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प्रचार खिडकी

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

कलम उनकी, कातिल है........


कलम उनकी,
कातिल है ,
हम रोज मरते हैं॥

कुछ कही,
और अनकही,
हम रोज पढ़ते हैं॥

कभी दोस्त,
कभी दुश्मन बनके,
हम रोज मिलते हैं॥

कभी दिखने को,
कभी बिकने को,
हम रोज सजते हैं॥

एक जगह पर,
रुक कर भी,
हम रोज चलते हैं॥

मैल बनी चमड़ी , उतरती नहीं,
वैसे तो ख़ुद को ,
हम रोज मलते हैं।

कभी अपनों से,
कभी अपने आप से,
हम रोज जलते हैं॥

नींद ख़राब है, कि सोच हमारी,
अब तो सपनो में,
हम रोज़ डरते हैं.

13 टिप्‍पणियां:

  1. मैल बनी चमड़ी , उतरती नहीं,
    वैसे तो ख़ुद को ,
    हम रोज मलते हैं।
    बेहतरीन रचना....आभार!
    http://kavyamanjusha.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  2. कभी दिखने को,
    कभी बिकने को,
    हम रोज सजते हैं॥
    कटु सत्य को शब्द दे दिया आपने
    शायद यही सच्चाई है

    उत्तर देंहटाएं
  3. कभी दिखने को,
    कभी बिकने को,
    हम रोज सजते हैं॥
    कविता इतनी मार्मिक है कि सीधे दिल तक उतर आती है ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. नींद ख़राब है, कि सोच हमारी,
    अब तो सपनो में,
    हम रोज़ डरते हैं.

    बढ़िया आत्म निरीक्षण।

    उत्तर देंहटाएं
  5. अरे नहीं अजय भईया ऐसा गजब नहीं , सबको डराने वाला खूद ही डरने लगे वह भी सपने में ये अच्छा नहीं , कविता बड़ी जानदार है ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. कभी दिखने को,
    कभी बिकने को,
    हम रोज सजते हैं॥

    ये दुनिया ही ऐसी है....कौन बच पाया...बढ़िया कविता भाई

    उत्तर देंहटाएं
  7. कटु सत्य को शब्द दे दिया आपने
    शायद यही सच्चाई है

    उत्तर देंहटाएं
  8. आप ने सच को कलम के जरिये यहां लिख् दिया, बहुत सुंदर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  9. शानदार झा जी..ये किस तरफ चले!

    उत्तर देंहटाएं

टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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