........
Monday, May 19, 2008
सच का कच्चा चिटठा
आजकल लिखने का कम मगर पढने का ज्यादा मन कर रहा है , और मज़ा भी उसी में आ रहा है, अभी हाल ही में मित्र देवेन्द्र आर्य की कलम से निकली कुछ गज़लें पढी ,लीजिये आप भी नोश फरमाएं।
पहले सच का कच्छ चिटठा खोला जाता है,
फ़िर जाके एक झूठ हवा में घोला जाता है॥
आख़िर कैसे मंडी से मुठभेड़ किया जाए,
गंगा बचती है तो कोका कोला जाता है.।
ये तो सदियों से होता आया है भाई जी,
कंगालों का ही ईमान टटोला जाता है॥
कोई वसूली करते मुझको पकड़े तो जानू,
मैं थोड़े जाता हूँ, मेरा झोला जाता है॥
सीट सुरक्षित है लेकिन अब भी हर प्रत्याशी,
चमरौती के पहले बामन तोला जाता है॥
जिसकी निर्धनता के आगे नतमस्तक था धन ,
वह गांधी भी अब सिक्कों से तौला जाता है॥
मुझको लगता है मैं अब भी सीखा नहीं पाया,
चुप रहकर कविता में कैसे बोला जाता है...
कैसी लगी जरूर बतायें........
Saturday, May 17, 2008
जब भी मुझको याद करोगे .
अभी कुछ दिनों पहले ही मैंने आपको अपने दूसरे चिट्ठे में मित्र बैजू कानूनगो की कलम से निकली हुई रचना पढ़वाई थी , आज फिर एक बार उन्ही के कलम से कुछ और प्रस्तुत है :-
जब भी मुझको याद करोगे,
आंसुओं का अनुवाद करोगे॥
मेरा घर बरबाद किया तो,
किसका घर आबाद करोगे॥
इतनी फ़ैली हैं अफवाहें,
किस किस का प्रतिवाद करोगे॥
औलादों का सुख समझोगे,
पैदा जब औलाद करोगे॥
जो होना है, हो जाने दो,
कब तक वाद-विवाद करोगे॥
जीवन जीने की तैयारी,
क्या मर जाने के बाद करोगे॥
तुम को भूल गया जो, बैजू,
क्या तुम उसको याद करोगे....
Friday, May 16, 2008
जाने कितने निशाने हैं ?
समय के,
अंतराल पर,
नित नया,
धमाका होता है,
हर बार,
किसी शहर का,
कोई कोना,
मौत की,
नींद में,
सोता है॥
कैसा मज़हब,
कैसा मकसद,
आतंक और,
दहशत के ,
ही वे,
दीवाने हैं,
निर्दोष ,
मासूम ,
औरत,
बच्चे,
रेल -बस,
और ,
मन्दिर मस्जिद,
जाने कितने
निशाने हैं॥
उन्हें बिलखते,
बच्चे नहीं दिखते,
उन्हें उजड़ते,
घर शहर नहीं दिखते,
मौत के सुदागर,
छिप के रहते हैं,
सामने आने का,
वे जिगर नहीं रखते॥
हाँ, मगर ,
बड़े फख्र से,
अपनी हैवानीयत,
को वे,
कुबूल करते हैं॥
उन्हें इंसान ,
समझने की,
हमारे हर ,
भूल की, वो पूरी,
कीमत ,
वसूल करते हैं।
आज मुझे,
मानवाधिकार का,
ढोल पीटने वाला,
जाने क्यों ,कोई,
दिखाई नहीं देता,
शायद उन्हें,
इन धमाकों का,
शोर कभी,
सुनाई नहीं देता।
सिर्फ़ इतना कि, जो ये सब करते हैं उन्हें किसी भी दृष्टिकोण से इंसान नहीं कहा जा सकता , इसलिए उनके साथ बिल्कुल जानवरों जैसा सलूक करना चाहिए, जानवर पागल हो जाए तो उसे मारना ही बेहतर होता है.
Wednesday, May 14, 2008
विकल्पों की दुनिया
पुराने दिन याद करता हूँ तो एक चीज़ जो भुलाए नहीं भूलती वो थी बगैर किसी विकल्प के, यानि सिर्फ़ एक ही ब्रांड की दुनिया। न सिर्फ़ हमारी दैनिक जरूरतों की वस्तयूं बल्कि टी वी , रेडियो तक में सिर्फ़ एक या ज्यादा से ज्यादा दो विकल्प होते थे सबके पास। दूरदर्शन , एक, आकाशवाणी एक टाटा नमक एक बाटा जूता एक , बोरोलीन एक, पैराशूट नारियल तेल एक, सरसों तेल एक, फोन एक , हाँ साबुन पौउदर जरूर एक से ज्यादा दिख जाते थे। कहीं कोई मुफ्त स्कीम नहीं कोई इनाम नहीं , कोई गलाकाट प्रतियोगिता नहीं थे। मगर सब कुछ मजे में था । उलटा लोगों में निश्चिन्तता थी की ये है तो ठीक है और यही है भी। अजी मुझे तो याद है की रुकावट के लिए खेद है को भी हम सब्र से बैठ कर देखते थे.समय बदला और बाज़ार में भीड़ बढ़ी। खरीददार बढे तो सामान बनाने और बेचने वाले भी बढे।
आज सबके सामने विकल्पों की बड़ी ( या शायद भ्रमित करने वाली छोटी ) दुनिया खुली हुई है। आज कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे चुनने से पहले सबके पास ढेरों विकल्प न हों। अजी, सामानों की तो बातें क्या कहें , शिक्षा, पढाई के विषय , नौकरी, और यहाँ तक की , दोस्ती, रिश्ते तक में भी सबके पास विकल्प हैं। बास करना तो ये है की आपको अपनी वरीयताओं या कहूँ की जरूरतों के हिसाब से बस चुनना भर है। और ऐसा नहीं है की इसके लिए आपको कोई आत्मग्लानी हो , क्योंकि आज सबके साथ ही तो ऐसा हो रहा है। बस शुक्र है तो इतना की माता- पिता, गुरुजनों , घर , परिवार का अब भी कोई विकल्प नहीं है और ना ही कभी हो सकते हैं। हां, इतना जरूर है की इन विकल्पों की दुनिया ने सबमें एक अतृप्ति सी , एक अनबुझी प्यास , एक अंधी दौड़ सी भर कर रख दी है, जाने हम अपनी आने वाली नस्लों को क्या देने जा रहे हैं.
Saturday, May 10, 2008
यहाँ मैं क्या करता हूँ ?(कविता )
इस कोरी,
मगर काली नहीं,
स्लेट पर,
रोज़ कुछ,
शब्दों-चित्रों को,
उकेरता हूँ॥
कभी सपने,
कभी नग्मे,
कभी अपनी,
यादों के ,
रंग,
बिखेरता हूँ॥
रोज़ यहाँ,
कितने लम्हे,
कितने फ़साने,
खुशिया, गम,
सीने में,
सहेजता हूँ॥
बड़ी दुनिया में,
दूर हैं सब,
पहचान नहीं,
कोई रिश्ता नहीं,
पर जाने कितनों को,
रोज़ यहाँ , अपनी,
बाहों में,
समेता हूँ॥
हाँ यही सब तो करता हूँ यहाँ, रोज़ , और ये करना अच्छा भी लगता है, और आपको ..........
Thursday, May 8, 2008
क्या मैं पत्थर हो गया हूँ ?
सड़क पर,
हादसे देखता हूँ,
और पड़ोस में,
हैवानियत।
कूड़े में अपनी,
किस्मत तलाशते बच्चे,
कहीं प्यार, अपनापन,
और आश्रय तलाशते बड़े (बुजुर्ग) ।
सूखी तपती धरती,
लूटते- मरते किसान,
कच्ची मोहब्बत में,
कई दे रहे अपनी जान।
व्यस्त मगर,
बेहद छोटी जिंदगी,
चुपके से , कभी अचानक ,
आती मौत।
और भी,
कई मंजर ,
देखती हैं,
मेरी आंखें .
मगर मौन,
हैं , मन भी,
और नयन भी,
क्या मैं पत्थर हो गया हूँ ?
