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प्रचार खिडकी

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

एक गधे की कथा और एक लघुकथा ...



एक बार एक गधा एक बड़े से गड्ढे में गिर गया। धोबी देखता है कि गड्ढा काफी गहरा है और उसमें से गधे को निकालना मुश्किल है फ़िर चूँकि वो बूढा भी हो चुका है इसलिए अच्छा है कि इस गड्ढे के ऊपर मिटटी दाल कर उसे बंद कर दे और उसकी जान छूटे। वो गड्ढे में मिटटी डालने लगा ।पहले तो गधे के समझ में कुछ नहीं आया । मगर जब उसे समझ में आया है तो वो दुखी भी हुआ और चकित भी । फ़िर अचानक ही गधे को कुछ सूझा , जैसे ही धोबी उसके ऊपर मिटटी डालता वो अपने आप को हिला कर उस मिटटी को झाड़ लेता और उस मिटटी पर चढ़ जाता। इस प्रकार धीरे धीरे गधा ऊपर आने लगा। उस धोबी के आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं रहा जब उसने देखा कि गधा धीरे धीरे ऊपर आकार बाहर निकल जाता गया । कहने का मतलब ये कि


जीवन में इस तरह सबके ऊपर बहुत सारी मुश्किलें मिटटी के तरह आ पडती हैं जिन्हें झाड़ते हुए और उनके ऊपर कदम रखते हुए जो आगे और ऊपर चढ़ता जाता है वो हर मुश्किल से बहार निकला जाता है। गधे तुझे सलाम......



अब एक लघुकथा

बचत

लीना और टीना शौपिंग मॉल में खरीददारी कर रही थी।

पर्स का दाम सुनकर लीना ने टीना से कान में चुपके से कहा , टीना , यार ये तो खुल्लम खुल्ला लूट रहे हैं इस पर्स का बाहर किसी भी दुकान में इससे आधा ही होगा, रहने दे चल निकल यहाँ से।

टीना ने उसे फुसफुसा कर समझाया , क्या बोल रही है तू, पागल अब जो है ले ले , ऐसी जगह पर कोई मोल भाव करता है क्या कितनी शर्म आयेगी।

सो पर्स खरीद लिया गया ।

मॉल से बाहर निकलते ही दोनों सहेलियां एक रिक्शा करने लगी,

बड़े चौक का कितना लोगे भाई,

जी मेम साहब दस रुपैये लगेंगे।

अरे जाओ जाओ वहां के तो आठ ही लगते हैं, हम तो रोज़ जाते हैं।

जी बीबीजी, मगर ये भी तो देखिये की कितनी तेज धुप है।

चलो चलो आठ में चलना है तो बताओ।

ठीक है बीबीजी, चलिए।

"देखा ये रिक्शे वाले बदमाश होते हैं, बचा लिए न दो रुपैये, लीना से टीना ने कहा.

ये हुई न बचत ????







23 टिप्‍पणियां:

  1. गधे का शीर्षक पढ़कर.... मुझे ऐसा लगा कि आपने कुछ मेरे बारे में लिखा है.... पर यह तो बहुत ही इंस्पिरेटिव कहानी निकली.... कहानी से बहुत अच्छी सीख मिली.... और मुझे ऐसा लगा कि मैं भी अकल्मन्द हूँ.... बहुत अच्छी लगी यह कहानी..... दूसरी लघुकथा से यह समझ में आ गया कि दुनिया कितनी दोहरी ज़िन्दगी जीती है.....

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  2. ऐसे गधे की जय हो
    गधा जी गुरु मन्त्र दे गयें

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  3. मुझे तो यही समझ में आया है कि विरोध की पोस्‍टों को मिट्टी समझकर गधा बनकर उपर चढ़ते रहो। संगठन बन जाएगा।
    जय हो अजय भैया की।

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  4. ये तो एकदम बिल्कुल सही है.... अच्छा गुरुमंत्र है।

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  5. अविनाश वाचस्पति जी से सहमत हुं जी, बाकी दुसरी कथा मन को दुखी कर गई, इस रिकक्ष वाले को दस की जगह १२ देता अगर मै होता, ओर माल से मंहगा समान बिलकुल ना लेता. धन्यवाद सुंदर कथा के लिये

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  6. अविनाश वाचस्पति जी से सहमत हुं जी

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  7. अविनाश वाचस्पति जी से सहमत।
    जय हो।

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  8. पहली कहानी सुन्दर एवं प्रेरक लगी और दूसरी हमारी मनोवृति पर चोट करती हुई महसूस हुई...

    बहुत बढ़िया

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  9. झा जी ये तो हमारा संतू (संतराम) गधा है जिसे उसके मालिक रामदयाल कुम्हार ने कुंये मे पटकवा दिया था. इस गधे को ताऊ ने ही मोबाईल पर टिप दी थी इस कुंये से बाहर निकलने की और तबसे ही ये गधा ताऊ के साथ रहता है. अब ये बहुत ही चालू गधा हो गया है.

    रामराम.

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  10. दोनो कथायें बहुत अच्छी लगी पहली तो बहुत अच्छा संदेश देती है और दूसरी लोगों की मानसिकता का सही चित्र है
    धन्यवाद इस कहानी के लिये

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  11. गधे की बोधकथा, बहुत प्रेरक है. गुरुमंत्र की तरह. बहुत धनयवाद आपका.

    इंसानी गधे की कहानी भी अच्छी लगी.. ऐसे ही जनजागरण करते रहिये.

    होली की बधाई दे रहा हूँ...

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  12. गधे पर कुम्‍हार ने मिट्टी तो डाली यहाँ तो कोई मिट्टी भी मुफ्‍त में नहीं डालता, कैसे ऊपर आएं। बहुत प्रेरणादायक कथा। दूसरी लघुकथा तो मेरे मन की बात है जो हमेशा ही मैं कहती हूँ कि हम केवल गरीबों से ही मोल-भाव करते हैं सोने-चांदी की दुकान पर नहीं।

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  13. अरे वाह अजय भईया क्या बात है बहुत खूब , गधे वाली कहानीं बहुत ही उम्दा लगी, रिक्शा वाला भी मजेदार लगा ।

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  14. अरे वाह अजय भईया क्या बात है बहुत खूब , गधे वाली कहानीं बहुत ही उम्दा लगी, रिक्शा वाला भी मजेदार लगा ।

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  15. अजय भईया क्या बात है बहुत खूब

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  16. कहानी से बहुत अच्छी सीख मिली.शानदार लघुकथा.

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  17. गधा तो खैर जो भी सन्देश दे रहा है पर आपकी लघुकथा बताती है कि कैसे अमीर और अमीर तथा गरीब और भी गरीब बनते जाते हैं!

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  18. अजय जी बडी़ प्रेरक लघुकथाएं हैं ।यह गौर करने की बात है कि ” गधा अब गधा न रहा ” और बचत के फंडे ने तो आज की तस्वीर दिखा दी है । वास्तव में आज लीना - टीना एक नहीं अनगिनत संख्या में मौजूद हैं ।

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टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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