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रविवार, 24 नवंबर 2013

चलो लगाएं कोई नया सा इल्ज़ाम फ़िर










कभी नहीं चली है ,मुद्दों की सियासत इस देश में ,
चलो इक दूजे पर लगाएं कोई नया सा इल्ज़ाम फ़िर ॥
.

क्यूं खिलाफ़ किया जाए किसी को, किसी का अच्छा बोलकर,
देखो जरा ऊंची गर्दन किसी की ,उसे फ़ौरन करो बदनाम फ़िर॥
.

उन्हें बंदूक और बारूद की भाषा है मालूम ,बस जिन्हें ,
तुम पता नहीं क्यूं हर बार भेजते हो इश्क के पैगाम फ़िर॥
.

तुम्हें पता है वो डर की ताकत जानते हैं , डराएंगे ही ,
तुम आगाज़ जब तेज़ाब सी करते हो,क्यूं सोचते हो अंजाम फ़िर ॥
.

ये मत कहिए कि पहले ऐसा कभी हुआ ही नहीं गुनाह देश में ,
हां ये जरूर है कि जो हुआ पर्दे में ,अबकि हुआ है सरेआम फ़िर ॥
.

इस देश में लडाने को बहुत से बहाने हैं सियासतदानों के पास,
देखो उसी धर्म मज़हब के नाम पर लडते हैं ,रहीम और राम फ़िर ॥
.

जिस लोकतंत्र की दुहाई देकर तुमने ये रियासत टिका रखी है ,
अगर यही है वो तो अभी के अभी बदल डालो इसका नाम फ़िर॥
.

कभी कुहासे और ओस से भीग जाती थीं सांझ की चूनर ,
बदला रूत मगर धुंएं से हुई है धुंधली, शहर की शाम फ़िर ॥
.

शनिवार, 21 मई 2011

सामने रख कर आईना , किताब लिखने बैठा हूं मैं ......




कवि जी पुराने ही हैं ..



बारूद की स्याही से , नया इंकलाब लिखने बैठा हूं मैं , 
सियासतदानों , तुम्हारा ही तो हिसाब लिखने बैठा हूं मैं 


बहुत लिख लिया , शब्दों को सुंदर बना बना के , 
कसम से तुम्हारे लिए तो बहुत , खराब लिखने बैठा हूं मैं 


टलता ही रहा है अब तक , आमना सामना हमारा ,
लेके सवालों की तुम्हारी सूची, जवाब लिखने बैठा हूं मैं 


सपने देखूं , फ़िर साकार करूं उसे , इतनी फ़ुर्सत कहां ,
खुली आंखों से ही इक , ख्वाब लिखने बैठा हूं मैं ......


मुझे पता था कि बेईमानी कर ही बैठूंगा मैं ,अकेले में,
सामने रख कर आईना , किताब लिखने बैठा हूं मैं ...


जबसे सुना है कि उन्हें फ़ूलों से मुहब्बत है , 
खत के कोने पे रख के ,गुलाब , लिखने बैठा हूं मैं 



शुक्रवार, 20 मई 2011

अब, खतों का मेरे , कोई जवाब नहीं देता.....


कवि जी , इन कविताई पोज़



हां ,बदल ही गया होगा दस्तूर जमाने का ,
अब ,खतों का मेरे , कोई जवाब नहीं देता ॥


सयाने हुए हैं सारे , अब जरूरत नहीं होती,
यही वजह है कि , तोहफ़े मे अब कोई किताब नहीं देता ॥


अब कहां , कशिश बची है मोहब्बत की ,
किताबों में रखने को , कोई अब गुलाब नहीं देता ॥


दूसरों की खामियां देखते , उम्र गुजर जाती है ,
अपने गुनाहों का , खुद कोई क्यों हिसाब नहीं देता ॥


दुश्मन ही है वो , कैसी पडोसी मान लें ,
जो होता पडोसी , तो हर साल एक नया "कसाब " नहीं देता ॥


हर कोई दिखाता है रुतबा अपनी पहचान और ओहदे का
 सच्चा और ईमानदार ही बस , अपना रुआब नहीं देता ॥


रविवार, 1 मई 2011

पहले बनाते हैं , बाद में चलाते हैं .......सुना आज मजदूर दिवस है




मजदूर दिवस को ,
फ़िर आज ,
मनाने की ,
जोरदार थी तैयारी ....

मीडिया की ,
फ़िर मंत्री जी की ,
और टाटा-बिडला की भी ,
आज आनी थी बारी ,

सबने की घोषणा ,
अबकि इसे,
मजदूरों के बीच ही ,
जाकर मनाया जाएगा

कितनी चिंता है ,
आज हमें, कामगारों की ,
उन्हें साथ बिठाकर
ये बताया जाएगा

शहर के छोर की ,
गंदी झुग्गी बस्ती के ,
एक कोने की ,
कराई गई सफ़ाई

टेंट लगे और ,
बडे से भोंपू , ताकि ,
जो बोलें मंत्री जी ,
वो सबको दे सुनाई

नेताजी आए , थोडा
अचकचाए फ़िर सकपकाए,
अरे ! अब आ गए हम हैं ,काहे का गम है ,
लेकिन आपकी संख्या थोडी कम है ??

पीए ने कान में बताया ,
फ़ुसफ़ुसा के समझाया ,
नेताजी जल्दी से कुछ भी ,
बोले के , फ़ौरन जाईये निकल,

अभी अभी पता चला है कि ,
इस बस्ती के ,दस मजदूर ,
कल लगी तो जो आग ,
उसमें जिंदा गए थे जल

आयं ! काहे की ,फ़ैक्ट्री थी ,
कौन सा था वो कारखाना
अबे जब ऐसा था तो ,
तुम्हें ये पहले ही था बताना

सर, जूतों का था वो कारखाना,
जहां कल लगी थी आग ,
मालिक ने जड दिया था ताला ,
अंदर दस जिंदगियां राख

नेताजी चौंके, नीचे उतर आए ,
चलो फ़िर मंत्रालय में ही मजदूर दिवस मनाते हैं ,
अच्छा हुआ जूते जल गए , और मजदूर भी ,
पहले जूते बनाते हैं , बाद में जूते चलाते हैं



सुना है कि सरकार ने आज उन अभागे मजदूरों के परिवार वालों को दो दो लाख रुपए का मुआवजा देने की घोषणा की है ...काश कि इस या इससे ज्यादा मुआवजे में ..मजदूरों को भी कभी ...एक फ़ैक्ट्री मालिक , एक नेता या मंत्री जिंदा जलाने को मिल जाता

बुधवार, 3 मार्च 2010

रे माधो, तू देखना,


रे माधो, तू देखना,
इक दिन ,
मैं इस चाँद का,
एक टुकडा तोड़ कर,
तेरे माटी के,
दिए में पिघलाऊंगा ॥

रे माधो, तू देखना,
इक दिन,
इन तारों को,
बुहार कर एक साथ,
रगडूंगा, तेरे आँगन में,
आतिशबाजी , करवाउंगा मैं॥

रे माधो, तू देखना,
इक दिन,
तू नहीं जायेगा,
पंचायत में हाजिरी देने,
तेरे दालान पर,
संसद का सत्र बुलवाऊंगा मैं॥

रे माधो, तू देखना,
इक दिन,
तेरे गेहूं के बने ,
जो खाते हैं, रोटी,
ब्रैड-नॉन, भठूरे,
उन सबसे ,
तुझको मिलवाउंगा मैं॥

रे माधो, तू देखना,
इक दिन,
तेरी मुनिया को,
इस स्लेट-खड़ी के साथ ,
बड़े कोन्वेन्ट में ,
पढवाउंगा मैं॥

रे माधो, तू देखना,
इक दिन,
मुझे कोई जाने न जाने ,
तुझे पहचान लेंगे सब,
कुछ ऐसा ही कर जाऊंगा मैं .....

और एक दिन ऐसा होकर रहेगा ...मुझे विश्वास है कि भारत के गांव में बसा ..माधव ही आखिरी विकल्प होगा ........

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

हुआ जो , हादसा, मेरे साथ, जमाने भर , के लिए, वो बस, एक ख़बर थी

हुआ जो ,
हादसा,
मेरे साथ,
जमाने भर ,
के लिए,
वो बस,
एक ख़बर थी॥

मैं तो,
सतर्क था,
और ,
सचेत भी,
मगर जिसने ,
हमें रखा,
अपनी ठोकरों पर,
शायद उसकी ही,
कहीं और ,
नज़र थी॥

मैंने छोड़ दिए,
कई रास्ते,
और कई,
मंजिलें भी,
जिसके लिए,
वो तो,
पहले ही,
किसी और की,
हमसफर थी॥

मैं ढूँढ ,
रहा था,
अपनी किस्मत को,
आकाश की,
बुलंदियों पर,
पाया तो ,
गर्दिशों में,
दर बदर थी॥

इक छटपटाहट,
सी थी,
जीवन चक्र
को चूमने की,
जब छुआ ,
तो जाना,
ये झील ।
में घूमती,
भंवर थी...


रविवार, 21 फ़रवरी 2010

जाने किस ओर से, ये खुश्क हवा सी आई है


परेशान है हर,
आदमी आज,
क्यों इतनी,
बदहवासी सी छाई है॥

शुष्क है आंखें और,
सूखी-सूखी आत्मा भी,
जाने किस ओर से,
ये खुश्क हवा सी आई है॥

मोहब्बत के मायने बदले,
प्रेम प्यार का फलसफा भी,
आज इश्क में, वो बात कहाँ,
कहीं गुस्सा, कहीं धोखा, कहीं पर रुसवाई है॥

ये मुमकिन है कि ,
वक्त अलग हो और जगह अलहदा,
बस तय है इतना कि,
हर दिल ने चोट खाई है॥

हर तरफ़ नफरत की आंधी,
राग द्वेष यूं पसरा है,
ख़ाक होने को घर भी नहीं उतने,
जितने हाथों में दियासलाई है




शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

मैं खुद ही खुद को प्यार करने लगा ....


जब लगे,
दुत्कारने,
मुझको सभी,
परित्यक्त ,
सा हर कोई,
व्यवहार करने लगा॥

खुद को,
उठाया,
गले से,
लगाया,
में खुद ,
खुद को,
ही प्यार करने लगा॥

जीता रहा,
जिस दुनिया को,
अपने,
सीने से लगाए,
मुझे अपने से,
दूर जब ये,
संसार करने लगा॥

खुद को,
सम्भाला,
संवारा-सराहा,
स्नेह से,
पुचकारा,
खुद को ही,
लाड करने लगा॥

उसने इतना,
दिया नहीं मौका,
कि उसे,
कह पाता,
मैं बेवफा,
तो खुद ,
आईने में,
अपने अक्स से,
मोहब्बत का,
इजहार करने लगा।

क्या करता सोचा चलो कोई तो होना ही चाहिए प्यार करने वाला तो मैं खुद ही क्यों ???


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