इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

प्रचार खिडकी

मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

आप हिन्दी में ब्लॉग्गिंग कर रहे हैं तो ख़ास हैं, और इस खासियत को समझें

जी हाँ, मैं पूरे संजीदगी से ये बात कह रहा हूँ। आप शायद ये कहेंगे की ये क्या बात हुई भला और ये बात अभी यहाँ क्यों कह रहा हूँ। कारण तो है , वाजिब या गैरवाजिब ये तो नहीं जानता। दरअसल जितना थोडा सा अनुभव रहा है मेरा, उसमें मैंने यही अनुभव किया है की सब कुछ ठीक चलते रहने के बावजूद हिन्दी ब्लॉगजगत में अक्सर कुछ लोगों द्वारा चाहे अनचाहे किसी अनावश्यक मुद्दे पर एक बहस शुरू करने की परम्परा सी बंटी जा रही है। हलाँकि ऐसा हर बार नहीं होता और ऐसा भी जरूरी नहीं है की जो मुद्दा मुझे गैरजरूरी लग रहा है हो सकता है दूसरों की नजर में वो बेहद महत्वपूर्ण हो। मगर मेरा इशारा यहाँ इस बात की और है , की कभी एक दूसरे को नीचा, ओछा दिखने की होड़ में तो कभी किसी टिप्प्न्नी को लेकर, कभी किसी के विषय को लेकर कोई बात उछलती है या कहूँ की उछाली जाती है बस फ़िर तो जैसे सब के सब पड़ जाते हैं उसके पीछे , शोध , प्रतिशोध, चर्चा, बहस सबकुछ चलने लगता है और दुखद बात ये की इसमें ख़ुद को पड़ने से हम भी ख़ुद को नहीं बच्चा पाते, और फ़िर ये भी की क्या कभी किसी निष्कर्ष पर पहुँच पाते है ?

मुझे पता है यहाँ पर जो लोग इस दृष्टिकोण से देखते हैं की यदि ब्लॉग्गिंग में यही सब देखना और सोचना है तो फ़िर ब्लॉग्गिंग क्यों और भी तो माध्यम हैं न। मैं उन सब लोगों को बता दूँ और अच्छी तरह बता दूँ की आप सब जितने भी लोग हिन्दी और देवनागिरी लिपि का प्रयोग कर के लिख रहे हैं वे बहुत ख़ास हैं विशिष्ट हैं, सिर्फ़ इतने से ही जानिए न की करोड़ों हिन्दी भाषियों में से आप चंद उन लोगों में से हैं जो हिन्दी में लिख पा रहे हैं, और हाँ गए वो दिन जब आप अपने लिए लिखते थे। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ आज कम से कम हरेक हिन्दी का अखबार हमारी लेखनी को पढ़ रहा है, उस पर नजर रखे हुए है, उसे छाप भी रहा है और हमारे आपके विचार समाचार पत्रों के माध्यमों से न जाने कितने लोगों तक पहुँच रहा है।

तो आपको और हमें ही ये सोचना है की हम अपनी लेखनी और शब्दों को इस बात के लिए जाया करें की
गाली का मनोविज्ञान कहाँ से शुरू होकर कहाँ तक पहुंचा या कुछ सार्थक सोचे और लिखें .............
यदि कुछ ज्यादा कह गया तो परिवार का सदस्य समझ कर क्षमा करें.

सोमवार, 29 दिसंबर 2008

डायरी का एक पन्ना

अभी वर्षांत पर जबकि मन और मष्तिष्क दोनों ही बोझिल से हैं, और सच कहूँ तो बस इस साल के बीतने के इन्तजार में हैं, तो ऐसे में तो यही अच्छा लगा की जिस डायरी को मैं yun ही उलट रहा था उसके एक पन्ने पर उकेरे कुछ पंक्तियों को आपके सामने रख दूँ।

बसर हो यूँ की हर इक दर्द हादसा न लगे,
गुजर भी जाए कोई गम तो वाकया न लगे।
कभी न फूल से चेहरे पे गुर्दे यास जामे,
खुदा करे उसे इश्क की हवा न लगे॥
वो मेहरबान सा लगे इसकी कुछ करो तदबीर,
खफा भी हों आप तो खफा ना लगें॥

वो सर बुलंद रहा और खुद्पसंद रहा,
मैं सर झुकाए रहा और खुशामदों में रहा
मेरे अजीजों, यही दस्तूर है मकानों का,
बनाने वाला हमेशा बरामदों में रहा

मैं इन्तजार करूँगा आपका हर पल यारों,
आप आयेंगे, तभी मेरे रूह का दफ़न होगा,
हो सके हाथ में फूल के दस्ते नहीं , न सही,
खुदा के नाम पे , काँटों का तो कफ़न होगा॥

तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था,
वो रकीब न था तो वो नया नाम किसका था।
वो कत्ल करके मुझे हर किसी से पूछते हैं,
ये किसने किया, ये काम किसका था॥

कुछ इस तरह से सताया जिंदगी ने हमें,
हंस-हंस के रुलाया जिंदगी ने हमें,
मौत आवाज देती रही बार- बार,
न इक बार बुलाया जिंदगी ने हमें।

मैं नहीं जानता इन्हें किन लोगों ने लिखा, मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ की वे बड़े काबिल लोग होंगे..........

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008

तन्हाइयां बोलती हैं

अभी मन और मष्तिष्क ने रफ़्तार नहीं पकडी है, सो फ़िर कुछ हल्का फुल्का :-

दीवारों-दर से उतर के परछइयां बोलती हैं,
कोई नहीं बोलता जब तन्हाइयां बोलती हैं

परदेश के रास्तों, रुकते कहाँ मुसाफिर,
हर पेड़ कहता है किस्सा, कुस्स्वाईयाँ बोलती हैं

मौसम कहाँ मानता है तहजीब की बंदिशों को,
जिस्म से बाहर निकल के अंगडाइयां बोलती हैं

सुनने की मोहलत मिले तो आवाज हैं पत्थरों में,
गुजरी हुई बस्तियों में आबादियाँ बोलती हैं

कहीं बहुत पहले पढा था, अफ़सोस की लेखक का नाम याद नहीं, मगर उन्हें पूरी श्रद्धा के साथ नमन.

गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

बदले हैं अब दस्तूर ज़माने के

आज लगभग डेढ़ महीने बाद ब्लॉग पर लौटा हूँ, पिछले दिनों के लिए सिर्फ़ इतना की वे मेरी जिंदगी के कुछ बेहद कठिन दिनों में से कुछ दिन रहे, मन में कुछ भी नहीं हैं न ही मस्तिष्क में इसलिए कुछ हलकी फुलकी पंक्तियाँ आपको पढ़वाता हूँ जो मैंने कहीं बहुत पहले पढी थी, यदि मेरी याददाश्त ठीक है तो लेखिका का नाम था , सुश्री रीता यादव।:-

बदले हैं अब दस्तूर ज़माने के इस कदर,
अपना कोई बनना ही गंवारा नहीं करता

पागल भी नहीं लोग की माने नसीहत,
जो मान ले गलती वो दोबारा नहीं करता

अपने लिए तो जीते हैं , मरते हैं सभी लोग,
औरों के जख्म कोई दुलारा नहीं करता

जाते हैं बिखर आज, गुलिश्ते बहार के,
जिनको कोई माली भी संवारा नहीं करता

ऐसे तो मुकद्दर को कोई बदल सका,
फ़िर भी सिकंदर है , जो हारा नहीं करता

तूफानों से लड़ के जिन्हें मिल जाए किनारा,
वो ही कभी औरों को पुकारा नहीं करता

तारे भी तोड़ लाने का जो रखता है जिगर,
वो शख्स फटेहाल, गुजारा नहीं करता

शुक्रवार, 14 नवंबर 2008

पांडे V/S ठाकरे ( राजनीति का २०-२० )

अब क्षेत्रवाद का मैच ये,
और भी रोचक होगा,
नारे-दंगे, लाठी- डंडे,
सभी कहेंगे , बाप रे॥
मंजे हुए दोनों कप्तान,
इक पांडे, इक ठाकरे॥
अब जलने को तैयार रहो,
तिल तिल कर हर बार मरो,
इक डालेगा पैट्रोल, दूजा,
लगवाएगा आग रे ॥
पांडे बोले , जो बिदके,
अबकी उलटा सीधा,
तो न ताज रहें न राज रे॥
भागी सेना, पहुँची थाने,
डर और चिंता, लगी सताने,
गाने लगे, सब,
सुरक्षा का राग रे॥
गरीब भला ये क्या जाने,
आया था दो रोटी कमाने,
पीछे पड़ा , बोली-भाषा का नाग रे॥

चलिए , भगवान् करे पांडे ठाकरे टीम के इस मैच में किसी निर्दोष का विकेट न गिरे, मगर मुझे डर है की ऐसा ही होगा...

रविवार, 9 नवंबर 2008

दोस्त परेशान है , बताइए क्या करे

जब कोई आपके आसपार परेशान या दुखी हो तो जाहिर है की उसके प्रभाव से आप भी बच नहीं सकते, यदि आप सचमुच इंसान हैं तो , जरूर ही। बातों बातों में ही दोस्त से पता चल की आजकल वो बेहद परेशान चल रहा है , उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा की क्या करे और कैसे इस परेशानी से निकले , हलाँकि मैंने उसे सभी मानवीय और कानूनी उपाय और रास्ते भी बता दिए हैं लेकिन मुझे नहीं लगता की वो इसमें से बाहर आ पाया है, जब मैं भी नहीं जानता कि, उसे कौन सा रास्ता अपनाना चाहिए, इश्वर करे उसे ये न पता चले कि मैंने उसकी समस्या यहाँ रख दी।

दरअसल कुछ साल पहले नौकरी की तलाश में गों से शहर आया, खूब भाग दौड़ के बाद एक अच्छी सी नौकरी भी मिल गयी, और किस्मत से अच्छी सी छोकरी भी, जी हाँ अपने दोस्त को या उनकी धर्मपत्नी जी को प्यार हो गया, परिणाम ये कि दोनों अलग क्षेत्र, अलग भाषी, और अलग संस्कृति के बावजूद, बहुत से विरोधों के बावजूद परिणय सूत्र में बाँध गए.दोनों की आपसी समझ भी अच्छी ही है, मगर आजकल स्थिति कुछ ठीक नहीं है। दोस्त के बूढे माँ बाप, जब कुछ दिनों के लिए गाओं से यहाँ शहर में अपने बेटे और बहू के पास रहने आए तो दिक्कत शुरू हो गयी। पता नहीं कौन सही है कौन ग़लत, किसका व्यवहार ठीक है किसका नहीं, दोनों के पास अपने अपने तर्क हैं, और एक लिहाज से दोनों ही कभी ठीक तो कभी ग़लत होते हैं। अब मुश्किल ये है कि दोनों ही एक दूसरे को देखना भी नहीं चाहते, नहीं सहायद मैं ग़लत कह गया, दरअसल हमारी भाभी जी को दोस्त की माताजी से बिल्कुल ही खुन्नस हो गयी है, और इसके लिए उनके पास शायद लाखों तर्क हैं। दोस्त ने प्यार से तकरार से, मान मनौव्वल से , रूठ कर और सख्ती से भी प्रयास कर देख लिया, मगर अफ़सोस कोई बात नहीं बनी। एक बार तो ऐसा समय आ गया कि दोस्त ने माँ बाप के लिए सब कुछ छोड़ने का फैसला कर लिया, मगर फ़िर अपने बच्चों के कारण ऐसा भी नहीं कर पाया।
अब हालात ये हैं कि वो कशमकश में फंसा हुआ , बेचारा सबसे पूछ रहा है कि क्या करे, माँ बाप को इस बुढापे में छोड़ दे या फ़िर बच्चों का भविष्य दांव पर लगा दे।

मुझे तो सिर्फ़ एक ही रास्ता सूझा , वो ये कि , नहीं दोनों में से कुछ भी नहीं कर सकता इस लिए जब तक कर सकता है कोशिश करता रह और अपना कर्म भी , बिना कुछ सोचे और समझे।

अब ये बताइए, विशेषकर महिला समाज से तो जरूर ही जानना चाहूंगा कि दोनों ही औरतें उसकी जिम्मेदारी हैं उसका जीवन भी और दायित्व भी, तो ऐसे में वो क्या करे ..........?

शनिवार, 8 नवंबर 2008

औरत एक अंतहीन संघर्ष यात्रा


अपनी पिछले पोस्ट में नारी ने मुझे शिकायत की , कि मैंने ब्लॉग्गिंग पर लिखे और छपे अपने विस्तृत आलेख में महिला ब्लोग्गेर्स के लिए ज्यादा नहीं लिखा, हलाँकि मैंने उन्हें आश्वाशन दे दिया है कि जल्दी ही मैं उनकी ये इच्छा भी पूरी कर दूंगा, मगर फिलहाल मुझे लगा कि शायद ये उपायुक्त अवसर होगा कि महिला जीवन पर मेरा एक आलेख को मैं यहाँ पर छाप सकूं।
* छपे हुए आलेख को पढने के लिए उस पर क्लिक करें.

शुक्रवार, 7 नवंबर 2008

ब्लॉग्गिंग पर मारा आलेख २९ समाचार पत्रों में छपा



जैसा की बहुत पहले ही सोचा था कि जब ब्लॉग्गिंग हो ही रही है तो , इसके बारे में अन्यत्र भी चर्चा होनी चाहिए, खासकर उन माध्यमों में तो जरूर ही जहाँ मैं सक्रिय हूँ, पहले रेडियो, फ़िर प्रिंट में भी सोचा था, आखिरकार ब्लॉग्गिंग के विषय में पहला आलेख फीचर के माध्यम से अब तक २९ समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में छपा। सबसे अच्छी बात ये रही कि ये आलेख, हैदराबाद, श्रीगंगानगर, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार आदि कई राज्यों में छपा। मेरी कोशिश तो यही रही कि सब कुछ लिख सकूँ , पर जाहिर है कि एक ही पोस्ट में ऐसा सम्भव नहीं था, इसलिए फैसला किया है कि ,जल्द ही एक नियमित स्तम्भ , "ब्लॉग बातें " विभ्हिन्न समाचार पत्रों में दिखाई देगा, योजना को मूर्त रूप देने में लगा हूँ, आप लोगों का साथ रहा तो जल्दी ही और भी कुछ सामने आयेगा.

मंगलवार, 4 नवंबर 2008

लीजिये अब पौधे भी करेंगे ब्लॉग्गिंग

जी हाँ, आप ये कदापि न सोचें कि, मैं यूँ ही कोई रद्दी माल उठा कर आपके सामने परोस रहा हूँ। ये बिल्कुल सच है ,आप ख़ुद ही sochiye कि यदि कोई पौधा ये कहता है कि आज तो बहुत अच्छा लगा, दिन भर गुनगुनी धुप सेंक कर बड़ा अच्छा लगा , वो भी अपने ब्लॉग पर तो कैसा लगेगा, खैर आप जब तक ये सोचें कि आप उस पौधे की पोस्ट पर क्या टिप्प्न्नी करेंगे, तब तक में आपको पूरी ख़बर बताता हूँ।
दरअसल जापान में एक विशेष तकनीक विकसित की गयी है जिसके जरिये पौधा भी अपनी भावनाएं ब्लॉग के माध्यम से व्यक्त कर सकेगा। एक इन्टरनेट कैफे में लगा मदोरी सेन नामक एक पौधा नियमित रूप से इन्टरनेट पर ब्लॉग लिख रहा है। वैज्ञानिकों द्वारा आविष्कार किए गए सेंसर के माध्यम से पौधे की भावनाओं को जापानी भाषा में ( यहाँ ये बता दूँ कि जापानी भाषा में इसलिए कि आंकडों के अनुसार दुनिया में सर्वाधिक पोस्ट जापानी भाषा में ही किए जाते हैं ) अनुवाद कर उसके ब्लॉग पर डाल दिया जाता है ।
अब बताइये है न कमाल की बात, यार ये जाप्नीयों के दिमाग में होता क्या है। वैसे मैं सोच रहा हूँ कि यदि मुझे भी ये प्रोग्राम मिल गया तो सबसे पहले मैं आलू , प्याज, और टमाटर के अन्दर उसे फ़िर करके पोस्ट करवाउंगा, और जरूर पूछूंगा कि भाई, कब तक तुम्हारी वजह से मीर हैसियत यूँ गरीबों वाली रहेगी।
आप भी सोचें कि आपने किस पौधे से क्या पोस्ट करवाना है,या कौन सी टिप्प्न्नी करनी हैं।

अब होगी ओबामा और ओसामा की लडाई : - मेरे मित्र पलटू राम की ये आदत कभी नहीं जायेगी, कि वो हमेशा किसी भी चीज को, घटना को, दुर्घटना को भी उल्टे होकर देखते हैं, पता नहीं शायद उल्टे पैदा हुए थे। खैर जब उनसे पूछा कि क्यों भाई सबसे शक्तिशाली आदमी के रूप में ओबामा को ही देखा जा रहा है क्या कहते हो। वो कहने लगे, यार ये तो पता नहीं मगर मुझे लगता है कि यदि ओबामा जीत गए तो ओसामा को नहीं छोडेंगे, देखो न कितना मिलता जुलता नाम है, उन्हें इसी का कोम्प्लेक्स सताता रहेगा, तो लगता है कि जल्दी ही कोई बड़ी लड़ाई छिड़ने वाली है, कमाल है ये कौन सा एंगल था यार.

गुरुवार, 30 अक्तूबर 2008

मंजर , यही हर बार रहता है .

माहौल कुछ ऐसा है,
या कि, अपनी,
आदत बन गयी है ये,
अब तो,
हर घड़ी,
इक नए दाह्से का,
इन्तजार रहता है,
हकीकत है ये,
कि बेदिली की इंतहा,
देखते हैं, पहला,
दूसरा पहले से,
तैयार रहता है,

घटना- दुर्घटना ,
हादसे-धमाके,
प्रतिरोध-गतिरोध,
बिलखते लोग,
चीखता मीडिया,
बेबस सरकार,
आंखों में मंजर यही,
हर बार रहता है........

हाँ, शायद आज यही हमारी हकीकत बन चुकी है , कि एक के बाद एक नयी नयी घटनाएं, सामने आती जाती हैं, पिछली हम भूलते जाते हैं, और अगले का इंतज़ार करते हैं, यदि दूसरों पर बीती तो ख़बर, अपने पर बीती तो दर्द....

मंगलवार, 21 अक्तूबर 2008

मनसे यानि, मनोरोगियों की नक्सलवादी सेना

इन दिनों आ सी एल की ख़बरों की जितनी ही दुर्दशा हो रही है उतनी ही ज्यादा चर्चा अपने मनसे की हो रहे है और फ़िर हो भी क्यों न जितनी तेज़ गति से वे रोज कोई न कोई रोमांचक मैच खेल रहे हैं तो जाहिर है की उनकी ही चर्चा ज्यादा होनी चाहिए। हाल ही में इस खाकसार को उनका सामना करने का मौका मिला, (यहाँ ये स्पष्ट कर दूँ की ये साक्छात्कार उनके कारागार प्रवास से पहले का है, इसलिए शक न करें )

सर, आपकी ये जो मनसे नामक टीम है, इस पर कई गंभीर आरोप लग रहे हैं, पहला तो यही है कि, आप मनसे नहीं हैं आप लोग असल में तनसे हैं, मतलब आप लोग सारे काम तनसे, विशेष कर हाथ और लात से ही ज्यादा करते हैं, और मन की कौन कहे जो बोले बैगैर भी काम चल सकता है आप उसमें भी अपनी जुबान का काम लेते हैं तो कैसे हुए आप मनसे,
उन्होंने घूर कर देखा , और इशारा किया कि आगे बढो।
साडी कहा जा रहा है कि आपकी सेना का पूरा नाम तो मनोरोगियों की नक्सलवादी सेना होना चाहिए, काम तो आपके उनके जैसे ही हैं, और फ़िर कहे का पुनर्निर्माण, क्या निर्माण ऐसे होता है ।
बिल्कुल, आपने इतिहास नहीं पढा , किसी भी निर्माण से पहले उसका विध्वंस होना जरूरी होता है । देखो दिल्ली सात बार बसने से पहले उतनी ही बार उजड़ी भी थी न , अबकी बार मैंने घूर कर देखा, नहीं शर्मा कर।

सर सुना है आप हमेशा ही धमकी देते रहते हैं कभी किसी को कभी किसी को, असर वासर तो होता नहीं है कुछ।
क्या कहा असर नहीं होता , किसने कहा आपसे , अजी हमने रातों रात मुंबई के सारे पोस्टर्स, दुकानों के नाम, होटलों के नाम सब कुछ मराठी में करवा दिया,और बोल्लीवुद के कौन कहे, अपने सरकार देखी थी, उसके बाद जो रामू ने सरकार राज बनायी थी, वो किसके लिए थी, और किसे खुश करने के लिए थे, आप सरकार में राज के बाद भी नहीं समझे ।

सर हाल में बिहार , यु पी , से बेचारे गरीब छात्र यहाँ परिक्षा देने आए थे, उनके साथ भी आप लोगों ने मारपीट की, कई तो उनमें से ऐसे थे जो मराठी जानते भी थे, फ़िर भी.....

क्या मराठी जानते थे, सब झूठ, जब सर पे डंडा पडा सारा झूठ निकल गया, वे चीख तो हिन्दी में रहे थे ।

सर , भविष्य के लिए आपकी और क्या क्रांतिकारी योजनायें हैं ?

पहले तो में सरकार से मांग करने जा रहा हूँ कि जब सबके लिए इस पे कमीसन में बात हुई, सेना के लिए तो अलग से हुई तो हमारी सेना के लिए कुछ क्यों नहीं सोचा गया, जल्दी ही राष्ट्र्यव्यपी, नहीं महाराष्ट्रव्यापी आन्दोलन होगा। हम फैसला लेने जा रहे हैं कि जितने भी बड़े बड़े कलाकार हैं सबको अपना सरनेम महाराष्ट्रियन ही लगाना होगा, जैसे, शाहरुख पाटिल, आमिर राणे, अमिताभ गायकवाड, सलमान पवार, कैटरीना मातोंडकर अदि , और भी कई योजनायें हैं, आप देखते रहे।
मगर सर सुना है कि आप दोनों परिवारों के बीच कुछ अनबन चल रहे है, जैसे उन्होंने कहा कि सब कुछ उनके
पिता महाराज का है .
अजी छोडो छोडो मजाक है क्या, उनके कहने से क्या होता है, उनका तो तभी पता चल गया था , वैसे तो कहते थे कि मैं ये हूँ वो हूँ और , जब माईकल जैकसन आया तो कहने लगे कि , मुझे फक्र है कि माईकल जैकसन जैसे कलाकार ने मेरा टॉयलेट उप्यूग किया, बताइए तो ये कोई बात हुई।
अच्छा आप अब जाईये मुझे मनसे के बारे में पूरे मन से सोचना है।
मैं भी मन ही मन सोचते चला गया.

शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2008

खुशियों की खुरचन ही मिली

कोशिश तो,
हमने भी की,
अपनी झोलियाँ,
भरने की,
किस्मत अपनी,
की हर बार,
खुशियों की,
खुरचन ही मिली।

जब कर लिए,
सारे प्रयास,
और ढूंढ लिए,
कई प्रश्नों के,
उत्तर भी,
हर जवाब से,
इक नयी,
उलझन ही मिली॥

चाहा की तुम्हें,
रुसवा करके,
सिला दूँ, तुम्हें,
तुम्हारी बेवफाई का,
तुम्हें दी ,
हर चोट से,
अपने भीतर इक,
तड़पन सी मिली॥

मैं मानता था,
अपने अन्दर,
तुम्हारे वजूद को,
मगर न जाने क्यों,
हर बार , बहुत,
दूर तुम्हारी,
धड़कन ही मिली...

गुरुवार, 16 अक्तूबर 2008

दूज , तीज,चौथ, महिलाओं की- पंचमी पुरुषों की.

करवा चौथ का सबसे कड़वा पहलू तब होता है जब घर की सारी अबला सेना दोनों हाथों में मेहंदी लगा कर बैठ जाती हैं और सारे काम हमें सौंप कर अबला बना डालती हैं। क्खैर, ऐसे ही सभी काम काज, निपटा कर जब फुर्सत में बैठे तो महिला मंडली से हमने भी कुछ वाद विवाद करने का मन बना लिया। सो शुरू हो गए, पहले अपनी छुटकी से ही शुरू किया।
एक बात बताओ ये तुम लोगों का मैथ से कौन सा कनेक्शन है, सभी अंकों पर तुमने अपने एक त्यौहार फिक्स कर लिए हैं, और वो भी ऐसे की कमबख्त सब में हमारी ही धुलाई पुताई जो जाती है।
बीच में ही सबका ध्यान अपनी और पाटा देख कर मैंने कहना जारी रखा, देखो भैया दूज, हो तो भैया जी बन कर गए काम से, फ़िर आयी तीज की बारी, इसमें भी श्रृंगार पतार पर जो अतिरिक्त बोझ बजट पर आता है उससे हमारा ही बैंड बजता है, और अब ये करवा चौथ। यार इस चौथ पर आप सबने जो ये मेहंदी और तरह तरह की सजावट, सर पर ये पंडाल वैगेरह लगवाए हैं, जानते हो यदि सिर्फ़ इस बार ही आप सब इस प्रोग्राम को एक्सटैंड कर देते तो आपको पता नहीं ये तो इस बाज़ार पर बिल्कुल रिजर्व बैंक की तरह का उपकार कर देते। और एक अन्तिम बात सभी कुछ आप लोगों के लिए ही है, हमारा क्या, हमारे लिए कुछ भी नहीं।

श्रीमती जी, तपाक से ब्लोई, छुटकी, अपने भैया से कहो निराश होने की क्या बात है, चौथ के बाद पंचमी आती है, और इस लिहाज से नाग पंचमी उन्ही लोगों के लिए है, तभी तो हम सब उस सारे नागों को बिल से निकाल कर दूध पिलाते हैं, और फ़िर साल भर उन नागों को बीन पर नचाते हैं।

मैं चुपचाप उनके लिए चाय बनाने चल दिया, ज्यादा दूध वाली।

हे , इछाधार्नियों आप सबको करवा चौथ पर बहुत बहुत बधाई.

रविवार, 12 अक्तूबर 2008

एक पाती , अनाम जी के नाम

हे , परम आदरणीय अनाम जी, आप नारी हैं, नर हैं, या किन्नर हैं, या की कोई अलीयन हैं, मैं नहीं जानता परन्तु जो भी हैं , मेरा यथोचित अभिवादन स्वीकार करें। दरअसल आपकी पहचान को लेकर दुविधा का कारण भी ख़ुद आप हैं। अपनी टिप्प्न्नी के माध्यम से ही आप दिल के करीब आ गए हैं। महिला समाज और सोच पर लिखी एक पोस्ट पर आपने थोक के भाव मीर धज्जियाँ उडाई तो मैं समझा की महिला अधिकारों की शाश्क्त प्रहरी आप अवश्य ही कोई देवी हैं। मगर अगले ही पल मुझे पता लगा की आपने तो वरिस्थ महिला ब्लॉगर घुघूती जी को भी अपने शुभ वचनों के प्रसाद का रसास्वादन कराया है, फ़िर आपने मुझ पर ये आरोप भी जड़ दिया की मेरी पसंदीदा सूची में सिर्फ़ महिला ब्लोग्गेर्स का नाम क्यों, जबकि उनमें कई ब्लॉगर भाई भी मौजूद हैं। तो नर नारी के बाद किन्नर के रूप में आपको परखने की मेरी हिम्मत नहीं हुई।
अब एक अलग बात, हे प्राणी, आपका चेहरा कभी दिखाई नहीं देता। जो नेगटिव नुमा तस्वीर अपने चस्पा कर राखी है उससे आपकी शक्ल का अंदाजा लगायें तो उतनी बुरी नहीं लगती जितनी तल्ख़ आप टिप्प्न्नी करते हैं। मान्यवर, क्यों आप ;इतना तपे हुए, जले फूंके और लुटे हुए हैं। यदि किसी को प्रोत्साहित करने वाली बात गलती से ही सही , आपने कही हो तो बताएं, मैं पहले उनके फ़िर आपके चरणों में लोट जाउंगा।
एक आखिरी आग्रह इसी तरह मेरे चिट्ठे पर आकर मेरी बैंड बजाते रहे। भविष्य में फ़िर कोई नयी पोस्ट लिखने का प्लाट मिले न सही आपसे एक अनाम रिश्ता तो बना रहेगा। और हाँ, मित्रवर, आपके नाम की स्पेलिंग भी बड़ी कठिन है anynomous, इससे आसान और अच्छा रहेगा - ? । अब आप अपने आशीष वचनों से कृतार्थ करें। आप द्वारा घोषित आपका मानसिक रोगी.

शनिवार, 11 अक्तूबर 2008

सपनो को फ्रिज में रख छोड़ा है

मैंने सपने देखना,
नहीं छोडा है,
न ही,
उन्हें पूरा करने की,
जद्दोजहद।
मगर फिलहाल,
जो हाल,
और हालात हैं,
उन सपनो को ।
फोंइल पेपर में,
लपेट कर,
फ्रिज में रख छोडा है,
मौसम जब बदलेगा,
और पिघलेगी बर्फ,
सपने फ़िर बाहर आयेंगे,
बिल्कुल ताजे और रंगीन.

रविवार, 10 अगस्त 2008

चिचिंग चांग, चमचम, चों चों, यानि ओलम्पिक उदघाटन में मज़ा नहीं आया .

यार पिछले कितने समय से ओलम्पिक उदघाटन का इंतज़ार कर रहे थे। पहले तो सोचा था कि किसी खेल वेळ में नाम लिखवाकर पहुँच जायेंगे मगर पता चला कि गुल्ली डंडा , पतंगबाजी, कंचे, ताश, डंडे से टायर चलने आदि , जिन जिन खेलों में हमने महारथ हासिल की थी उन्हें तो हमारे अलावा कोई देश जानता ही नहीं। बताइये होता तो सारे गोल्ड, सिल्वर आयरन ,स्टील मैडल अपने ही होते न । खैर, जब पक्का हो गया कि नहीं जा पायेंगे तो मन बना लिए घर पर ही उदघाटन समारोह का मजा लेंगे। मगर धत तेरे की।

आप ही बताइये चीन के नाम पर अपने लोगों के दिमाग में क्या आता है - चौमींत, चाऊ चाऊ, और ढेर सारा चाईनीज़ नकली समान। पूरे समारोह के दौरान आँखें फाड़ फाड़ कर चाउमीन देखने के लिए बेताब रहे और बाद में तो हमें यकीन सा होने लगा कि इस चौमें से चीन का कोई लेना देना नहीं है, होता तो क्या ओलम्पिक में न दिखता। मगर हां नकली समान वाली बात तो बिल्कुल ठीक लग रही थी। यार, वहाँ नकली बुश, नकली मुशर्रफ नकली सोनिया और पता नहीं कितने सारे नकली नेता बिठा रखे थे।

सुनने में तो आया है कि बहुत सारे नकली मैडल भी तैयार हुए हैं ताकि हमारे देश तथा उनके जैसे और खिलाडिओं को निराश न होना पड़े। हां, भाई एक बात और जनसंख्या के हिसाब से चीन से हम सिर्फ़ एक नंबर पीछे हैं और ओलम्पिक में हमारा कोई नंबर ही नहीं है। हालाँकि चीन ने भारत पर साजिश रचने का आरोप लगाया है कि भारत ने मात्र ५६ लोगों को ओलम्पिक में भेजा है ताकि बांकी लोग यहीं रहकर जल्दी से जल्दी चीन की सबसे ज्यादा जनसंख्या का रेकोर्ड तोड़ दें।

कुल मिलाकर उदघाटन में मजा नहीं आया................................

गुरुवार, 31 जुलाई 2008

मन किया तो लिख डाला, मन करे तो पढ़ लेना

कई अलग अलग कारणों से पिछले कुछ दिनों से अपना ये पसंदीदा काम नहीं कर पाया था, और पिछले ही कुछ दिनों में कई सारी घटनाएं-दुर्घटनाएं एक साथ घटती चली गयी। जिन्हें जब मैंने बैठ कर एक साथ सोचा तो ये सारी बातें निकल कर सामने आयी :-

एक करोड़ का बैग :- संसद में अभी अभी हमारे माननीय सांसदों द्वारा एक करोड़ की नोटों की गद्दियाँ उछालने को बिल्कुल ग़लत दृष्टिकोण से देखा और दिखाया गया।

समाज और समाज सेवक के बीच पूर्ण पारदर्शिता का ये प्रत्यक्ष प्रमाण था।
इसी घटना से एक आम आदमी को पता चला की यदि सौ सौ की गद्दियों का एक करोड़ हो तो कुल वज़न उन्नीस किलो होता है, वरना एक आम आदमी तो गुल्लक में जमा सिक्कों के वज़न से ही ख़ुद को कृतार्थ कर लेता है।
इसी गटना से पहली बार आम लोगों को किसी भी संसद सत्र में, सस्पेंस, थ्रिल और कोमेडी का पूरा मज़ा मिला, वरना तो ये सत्र वैगेरा बिल्कुल बोरिंग ही होते थे।
घटना ने दिखा दिया , की दुनिया वालों, यदि तुम समझ रहे हो की इस देश में सिर्फ़ गरीबी, भुखमरी , अशिख्सा है, किसान आत्महत्या कर रहे हैं, लोग कुपोषण और बीमारी से मर रहे हैं, तो आँखें पसार कर देख लो हमारे सेवक जन करोड़ों के गड्डी बना कर खुलेआम कैच कैच खेल रहे हैं।

बंगलुरु और गुजरात में बम विस्फोट :-

सब कुछ एक तय शुदा कार्यक्रम है भाई।
आतंकियों का काम, पहले जगह तलाशो, जहाँ खूब भीडभाड हो , भारत में ये कौन मुश्किल काम है, फ़िर मजे से बम लगाओ और फोड़ दो।
पुलिस का काम, फ़टाफ़ट जांच शुरू, ई मेल , फी मेल पकड़े, संदिग्धों की धड पकड़ की, और अपनी पीठ थोक ली।
सरकार और हमारे मंत्रियों का काम, पहुंचे , बम विस्फोट की निंदा की, मुआवजे की घोषणा की, और चलते बने।
आम आदमी का काम, बम फटा, मरे, घायल हुए तो टी वी अखबार में फोटो छपी, मंत्रियों ने सांत्वना दी, मुवाजे का लोलीपोप दिखाया, और फ़िर सब , सब कुछ भूल कर बैठ गए,
किसी अगले बम विस्फोट की प्रतीक्षा में..............................

सीना फुलाए जाओ, सर झुकाए आओ।

ये लीजिये, अभी हमारा ५७ सदस्यों वाला दल ओलम्पिक में भाग लेने निकला ही था की उनकी सफलता-विफलता की चिंता होने लगी। पदकों का हिसाब किताब चल रहा है, और हमारे मंत्री अधिकारी अपने विचार और बयान दे रहे हैं। भविष्य में ओलम्पिक का कितना सोना चांदी भारत में चमकेगा ये तो पता नहीं मगर फिलहाल के स्थिति में एक आम भारतीय समझ नहीं पा रहा है की हँसे या रोये। कोई नसीहत दे रहा है की किसी चमत्कार या पदक की कोई उम्मीद नहीं लगाना भैया, कोई कह रहा है की चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए कम से कम आठ पदक तो अपने हैं ही। सवा अरब की जनसंख्या में सिर्फ़ पचास पचपन खिलाड़ी , जीते तो आठ, नहीं तो हमेशा की तरह सीना फुलाए जाओ, सर झुकाए आओ की नीती सफल रहेगी। तो फ़िर यार, सिर्फ़ छप्पन लोग क्यों छप्पन हज़ार या छप्पन लाख क्यों नहीं, कम से कम ओलम्पिक के दौरान ज्यादा से ज्यादा खिलाड़ी भारतीय ही दिखाई देंगे।

इश्मीत का जाना:-

यार, कौन कहता है कि, भगवान् से अन्याय नहीं होता , एक उदाहरण तो सामने है ही।
कोई अपनी मेहनत और किस्मत से सिर्फ़ इतनी सी उम्र में इतनी ऊचाईयों तक पहुंचा और फ़िर अचानक ही मौत की गहराई में चला गया।
मेरे तरह बहुत से लोग ऐसे होंगे जिन्होंने इश्मीत सिंग को सिर्फ़ टी वी में ही देखा होगा, और शायद मेरी तरह ही कभी वोट भी नहीं किया हो, मगर दुःख , बेहद दुःख तो उसे भी मेरी तरह ही हुआ होगा।
एक नहीं भूल सकने वाली कहानी, एक फ़साना, इश्मीत का जाना, अफ़सोस , अफ़सोस, अफ़सोस।

आज इतना ही..........

शनिवार, 12 जुलाई 2008

ब्लॉगजगत में महिलाओं की धाक


पिछले दिनों जब मैंने अपने एक पोस्ट में महिलाओं पर कुछ पंक्तियाँ लिखी थी तो जैसा मैंने सोचा था बहुत सी प्रतिक्रियां आयी थी और कई तो ऐसी थे की जिनको पढने के बाद मुझे लगा की यार ये सब तो मुझे औरतों का दुश्मन समझने लगे हैं। हालाँकि ऐसा नहीं है की उस बात को ठीक करने के लिए या किसी तरह की कोई सफाई देने के लिए मैं ये पोस्ट लिख रहा हूँ परन्तु इतना जरूर है की मैं चाहता था की बिल्कुल आराम से किसी दिन फुर्सत में ये पोस्ट लिखूंगा, क्योंकि यदि किसी का जिक्र छूट गया या कोई बात दिमाग में आने से रह गयी तो फ़िर बाद में अफ़सोस होगा , मगर पता नहीं किस भावना के वशीभूत होकर मैं ये लिखने बैठ गया हूँ।

ब्लॉगजगत पर जितने समय से मैं हूँ उसमें मैंने महसूस किया है की यहाँ महिलाओं के लेखन की , उनके ब्लोग्स की और शायद इससे बनी उनकी शक्शियत की एक अलग ही बात है , एक अलग ही प्रभाव है, जो किसी भी क्षेत्र से ज्यादा है, नहीं ऐसा नहीं है की ये एक अकेला ऐसा क्षेत्र है, या की मैं पुरुषों के लेखन या इस ब्लॉगजगत में प्रभाव और सक्रियता से कोई तुलना कर रहा हूँ । बस इतना समझ लीजिये की यहाँ महिलाओं को जबरदस्त स्थान और महत्त्व मिला हुआ है।

यदि मैं एक एक का नाम लिखवाऊं तो शायद अपनी आदत के अनुरूप किसी न किसी का नाम जरूर भोल जाउंगा फ़िर भी कोशिश करता हूँ , क्योंकि उनकी नाम की चर्चा के बगैर , ये चर्चा अधूरी सी हो जायेगी। उन नामो में , घुघूती बासूती, नीलिमा, प्रत्यक्षा, मीनाक्षी, रंजना, अनुराधा, लवली, स्वाति, सुजाता, पारुल, दीप्ति, रश्मि सुराना ,शानू, मुस्कान, महक, बेजी ,ममता ,और भी बहुत सी महिला ब्लोग्गेर्स जिन्हें में पढता या नहीं भी पढ़ पाता हूँ।

सबसे पहली बात तो ये की महिला ब्लोग्गेर्स (अधिकाँश महिला ब्लोग्गेर्स ) अपने ब्लॉग को उसी तरह सजाती और सवारती हैं जैसा वे अपने घर को , हमारे जैसे नहीं की बिना मुंह धोये पहुँच गए , जैसा अपना थोबडा वैसा ही ब्लॉग का भी दिखता है, मगर ऐसा नहीं है की इसमें सिर्फ़ महिलाओं को ही महारत हासिल है हमारे भाई लोग भी कमाल की मेहनत कर रहे हैं.मगर इतना तो मैं यकीनी तौर पर कह सकता हूँ की महिलाएं इस काम में ज्यादा ध्यान देती हैं । अब उनके लिखने के विषय पर जाएँ, इसमें कोई शक नहीं की हमारी महिला ब्लोग्गेर्स अपने क्षेत्र
और अपनी विशेषता के अनुरूप पूरी दक्षता और संजीदगी से यहाँ लिख रही हैं। चाहे वो पारुल जी का संगीत ज्ञान हो , या प्रत्यक्षा का साहित्य ज्ञान, चाहे वो बेजी की चिकित्सकीय स्पंदन हो या घुघूती जी का घुमक्कड़ साहित्य, या फ़िर शानू अनुराधा, रंजना की कवितायें हो या मिनाक्षी जी का अलग अलग अंदाज़ या फ़िर स्वाति की विशिस्थ शब्दावली, सब कुछ अपने आप में अनोखा है, और ममता जी के तो पता नहीं कितने टी वी चैनल हैं । हाँ मगर मुझे लगता है की यदि मैं औरतनामा, चोखेरबाली जैसे सामूहिक ब्लोगों की चर्चा नहीं भी करूँ तो भी सभी महिला का एक प्रिया विषय ख़ुद "औरत " ही है, उनका संघर्ष , उन पर होने वाले अत्याचार, उनका शोषण, उनमें आ रहे परिवर्तन, और अपनी आदत के अनुरूप वे पुरुषवादी मानसिकता वाले समाज को जरूर कटघरे में खडा करती है , जो शायद स्वाभाविक भी है। लेकिन कोई महिला ब्लॉगर या जो ब्लॉगर नहीं भी है कभी उन महिलाओं को अपने निशाने पर नहीं लेती जो ख़ुद ही औरतों की सबसे बड़ी दुश्मन बन जाती है।

एक और ख़ास बात लगती है महिलाओं की, वे बेहद भावुक पाठक और उतनी ही तत्पर टिप्प्न्नी करने वाली भी होती हैं, मगर सिर्फ़ उनके लिए जो उन्हें टिप्प्न्नी करते हैं, हा हां हां , मजाक कर रहा था , मगर यदि किसी ने महिलाओं के लिए कोई प्रतिकूल बात कह दी या जिसे हमारे बुजुर्गों ने बड़ी चालाकी से नाम दे दिया है कड़वा सच तो फ़िर तो बच्चू आपकी खैर नहीं , आपको ऐसी ऐसी , और ऐसे ऐसे लोगों से तिप्प्न्नियाँ मिलेंगी की फ़िर कभी आपको ये हसरत नहीं रहेगी की को आपको टिपियाता नहीं है।

चलिए आज इतना ही ज्यादा लिखा तो जरूर कोई न कोई मेरे कान पकड़ लेगा। चलते चलते सिर्फ़ इतना
की जिनका नाम भूलवश मैं यहाँ लेना भूल गया वो मुझे माफ़ कर दें , और अपने बोल्ग्गेर भाइयों से इतना केई बंडू नाराज़ ना होना की जो काम एक महिला को करना चाहिए था वो मैंने क्यों किया , आप लोगों के लिए भी जल्दी ही एक खुशखबरी दूंगा। वैसे अभी तो सिर्फ़ इतना ही की शायद अगली पोस्ट मेरा विभिन्न समाचार पत्रों में छापा हुआ आलेख होगा जो की पूरे ब्लॉगजगत पर लिखा गया है, प्रति आते ही यहाँ स्कैन करके लगाउंगा।

फिलहाल राम राम
आपका
अजय
9871205767

रविवार, 29 जून 2008

रे माधो, तू देखना


रे माधो, तू देखना,
इक दिन ,
मैं इस चाँद का,
एक टुकडा तोड़ कर,
तेरे माटी के,
दिए में पिघ्लाउंगा॥

रे माधो, तू देखना,
इक दिन,
इन तारों को,
बुहार कर एक साथ,
रग्दुन्गा , तेरे आँगन में,
आतिशबाजी , करवाउंगा मैं॥

रे माधो, तू देखना,
इक दिन,

तू नहीं जायेगा,
पंचायत में हाजिरी देने,
तेरे दालान पर,
संसद का सत्र बुल्वाउंगा मैं॥

रे माधो, तू देखना,
इक दिन,

तेरे गेह्नु के बने ,
जो खाते हैं, रोटी,
ब्रैड-नॉन, भठूरे,
उन सबसे ,
तुझको मिलवाउंगा मैं॥

रे माधो, तू देखना,
इक दिन,

तेरी मुनिया को,
इस स्लेट-खड़ी के साथ ,
बड़े कोंवेंट में ,
पढवाउंगा मैं॥

रे माधो, तू देखना,
जो इस जनम,

न हो सका , ये सब,
तो जब तक,
हो न सकेगा, ये सब,
हर बार , इक नया जनम,
लेकर आउंगा मैं॥

माधो , तू देखना एक दिन ऐसा जरूर होगा, क्यों होगा न ?

गुरुवार, 19 जून 2008

ब्लॉगजगत के एलियन -श्री उड़नतश्तरी जी महाराज पर एक पोस्ट

शुरू-शुरू में जब मैंने अपने चिट्ठों पर लिखना शुरू किया था तो एक अदद टिपण्णी की दरकार रहती थी, इसका ये कतई मतलब नहीं की आजकल दरकार नहीं रहती, मगर उन दनी हम किसी कक्षा में आए नए बच्चे की तरह थे जो कक्षा में मौजूद हरेक सहपाठी से अपनी जान पहचान बढाना चाहता है। ऐसे में इस ब्लॉगजगत के लोग कब कितना टिपियाने आए ये तो याद नहीं मगर धरती, पातळ , आकाश को छोड़कर आसमान के ऊपर से एक अन्तरिक्ष के प्राणी- उड़नतश्तरी जी - हमारे चिट्ठे पर अक्सर अवतरित होने लगे। तब हमारे अल्पबुद्धि मस्तिष्क में दो ही बातें संचारित हुई। पहली ये की- यार, कमाल है हमें टिपियाने जादू के भी, बंधू, एलियन लोग आने लगे, इतने ऊपर लेवल की लेखनी हो गयी, हमारी कमाल है, झा बाबु।

दूसरी ये की यार, कहीं ऐसा तो नहीं की धरती- पातळ में कोई हमारी बात समझ ही नहीं रहा तो बेचारा कोई एलियन उसे अपनी कूट भाषा समझ कर टिपिया रहा हो, अजी लानत है झा जी। खैर हमारे बात पर झाडू मारिये।

जब हमने उस यु , आई, ओ , यानि अन आईदेंतीफाईद ओब्जेक्त को आईदेंतीफाई किया तो आशा के अनुरूप आलूबुखारे, रसगुल्ले, गुलाबजामुन, की प्रजाती के गुलगुले -थुलथुले से एलियन महाशय निकले- उड़नतश्तरी जी। उनका असली नाम समीर सोनी है ये तो मुझे कुछ ही समय पहले पता चला। वैसे अपने मम्मी पापा से अच्छा तो ख़ुद ही उन्होंने अपना नामकरण किया है।

इनकी पोस्टों, इनकी, लेखन शैली, इनकी अनोखी सोच, अद्भुत विचारों के बारे में क्या कहूं। इन्हें पढ़ कर कोई भी समझ सकता है की ये इंसानी शरीर, रंग रूप मगर दिमागी तौर पर किसी एलियन का काम हो सकता है। चाहे गंभीर बात करें या किसी को जूता मारें ( ध्यान रहे की ये जूता मारने से पहले उसे अच्छी तरह भिगो देते हैं ) , बस हर बात में एक तरह का अन्त्रीक्ष्पना टपकता है।

अब टिप्पणियों की बात। जैसा की मैंने पहले ही बता दिया है की ये वो उड़नतश्तरी है जो बगैर किसी ट्रैफिक जाम ,रेड लाईट, में फंसे हर किसी के चिट्ठे पर लैंड करती है। (मेरे यहाँ तो इनकी पार्किंग का आजीवन पास बना हुआ है )। इनकी इस क्रिया की ऐसी प्रतिक्रया होती है की इनकी एक पोस्ट पर इतनी टिप्पणियाँ आती हैं, जितनी हम साल भर पोस्ट नहीं लिख पाते। खुदा खैर करे यदि गलती से भी किसी दिन मेरी रद्दी की टोकरी में इतनी तिप्प्न्नियाँ आ गयी तो यकीन मानिए खुशी के मरे मेरे चिट्ठे का हार्ट फ़ैल हो जायेगा।

जब भी ब्लॉगजगत पर किसी के योगद्दन की चर्चा होगी तो इस मोस्ट आईदेंतीफाईद ओब्जेक्त की टिप्पणियों और उनके साथ नए चिट्ठाकारों को आमंतरण और प्रोत्साहन के संदेश के लिए हमेशा ही याद किया जायेगा। मैंने भी ख़ुद इसी से प्रेरित होकर बहुत लोग को धकिया कर यहाँ इकठ्ठा कर लिया है। हाँ मेरी एक हसरत तो हमेशा से रहेगी की कभी मिले तो इस उड़नतश्तरी को छु कर सहला कर गुदगुदा कर महसूस करूंगा की यार इस बन्दे में के अन्दर क्या क्या भरा पडा है।

आदरणीय उड़नतश्तरी जी , यदि कोई गुस्ताखी हुई हो तो माफ़ कर दें, अपना छोटा समझ कर , और मैं आपसे छोटा हूँ ये तो मैं साबित भी कर सकता हूँ।

अजय
9871205767

सोमवार, 16 जून 2008

तुम औरतें, हर बार क्यों,

तुम औरतें,
हर बार, क्यों,
हम पुरुषों को ही,
कटघरे में,
खडा करती हो ?

जो मर्द,
बने फिरते हैं,
उन बेटों को,
बेटियों से ज्यादा,
लाड देकर , ख़ुद तुम्हीं तो ,
बड़ा करती हो॥

वो जो,
किसी कन्या के,
जन्म पर, सबसे ज्यादा,
छाती पीटती है,
और कोसटी है,
बेटी , बहू और बहिन को,
वो तो,
औरत ही होती है न।

वो जो,
शादी के बाद,
ताना देती,
और अक्सर,
आग लगाकर,
जला देती है,
अपनी बाहू और भाभी को,
वो भी,शायद,
औरत ही होती है न।

मैं मानता हूँ,
कि, इस मर्दाने,
समाज ने,
तुम से,
हमेशा ही,
अन्याय किया है।

लेकिन क्या,
तुम्हें नहीं लगता,
जाने -अनजाने,
ये अधिकार ,
भी ख़ुद,
तुमने ही दिया है।

क्या मर्दों के,
कपड़े पहनने से,
या उनकी,
तरह पनपने से,
औरत कोई,
मर्द सा बन जायेगी।

माना , गर ऐसा,
हो भी जाए,
तो फ़िर क्योंकर,
वो भी,
औरत ही कहलायेगी ?

सब सोच की,
लड़ाई है ,
नजरिये का फर्क है,
असंतुलन के ,
इस समीकरण में,
अज्ञानता की पर्त है॥

"नारी कभी,
कमजोर नहीं थी,
कमजोरी है,
उसका औरत्पन,
अपनी शक्ति,
ख़ुद पहचानो,
तौलो ख़ुद,
अपना अंतर्मन...

औरत आज भी कस्तूरी मृग की तरह अपनी शक्ति को ढूँढने के लिए भटक रही है, जबकि वो शक्ति ख़ुद उसके अन्दर मौजूद है.

रविवार, 15 जून 2008

दर्द हो या नंगापन ,अच्छी पैकिंग में सब बिकता है. (भाग दों)

कल इसी विषय पर मैंने अपने दूसरे चिट्ठे में (देखें मेरा दूसरा चिटठा , मेरा दूसरा ठिकाना ) कुछ पंक्तियाँ लिखी थी, मगर फ़िर लगा कि, अभी मन नहीं भरा और अभी और भी बहुत कुछ कहना बांकी है ।

अभी हाल फिलहाल में ख़बर पढी कि , ताजातरीन आरुशी काण्ड ने हिन्दी समाचार चैनलों की टी आर पी बढ़ा दी है। टी आर पी, यानि टेलीविजन रेटिंग पोंट्स , मतलब उन दिनों लोगों ने अधिकांश समय ये समाचार चैनल्स देखे। इसके साथ ही इस घटना से जुडी कुछ और खबरें भी आयी, जैसे कि एक प्रमुख महिला निर्मात्री (जिन्हें मेरे विचार से भारतीय टेलीविजन इतिहास की सबसे सादे गले मस्तिष्क और विचार वाली महिला और निर्मात्री कहा जाए टू ग़लत नहीं होगा ) ने अपनी आदत के अनुरूप इस व्हातना को भी अपने वाहियात सेरेयलों को ज्यादा वाहियात बनाने के लिए शामिल करने की सोची, मगर आयोग के डंडा फटकारते ही दुबक गए।

हालांकि ये पहला मौका नहीं है जब मीडिया , और चित्रपट के लोगों द्वारा हादसे को, किसी के दर्द को भुनाने की कोशिश की गयी हो। बॉलीवुड में तो ये एक स्थापित चलन सा बन चुका है। आपको राजस्थान की दलित महिला भंवारी देवी के साथ किए गए सामूहिक बलात्कार की घटना पर बनी पिक्चर बवंडर शायद याद हो। जहाँ तक मुझे पता है कि इसके निर्माता निर्देशक (उनका नाम शायद जगमोहन मून्द्रा था ) ने आज तक कभी भंव्री देवी की शक्ल भी नहीं देके, उसका दर्द पूछना तो दूर की बात है। और ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जिन्हें याद करने के लिए दिमाग पर ज्यादा जोर नहीं डालना पडेगा।

असल बात सिर्फ़ इतनी है कि ये जो हमारे बीच से निकलकर हमारे सामने खड़े हैं और जिनका दावा है कि वे जो दिखाते बताते हैं वो तो समाज का आईना है वो एक सौदागर हैं, विशुद्ध सौदागर , सबकुछ बेचने वाले। सपने मुस्कराहट, आतंक, मासूमियत, दर्द, प्यार, नफरत, हादसा, हकीकत, सबकुछ। माल चाहे जैसा भी हो, जो भी हो या कि सबके पास एक ही माल हो फर्क पैकिंग और प्रस्तुतीकरण का है।

और फ़िर हमारे समाचार चैनलों की इन्तहा टू ये है कि अभी कुछ समय पहले एक समाचार चैनल की प्रसारिका एक अपराध आधारिक कार्यक्रम की उद्घोषणा इतनी शिद्दत से करती थी कि लगता था कि वे अपराधियों का नाम नहीं बल्कि अपने प्रेमियों का नाम ले ले कर पुकार रही हों। तो फ़िर तो यही लगता है कि ये सब के सब उन गिद्धों के झुंड की तरह हो गए हैं जिन्हें सिर्फ़ लाशों से मतलब होता है, चाहे वो इंसान की लाशें हों या जानवरों की। वह रे हमारा चौथा स्तम्भ !

शनिवार, 14 जून 2008

दान (एक छोटी सी कहानी )

सुबह सुबह ही विद्या के फोन की घंटी कम ही बजा करती थी इसलिए जब उस दिन अचानक ही नींद खुलने से पहले ही घंटी बज उठी तो उसने बुरा सा मुंह बनाया, और मन ही मन उस फोन मिलाने वाले को कोसती हुई फोन उठा कर देखने लगी, नंबर देखते ही झुंझलाहट कम हो गयी, कविता दीदी का फोन था,

" हेलो, अरे विद्या तूने, कल मुझे ये तो बता दिया की आज निर्जला एकादशी है , परन्तु शायद तुझे ये नहीं पता कि इस दिन का बड़ा महत्त्व है, सिर्फ़ चावल नहीं खाने का मतलब नहीं है, आज लोग खूब दान पुण्य , करते हैं। मैं तुझे बताती हूँ , आज के दिन मन्दिर में खरबूजा, पंखाघडा, दूध चीनी आदि का दान करने से बहुत पुण्य मिलता है। अरे हाँ , मुझे कौन सा मालूम था , वो तो माँ का फोन आया था , शायद तुझे भी करें।"

इसके बाद तो माँ , बड़ी दीदी, बाजी और जाने किस किस ने फोन करके पुण्य कमाने का सूत्र विद्या को बता दिया। दरअसल विद्या ने अभी अभी घर गिरहस्थी शुरू की थी, और फ़िर घर में सबसे छोटी होने के कारण भी सब उसे हर बात बताते और समझाते थे।

विद्या ने इसके बाद देर करना ठीक नहीं समझा और विनय को भी जबरदस्ती उत कर सारे सामानों की सूची पकडा दी, और ये भी बता दिया कि जब तक वो बाज़ार से ये सारी चीज़ें लाते हैं वो नहा धोकर तैयार हो जायेगी, ताकि मन्दिर जाकर वो सारी चीज़ें दान कर सके, बाद में बहुत भीड़ हो जाती है। विनय भी बेमन से उठ कर बाज़ार चल दिए और जाते जाते बोल गए , " भाई , तुम लोगों का कुछ नहीं हो सकता इस सबसे अच्छा तो ये होगा कि इन चीजों को किसी गरीब को देदो , भगवान् से तुम्हें क्या कब कैसे मिलेगा ये तो पता नहीं मगर गरीब की दुआ हाथोंहाथ मिल जायेगी।"


विद्या सारा समान लेकर फताफर मन्दिर की तरफ़ चल पडी। वहाँ देखा तो वहाँ पहले से ही बहुत सी औरतें , दान के लिए खादी थी, उसने सोचा कि शायद उसे थोडा और जल्दी आना चाहिए था, मगर वो क्या करती , सबने इसके बारे में आज ही तो बताया था। काफी इंतज़ार के बाद उसका नंबर भी आ ही गया , भगवान् को प्रणाम करने के बाद उसने दान की थाली पंडितजी के हाथ में पकडा दी। पंडित जी ने भी उसे खूब मन से आशीर्वाद दिया।

पूजा पाठ के बाद वो बाहर निकलने लगी , तो मन्दिर के गेट पर ही दो छोटी छोटी लडकियां फटी चिती फ्राक में उसके आगे हाथ पसारे आ गयी, अबी वो कुछ और सोचती इससे पहले ही उसे याद आया कि , अरे उसने तो मन्दिर की प्रदक्षिना की ही नहीं। वो तुरंत वापस घूम गयी। प्रदक्षिना करते करते जैसे ही मन्दिर के पीछे पहुँची तो उसे पंडित जी दिखाई दिए, पास में खड़े किसी लड़के को शायद कुछ कह रहे थे, " जा जल्दी से ये सब कुछ पीछे वाले लाला जी की दुकान पर दे आ, कभी कभार तो कमाने धामाने का मौका मिलता है, और हाँ मोहन से कह कि ये साले भूखे नंगे बच्चों को यहाँ से भगाए , सब साले मामला ख़राब करते हैं।"

विद्या ने उड़ती उड़ती निगाह डाली तो देखा कि पंडितजी सारा समान जो अभी अभी दान में लोग दे कर गए थे एक बड़े से पोलीथिन में दाल कर उस लड़के को पकडा रहे थे। विद्या पर निगाह पड़ते ही पंडित जी ने खिसयानी सी हंसी हंस दी।

विद्या, ने गेट पर खड़ी दोनों लड़कियों को दो दो रूपैये का सिक्का दिया। उसके मन को जो भी शांती मन्दिर में दान करते वक्त मिली थी वो सारी कब की उड़ गयी थी। उसे दान का मतलब समझ आ चुका था, और अब उसे अगली एकादशी का इंतज़ार है.

शुक्रवार, 13 जून 2008

सफ़ेद चेहरे (एक कहानी या शायद हकीकत )

कांति और नुपुर , बिल्कुल उस तरह से थी जैसे कि, दो बहने हों । उनकी ये दोस्ती कितनी पुरानी थी इस बात से ज्यादा ये बात जानने में मज़ा आ सकता है कि उनकी दोस्ती कैसे हुई। दरअसल ये उनके कोल्लेज के दिनों की बात थी, दोनों एक ही बस में चढ़ कर एक ही कोल्लेज और एक ही क्लास में जाती थी, मगर उनमें शायद कभी भी ऐसी दोस्ती न होती यदि , उस दिन वो घटना ना हुई होती। जब वे अपना क्लास ख़त्म करके बस में चढी तो रोज की तरह बस ठसाठस भरी हुई थी। वे दोनों भी बिल्कुल आस पास खादी हो गयी थी। नुपुर जो कि हमेशा से बेहद संकोची और डरने वाली लडकी थी , उसे अचानक लगा कि किसी ने पीछे चिकोटी काटी है, वो हमेशा की तरह कस्मसाई और आगे बढ़ने की सोचने लगी। मगर आगे भी भीड़ थी, तभी अचानक इससे पहले कि वो कुछ और सोच या कर पाती, चटाक की एक तेज़ आवाज़ उसके कानो में गूंजी। उसने मुड़ कर देखा , साथ खड़ी लडकी ने बिल्कुल पास खड़े लड़के के कोल्लर पकड़ कर उसे भला बुरा कह रही थी। इसके बाद का काम भीड़ ने कर दिया, न किसी ने कुछ पूछा और न कहा। नुपुर की कांति से यहीं से दोस्ती की शुरूआत हुई थी। जब उसे कांति से पूछा था कि क्या ये सब करते हुए उसे डर नहीं लगा, उसने बताया था कि वो एक बड़े घर की लडकी है, और उसका माहौल बहुत अलग है जिसमें डर वर की कोई गुंजाईश नहीं है। वो तो कार में अपनी जिद्द की वजह से नहीं आती है। इसके बाद तो दोनों जैसे एक ही घर में पैदा हुई दो बेटियाँ हों।

आज नुपुर बेहद उदास थी, ऐसी ही उदासी उसके चेहरे पर तब भी थी , जब वो नौकरी के लिए भटक रही थी। कांति ने लाख कहा था कि वो अपने पापा के कहने पर उसे किसी अच्छी जगह पर काम दिलवा सकती है, या चाह तो उसे अपने पापा के यहाँ ही कोई अच्छी नौकरी दिलवा सकती है, मगर नुपुर अब भी उन्हें पुराने खालों की लडकी थी इसलिए बड़ी विनम्रता से उसे टाल गयी.मगर फ़िर उसे जब एक जगह रीसेप्स्निष्ट की नौकरी मिल गयी थी तो वो कितना खुश थी, फ़िर एक हफ्ते बाद ही तो उसने बताया था कि सर ने उसे अपना सेक्रतारी बनाने का को कहा है.मगर आज कुछ जरूर गड़बड़ थी। कांति उसका फक्क चेहरा देख कर ही समझ गयी थी। बहुत कुरेदने पर पता चला कि वही पुरानी बात उसके बॉस ने उससे बत्तमीजी करने की कोशिश की थी। बस कांति भड़क गयी, पहले तो उसने नुपुर को ही खूब भला बुरा कहा, फ़िर लाख न न करने के बाद भी उसे इस बात के लिए राजी कर लिया कि कल वो भी नुपुर के साथ जाकर उस बॉस की अक्ल ठिकाने लगा कर आयेगी।

अगले दिन नुपुर ने बहुत कोशिश की , कि उसकी तबियत ख़राब है , वो बात आगे नहीं बढाना चाहती , या वो और कहीं नौकरी कर लेगी। मगर कांति उसे सबक सिखाने पर आमादा थी। सो दोनों चल पड़े। तू, कुछ नहीं कहेगी, चुपचाप खड़े होकर तमाशा देखना, आज मैं उसका कैसा बैंड बजाती हूँ, कांति ने उसे कहा।

गाडी जहाँ रोकने के लिए नुपुर ने कहा, पहले तो कांति थोडा चौंकी, फ़िर कुछ सोच कर चुप हो गयी। इसके बाद दोनों उस बिल्डिंग में दाखिल हुए, अब कांति के चेहरे पर एक अजीब सा खुरदुरा पं आ गया था मगर अन्दर ही अन्दर उसका दिल भी धाड़ धाड़ बज रहा था। नुपुर के साथ साथ वो भी सीधे बिना खात्खाताये बॉस के कमरे में दाखिल हो गए। नुपुर को ना जाने कांति के साथ ने कहाँ से हिम्मत दे दी, ' देख नुपुर याही है वो, उसे सामने खड़े व्यक्ति की तरफ़ इशारा किया।

"पापा , आप ," कांति के मुंह से निकला।

सबके चेहरे सफ़ेद पड़ चुके थे, कारण अलग थे , मगर सफेदी एक जैसी थी......

गुरुवार, 12 जून 2008

ताज्जुब है ,


ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥

शहर की हर गली मैं, एक कोठी,
और इक झुग्गी मिलती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


लख्ताकिया , फतफतिया, और सायकल,
लालबत्ती पर सारी रुकती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


घर के एक कमरे से कातिल,
दूसरे से लाश निकलती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


प्रेम , दोस्ती, रिश्ते की परिभाषा,
हर रोज़ बदलती है ।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


गिरने के डर से ही, मैं नहीं दौडा,
वो रोज़ गिरती है, वो रोज़ संभलती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


मैं समझ नहीं पाता, कैसे मेरे अन्दर,
प्यार भी पलता है, नफरत भी पलती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


मुझको क्या पता था, जितना जहर मैं पीता हूँ,
उससे ज्यादा जहर तो मेरी गाडी उगलती है ।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


बेटा जिस कोख में मारे किलकारी,
बेटी के लिए उसमें मौत ही पलती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


हाँ , और दुःख की बात है कि ये दुनिया तो फ़िर भी चलती ही रहेगी ............

बुधवार, 11 जून 2008

बेटी और माँ, दोनों का बलातकार , माँ की ह्त्या और बेटी ने खुद्खुशी की

यूं तो अब इस समाज में ऐसी ऐसी खबरें नित्य ही पढने को मिल जाती हैं की किसी भी बात पर आश्चर्य नहीं होता और न ही अब ऐसा लगता है की यार यहाँ , अपने देश में ऐसा कैसा हो सकता है। चाहे मैं निठारी काण्ड की चर्चा न भी करूं, चाहे मैं हाल फिलहाल चर्चित आरूशी काण्ड की भी न चर्चा करूं , मगर फ़िर भी ऐसी अनेकों घटनाएं इस देश , इस राज्य और इस समाज में घाट रही हैं की मन अवाक और दुखी होकर यही सोचता है की यार ये हो क्या रहा है।

कल ही पंजाब के एक शहर में घटी एक ऐसी ही घटना ने अन्दर तक हिला कर रख दिया है। एक महिला अपने पाती और दो बेटियों के साथ किसी बड़े अधिकारी के पास पहुँची और उसे बताया की वो घर से जहर पी कर आयी है, जब तक उसे अस्पताल ले जाया गया वो मर चुकी थी। दरअसल हुआ ये था की , उस अभागन के पाती को पुलिस ने किसी भी झूठे या सच्चे अपराध के आरोप में थाने में बंद कर दिया था, जब वो महिला इस बारे में थाने में पता करने गयी तो वहाँ तैनात दो पुलिसकर्मियों ने उसे दारा धमका कर या शायद मार पीट कर उसके साथ बलात्कार किया। महिला वहाँ से बाहर जान बचा कर निकली और काफी भागदौड़ करने के बाद उन पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज करवा पायी। मगर मुकदमा दर्ज होने के बाद वही पुलिस वाले उसे और उसके पति को और भी धमकाने लगे। उनका किसी भी कानून ने कुछ नहीं बिगाडा और उस क़ानून पर विश्वास उत्थ जाने के बाद थक हार कर उस अभागन ने अपना जीवन समाप्त कर लिया। उसके पिटा ने बताया की कुछ वर्षों पहले इस अभागी महिला की माँ की भी बलात्कार के बाद ह्त्या कर दी गयी थी। मैं पूरी घटना के बारे में जानकर सन् रह गया। मेरे दिमाग में बहुत सी बातें अभी भी कौंध रही हैं।

अब जो उसकी दो बेटियाँ हैं, उनके लिए इस दुनिया का क्या मतलब रह जायेगा। जब उन्हें पता चलेगा की उनकी पिछली दो पीधीयाँ इस बहुत सभ्य , आधुनिक , तेज़ , समाज के हवास का शिकार हो गया। क्या वे भी इस बात का इंतज़ार नहीं करेंगी की कल को कोई ऐसा ही इंसानी भेदिया उन्हें अपना शिकार बना कर उनका जन्म सार्थक नहीं करेगा। पता नहीं सोचता हूँ तो दिमाग फट जाता है।

दरअसल बलात्कार के मामलों में जितने अलग अलग पहलू और बातें मेरे सामने आती रही हैं, उसमें मैं ख़ुद भी समझ नहीं पा रहा हूँ की आख़िर गलती कहाँ और क्या हो रही है। किसे दोष दें, किसे अपराधी माने , और कौन कौन दोषी नहीं है। यहाँ तो आलम ये बन चुका है की हर इंसान कब हैवान बन जाए , वो भी अकल्पनीय स्तर तक, कहा नहीं जा सकता। मैं जिस अदालत में कार्यरत हूँ सिर उसमें ही दस से अधिक मुक़दमे ऐसे चल रहे हैं जिनमें नाबालिग़ पुत्रियों ने अपने पिटा पर ही बलात्कार का आरोप लगा रखा है। फ़िर मैं उन महिलाओं और औरतों के बारे मैं भी सोचता हूँ जो खुले आम ढिंढोरा पीट पीट कर कहती हैं की " मुझे तो आक्रामक मर्द ही पसंद हैं, उका हर अंदाज़ दीवाना बना देता है "। उनसे कौन पूछता है की उनके ये आक्रामक मर्द कितने आक्रामक हो गए हैं और समाज ही आक्रामक हो गया है। मुझे नफरत है उनसे भी जो महिला अधिकारों का ढिंढोरा पीट पीट कर अपना प्रचार , नाम और दाम बनाने में लगे रहते हैं और ऐसे किसी भी मासूम की रक्षा कर नहीं पाते।


असलियत तो ये है की हम सब उस सभ्य युग में जी रहे हैं जहाँ हम सब जानवरों से भी अधिक जंगली और हिंसक हो गए हैं.

सोमवार, 9 जून 2008

जब उन्हें मैं दिल्ली का नहीं लगा.

यूं तो मेरा अधिकांश बचपन पिताजी के साथ कई राज्यों और बहुत से बड़े छोटे शहरों में बीता , मगर समय के उस चक्र में जब शायद मैं बचपने से थोडा बाहर निकल रहा था , तब अचानक बहुत से कारणों से हमें अपने गाँव जाना पडा , सच कहूं तो मुझे तो ज़रा भी अलग या बुरा नहीं लगा,हालांकि मैं शहर की चकाचौंध के बाद सीधी लालटेन की पीली रौशनी में पहुँच गया था। मगर मुझे लगता है की ऐसा शायद इसलिए था क्योंकि मुझे शहर की नियमित दिनचर्या से अलग कुछ मिल गया था। मैंने गाँव में बिठाये पलों के बारे में बताना शुरू किया तो शायद सब कहें की उसके लिए तो एक अलग चिटठा ही बना लूँ तो बेहतर होगा। खैर , जब अपनी पढाई लिखाई के बाद मैंने दिल्ली आने का फैसला लिया था तो ये उन दिनों एक प्रचलित रिवाज़ सा बन गया था। और चूँकि अपने सारे फैसले मैं न जाने कब से ख़ुद ही करने लगा था इसलिए इस फैसले को भी सबने खुशी खुशी मान लिया।

गाँव की आबो हवा के बाद जब कुछ दिनों तक दिल्ली की बसों में और ट्रेफ्फिक की धूल धुएं को अपने फेफड़ों में महसूस करने लगा तो पता चला की यार ये दिल्ली कैसी है। आप तब भी मेरे अनुभव का अंदाजा चंद इन्हें बातों से लगा सकते हैं। मुझे पहली बार किसी दोस्त की पार्टी में खाने के लिए मिली चौउमीन को देख कर मैं बुरी तरह बिदक गया था, कि कमबख्त ने मुझे केंचुए क्यों दे दिए हैं, क्योंकि उससे पहले मैंने कभी चौउमीन नहीं देखा था। दोसोतोंके कहने पर बस में मुफ्त चलने के लिए मैंने जब staaff कहा तो बस वाले के पूछने पर मैंने हदबदा कर एक गर्ल्स कोल्लेज का नाम ले दिया था। तो आप समझ ही गए होंगे की उस वक्त शायद मैं दिल्ली में रहने वाला सबसे बड़ा गंवार था।

एक दिन ऐसी ही एक बस यात्रा के दौरान मैंने देखा की मेरे सीट के पास एक वृद्ध महिला आकर खड़ी हो गयी । बस अभी अभी चली थी और मैंने नज़र दौडाई तो कहीं भी जगह नहीं थी , इसलिए मन में सोचा की छोडो यार इतनी दूर जाना है, और फ़िर मैं कौन सा लडीस सीट पर बैठा हूँ। मगर न जाने किस भावना के वशीभूत मैं चुपचाप खडा हो गया और उन्हें बैठने का इशारा किया। वे कृतागाया भाव से देखते हुए बैठ गयीं। मैं थोडा आगे जाकर खडा हो गया। तकरीबन सवा घंटे के बाद जब वे महिला उतरने के लिए खड़ी हुई तो उन्होंने चौंक कर मुझे देखा, फ़िर कहा, "पुत्तर तुसी ओथी उतरे नहीं मैं समझी त्वानु ओत्थे ओतारना हैगा " मैंने कहा जी नहीं मुझे तो आगे उतरना है।
वे और चकित होते हुए मेरे पास आकर अपने हाथ मेरे सर पर फेरती बोली, पुत्तर तू मेनू दिल्ली दा नही लगदा। " कहकर वे चली गयीं। मैं आज भी उनके वे शब्द और वाक्य नहीं भूल पाया हूँ।

काश की मैं कभी भी दिल्ली का नहीं हो पाऊं

रविवार, 8 जून 2008

स्त्री (एक कविता )


आज आपको वीरेन्द्र सारंग जी की एक कविता पढ्वाता हूँ जो मुझे बेहद पसंद है,

मैं चाहता हूँ स्त्री होना,
सुरेले स्वर के साथ कर्कश भी,
करुना के बाद थोडा क्रोध भी,
मैं स्त्री होकर चुपचाप जीवन नहीं चाहता॥

मैं उकठा पुराण में खूजूंगा अपने को,
आर्त्नादों में अर्थ,,
मुंह लगना और भैंस का जाना पानी में,
समझकर पंखा झेलूंगा उमस भरे दिन में,
स्त्री होकर॥

मैं स्त्री होकर वाद्य नहीं होना चाहता की बजता रहूँ....
बर्तन भी नहीं की मंजता रहूँ सुबह-शाम,
मैं जानता हूँ, स्त्री से जो हवा आती है, वह,
सहस्र होती... सहती हो जाती है, और भोगती रहती स्त्री,
सारे काम भरे हैं घट्ठों वाले हाथों में ,
फ़िर भी बवालेजान स्त्री, मेहेंदी रचने के बाद भी,
ओखल-जाँत, बाल-जूडे, श्रृंगार भावना से लबरेज स्त्री,

गंदे मुहावरों के लिए प्रसिद्ध स्त्री,
श्रम-सौंदर्य के स्वेद में एन वक्त पर खाती है डांट,
पुष्ट आत्मविश्वास और कमाया-धमाया मिल जाता पानी में,
स्त्री होकर मैं चाहता हूँ मुट्ठी भीचना॥

मैं जानना चाहता हूँ और स्त्री की यात्राएं,
जो सिर्फ़ वही करती है एक पुरूष के लिए,
मैं सरंक्षित करना चाहता हूँ,
स्त्री के भीतर दबे उन्चासों पवन,
मैं विशेष आत्मविश्वास के साथ स्त्री के सफर पर हूँ,
स्त्री होकर .... वाकई मैं चाहता हूँ स्त्री होना॥

शनिवार, 7 जून 2008

एक कविता या पता नहीं और कुछ

इतने निष्ठुर,
इतने निर्मम,
ये बच्चे,
अपने से नहीं लगते,
फ़िर किसने ,
ये नस्लें ,
बोई हैं॥

किस किस के ,
दर्द का,
करें हिसाब,
लगता है,
पिछली रात,
शहर की,
हर आँख,
रोई है॥

सपनो का,
पता नहीं,
मगर नींद तो,
उन्हें भी,
आती है,
जो ओढ़ते हैं,
चीथरे, या ,
जिनके जिस्म पर
रेशम की,
लोई है॥

क्या क्या,
तलाशूं , इस,
शहर में अपना,
मेरी मासूमियत,
मेरी फुरसत,
मेरी आदतें,
सपने तो सपने,
मेरी नींद भी,
इसी शहर में,
खोई है॥

ये तो ,
अपना अपना,
मुकद्दर है, यारों,
उन्होंने , सम्भाला है,
हर खंजरअपना ,
हमने उनकी,
दी हुई,
हर चोट,
संजोई है..

शुक्रवार, 6 जून 2008

नकारात्मक चीज़ें ज्यादा आकर्षित करती हैं .

क्या आपको बहुत पहले दिखाया जाने वाला एक विज्ञापन याद है। उस विज्ञापन में एक नन्ही से बच्ची , स्कूल की पास से आने जाने वालों को एक पम्फ्लेट पक्दाती है, जैसे कि अक्सर ही लाल बत्ती पर आपको हमें भी कोई न कोई पम्फ्लेट पकडा देता है, और जैसा कि अक्सर ही होता है कि हम सभी उस पर एक उड़ती हुई निगाह डालते हैं और फेंक देते हैं, ठीक उसी तरह उस बच्ची द्वारा दिए गए कागज़ के टुकड़े को सभी आने जाने वाले हाथ में लेकर थोडा आगे जाने पर फेंक देते हैं। एक स्कूटर चालक जो ये सब देख रहा होता है , वो बच्ची के पास आता है और उसे बताता है कि अब उसे ये पम्फ्लेट किसी के भी हाथ में देने से पहले उसे अच्छे तरह मरोड़ कर देना है। वो नन्ही बच्ची ऐसा ही करती है, फ़िर जिस पहले आदमी को वो ये कागज़ तोड़ मडोदकर देती है , वो पहले उस बच्ची को गौर से देखता है फ़िर उसे कगाज़ के टुकड़े को खोल कर पढने लगता है।

मुझे लगता है कि इंसान का मनोविज्ञान , चाहे उत्सुकता के कारण या फ़िर कि खुराफाती कारणों से अक्सर या ज्यादातर नकारात्मक चीजों की तरफ़ आसानी से आकर्षित होता है। बल्कि ये कहूं कि कि सकारात्मक बातों , चीजों की तरफ़ चाहे एक बार को उसकी नज़र ना जाए या जाए भी तो वो उसे नज़र अंदाज़ कर दे मगर उल्टी भाषा , उल्टी बातों और उल्टी चीजों की तरफ़ उतनी ही जल्दी आकर्षित हो जाता है। किसी बच्चे को आप किसी बात के लिए मन कीजिये तो मैं ये तो नहीं कहता कि शत प्रतिशत , मगर आम तौर पर ज्यादा बच्चे वही काम करने में दिलचस्पी दिखाएँगे। एक और उदाहरण देता हूँ, किसी ने अपने चिट्ठे पर अपने पोस्ट का शीर्षक दिया, इसे बिल्कुल मत पढ़ना, आपन माने या ना मने , मगर उस दिन जितने लोगों ने उसे पढा था उससे पहले उसके पोस्ट को कभी भी इतने लोगों ने नहीं पढा था।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ नकारात्मक बातें ही मन को और मस्तिष्क को आकर्षित करती हैं मगर कुछ तो कनेक्शन जरूर है इन बातों में, या पता नहीं कि ऐसा सिर्फ़ मेरे साथ होता है..................

गुरुवार, 5 जून 2008

शुक्र है ,उन्हें हिन्दी नहीं आती

अभी तक जहाँ तहां ब्लॉग के बारे में जो भी अनाप शनाप पढ़ते आ रहे थे, अरे घबराइये नहीं हम लोगों के बारे में कौन कमबख्त अनाप शानाप लिख सकता है ख़ुद हम लोगों के अलावा, वो तो मैं उन फिल्मी अभिनेताओं के बारे में कह रहा था जो सब यकायक इस ब्लोग्गिंग के क्षेत्र, अरे नहीं, कारोबार में कूद पड़े हैं, और लिख भी क्या कमाल रहे हैं, कोई अपने जिगरी दोस्त को खुलेआम गलिया रहा है तो कोई इससे भी बढ़कर अपने कुत्ते बिल्ली का नाम अपने साथी कलाकारों के नाम पर रख कर उसे हमें बड़े ही आदर सत्कार से पढ़वा रहा है, जिसे इन दिनों मीडिया ब्लॉग वार का नाम दे रहा है , अजी हमारी समझ से तो ये सब छिछोरापन है । खैर , मैं तो आज उस बात को छेड़ ही नहीं रहा हूँ । दरअसल ख़बर तो असली ये है कि,

सावधान , ब्लॉगजगत वालों इस बार अभिनेता के साथ एक नेता जी भी ब्लॉग लेकर आ रहे हैं। जी हाँ नेताओं के नेता , श्री श्री लालू जी यादव महाराज अपनी ब्लॉग एक्सप्रेस लेकर जल्दी ही प्रकट होंगे। उन्होंने बताया है कि ई सब ओ अमेरीकी चुनाव के नेता बराक ओबामा से प्रेरित होकर कर रहे हैं। वैसे असली बात तो ये है कि उनका कहना है कि शायद इसी बहाने वे हिलारी क्लिंटन को अपनी पार्टी में आने के लिए मन लें। जाहिर है अमेरीकी राष्ट्रपती का चुनाव हारने के बाद ही। लेकिन, जी हाँ, लेकिन हमें घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि, श्री अमिताभ बच्चन, आमिर खान, सलमान खान और सारे खान और हीरे मोत्तियों की तरह उन्हें भी हिन्दी नहीं आती। क्या कहा , उन्हें तो अंग्रेज़ी नहीं आती , अरे कौन कहता है , आने को तो इन सभी अंग्रेज़ हिन्दुस्तानियों को हिन्दी आती है , पर अपनी भाषा में लिख कर बोल कर , पढ़ कर आख़िर उन्होंने अपनी इज्ज़त का फालूदा थोड़ी बनवाना है।

वैसे तो अच्छा है कि इन सभी महान लोगों को हिन्दी से खुजली हो जाती है, वरना सोचिये यदि वे यहाँ पर आकर अपने चटखारे दार किस्से , मिर्च मसाले लगा कर आपको सुनाते तो क्या आप कभी इस रद्दी की टोकरी की तरफ़ अपने नज़रे इनायत करते, नहीं न...........

बुधवार, 4 जून 2008

मेरा कबाड़खाना , अब "रद्दी की टोकरी "

जी हाँ , आज और अभी से मेरा कबाड़खाना , यानि मेरा ये चिटठा, आपको कबाड़खाना के नाम से नहीं बल्कि " रद्दी की टोकरी " के नम से दिखेगा। दरअसल ये विचार तो मेरे मन में तभी से था जब इससे पहले ऐसी ही एक स्थिति में मेरा दूसरा चिटठा "बिहारी बाबू कहीं " को प्रियरंजन भाई के आदेश के बाद मैंने देहाती बाबू कहीं में बदल दिया था।

आज दैनिक हिन्दुस्तान के दिल्ली संस्करण में जब वरिष्ठ चिट्ठाकार श्री रवीश कुमार जी ने अशोक पण्डे जी के चिट्ठे "कबाड़खाना " का विस्तृत जिक्र किया तो मुझे पता नहीं क्यों एक आत्मग्लानी सी हुई। हालांकि मुझे किसी ने भी कभी टोका नहीं और मेरा कबाड़खाना अंग्रेज़ी शीर्षक वाला था , न ही ये बात थी की मैंने अशोक जी के चिट्ठे के नाम से प्रेरित होकर ऐसा कोई नाम रखा था, मगर फ़िर भी आज मैंने निर्णय किया की किसी भी तरह की भ्रम की स्थिति ख़त्म करने के लिए अब भविष्य में मेरे इस चिट्ठे का नाम होगा "रद्दी की टोकरी "।

अब ऐसा समझिए न कि, जैसे बच्चा घर में खेलते-कूदते एक नाम से जाना जाता है और फ़िर जब स्कूल जाने लायक हो जाता है तो उसे नया नाम मिल जाता है। मगर हां, इतना यकीन दिलाता हूँ कि ये बच्चा चाहे नाम बदल ले या शक्ल , रहे उतना ही खुराफाती और शरारती।

मुझे पुरी उम्मीद है कि जिस तरह आपने मेरे छोटे कबाड़खाने प्यार से सराहा उसी तरह आप मेरी इस रद्दी की टोकरी में भी अपनी नज़र और हाथ डाल कर जरूर गंदा करेंगे।

आपका छोटा कबाड़ी......

सोमवार, 2 जून 2008

हमने चिट्ठों को अपनी संतान बना रखा है (कविता )

जाने कब से,
अपने आसपास,
एक छद्म,
संसार बसा रखा है॥

हरकतों से,
पकड़े जाते हैं,
हैवानों ने भी,
इंसान का,
नकाब लगा रखा है॥

कोई बेच रहा,
धर्म, तो कोई ,
शर्म, और इमान,
कईयों ने तो जीवन को ही,
दूकान बना रखा है॥

बेदिली की ये,
इंतहा है यारों,
माओं ने कोख को,
बेटियों का,
शमशान बना रखा है॥

कितनी बेकसी,
का दौर है ये,
न दिल में जगह है,
न घर में,
लोगों ने मान-बाप को भी,
मेहमान बना रखा है॥

लपटें सी ,
उठ रही हैं,
शहर के हर घर से,
हमने इसीलिए,
गाओं में भी एक,
मकान बना रखा है॥

एक हम हैं, जो,
चेहरे पे नाम लिखा है,
कई मशहूर हैं इतने की,
गुमनामी को ही,
पहचान बना रखा है॥

अभी तो उँगलियों ने,
रफ़्तार नहीं पकडी है,
घरवालों की तोहमत है,
हमने चिट्ठों को अपनी,
संतान बना रखा है॥

अजय कुमार झा
9871205767

रविवार, 1 जून 2008

भडास की सडास

अक्सर ही कई ऐसे मौकों पर जब मुझे कुछ भी नहीं सूझ रहा होता है न जाने कहाँ से अपने अज़ीज़ मित्र श्री चिटठा सिंह जी ,
कहीं न कहीं जरूर मिल जाते हैं और फ़िर कुछ ऐसी वैसी बात अवश्य ही निकल जाती है है की उसे यहाँ बताना लाजिमी हो जाता है। पिछले दिनों जैसे ही मिले कहने लगे , अमा सुना तुमने इन दिनों तो फ़िर से चिट्ठाजगत पर भडास ही भडास है अरे भडास क्या उसकी सडास ही फ़ैली हुई है , चारों तरफ़ उसकी बू आ रही है।

" क्या कह रहे हो मियां , एक बार फ़िर से, यार मुझे तो लगता है की ये सब इनकी टी आर पी का चक्कर होगा, वैसे भी मैं तो पहले ही इनका पंच लाइन पढ़ कर समझ गया था कि, सब उल्टे लोग हैं, बताओ लिखा है कि उगल दो , क्या उगल दो यार , कुछ भी अगर सलीके से निकालोगे तो ठीक है उग्लोगे तो उबकाई ही तो बाहर निकलेगी। और फ़िर इन्हें एकता कपूर के धारावाहिकों की तरह दुश्मनों को ढूँढने के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती , सब मजे में एक दूसरे को धकियाने में और गलियाने में लगे रहते हैं। और चिटठा जगत पर हर दूसरी पोस्ट में भडास निकली रहती है। अरे भाई , भडास और गुस्सा निकालने के लिए क्या बाहर कम जगर और गुंजाइश है कि यहाँ भी शुरू हो गए , यार यहाँ तो प्यार बांतों , कुछ अच्छी अच्छी बातें करो कि दिल को सुकून पहुंचे। "

चिटठा सिंग जो अब तक धैर्यपूर्वक सुन रहे थे ( यहाँ मैं बता दूँ कि चिट्ठासिंग उन मासूम लोगों में से एक हैं जो बस तीली जला कर चुपचाप खड़े हो जाते हैं और फ़िर लगी हुई आग की लपटें चुपचाप तापते हैं ) , ने आगे कहा , " अरे भाई , इस बार मामला ज्यादा गंभीर है , सुना है कि किसी भडासी भाई ने बलात्कार की कोशिश की है और उनके ख़िलाफ़ कोई मुकदमा भी दर्ज हुआ है । और बेशर्मी की हद देखो कि जिसका बलात्कार करने की कोशिश की हैवो उनके मित्र की पुत्री थी शायद। "

मैं अवाक और स्तब्ध हो गया, " क्या कह रहे हो , क्या ये सच है , हाँ यार टी आर पी के लिए कोई इस हद तक तो भडास नहीं निकाल सकता । वैसे ये तो ठीक है कि कोई इस चिट्ठाजगत पर चिकनी चुपडी बातें कर रहा है और दुनिया भर की शिक्षा बघाड रहा है इसका मतलब ये तो नहीं कि उसे gundagardee करने , लम्पती करने और सीधे कहूँ तो नीचे गिरने का कोई अधिकार नहीं है , मगर यार ये तो हद से भी हद हो गयी कि सीधा बलात्कार तक पहुँच गए । खैर वो भी क्या करते आजकल सबको पता है कि अपने क़ानून का जो हाल है उसमें तो बलात्कार और हत्या ही दो वे जुर्म बच गए हैं जिनमें अपराधियों का कुछ नहीं बिगड़ता । यार ये तो चिट्ठाजगत के लिए बुरी ख़बर है और जब इसकी चर्चा किसी और माध्यम में होगी तो सोचो इसका क्या असर पडेगा। वैसे इसके बाद क्या हुआ

यार उनकी खूब लानत मलामत हुई, और बहुत से लोगों ने तो उनसे अपने सम्बन्ध तक तोड़ लिए , सच कहूँ तो उनपर सबने जम कर भडास निकाली । अच्छा अब चलता हूँ , चिट्ठाजगत की और भी खबरें लेकर फ़िर मिलूंगा।

चिट्ठासिंग चले गए और मैं अब तक उस भडास की सडास महसूस कर रहा हूँ.

शनिवार, 31 मई 2008

वो आख़िरी रात

कहीं पढ़ा सुना था कि, जिंदगी बहुत छोटी है, मोहब्बत के लिए भी और नफरत के लिए भी और शायद इसीलिए किसी ने कहा भी है कि ,

दुश्मनी करना भी तो इतनी जगह जरूर रखना कि सामने पड़ो तो नज़रें चुरानी न पडें।

मगर शायद ये बात समझते समझते बहुत देर हो गयी या यूं कहूँ कि उम्र के उस पड़ाव पर बहुत कम लोग ये बातें समझ पाते हैं और मैं उन में से नहीं था। बात उन दिनों की है जम मैं अपनी दसवीं की परीक्षाओं के बाद खेल कूद में लगा हुआ था। हम सब दोस्त एक जगह इकठ्ठा होते और फ़िर आगे का कार्यक्रम तय होता और वो एक जगह हम पहले ही तय कर लेते थे। तब जाहिर सी बात है कि आज की तरह न तो कोई शोप्पिंग मॉल होता था न कोई स्य्बर कैफे न ही कोई कोफ्फी हौस इसिलए किसी न किसी दोस्त का घर ही हमारा मिलन स्थल बन जाता था और वहाँ थोडा सा उस दोस्त के मम्मी पापा को तंग करके हम आगे निकल जाते थे। उन दिनों खेल कूद का दौर था, अजी नहीं सिर्फ़ क्रिकेट की मगजमारी नहीं थी, नहीं ये नहीं कहता कि नहीं थी मगर दूसरे खेल भी हम मेज़ में खेला करते थे, सर्दियों की रातों में badminton खेलना अब तक याद आता है। मगर कुछ दिनों से हमारे बीच में वोलीबाल खेलने का एक क्रेज़ सा बन गया था। सभी लोग दो टीमों में बाँट कर खूब खेलते थे और पसीने में तर होकर शाम के गहराने तक घर वापस लौट जाते थे।

अक्सर खेल ख़त्म होने के बाद , थोड़ी देर सुस्ताने के लिए जब बैठते थे तो पहला काम तो ये होता था कि ये तय करें कि कल किसके घर मिलना है , दूसरा ये कि आज कौन एकदम बकवास खेला फ़िर थोड़ी गपशप । यहाँ ये बता दूँ कि हम लोगों के बीच कभी अपने परीक्षा परिणामों की चर्चा नहीं होती थी ,शायद उसका कारण ये था कि तब आज के जैसा karfew जैसा माहौल नहीं बनता था। अमर मेरे दोस्तों में थोडा ज्यादा करीब था और सबसे ज्यादा मेरी उसीसे पटती थी। उसका कारण एक ये भी था कि हम दोनों के घर एक ही गली में थे। अक्सर खेल के बाद जब हम दोनों घर लौटते थे तो एक ही साथ और हमेशा उसके साइकल पर लौटते थे । उस दिन अचानक अमर कोई बात कहते कहते बोल पड़ा कि , यार तुने, कैलाश की छोटी बहें को देखा है , कितनी सुंदर है "

मुझे नहीं पता कि ऐसा उसने क्यों कहा , मगर मैं उसके ये कहने से बिल्कुल अवाक् था। क्योंकि कैलाश हमारे साथ पड़ने वाला हमारा दोस्त था और उन दिनों दोस्त की बहन , सिर्फ़ बहन ही होती थी और हम समझते भी थे। अपने घर आने पर मैं चुपचाप घर की ओर चल दिया। अगले दिन से उसकी मेरी बातचीत बंद हो गयी। दोस्तों ने लाख पूछा , उससे भी और मुझसे भी मगर बात वहीं की वहीं रही। लगभग एक या सवा साल तक हम सभी दोस्तों की बीच रहते हुए भी कभी आमने सामने नहीं हुए । इस बात का मुझे कोई मलाल भी नहीं था ।

एक दिन अचानक मुझे पता चला कि कैलाश की उसी बहन की शादी , अमर के फुफेरे भैया से हो रही है और चूँकि कैलाश के पिताजी नहीं थे इसीलिए उसके घर के हालत को देखते हुए अमर ने ही ये रिश्ता करवाया था। मेरा दिल बुरी तरह बैचैन था अमर से मिल कर माफी मांगे के लिए भी और अपनी किए पर शर्मिन्दा होने के कारण भी। मैं अमर के घर गया उसकी मम्मी मुझे इतने दिनों बाद अचानक देख कर पहले चौंकी फ़िर खुशी से आने को कहा। उन्होंने बताया कि अमर उसी रिश्ते के सिलसिले में बाहर गया हुआ है और देर रात तक घर लौटेगा। मैंने उन्हें कहा कि अमर के लौटने पर उसे जरूर बता दें कि मैं आया था, वैसे मैं सुबह आकर मिल जाऊँगा। मुझे उससे कुछ जरूरी बात कहनी है।

उन दिनों फोन का चलन नहीं था तो मोबाईल का कौन कहे। अगली सुबह उठता तो गली में अफरा तफरी का आलम था । हर कोई बदहवास सा भागा जा रहा था। मैंने साथ वाले छोटे लड़के से पूछा कि अबे क्या हुआ कोई चोरी वोरी हुई है क्या , या कहीं झगडा हुआ है ।

नहीं भैया, वो शर्मा जी का बेटा था न अमर , अरे जिससे कभी आपकी दोस्ती थी। सुबह नहाते समय बाथरूम में गिर गया । सर की सारी नसें फट गयी, मर गया बेचारा।

आज तक उस रात की दूरी मुझे सालती है और शायद त उम्र सालेगी। इश्वर से दुआ करता हूँ कि अगले जन्म में किसी भी रूप में अमर को मुझसे जरूर मिलाना ताकि एक बार माफी मांग सकूं.

गुरुवार, 29 मई 2008

ब्लॉगजगत और ब्लोग्गिंग की कुछ और खबरें

जैसा कि कुछ दिनों पहले मैंने , अपने दूसरे चिट्ठे में जिक्र किया था कि जबसे ब्लोग्गिंग शुरू की हैं, तभी से उससे जुडी तमाम ख़बरों पर स्वाभाविक रूप से नज़र चली ही जाती है, मुझे वो खबरें जब भी रोमांचित या प्रभावित करती हैं तो मन करता है कि आपको भी बताया जाए। अपनी उस पोस्ट में मैंने जिक्र किया था कि किस प्रकार इन दिनों प्रिंट और एकोक्त्रोनिक माधायमों ब्लॉग एवं ब्लोगेर्स की चर्चा हो रही है।

उसी बात को जारे रखते हुए आगे बताता हूँ, पिछले दिनों बहुत से हिन्दी समाचारपत्रों में अलग अलग लेखकों और ब्लोग्गारों द्वारा ब्लॉग विशेषकर हिन्दी ब्लोग्गिंग पर काफी कुछ लिखा गया, इसमें न सिर्फ़ ब्लॉग या उनके नाम के चर्चा हुई बल्कि कुछ बेहद तार्किक और लाभदायक टिप्नियाँ की गयी थी। पहला जिक्र करूंगा दैनिक भास्कर का, जिसमें शैनिवार को रविन्द्र भाई नियमित रूप ब्लॉग उवाच के नाम से ब्लोग्गिंग पर एक स्तम्भ लिखते हैं, इस बार उन्होंने किसी ऐसे ब्लॉग की चर्चा की थी जो पर्यावरण पर काफी कुछ लिख और बता रहा है। उन्होंने इस ब्लॉग की काफी तारीफ करते हुए बताया कि ऐसे ब्लॉग न सिर्फ़ अपना काम बखूबी कर रहे हैं बल्कि उनमें दी गयी जानकारी बहुत से लोगों को सोचने पर मजबूर कर रही है और यही बात उस ब्लॉग को सार्थक बना रही है।

राजधानी से निकलने वाले एक अन्य अखबार आज समाज में भी शनिवार को ही कंप्युटर जगत पर अक्सर लिखने और बहुत सी जानकारी रखने , देने वाले विद्वान् लेखक बालेन्दु दाधीच जी ने विस्तारपूर्वक इस बात की चर्चा की थी कि इतना समय बीत जाने के बाद भी किन किन कारणों से हिन्दी ब्लोग्गेर्स को ना तो वो जगह, न वो प्रसिद्धि , और न ही वो पैसा मिल पा रहा है जो कि एक आम ब्लॉगर जो किसी भी अन्य भाषा में लिख रहा है , को मिल रहा है। इसमें मौलिकता का अभाव , दूसरा ये भी कि किस प्रकार कोई विज्ञापन जो कि स्वाभाविक रूप से अंगरेजी उत्पाद का होता है को एक हिन्दी भाषी पाठक ये लेखक देखने में कितनी रूचि दिखा सकता है। हालांकि उन्होंने ये जरूर जिक्र किया कि जल्दी ही किसी न किसी माध्यम से इन सभी मुश्किलों से पार पाते हुए हिन्दी ब्लॉग जगत भी अपना एक अलग मुकाम बना लेगा।

बुधवार २८ मई को अपने रवीश कुमार जी ने दैनिक हिन्दुस्तान में एक स्तम्भ कमेंट्री में भी ब्लोग्गिंग की चर्चा की है। इसमें उन्होंने ब्लॉग पते के साथ बताया कि कि प्रकार हिन्दी ब्लॉग जगत पर हमारी महिला ब्लोग्गेर्स ने एक बगावती और बुलंद रुख अपना रखा है। नंदिनी जी के ब्लॉग की, notepad की, मनीषा जी की तथा और भी कई महिला ब्लोग्गेर्स की चर्चा बड़े ही दिलचस्प अंदाज़ में की गयी है। इसी दिन दैनिक त्रिबुने के दिल्ली संस्करण में भी विशेष पृष्ठ शिक्षा लोक में अपराजिता ने बताया कि ब्लोग्गिंग करने वाले वो ब्लॉगर जो विशुद्ध रूप से व्यावसायिक ब्लोग्गिंग कर रहे हैं उनमें पैसा कमाने की धुन के कारण कई तरह की मानसिक बीमारियाँ और तनाव भरी दिनचर्या का सामना कर रहे हैं।

पिछले कई दिनों से देख रहा हूँ कि अमर उजाला के दिल्ली संस्करण में हिन्दी ब्लोग्गिंग का जिक्र नियमित रूप से रहने लगा है । जैसे कि आज उन ब्लॉग पर बात की गयी है जिन पर वे बच्चे लिख रहे हैं जो इस बार माध्यमिक या उच्च माध्यमिक परीक्षाओं में बैठे थे। उस ख़बर में तो यहाँ तक बताया गया है कि किस प्रकार कई बच्चों ने तो अपने आत्महत्या के नोट तक लिख डाले हैं।

मगर इन सबके बीच मुझे एक अफ़सोस हमेशा रहता है कि ये तमाम बड़े लोग अपने आपको एक दायरे में समेटे हुए हैं, यहाँ ब्लॉगजगत पर भी और अपनी लेखनी में भी । कहीं भी नए ब्लोग्गेर्स, छोटे छोटे प्रयास करने वाले ब्लोग्गेर्स की कोई चर्चा नहीं , जिक्र तक नहीं। मैंने निश्चय किया है कि ब्लोग्जत पर जल्दी ही आने वाले अपने आलेख में मैं ज्यादा से ज्यादा ब्लोग्गेर्स से सबका परिचय करवाउंगा और कोशिश करूंगा कि उसे यहाँ भी स्कैन कर के लगा सकूं।

मेरा अगला पन्ना ;- वो आखिरी रात.

शनिवार, 24 मई 2008

रिश्ते बदल रहे हैं (एक कविता )



बदल रहा है ज़माना,
या कि,
रिश्ते बदल रहे हैं॥
अब तो लाशें,
और कातिल ,
एक ही,
घर के निकल रहे हैं॥

पर्त चिकनी , हो रही है,
पाप की,
अच्छे-अच्छे,
फिसल रहे हैं॥
बंदूक और खिलोने,
एक ही,
सांचे में ढल रहे हैं॥

जायज़ रिश्तों के,
खून से सीच कर,
नाजायज़ रिश्ते,
पल रहे हैं॥
मगर फिक्र की,
बात नहीं है,
हम ज़माने के,
साथ चल रहे हैं...

बदल रहा है ज़माना,
या कि,
रिश्ते बदल रहे हैं॥

शुक्रवार, 23 मई 2008

जो सक्षम हैं आगे आयें, ( सभी ब्लोग्गेर्स से विनम्र अपील )

मैं पहले भी बता चुका हूँ कि ब्लॉग लेखन में मेरी शुरुआत एक इत्तेफाक था। वो टू शुक्र है कादम्बिनी पत्रिका के एक अंक का और सभी बड़े ब्लोग्गेर्स का जिन्होंने विस्तारपूर्वक बताया हुआ था कि कैसे अपना ब्लॉग बनाया जाए । इसके बाद एक मित्र के पीछे पड़कर पहला ब्लॉग बना। धीरे-धीरे सिलसिला चलता गया और आज हिन्दी अंग्रेज़ी के आठ ब्लोग्स पर निरंतर लेखनी चल रही है। हालांकि ऐसा नहीं है कि ब्लॉग लेखन, उसका प्रकाशन आदि बहुत कठिन या क्लिष्ट काम है मगर इतना तो यकीनन है कि मुझ जैसे अनादियों को यदि मार्गदर्शन देने के लिए कोई मिल पाटा तो बहुत सी कठिनाइयां या ऐसी बातें जो समझ ही नहीं आयी, का हल निकल सकता था। इससे अलग टी ये कि हम भी फोट-शोट, गाने-वने, और ततू-शतू लगवाकर अपने ब्लॉग को वैसा ही खूबसूरत बना पते।

ब्लोग्गिंग करते रहने के बावजूद मुझे ये नहीं पता था कि इसमें अपनी फोटो कैसे लगा सकता हूँ, दूसरे दृश्य चित्रों का क्या कहूँ वो तो अब तक नहीं आते मुझे लगाने। ऐसा ही कुछ कुछ तिप्न्नी के साथ भी हुआ। तिप्न्नी करते करते महक जी ने एक रोज़ बताया कि मुझे वर्ड वेरीफिकेशन हटाना चाहिए, मैंने सोचा ये क्या बाला है और हटेगी कैसे। जैसे तैसे कोशिश की तो तिप्न्नी मोद्रित करें टाईप की कोई दूसरी बाला गले पड़ गयी। बस यूं समझिए कि किसी तरह इनसे पीछा छोटा । मगर सबसे बड़ा अफ़सोस कि हाय रे आज तक एक भी तिप्न्नी हिन्दी में नहीं कर पाया अजी लानत है मुझ पर, मगर क्या करूं अब तक पता ही नहीं है कि ये मैं कैसे कर सकता हूँ। हालांकि अनवरत वाले द्विवेदी जी ने भरसक प्रयत्न किया मुझे सिखाने का मगर हम जैसे नालायक तो बस समझिए कि युगों में पैदा होते हैं, खैर।

तो अंत में अपनी इस पोस्ट में जो कि इत्तेफाकन इस चिट्ठे की शतकीय पोस्ट है , में aअप तमाम जानकार , विद्वान् ब्लोग्गेर्स से आग्रह करता हूँ कि कोई बंधुगन ऐसा ब्लॉग भी बनायें जो हमारे जैसे अनाड़ियों के प्रश्नों, शंकाओं , का हल हमें बता सके। यदि पहले से ही ऐसा कोई ब्लॉग मौजूद है तो उसकी जानकारी मुझे और अन्य सभी को देने की कृपा करें। आप लोग ही बताइये क्या आप लोगों को ये अच्छा लगेगा कि आप जैसे विद्वान् लोगों के बीच हम जैसे भैन्सालोटन भी मौजूद रहे , आगे आपकी मर्जी.

बुधवार, 21 मई 2008

ब्लॉगर के रूप में पहचान न बने , न सही, मगर.........

बहुत पहले किसी ने कहा था, की साहित्य असल में सिर्फ़ साहित्यकार के लिए होता है, और ठीक उसी तरह शायद ब्लॉग भी सिर्फ़ ब्लोग्गेर्स के लिए होता है, सिर्फ़ उन्ही के पढने और उन्ही के लिखने के लिए। पिछले छः सात महीनों तक यहाँ ब्लॉगजगत पर समय बिताने के बावजूद ब्लॉगर के रूप में मेरी क्या कितनी पहचान बन पायी है न इस बारे में कभी सोचा है न सोचना चाहता हूँ, मगर इतना जरूर है की आज जिन ब्लोग्गेर्स का नियमित तिप्प्निकारों के रूप में मैं आभारी हूँ , मैं चाहता हूँ की एक दिन मैं ख़ुद उस कतार में शामिल हो जाऊं। अहलंकी कुछ दिनों पहले जब मुझे मौका मिला था या कहूँ की ऑफिस में कम्पूटर और थोडा समय भी मिल गया था टू मैंने उसका पूरा फायदा उठाते हुए खूब सारी टिप्पणियाँ की थी, मगर यहाँ कफे में बैठ कर वो सम्भव अनाहीं हो पा रहा है और जैसे ही मैं अपना ख़ुद का कंप्युटर ले लूंगा तो जरूर ही भाई उड़नतश्तरी,डॉक्टर अनुराग आर्य, भाई महेंद्र, मित्र द्विवेदी जी मेहेक्क जी, और भी जो नियमित टिप्पणी करने वाले हैं उनमें से एक बन पाऊँगा और ऐसा जल्दी ही होगा ये मेरा विश्वास है। तब शायद ही कोई ऐसा ब्लॉग बचेगा जहाँ में घूम कर पढ़ कर और लिख कर नहीं आऊंगा।

अपने अगले पन्ने में आप सब ब्लॉगर से कुछ ख़ास बात या निवेदन या सलाह-मशवरा करने वाला हूँ, इस बारे मं की आप सब में से जो भी जानकार लोग हैं किसी एक विशेष ब्लॉग के माध्यम से हम सभी ब्लोग्गेर्स के प्रश्नों का कठिनाएइयों का समाधान कर सकें तो बड़ा उपकार होगा।

सोमवार, 19 मई 2008

सच का कच्चा चिटठा

आजकल लिखने का कम मगर पढने का ज्यादा मन कर रहा है , और मज़ा भी उसी में आ रहा है, अभी हाल ही में मित्र देवेन्द्र आर्य की कलम से निकली कुछ गज़लें पढी ,लीजिये आप भी नोश फरमाएं।


पहले सच का कच्छ चिटठा खोला जाता है,
फ़िर जाके एक झूठ हवा में घोला जाता है॥

आख़िर कैसे मंडी से मुठभेड़ किया जाए,
गंगा बचती है तो कोका कोला जाता है.।

ये तो सदियों से होता आया है भाई जी,
कंगालों का ही ईमान टटोला जाता है॥

कोई वसूली करते मुझको पकड़े तो जानू,
मैं थोड़े जाता हूँ, मेरा झोला जाता है॥

सीट सुरक्षित है लेकिन अब भी हर प्रत्याशी,
चमरौती के पहले बामन तोला जाता है॥

जिसकी निर्धनता के आगे नतमस्तक था धन ,
वह गांधी भी अब सिक्कों से तौला जाता है॥

मुझको लगता है मैं अब भी सीखा नहीं पाया,
चुप रहकर कविता में कैसे बोला जाता है...

कैसी लगी जरूर बतायें........

शनिवार, 17 मई 2008

जब भी मुझको याद करोगे .

अभी कुछ दिनों पहले ही मैंने आपको अपने दूसरे चिट्ठे में मित्र बैजू कानूनगो की कलम से निकली हुई रचना पढ़वाई थी , आज फिर एक बार उन्ही के कलम से कुछ और प्रस्तुत है :-

जब भी मुझको याद करोगे,
आंसुओं का अनुवाद करोगे॥

मेरा घर बरबाद किया तो,
किसका घर आबाद करोगे॥

इतनी फ़ैली हैं अफवाहें,
किस किस का प्रतिवाद करोगे॥

औलादों का सुख समझोगे,
पैदा जब औलाद करोगे॥

जो होना है, हो जाने दो,
कब तक वाद-विवाद करोगे॥

जीवन जीने की तैयारी,
क्या मर जाने के बाद करोगे॥

तुम को भूल गया जो, बैजू,
क्या तुम उसको याद करोगे....

शुक्रवार, 16 मई 2008

जाने कितने निशाने हैं ?

समय के,
अंतराल पर,
नित नया,
धमाका होता है,
हर बार,
किसी शहर का,
कोई कोना,
मौत की,
नींद में,
सोता है॥

कैसा मज़हब,
कैसा मकसद,
आतंक और,
दहशत के ,
ही वे,
दीवाने हैं,
निर्दोष ,
मासूम ,
औरत,
बच्चे,
रेल -बस,
और ,
मन्दिर मस्जिद,
जाने कितने
निशाने हैं॥

उन्हें बिलखते,
बच्चे नहीं दिखते,
उन्हें उजड़ते,
घर शहर नहीं दिखते,
मौत के सुदागर,
छिप के रहते हैं,
सामने आने का,
वे जिगर नहीं रखते॥

हाँ, मगर ,
बड़े फख्र से,
अपनी हैवानीयत,
को वे,
कुबूल करते हैं॥
उन्हें इंसान ,
समझने की,
हमारे हर ,
भूल की, वो पूरी,
कीमत ,
वसूल करते हैं।

आज मुझे,
मानवाधिकार का,
ढोल पीटने वाला,
जाने क्यों ,कोई,
दिखाई नहीं देता,
शायद उन्हें,
इन धमाकों का,
शोर कभी,
सुनाई नहीं देता।


सिर्फ़ इतना कि, जो ये सब करते हैं उन्हें किसी भी दृष्टिकोण से इंसान नहीं कहा जा सकता , इसलिए उनके साथ बिल्कुल जानवरों जैसा सलूक करना चाहिए, जानवर पागल हो जाए तो उसे मारना ही बेहतर होता है.

बुधवार, 14 मई 2008

विकल्पों की दुनिया

पुराने दिन याद करता हूँ तो एक चीज़ जो भुलाए नहीं भूलती वो थी बगैर किसी विकल्प के, यानि सिर्फ़ एक ही ब्रांड की दुनिया। न सिर्फ़ हमारी दैनिक जरूरतों की वस्तयूं बल्कि टी वी , रेडियो तक में सिर्फ़ एक या ज्यादा से ज्यादा दो विकल्प होते थे सबके पास। दूरदर्शन , एक, आकाशवाणी एक टाटा नमक एक बाटा जूता एक , बोरोलीन एक, पैराशूट नारियल तेल एक, सरसों तेल एक, फोन एक , हाँ साबुन पौउदर जरूर एक से ज्यादा दिख जाते थे। कहीं कोई मुफ्त स्कीम नहीं कोई इनाम नहीं , कोई गलाकाट प्रतियोगिता नहीं थे। मगर सब कुछ मजे में था । उलटा लोगों में निश्चिन्तता थी की ये है तो ठीक है और यही है भी। अजी मुझे तो याद है की रुकावट के लिए खेद है को भी हम सब्र से बैठ कर देखते थे.समय बदला और बाज़ार में भीड़ बढ़ी। खरीददार बढे तो सामान बनाने और बेचने वाले भी बढे।

आज सबके सामने विकल्पों की बड़ी ( या शायद भ्रमित करने वाली छोटी ) दुनिया खुली हुई है। आज कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे चुनने से पहले सबके पास ढेरों विकल्प न हों। अजी, सामानों की तो बातें क्या कहें , शिक्षा, पढाई के विषय , नौकरी, और यहाँ तक की , दोस्ती, रिश्ते तक में भी सबके पास विकल्प हैं। बास करना तो ये है की आपको अपनी वरीयताओं या कहूँ की जरूरतों के हिसाब से बस चुनना भर है। और ऐसा नहीं है की इसके लिए आपको कोई आत्मग्लानी हो , क्योंकि आज सबके साथ ही तो ऐसा हो रहा है। बस शुक्र है तो इतना की माता- पिता, गुरुजनों , घर , परिवार का अब भी कोई विकल्प नहीं है और ना ही कभी हो सकते हैं। हां, इतना जरूर है की इन विकल्पों की दुनिया ने सबमें एक अतृप्ति सी , एक अनबुझी प्यास , एक अंधी दौड़ सी भर कर रख दी है, जाने हम अपनी आने वाली नस्लों को क्या देने जा रहे हैं.

रविवार, 11 मई 2008

यहाँ मैं क्या करता हूँ ?(कविता )

इस कोरी,
मगर काली नहीं,
स्लेट पर,
रोज़ कुछ,
शब्दों-चित्रों को,
उकेरता हूँ॥

कभी सपने,
कभी नग्मे,
कभी अपनी,
यादों के ,
रंग,
बिखेरता हूँ॥

रोज़ यहाँ,
कितने लम्हे,
कितने फ़साने,
खुशिया, गम,
सीने में,
सहेजता हूँ॥

बड़ी दुनिया में,
दूर हैं सब,
पहचान नहीं,
कोई रिश्ता नहीं,
पर जाने कितनों को,
रोज़ यहाँ , अपनी,
बाहों में,
समेता हूँ॥

हाँ यही सब तो करता हूँ यहाँ, रोज़ , और ये करना अच्छा भी लगता है, और आपको ..........

गुरुवार, 8 मई 2008

क्या मैं पत्थर हो गया हूँ ?

सड़क पर,
हादसे देखता हूँ,
और पड़ोस में,
हैवानियत।

कूड़े में अपनी,
किस्मत तलाशते बच्चे,
कहीं प्यार, अपनापन,
और आश्रय तलाशते बड़े (बुजुर्ग) ।

सूखी तपती धरती,
लूटते- मरते किसान,
कच्ची मोहब्बत में,
कई दे रहे अपनी जान।

व्यस्त मगर,
बेहद छोटी जिंदगी,
चुपके से , कभी अचानक ,
आती मौत।

और भी,
कई मंजर ,
देखती हैं,
मेरी आंखें .

मगर मौन,
हैं , मन भी,
और नयन भी,
क्या मैं पत्थर हो गया हूँ ?

गुरुवार, 1 मई 2008

एक कविता

होते होंगे,
कई दर्द,
मीठे भी,
हमें तो,
हर दर्द,
का स्वाद,
कसैला लगा है॥

हुए होंगे,
किसी के साथ
हसीन हादसे भी,
हमें तो ,
हर चोट से,
सदमा पहुंचा है॥

होता होगा,
वक्त, किसी के ,
साथ भी,
हमारे तो,
हमेशा ही,
आगे या पीछे,
रहता है॥

मगर ये हो सकता है कि ऐसा सिर्फ़ हमारे ही साथ होता हो?
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