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प्रचार खिडकी

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

मैं और मेरी एक दुविधा



अपने हालिया ग्राम प्रवास के दौरान इस बार मन में एक उत्सुकता थी कि इधर कुछ समय से बिहार में विकास की बहती बयार की खूब चर्चा हो रही थी ।सच कहूं तो अपने होशो हवास में पहली बार इतने बडे पैमाने पर यातायात के क्षेत्र में निर्माण होते देख मैं इतराया भी खूब ।हालांकि मेरी इतराहट जब यथार्थ के नुकीले पत्थरों से टकराई तो पूछिए मत (इसका पूरा जिक्र तो मैं अपने दूसरे ब्लोग कुछ भी कभी भी , में तफ़सील से करूंगा ) मगर जब लंबी चिकनी सडकों को देख कर मैं इतरा रहा था , तभी मेरा मोबाईल कैमरा जैसे मुझ से बगावत करके पता नहीं कौन सा सच ढूंढ रहा था । आप तस्वीर देखिए और बताईये कि क्या मेरी दुविधा वाकई ठीक है .............??
क्या मोबाईल कैमरे ने मुझ से कुछ अलग देखा ..........?????


रविवार, 20 दिसंबर 2009

वैश्विक आतंकवाद की बढ़ती चुनौती (नई दुनिया में प्रकाशित एक आलेख )







नई दुनिया में प्रकाशित एक आलेख (आलेख को पढने के लिए इस पे चटका लगाएं )

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

एक कथा या सच (शीर्षक आप रखें )-ब्लोग की २०० वीं पोस्ट



निर्मला की कराह सुन के विनोद बाबू दौडे आए ," क्या हुआ क्या दर्द फ़िर बढ रहा है , आज ही रोहित को कहता हूं कि जल्दी से तय करके किसी अस्पताल में दाखिल करवा दे । इस तरह से मर्ज़ को देर तक पालने से आगे मुश्किल बढ जाएगी , मोहित भी आता ही होगा उसे भी खबर कर दी है , रास्ता ही कितनी देर का है , तुम चिंता मत करो "।

"नहीं नहीं मुझे चिंता इस बात की नहीं है कि अस्पताल में मुझे कब भर्ती होना है , मैं सोच रही हूं कि दोनों बेटे नाहक मेरे कारण इतना परेशान हो रहे हैं । बडी बहू (रोहित की पत्नी ) भी कितनी परेशान होती है मेरे कारण , मुझे तो डर लग रहा है अब मोहित के आने से फ़िर कोई बखेडा न खडा हो । वैसे भी उसकी प्राईवेट नौकरी है , हमेशा एक तलवार लटकी ही रहती है ।" बीमार निर्मला ने हांफ़ते हुए एक ही सांस में विनोद बाबू से सब कह डाला ॥

"अरे तुम तो खामख्वा चिंता करती हो , ऐसा कुछ नहीं होगा अब मतांतर किन भाईयों के बीच नहीं होता । दोनों समझदार हैं अपने आप सुलट लेंगे । तुम बेफ़िक्र रहो ..जल्दी ही भली चंगी हो जाओगी । " अब चुप हो जाओ और आराम करो , देखो कैसे चेहरा पीला पडता जा रहा है .." विनोद बाबू ने कहा , मगर वे मन ही मन निर्मला की गिरती सेहत को लेकर चिंतित थे और निर्णय ले चुके थे कि आज ही दोनों भाईयों के आने पर निर्मला की बाबत बात करेंगे ॥

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"अरे मोहित आ गया , चल अच्छा हुआ , मैं और तेरी भाभी तो पिछले कुछ दिनों से परेशान हो गए थे । देख मां की हालत दिन पर दिन बिगडती जा रही है ..उन्हें अस्पताल में दिखवाना जरूरी है । तुझे तो पता है कि हम दोनों की नौकरी है , बच्चे भी पीछे से कोई और ही संभालता है , ऐसे में मां की तीमारदारी कौन करेगा । चल अब तू आ गया है , मैं आज ही गाडी बुक करवा देता हूं , तू मां को ले के वहीं चला जा ", रोहित अपने छोटे भाई मोहित से मिलते ही बोला ।

"नहीं भैय्या , मैं मां को ले के नहीं जा सकता, आपको पता नहीं है , रेवती की कभी भी मां से नहीं बनी , वो तो इस हालत में मां को देखेगी तो और भी बिगड जाएगी कि क्यों ले कर आ गया । आप तो मां का इंतजाम यहीं करवाओ, कल किसी अस्पताल में दिखाते हैं चल के फ़िर देखते हैं कि आगे क्या कैसे होगा , वैसे भी आपने इतनी बार बार फ़ोन किया कि मुझे आना पडा , मेरे पास तो छुट्टी भी नहीं है । आप तो खुद ही संभाल सकते थे , " मोहित तल्ख स्वर में बोला ।

इससे पहले कि बात आगे बढती , विनोद बाबू जो अब तक चुप दोनों भाईयों की बात सुन रहे थे , कातर स्वर में बोल पडे , देखो बेटा , अभी इन बातों के लिए ठीक वक्त नहीं है , तुम्हारी मां की तबियत दिन पर दिन खराब होती जा रही हैं मुझे तो डर लगने लगा है कि कहीं कुछ हो न जाए ,और बेटा थोडा धीरे बोलो बगल के कमरे में तुम्हारी मां बीमार पडी है सुनेगी तो दुख होगा "।,

"आप चुप रहिए पिताजी , पहले भी मोहित ऐसे ही बहाने बनाता रहा है जब भी जरूरत पडती है इसकी , हमेशा ही इसकी अपनी समस्या आ जाती है । कोई न कोई बहाना बना देता है ..आखिर ये भी तो आपका बेटा है क्या इसका कोई फ़र्ज़ नहीं बनता , मुझे भी तो थोडा सा आराम चाहिए , शांति चाहिए मैं कुछ कहता नहीं तो ......." रोहित लगभग चीखता हुआ बोला । मैं सुबह तक का इंतज़ार कर रहा हूं , मोहित तू फ़ैसला कर ले क्या करना है , और फ़ैसला क्या , तुझे तो इस बार मां को लेकर जाना ही पडेगा । रोहित झटके से कमरे से बाहर निकल गया । मोहित भी बडबडाता हुआ , अपनी पत्नी को फ़ोन मिलाते हुए बाहर निकल गया ।
विनोद बाबू बुझे मन से अपनी पत्नी के कमरे में पहुंचे ," लो निर्मला, अब तो मोहित भी आ गया, अब चिंता की कोई बात नहीं , अरे सो गई क्या ,,...? " विनोद बाबू ने देखा तो चौंक गए ..निर्मला के आखों के कोर से आंसू की धार बह रही थी । वो मौन की भाषा समझ रहे थे ,और जैसे जैसे पढ रहे थे उनका दिल डूबता जा रहा था ।
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भोर की पहली किरण के साथ ही जब विनोद बाबू की नींद खुली तो वो निर्मला की ओर लपके । एक दम शांति कोई हलचल नहीं , ...धक से रह गए वे । गले से घुटी घुटी सी चीख निकली ....निर्मला....आ...आ...आ..। रोहित ...मोहित .......

पूरा परिवार इकट्ठा हो गया पल भर में और बहूओं का रोना धोना भी । बच्चे भी साथ साथ अवाक रो रहे थे । मोहित अपने मोबाईल से अपनी पत्नी को पहुंचने के निर्देश दे रहा था । रोहित सुबकियों के बीच चुप खडा था । धीरे धीरे ..आस पडोस के लोग भी इकट्ठा होने लगे । बीच में ही थोडी देर के लिए दोनों भाई सबसे पीछे जाकर बातें करने लगे । वहां कोई नहीं था, ॥

"देख मोहित मां तो चली गई , और अब पिताजी बचे हैं उनकी सेवा करनी है हमें , तेरी तो प्राईवेट नौकरी है , और फ़िर पिताजी की कौन ज्यादा देखभाल करनी है वे मेरे पास ही रहेंगे ( रोहित के मन में पिताजी की मोटी पेंशन चमक रही थी ) "

"वाह अभी मां को रखने के लिए तो तुम्हारे पास समय ही नहीं था अब पिताजी के लिए सब ठीक हो गया , ये कहो न कि पेंशन मिलेगी उसी के चक्कर में तैयार हो गए , मैं सब समझ रहा हूं ..पिताजी मेरे साथ ही जाएंगे । मैं खुद बात कर लूंगा पिताजी से । "मोहित तमतमाया हुआ बोला । और चल दिया वहां से ॥

दोनों भाईयों ने ये नहीं देखा कि वहीं ओट में खडे विनोद बाबू ,सब सुन चुके थे । वहां से निकल कर दोनों भाईयों को ईशारे से बुलाया और कहा, "बेटे तुम दोनों भाईयों ने अपनी शक्ति और श्रद्धा के अनुसार हमारी खूब सेवा की , तुम्हारी मां को तो मुक्ति मिल गई , अब संस्कार के बाद मुझे भी मुक्ति दो । मैं भी गांव चला जाऊंगा वहीं रहूंगा , उम्मीद है कि इससे तुम दोनों को आगे कोई कठिनाई नहीं होगी । विनोद बाबू, सख्त और सपाट स्वर में बोले ॥

गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

कुछ पंक्तियाँ .......बस और क्या



(
)

बेशक मुझे मालूम नहीं,
जवाब इसका,
मगर इतना तो है कि ,
तुम्हारा सवाल अच्छा है॥

कहते
हैं कि रात के बाद,
सवेरा तो आता ही है,
जाने कितनी लंबी होती है वो रात,
जिनके बाद सवेरा आता है,
जो भी हो दिल बहलाने को,
ये ख्याल अच्छा है

नहीं
पता, हां ये तो नहीं पता,
कि आज भरेगा ,
मजदूर का पेट,
या कि किसी ,
गरीब के घर,
पहुचेगा खुशियो का पैकेट,
ये हो हो, मगर,
बाजार में उछाल अच्छा है॥

क्या करूं कि,
गीत तुम्हें मेरे,
अच्छे नहीं लगते,
मेरा सुर ,बेसुरा सही,
मगर तबले पे ,
तुम्हारा ताल अच्छा है

बेशक उस गरीब के,
पास खाली झोली,
और याचक आखें हैं,
मगर मंदिर में जाने का,
पहला हक तुम्हारा है,
तुम्हारी पूजा का थाल अच्छा है



(
)

इबादत को बहुत मिलेंगे,
मगर जिनके नाम पे हो सके सियसत,
चलो आज करें कोशिश,
एक ऐसा भी भगवान तलाशा जाए॥

खालों से सजी दीवारें,
चकाचौंध अट्टालिकाओं के जंगल में
गेंदे की खूशबू और सोंधी महक वाला,
इक मिट्टी का मकान तलाशा जाए॥

टीवी से चिपके चिपके से,
काल्पनिक पात्रों में खोए बच्चे खूब मिले,
तितली के पीछे दौडता, चींटे को पकडता,
आज कोई नादान तलाशा जाए

बडे भारी उपहारों से लदे-फ़दे
और मुस्कान नकली सी ओढे ओढे,
उन अपनों के बीच, साथ फ़ाकाकशी करने वाला,
कोई मेहमान तलाशा जाए॥

सोमवार, 14 दिसंबर 2009

कर्ज (एक लघु कथा )

"मालिक थोडे से पैसे उधार दे दो , अबकी बार फ़सल अच्छी हुई तो सब चुकता कर दूंगा "भुवन गिडगिडाया ॥

"चल चल, जब देखो मुंह उठाए चला आता है कभी किसी बहाने तो कभी किसी बहाने । तेरा पिछला ही कर्जा इतना है कि उसका सूद ही तू नहीं चुका पाएगा मूल तक की तो बात ही क्या । कितनी बार कहा तुझे कि अपनी वो बलका वाली जमीन दे दे , बेच दे उसे , तेरा सारा कर्जा उतर जाएगा । वो भी तू नहीं मानता ।"

" मालिक , वो जमीन कैसे दे दें , एक वही तो टुकडा बचा है आखिरी सहारा बच्चों को पेट भर खिलाने के लिए । अगर वो भी दे दें तो करेंगे क्या मालिक । मालिक मेरी मां बहुत बीमार है ...इलाज के लिए शहर के अस्पताल ले जाना होगा ....उसी के लिए बस बीस हजार रुपए चाहिए थे मालिक ....." भुवन कहते कहते मालिक के पांव पकड चुका था ॥

तभी उसका छोटा बेटा बबलू दौडता आता दिखा ," बापू, जल्दी चलो दादी कुछ बोलती नहीं "

भुवन झटके से उठा और घर की ओर सरपट दौड लिया । मां दम तोड चुकी थी । मां की लाश से लिपट लिपट के रो रहा था भुवन दहाडें मार मार के । सभी आस पडोस से इकट्ठे हो रहे थे घर के आंगन में । भुवन को अपनी बेबसी पर एक आत्मग्लानि सी हो रही थी जो उसका दर्द और बढा रही थी । पत्नी भी वहीं साथ ही बैठ कर भुवन के साथ रो रही थी । भुवन को ज्यादा विलाप करता देख , धीरे से उसके कान में कह उठी ," सुनो , इश्वर की यही मर्जी थी शायद , मां के जाने से तुम पर आने वाला कर्जा तो बचा । भुवन को अचानक ही एक अनचाहा संतोष सा हो गया था ॥ पहले की अपेक्षा अब उसका रोना थोडा कम था ॥

तभी मालिक भी आ पहुंचे ," देखो भुवन , अब भगवान जैसा चाहता है वैसा ही होता है ...उसकी मर्जी के आगे कहां किसी की चलती है , तुम घबराओ मत । समाज तुम्हारे साथ है , मैं तुम्हारे साथ हूं । माता जी के श्राद्ध कर्म और भोज के लिए तीस चालीस हजार की जरूरत तो पडेगी ही तुम्हें , मगर मैं हूं न , कहीं जाने की जरूरत नहीं है , सब इंतजाम हो जाएगा ॥"

मालिक को बलका वाली शानदार जमीन दिख रही थी और भुवन को शहर में भटकता हुआ अपना परिवार और वो खुद ॥

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

वैश्विक आतंकवाद की बढ़ती चुनौती (सच कहूं ), सिरसा हरियाणा में प्रकाशित एक आलेख


वैश्विक आतंकवाद पर लिखा गया एक आलेख जो सिरसा हरियाणा के दैनिक ,सच कहूं में प्रकाशित हुआ ॥

सोमवार, 23 नवंबर 2009

शिक्षा का व्यावसायीकरण : डेली हिंद मिलाप (हैदराबाद ) में प्रकाशित एक आलेख ॥

शिक्षा का व्यावसायीकरण : डेली हिंद मिलाप (हैदराबाद ) में प्रकाशित एक आलेख ॥ आलेख को पढने के लिए उस पर दो बार चटका लगाएं ॥

शनिवार, 21 नवंबर 2009

ब्लॉग लेखन अभिव्यक्ति का नया मंच : (दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित एक आलेख )







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ब्लोगिंग को विषय बना कर लिखा गया मेरा ये आलेख ब्लोगिंग के शुरूआती दिनों में लिखा गया था , और लगभग २८ समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ था , समय की कमी के कारण ," ब्लोग बातें " नामका एक नियमित कालम शुरू नहीं कर पा रहा हूं मगर जल्दी ही कर पाऊंगा इसकी उम्मीद है ॥

शनिवार, 7 नवंबर 2009

क्यों खो रहा है बचपन ( दैनिक पंजाब केसरी में प्रकाशित एक आलेख )







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बच्चों के हालातों पर , लिखा गया एक सामयिक आलेख जिसे दैनिक पंजाब केसरी, दिल्ली संस्करण में स्थान मिला ।ये उन दिनों की बात है जब मैं अजय (रमाकांत) ( मेरे पिताजी का नाम ) के उपनाम से लिखा करता था

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

खामोश ! हम वसूली पर हैं (दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित एक व्यंग्य )



दिल्ली पुलिस के असाधारण और इतने कर्मठता से ड्यूटी करने की प्रेरणा से प्रेरित होकर ..एक श्रद्धांजलि टाईप की पोस्ट ..उनके लिये....॥











(चित्र को बडा करने के लिये उस पर चटका लगाएं )

रविवार, 1 नवंबर 2009

तुम्हारी हसरतों का फ़साना कह जाती हैं अंगडाईयां..

















भीड के साथ होता हूं
पर भीड साथ नहीं देती,
अक्सर
मेरा साथ देती हैं मेरी तन्हाईयां ॥



बेशक न कहो होठो से,
और पलकों से इशारे न करो,
तुम्हारी हसरतों का
फ़साना कह जाती हैं अंगडाईयां ॥



सबके मुकदमे
सालों साल नहीं चला करते,
हाकिम हुक्कामो की
होती हैं चंद सुनवाईयां ॥



कई करते हैं कत्ल पे कत्ल तो
कहीं जिक्र भी नहीं होता,
कई खुद का कत्ल कर लेते हैं
तो भी होती हैं रुस्वाईयां ॥




मंगलवार, 20 अक्तूबर 2009

अबकि दोस्तों की दीवाली खूब अच्छी मनी....







अबकि मेरे कुछ
दोस्तों की दीपावली
बहुत अच्छी मनी,
या कि उन्होंने ,
इसे खुद ही
अच्छी तरह मनाया।

होली में कुछ
गडबड हो गई थी,
मगर इस बार ,
पर्याप्त थी बोतलें,
और चखना भी ,
बहुत स्वादिष्ट था,
इसलिये सबने,
चार चार पैग, ज्यादा चढाया।

बस इतना हुआ कि ,
जो बच्चे उनके
दिवाली मनाने को आतुर थे,
जब देखा कि ,
उनके पापा व्यस्त हैं,
मगर नसीहत थी कि
पटाखे किसी बडे के साथ चलाना,
सो क्या करते, सबने,
उन पटाखों को मेरे साथ चलाया।

क्योंकि उन्हें पता था,
कि जब अंकल को
होली के रंग पसंद आये,
तो दिवाली की रोशनी भी भायेगी.........................................

सोचता हूं...दोस्तों के पर्व कितने कमाल के होते हैं न..कितनी समानता , कितनी एकरूपता होती है...रंगों का पर्व हो या रोशनी का...भाई बहन का हो या पति पत्नि का सब एक ही जज्बे से मनाया जाता है....सब कुछ ग्लासों में ही डुबाया जाता है॥

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009

एक समाज की दो दिवाली


पिछले कुछ वर्षों से जब से दिल्ली में रह रहा हूं, यहां के सभी पर्व त्योहारों को बारीकी से देखने समझने की कोशिश करता हूं। बारीकी से शायद इसलिये भी क्योंकि अनायास ही उसकी तुलना ग्रामीण क्षेत्रों में उन पर्वों को मनाये जाने के तरीके से करने लगता हूं। ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं कि ये अंतर इतना बडा है कि खबर बन जाये कि अमुक जगह पर दिवाली में लोगों ने एक दूसरे को गुलाल लगाया। मगर यकीनी तौर पर अपने अनुभवों से इतना तो जरूर कह सकता हूं कि ..चाहे किसी भी कारणों से...आर्थिक, सामाजिक या और किसी....मगर दोनों परिवेशों में पर्व त्योहार अपना स्वरूप बदल लेते हैं। हो सकता है ऐसा सिर्फ़ मुझे लगा हो , किंतु लगा तो है ही।


पहले बात करते हैं ग्रामीण क्षेत्रों में मनाई जाने वाली दिवाली की । मुझे याद है कि दिवाली की तैयारी वहां शुरु होती थी ..सफ़ाई और स्वच्छता वाले हमारे अभियान से । अभियान कोई राजनीतिक या सामाजिक नहीं था जी ...अपना पर्सनल सा था...तू मेरा हाथ बंटा मैं तेरा.....इस टाईप का। और हम कुछ युवक साथी....घर , बाहर, दालान, खलिहान, यहां तक की छोटी छोटी गलियों तक को साफ़ कर डालते थे। दीपावली की सुबह तो सडकों पर झाडू तक लगा कर उन्हें यथा संभव साफ़ कर दिया जाता था । इस काम में जो मजा और सुख मिला ..वो आज तक फ़िर कभी नहीं मिल पाया। अभी कुछ दिनों पहले जब गांव से समाचार जाना तो दुख हुआ ये जानकर कि अब तो सब बाहर ही आ गये हैं सो उतना तो नहीं हो पाता। महिलाएं गाय के गोबर से लीप कर आंगन को पवित्र कर दिया करती थीं। फ़िर आती थी बारी बाजार हाट की । गांव का आर्थिक परिवेश बेशक बहुत सी अघोषित सीमांए बना देता है, मगर शायद इस लिहाज से ये ठीक ही रहता है कि कम से कम इसी वजह से वहां का समाज शहरी दिखावट और औपचारिकता से बच जाता है। मिट्टी के दिये,खिलौने, लक्ष्मी गनेश की मूर्ति..और चीनी के बने खिलौने, जो प्रसाद में लगते थे। सबसे ज्यादा मारा मारी होती थी मिट्टी के तेल की आखिरकार हमारी सारी ढिबरियां उन्हीं तेलों से तो जलनी होती थीं। और वो डिपो वाला डीलर इसी समय अपने सारे दांव खेलता था ।
उस दिन मां सबसे पहले पूजा की तैयारी करती थी, फ़िर पूजा और सबके साथ की गई वो आरती कहां मिल सकता है अब ऐसा। इसके बाद भोजन..मां अपने हाथों से जाने क्या क्या बना देती थी ..हम खाते खाते थक जाते थे, मगर पकवान खत्म नहीं होते थे। फ़िर होती थी पठाकों की बारी, मगर बहुत ही कम इतने नहीं कि कान फ़ट जाये और चारों तरफ़ धुंआ ही धुंआ दिखे।


अब पिछले कुछ सालों से जो दिवाली मना रहा हूं वो भी तो देख ही लिजीये। तैयारी शुरु होती है ..इस बात से कि इस बार बोनस, फ़ेस्टिवल एडवांस, इन्क्रीमेंट और इन सब जैसे अन्य स्रोतों से कुल मिला कर कितना आ जायेगा...उसमें सब हो पाएगा कि नहीं। इसके बाद शुरू होती है खरीददारी...खरीददारी.....और बहुत सारी खरीददारी। अजी पहले कपडों की, फ़िर घर में रखे जाने वाले सजावट के सामानों की, फ़िर जो उपहार सबको बांटने हैं उनकी, फ़िर पटाखों की, फ़िर मिठाईयों की.....और पता नहीं क्या क्या। घर सजता है तो सब बनावटी सामानों से, बनावटी मिठाईयो ,और अब तो सुना है कि नकली भी , के साथ बनावटी गिफ़्ट लिये...और एक सबसे जबरदस्त बनावटी मुस्कुराहट के साथ ..लोग आपके घर आयेंगे या नहीं तो आप उनके घर जायेंगे। यदि आपका रिश्ता सोमरस नहीं है...तब तो आपका चयन सिर्फ़ इस बात के लिये हो सकता है कि आप अपने बच्चों के साथ पडोसी के बच्चों को बिल्कुल सुरक्षित दिवाली मनवाएंगे। और सच कहूं तो मुझे दिवाली , कम से कम यहां की दिवाली के लिये सबसे ठीक यही ड्यूटी लगती है।घर के खाने की कौन कहे..वो तो दो दिन पहले से ही बंद हो जाता है..सिर्फ़ बजारों में घूमिये और ठूंसे जाईये जो मन करे न करे।

मगर इस बार मैंने तय कर लिया था कि सब कुछ अपने मन मुताबिक करूंगा, घर बाहर की सफ़ाई, खुद के हाथों से बनाये गये से सजावट,,अपने हाथो से रंगोली,,,और भी बहुत कुछ ..तैयारी में लगा हूं....आप भी लगे ही होंगे...बस उत्सुकता ये जानने की हो रही है कि कौन सी वाली मना रहे हैं.....आखिर एक दिवाली को दोनों समाज कितने अलग अलग रूप में मनाते हैं न...
आप सबको दिवाली की बहुत बहुत शुभकामनायें।

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2009

महिलाओं में परकाया प्रवेश : कुछ दिलचस्प तथ्य/अनुभव


संचिका वाली सुश्री लवली कुमारी ने अपनी इस पोस्ट के माध्यम से बहुत ही मह्त्वपूर्ण मुद्दा उठाया। उन्होंने अपने शोध /अध्य्यन और अनुभव के आधार पर महिलाओं में परकाया प्रवेश ..या कहें कि भूत प्रेत का आना ..पर एक सारगर्भित पोस्ट प्रस्तुत की । मैं खुद इस विषय पर काफ़ी पहले से कुछ लिखना चाहता था ।हालांकि इसका कारण मेरे पास कुछ निजी था । दरअसल आज से लगभग बीस साल पहले जब मेरे दीदी का स्वर्गवास हुआ तो उसके कुछ महीनों बाद मेरी एक चचेरी बहन की ससुराल से ये संदेश आया कि दीदी की तथाकथित आत्मा मेरी उस बहन के अंदर आ जाती है और उसे तथा उसके परिवार को तंग करती है।मुझे बहुत क्रोध आया क्योंकि मैं जानता था कि मेरी उस चचेरी बहन से हमारी मुलाकात भी शायद कभी एक आध बार ही हुई हो। इसके बाद अभी कुछ समय पहले स्वर्गवासी हुई मेरी माता जी भी उसी चचेरी बहन के सपने में आ गयी और उसके अनुसार उन्होंने उसे मारा पीटा। इस बार मेरी सहन शक्ति जवाब दे रही थी...सो मैंने कहलवा भेजा कि ..दरअसल वो ये कहना चाह रही थीं कि इतने नाटक कर रही हो किसी न किसी दिन तुम्हें सच में ही आकर इस बात के लिये कोई पीटेगा। वो और नाराज़ हो गयी और अब उन्हें सपने आने बंद हो गये।हमारे परिवार में इस भूत प्रेत के आने की बात हमारी दादी से शुरू हुई थी..जिन्हें हमने अपने बचपन से अभी कुछ दिनों पहले तक, जब तक कि उन्होंने बिस्तर न पकड लिया , किसी न किसी प्रेतात्मा, देवी के साथ ही देखा। इसका एक असर तो ये हुआ कि परिवार की कम से कम चार महिलायें/बेटियां/बहुएं .उन्हीं की प्रेरणा पाकर आगे जाकर काफ़ी प्रसिद्ध हुईं...मतलब खूब चर्चा हुई उनकी...और लानत मलामत भी।

अब जबकि लवली जी ने बहस की शुरूआत कर दी है तो लगा कि उचित होगा कि इस बहस को आगे बढाया जाये। इस व्यवहार/रोग/प्रचलन ....जो भी कहिये ..के वैज्ञानिक कारण और पहलू से मैं इतना वाकिफ़ नहीं हूं । किंतु अपने तथ्यों के संकलन और अनुभव के आधार पर मैंने कुछ दिलचस्प परिणाम ढूंढे हैं जिन्हें आपके सामने रख रहा हूं ।

उत्तर भारत की अपेक्षा दक्षिण भारत में ये उतना देखने में नहीं आता ।
जी हां अब इसके कारण क्या हैं ये तो पता नहीं, किंतु ये सच है कि उत्तर भारत के बिहार , उत्तर प्रदेश , उडीसा, बंगाल आदि राज्यों में ही ये सबसे ज्यादा प्रचलित है। दक्षिण भारत में किसी एक राज्य, या किसी अमुक क्षेत्र में इस तरह के भूत प्रेतों का चलन महिलाओं में नहीं देखने को मिलता है। ऐसा नहीं है कि वे पराशक्तियों के अस्तित्व को नकारते हैं। मगर भूत प्रेत, देवी देवता, आदि मनुष्यों पर आते नहीं देखे जाते।

पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में इसका प्रतिशत लगभग नब्बे गुना ज्यादा है ।भूत प्रेत, चुडैल, देवी माता...आदि का जब भी जिक्र आता है तो अधिकांश घटनाओं में इससे ग्रस्त महिलाएं ही होती हैं...जबकि इनका इलाज करने वाले तथाकथित तांत्रिक/ओझा/गुनी/ ...अक्सर पुरुष होते हैं..जो खुद भी इनका इलाज करने के लिये ऐसी ही परकाया प्रवेश की शक्तियों के अपने अंदर होने का दावा करते हैं। इसका एक दुखद पहलू ये है कि अक्सर ये गुनी /ओझा/ ..इन सबका इलाज करने के बहाने ....इन पीडित महिलाओं का शोषण ..दैहिक/आर्थिक/सामाजिक रूप से करते हैं।मैंने अपने ग्राम्य जीवन के दौरान ओझाओं को इन महिलाओं के शरीर से इन भूतों का साया निकालने के लिये वो सब करते देखा है ....कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

इसके अलावा एक दिलचस्प जानकारी ये मिली कि...ग्रामीण क्षेत्रों में ही ये भूत प्रेत, चुडैल आदि विचरते हैं। शायद वे ये सोच कर शहर नहीं आते होंगे कि शहर का इंसान तो अपने आप में ही किसी भूत से कम नहीं। यहां स्त्रियों में जो भी इस तरह की घटना घटती भी है तो वो देवी के आने के रूप में ही ज्यादा प्रचलित है। इसी तरह कामकाजी महिलाओं में इन परकाया भूतों का संचारण नहीं हो पाता है। शायद ही किसी महिला ...सैनिक/अधिकारी /कर्मचारी /डाक्टर आदि पर भूत आते देखा गया हो।

जहां तक इनके कारणों की बात है तो इसके प्रचलन का क्षेत्र/ पीडित महिलाओं का सामाजिक/शैक्षिक/मानसिक स्तर को देखते हुए कुछ बातें तो निष्कर्ष स्वरूप निकल ही आती हैं। ये मूलत: अशिक्षा/अज्ञान/और अंधविश्वास के मिलन का ही परिणाम होता है। सामाजिक परिवेश , धार्मिक कर्मकांड ,जागरूकता का अभाव तथा सरकार द्वारा ऐसी समस्याओं की उपेक्षा.....ही वो कारक हैं जिसके कारण आज जबकि देश वैज्ञानिक रूप से इतना विकसित हो चुका है ...फ़िर भी ये सब बदस्तूर जारी है। और निकट भविष्य में भी जारी रहेगा...ऐसा मुझे लगता है।


सोमवार, 5 अक्तूबर 2009

अब राजधानी में भी हो सकेगी ठंड में दिवाली....


पिछले कुछ दिनों से देख कर तो यही लग रह था कि ...इस बार तो ये मुई गरमी सारे रिकार्ड तोड कर रख देगी....अब रिकार्डों का भी क्या कहें....चाहे क्रिकेट के हों.... या मौसम के ..बस बनते हैं और टूटते हैं....।
और मौसम के रिकार्ड का क्या कहें...हमारे मित्र लपटन जी कहते हैं.. ...ये ससुरे ..मौसम के रिकार्ड भी शीशे की तरह ...अजी तरह क्या उनसे भी नाजुक होते हैं...पता ही नहीं चलता ..कब टूट जाते हैं...और जब देखो...पिछले बीस बरस..पच्चीस बरस...इतने लंबे समय के ही टूटते हैं...।

लपटन जी ऐसे ही मौसम में कहने लगे झाजी ....अबके तो होली मनेगी होली.........

आयं..अमा लपटन जी आप भी कौनो बात ....कुछ भी बोल जाते हो...शुक्र मनाओ कि ..ब्लागर नहीं हो...नहीं तो...आपको का पता..इहां बिटवीन दि लाईंस ....को समझ कर भी लोग बाग पोस्ट लिख मारते हैं.....अब ई हम उनको नहीं बताये कि ..लोग पोस्ट मारते हैं कि ....लिख कर मारते हैं......ई समय में होली....अब तो दिवाली आने वाला है जी....रावण को फ़ूंकने के बाद ..जौन पटाखा बचा था...ऊ सब ठो बिटवा को दे भी दिये हैं फ़ोडने के लिये.....और आप कह रहे हैं कि होली मनायेंगे.....
(दिल्ली में छाये बादल)

अरे यार झा जी....ई गर्मी को देख कर तो यही जी कर रहा है कि ..दिवाली से बढिया तो यही है कि होली मनाई जाये....कम से कम पानी से राहत तो मिलेगी न.......

बात तो लपटन जी ठीक ही कह रहे हो आप......?

बस सुबह के इस संवाद को जैसे इंद्र देवता ने सीरियसली ले लिया.....

नतीजा आपके सामने...पहले कुछ इस तरह के बदरा छाये ........

फ़िर बरखा भी छमछम आयी.......


हमने भी फ़ौरन लपटन जी को मैसेज किया....विश यू ए दिवाली.....इन स्वीट ठंड...लपटन.....














शनिवार, 3 अक्तूबर 2009

मेरे बाद भी मेरी आंखें.... देखेंगी ये जमाना ...


कभी कभी जीवन में कुछ अनसोचा सा हो जाता है..,..कई बार ये दुखदायी होता है तो कई बार ...ऐसा होता है कि ....लगता है कि...अरे मैंने तो यही सोचा था ...मगर ये पता नहीं था......कि ये सब यूं हो जायेगा.....मगर हो जाने पर एक सुकून सा मिलता है मन को ....यहां दिल्ली में दुर्गा पूजा बहुत धूमधाम से नहीं होती ...मेरा मतलब उतने धूमधाम से नहीं जितने कि हमारे बिहार या उसके पडोसी राज्य बंगाल में होती है...अलबत्ता ये जरूर है कि ...यहां रामलीला खूब होती है...न सिर्फ़ होती है...बल्कि जमती और जंचती भी है।

<<(देखो रे संस्था का बैनर)

इससे पहले हम जहां रहा करते थे ..उसके आसपास रामलीला नहीं होती थी सो कभी बच्चों का मन भी हुआ तो कहीं किसी एक या दो दिन का कार्यक्रम बना कर जाना पडता था उन्हें रामलीला दिखाने ...मगर अब जहां हमारा निवास स्थान है ...वहां से निकट ही रामलीला भी होती है ....और रावण जी को भी बाकायदा पूरे इत्मिनान से फ़ूंका जाता है...सो अब कोई बहाना नहीं चलता ..अब तो राम जी के पैदा होने से लेकर ...उनके पुत्रों के पैदा होने तक की सारी लीला हमें देखनी और दिखानी पडती है.....इसी बहाने अपना बचपन भी जी लेते हैं ।


मगर उस दिन जब रामलीला देखने पहुंचे तो एक सुखद अनुभव से मुलाकात हो गयी। वहां एक स्वयंसेवी संस्था ...देखो रे ...ने अपना मंच लगाया हुआ था ...और वे सबको घूम घूम कर बता रहे थे ......कि नेत्र दान से बडा कोई दान नहीं होता....ये संयोग की बात है कि कुछ दिनों पहले ही हम और हमारी श्रीमती जी आपस में बातचीत करते हुए इसी बात पर चर्चा कर रहे थे...और श्रीमती जी ने अपनी इच्छा भी हमारी तरह ही नेत्र दान करने की जाहिर की....हमें तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गयी ...तो बस देर किस बात की थी ....हमने झटपट उनके.
(देखो रे ..के स्वयंसेवक ) कार्यकर्ताओं से आवेदन का फ़ार्म भर दिया .....और कर दिया अपने नेत्र दान का वादा .

सच कहता हूं ..उस दिन जो सुकून मिला ..वो अब सारी जिंदगी मेरे साथ रहेगा....और अपनी आखों का क्या कहूं ....ये तो मुझ से भी बडी हो गयीं...मेरे जाने के बाद भी ....किसी के जीवन में ..न सिर्फ़ रोशनी बिखेरेंगी बल्कि ....मेरी आखें...मेरे बाद भी जमाना देखेंगी......मुझे तो लगता है कि शायद ये सिर्फ़ जागरूगकता की ही कमी है ...अन्यथा लोग बहुत से हैं ऐसे जो नेत्र दान करने को इच्छुक रहते हैं......

अजी इसके बाद तो रामलीला ....और व्हां के मेले का आनंद हमें भी खूब आया...मेरे आग्रह और सुझाव पर कुल ११ लोग ऐसे और निकले मेरी जान पहचान के ...जिन्होंने नेत्र दान किया.....बस जी इसके बाद तो झूलों और लीला के बीच दशहरा कैसे बीता .....क्या कहें...

(चकाचौंध झूले...जिनपे हम भी खूब झूले...

सोमवार, 14 सितंबर 2009

मां की न कर सके तो, बेटी की सेवा करें...(हिंदी दिवस पर )


कैसे समय बीतते बीतते ठीक उसी जगह पर पहुंच जाता है....जहां से चलना शुरू करता है.....ऐसा लगता है जैसे अभी तो हिंदी दिवस बीता था....और अब बिना कुछ बदले...कुछ नया हुए....कुछ अलग हुए....फ़िर आ गया....ऐसा थोडी होता है....कम से कम ...त्रेता से द्वापर तक का समय तो मिलना ही चाहिये....तभी तो कुछ कर पायेंगे हिंदी के लिये....आखिर ..पूरे सवा या उससे भी ज्यादा लोगों को समझाना है कि हिंदी ही ......हमारी राष्ट्र भाषा है ...हमारी अपनी भाषा है....कम से कम वो एक इकलौती भाषा ....जिसके दम पर अपने इतने बडे देश में ..हम निश्चिंत होकर घूम सकते हैं....कि चलो कम से कम बतिया तो लेंगे ही सबसे ....न सही ..अपनी बात तो कह ही लेंगे......और यदि आज हिंदी दिवस के बहाने इसे दोबारा याद कर लिया जाये....कुछ देर आपस में बैठ कर हिंदी में बोल बतिया लेने से इसका रत्ती भर भी भला हो पाता है ...तो यही सही.....

हालांकि मुझे हमेशा ही इस बात से सख्त ऐतराज़ रहा है कि ....बहुत से लोग कहते हैं कि हिंदी कमज़ोर होती जा रही है.....इसकी सेहत की चिंता जाने कैसे कैसे ....कितनी जगह पर की जाने लगती है....और इस हफ़्ते...महीने में तो खास तौर पर इसे ..पल्स पोलियो ड्रोप्स पिलाने की तैयारी की जाती है....मैं तब सोचने लगता हूं.....ये अपनी हिंदी कमज़ोर कैसे हो गयी....बचपन से आज तक तो इसे वैसे ही ...सेहत मंद देखा है....घर से लेकर बाहर तक...दोस्त से लेकर दुश्मन तक.....गाने से लेकर ...रोने तक...और छोडने से लेकर ..लपेटने तक...सिर्फ़ हिंदी ही हिंदी दिखी मुझे तो ...दिखी क्या अब भी वही दिखती है.....मेरा दूध वाला.....मेरा सब्जी वाला.....मेरा मिस्त्री....मेरा ..अरे किस किस का नाम लूं सब के सब ....हिंदी मे ही बात करते हैं....अपनी उधारी भी हिंदी में ही वसूलने आते हैं....और खुदा ना खास्ता ...जब किसी बहाने पर उन्हें यकीन नहीं होता....तो ससुरे ...कोसते...गलियाते भी हिंदी में ही हैं.....कितनी बार कहा है..कि यार कम से कम गाली तो ........मगर न जी....पूछा भी कि अबे.....ये हिंदी दिवस लगता तुम लोगों के लिये ही मनाया जाता है....वे कहने लगे...कौन सा दिवस...कौन सी रात्रि....हम लोग तो यही बोलते समझते हैं....हमने मन ही मन कहा बेवकूफ़ कहीं के....कहां तो सरकार इनके लिये इत्ते पैसे खर्च कर रही है....और इन्हें पता तक नहीं.......क्या कहा इनके लिये थोडी कर रही है......तो फ़िर.....?

ओह तो उनके लिये.....जो टीवी....रेडियो....और अपने...इंटर्व्यू में...इंग्रेजी छांटते हैं...धत तेरे की....अपनी जनसंख्या में...वे लोग हैं ही कितने जी...मुट्ठी भर भी नहीं....उनके लिये इत्ता सारा ....और हमने तो सुना है कि ई सब बडका लोग भी ....अपने घर में...अपने धोबी, माली, नौकर, चाकर, ...सबसे हिंदी में ही...मतलब आ जाते हैं अपनी औकात पर ..........धत तेरे कि....यही सच है जी...

चलते चलते ...एक बात .....कल परसों जब मेरे कार्यालय में ...हिंदी कार्यशाला का आयोजन किया गया....तो जो हमारी कार्यशाला को संचालित करने आये थे....उन्होंने एक बात कही जो मेरे मन को बहुत ही गहरे तक प्रभावित कर गयी.....उनका कहना था.....संसक्रत (यदि किसी को बराहा में व्रित...प्रव्रति आदि लिखना पता हो तो बतायें...अब तो आप समझ ही गये होंगे..संस्क्रत ऐसे क्यों लिखा )....जो सभी भाषाओं की जननी यानि मां है...उसकी सेवा तो हम नहीं कर पा रहे हैं.....मगर कम से कम बेटी ...हिंदी की सेवा का जो मौका मिला है ..उसे तो कर ही सकते हैं...चाहे जिस रूप में भी हो....चाहे जिस तरह से भी हो......आने वाले बच्चों को हमें ये एह्सास कराना ही होगा कि ...हिंदी हमारी....हमारे परिवार की...देश की..समाज की ताकत है....उनकी अपनी ताकत है...
मेरी कोशिश जारी है.........................................और आपकी................................

रविवार, 6 सितंबर 2009

पहले कमाओ.....फ़िर नौकरी पाओ...



..है न कमाल..या शायद थोडा कन्फ़्यूजिंग.....नहीं जी बिल्कुल भी नहीं...जब आप भी पूरी बात सुनेंगे ..तो कहेंगे .कि ये तो सच ही है....दरअसल बात ये है कि अभी हाल ही में...केन्द्रीय विद्यालय संगठन में कई पदों की भर्ती का इश्तहार विग्यापित किया गया है...खुशी की बात है न.....आज जब सरकारी नौकरियों में काफ़ी कटौती की जा रही है तो ऐसे में..यदि इस तरह की चुनौतियां बच्चों को मिल रही हैं..ये उनके लिये निसंदेह अच्छी बात है.....यहां तक तो सब ठीक है .....मगर इसके आगे ....

इस पद को पाने के लिये जो प्रतियोगिता आयोजित की जायेगी...उसके लिये आवेदन मंगाये गये हैं...और उस आवेदन के साथ परीक्षार्थी को मात्र ....एक हज़ार रुपये की राशि जमा करनी है...अब ये आपकी श्रद्धा है....आप उसे ड्राफ़्ट के माध्यम से जमा करवाते हैं..या पोस्टल और्डर के माध्यम से...राशि सिर्फ़ ....मात्र एक हज़ार रुपये ही रहेगी....देखा सरकार कित्ते कम पैसे में ..बेरोजगार बच्चों को इतना सुनहरा अवसर दे रही है...मेरे ख्याल से सरकार शायद ये सोच रही है कि ..बच्चे पहले कमाना सीख लें..थोडे पैसे वैसे बचाना सीख लें.....फ़िर नौकरी भी दे दी जायेगी उनको....क्या कहा ...क्या पूछ रहे हैं आप ....नौकरी से पहले कमाना कैसे सीख सकेंगे बच्चे...लिजीये ..इससे सरकार को क्या लेना देना....भई वो सरकार है ...कुछ भी सोच सकती है....

मैंने भी अपने अनुज को इस प्रतियोगिता में आवेदन के लिये कहा था....मगर इत्ती सी फ़ीस सी फ़ीस को देख कर ....और उसकी अपार काबिलियत को देख कर थोडा सा ठिठक गया.....फ़िर सोचा इसी बहाने ...उनसे पूछूं तो सही कि ...ये इतनी सब्सीडी काहे दे रहे हो भाई.....बेरोजागारों को ....

हेल्लो...जी देखिये आपने जो ये फ़ौर्म निकाला है न....यार इसकी फ़ीस तो बहुत ज्यादा है...बंदा सिर्फ़ इसमें भाग लेने के लिये इतनी राशि खर्च कैसे करेगा...वो भी बेरोजगार व्यक्ति....

अबे जाओ ..ये कौन सी ज्यादा राशि है भई....कौन सी दुनिया में हो ..इत्ते में तो दस किलो दाल भी नहीं आयेगी......

आयं...नौकरी से दाल का क्या कनेक्शन भाई........

लो अब ये भी मैं बताऊं.... दाल से आज किस चीज़ का कनेक्शन नहीं है....और तो और ..सुना है सोना जो महंगा हुआ है ..उसमें भी कहीं न कहीं दाल का ही हाथ है....और सुनो ..विश्व में भारतीय अर्थव्यवस्था का अपना जो एक अलग और मजबूत स्थान बन रहा है ....सब दाल की बदौलत ....वे कह रहे हैं....जो देश दाल इतनी मंहगी खा सकता है ...वो जरूर ही ......

अरे भाई रूको रूको...यार मैं आवेदन की फ़ीस की बात कर रहा हूं आप दाल की गाये जा रहे हो....यार जब हमने फ़ौर्म भरा था ऐसे पदों के लिये तब तो मात्र बीस पच्चीस रुपये हुआ करते थे.....अब भाई को भरवाना है...

तो अब तो आप रिटायर हो चुके होंगे ....या होने वाले होंगे......?

अरे नहीं भई...सिर्फ़ दस साल पहले की बात है यार....आप तो कमाल करते हैं.....

तो तब क्यों नहीं भरवा दिया अपने भाई को फ़ौर्म अब इतनी मंहगाई में ये तजुर्बा क्यों कर रहे हो......

यार तब उसकी उम्र नहीं हुई थी.....अब हुई है...

अरे तो इतनी मंहगाई में जवान होगा तो ...भुगतना तो पडेगा ही न........

उसने फ़ोन काट दिया.....मैं भी लटका हुआ हूं....सोच रहा हूं इससे अच्छा तो एक दाल की दुकान ही खुलवा दूं...वैसे जिन जिन के पास मात्र हज़ार रुपये हों वे यह सुनहरा अवसर न छोडें.....


रविवार, 23 अगस्त 2009

एक इंटरव्यू ...पोलीग्राफी मशीन का (वही सच का सामना वाली )

आजकाल हर तरफ इंटरव्यू का दौर चल रहा है...या तो इंटरव्यू लिया जा रहा है ..या दिया जा रहा है....हम दोनों में से किसी भी कैटेगरी में नहीं आते ..ताऊ से भी कहा की ..लगे हाथ हमारा भी कुछ छोटा मोटा इंटरव्यू ले ही डालो ..फायर फॉक्स राउंड...वही दे धनाधन प्रश्नों वाली ..ही सही....मगर ताऊ तो ताऊ ठहरे...सूरमा भोपाली बना दिया ..शोले में ..खैर छोडिये..तो जब ये तय हुआ कि...यही अपने पराये इंटरव्यू नहीं लेने को तैयार हैं ..तो सोचा चलो खुद ही ये काम करें ...हम भी निकल पड़े.....

आजकल टी आर पी का ज़माना है ...सो सोचा कि मेहमान भी तो ऐसा होना चाहिए कि जिसके इंटरव्यू को देख पढ़ कर उसका हो न हो ....अपना कल्याण तो हो ही जाए...तो ऐसे में सच का सामना से बेहतर और कौन हो सकता था...मेजबान उस शो के तो तैयार नहीं हुए....कहने लगे ..अबे जा .अब जाके इस शो के बहाने तो मेरी खुद की टी आर पी बढ़ी है ...अब इंटरव्यू आप जैसे को दे दिया तो ..जो टी आर पी बढ़ी है ..वो टी आर पी से....सीधा बी जे पी .हो जायेगी.....बी जे पी......अरे पार्टी नहीं यार...बी जे पी मतलब ...भाड़ में जाओ पुत्तर ..ओह अच्छा ...तो और कौन मिलता ..वहाँ आने वाले मेहमान से बात की ....वे बौखलाए थे ..अबे भाग यहाँ से ..इस शो में आकर सिर्फ टी आर पी ही मिली है ...कमबख्त पैसे तो आज तक इन्होने किसी को दिए नहीं ....टी आर पी भी ..ऐसी ..थूकम और फजीहत ...

अचानक ही मेरा कोने वाला ब्रिलिएंट दिमाग भक्क से जल उठा ....अरे असली बंधू तो अब मिले हैं ...इंटरव्यू के लिए इनसे बढिया तो और कोई हो ही नहीं सकते थे ...मैं फटाक से पहुँच गया ....

और भैया ..एन आर आई..पोलीग्राफी मशीन ...कैसी हो ....कैसा लग रहा है ..पूरे देश की बखिया उधेड़ रही हो ...और मजे आ रहे हैं न......

मशीन की तो जैसे बाँछें खिल रही थी ...मुझे तो सिर्फ इस बात से पता चला कि उसमें से निकल रही बहुत सी तारें एक दम से ... टैन टैणेन .......करने लगी ...

मशीन हुलस कर बोली....क्या बताउं.....इससे पहले जितनी बार भी मुझे यहां बुलाया ..लाया जाता रहा है ...कम्बखत...चोरों...
डाकुओं....नेताओं.......और पता नहीं कैसे कैसे झूठों का ...कितना गंदा ....कैसा धंधा...और क्या क्या उगलवाया जाता था...और मुझे कह्ते थे...सुनो झेलो...बताओ...इतने पर भी मुझे कोई मलाल नहीं होता ...यदि ..वे मेरे ..सहारे किसी को सजा दिलवा पाते...अरे तो क्या खाली ..कहानी सुनाने के लिये बुलाया है मुझे...कह्ते तू बस सच झूठ का बता ...इसका यूज कैसे करना है ....वो हम देख लेंगे .....सत्यानाश हो तुम्हारा ....मन दुख जाता था.....मगर करती क्या.....

अब जाकर कुछ तसल्ली हुई है...बल्कि कहुं तो लगता है कि हां...इसी दिन के लिये तो मेरा जन्म हुआ था ...जब आयोजकों ने मुझसे सम्पर्क किया ..तो मुझे भी लगा ....ये क्या बात हुई..अपने जीवन से जुडी हुई कुछ सच्चाईयों को स्वीकार करो ..और ढेर सारे पैसे ले जाओ ...कोइ क्यों झूठ बोलेगा......किसे नहीं पैसे चाहिये.....मगर फ़िर पता चला ....अरे आप क्यों इत्ता सोच रही हो ...आप देखना हम प्रश्न ही ऐसे करेंगे ....कि यदि सच बोले तो भी गये..और झूठ बोले तो भी ....और प्रश्न भी ऐसे कि ....बस एक उत्तर देने वाले..और उसके रिश्तेदारों को छोड्कर ...बांकी सब को गुदगुदी होने लगे.....

अरे इतना ही नहीं ....उन्होंने मुझे एक सूची सौंपी ..और कहा कि ..किसान...मजदूर....गरीब...जैसों को कभी भी ...इस शो पर नहीं बुलाया जायेगा...तुम बस मजे लो....तब जाकर मुझे तसल्ली हुई...अब तो ऐसा लग रहा है कि ...इस देश में कोई ऐसा बचा ही नहीं...जिसका कोइ गलत सम्बन्ध नहीं...जाओ जाओ इससे ज्यादा इन्टरव्यु दिया तो ...गड्बड हो सकती है ...

शनिवार, 15 अगस्त 2009

नहीं मुझे कोई शिकायत नहीं , न देश से न उसकी आजादी से ..




















साल में दो बार जब भी देश के स्वतंत्र और गणतंत्र दिवस को मनाये जाने का अवसर आता है उस समय हमेशा ही ये प्रश्न उठता और उठाया जाता है की ...क्या यही है आजादी...क्या इसी के लिए हमारे पुरखों ने संघर्ष किया था ..क्या यही वो सपना था जो उन्होंने देखा था....और यकीनन फटाक से उसका जवाब मिलता है ...बिलकुल नहीं जी...ऐसा तो कतई नहीं सोचा था ....ये सब तो अब हो रहा है ...और कई बार तो ये तक कहा जाता है की .......यार इससे भले तो अंग्रेजों के जमाने में थे ...तो क्या सिर्फ इतने ही वर्षों में स्वतन्त्रता हमें भारी लगने लगी है ...इतनी की अब तो उसे मनाने का मन भी नहीं करता ...आज बहुत से लोगों के लिए ये सिर्फ एक छुट्टी बन कर रह गयी है ....यानि शिकायत ही शिकायत ..एक छटपटाहट ..एक व्याकुलता ...मगर किसलिए ...

क्या सचमुच देश को आजादी मिलने से ..हमें स्वतंत्र होने से ...कोई अंतर नहीं आया ...कम से कम मुझे तो ऐसा नहीं लगता ...हाँ ये हो सकता है की ऐसा मुझे अपने जीवन से मिले निजी अनुभवों के कारण लगता हो ....मगर अपने स्थान पर खड़े हर व्यक्ति से मैं कम से कम यही अपेक्षा तो कर ही सकता हूँ की ..हमें कोई शिकायत नहीं है ..इस देश के आजाद होने ..और आजादी बनी रहने से ..इस बात का भी अफ़सोस नहीं है की ..हम इस देश के नागरिक हैं ...और कहूँ तो गर्व है ..किन किन बातों पर ..वो एक अलहदा मुद्दा है ...जिसमें बहस की बहुत गुंजाईश है ...दोष और गुण ...दो सर्वथा अनिवार्य तत्त्व हैं ...जो सब जगह मिल ही जाते हैं ....बस फर्क आपके देखने का होता है ...मुझे बहुत अच्छी तरह स्मरण है की पिताजी बताते थे कि किस तरह वे और उनके पिताजी जी तोड़ मेहनत के बावजूद दो वक्त का खाना नहीं खा पाते थे क्यूंकि ..सारा अनाज लगान में ही चला जाता था ....समय बदला ...पहले उन्होंने फौज में देश की सेवा की....अपने बाल बच्चों को यथासंभव और यथाशक्ति ...उस समय उपलब्ध संसाधनों और शिक्षा सुविधाओं के अनुरूप ..पढाया लिखा कर एक जिम्मेदार नागरिक और एक अच्छा इंसान बनाया ..चाहते तो वे भी अपने मित्रों की तरह बहुत से व्यसन करते ..हो सकता था कि औरों की तरह वे भी अपने परिवार को ग्रामीण परिवेश में छोड़ कर ...बाद में नौकरी न मिलने के लिए देश को, सरकार को, उसके तंत्र को कोसते ..मगर ऐसा हुआ नहीं....आज मैं राजधानी में एक सरकारी नौकरी में हूँ ..अपनी संतानों के लिए ..उनके भविष्य के लिए ..उन्हें जो भी दे सकता हूँ दे रहा हूँ ...और मुझे कभी भी नहीं लगा कि ..सरकार , ये देश, मेरे लिए कोई ऐसी बाधा खड़ी कर रहे हैं ...

जानते हैं हमारी समस्या क्या है ...हम आसानी से ही ...बिना किसी सोच विचार के ..एक दम से निर्णय पर पहुंच जाते हैं कि ......सब दोष सिर्फ सरकार का इस देश की परिस्थितियों का ही है ....आखिर ये देश है कौन ..क्या मिटटी ,पानी, पहाड़, जंगल ,,गाँव , शहर ,,यही देश हैं...नहीं देश तो हम और आप हैं ...और हम आप क्या ....यदि आप खुद ठीक हैं ..तो देश ठीक है .....तो कीजिये न खुद का आकलन ..झांकिए न अपने अन्दर ..पूछिए न अपनी अंतरात्मा से प्रश्न ....और मुझे लगता है कि आपको जो जवाब मिलेगा वो ही बतायेगी कि ...देश का ...उसकी आजादी का महत्व क्या और कितना है ....वैसे भी पकिस्तान, बंगलादेश, चीन जैसे ....मासूम मित्र देशों की फितरत ,नीयत , और उद्देश्यों को कौन नहीं जान रहा है ...तो ऐसे में यदि हम खुद ही अपने देश के दुश्मन,,उसके विरोधी बने रहने का दिखावा करते हैं, (दिखावा इसलिए कह रहा हूँ क्यूंकि मैं जानता अहूँ कि भले हम थोड़ी देर के लिए भडास निकाल लें ,,खूब भला बुरा कह लें ...मगर हर हाल में दिल से भारतीय ही रहते हैं ..और रहेंगे ..न जाने कितने युगों तक ) तो ये ठीक नहीं होगा.....इसलिए ...दोस्तों इस आजादी को ..इस देश को ..और इस देश के आप जैसे सभी प्यारे देशवासियों के हर जज्बे को सलाम ......

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

कृष्ण तो याद रहे , गीता को भूल गए


जन्माष्टमी का पर्व हर वर्ष की तरह इस बार भी खूब जोर शोर से मनाया जा रहा है ...मंदिर सजे हुए हैं...आरती, पूजा, कीर्तन की तैयारी भी चल रही है...और मैंने महसूस किया है की ऐसा मैं अपने बचपन से ही देख रहा हूँ ....और अब हमारे बच्चे देख रहे हैं ....
चलिए इसी बहाने से ..उनमें वो पारंपरिक संस्कार तो जा ही रहे हैं...जिनकी आज न जाने मुझे क्यूँ बहुत जरूरत महसूस होती है...
बेशक हमारी तरह उन्हें ...ओम जय जैग्दीश हरे कंठस्थ न हो ...ये भी की उन्हें हमारे समय की तरह पारिवारिक आरती में कोई विशेष दिलचस्पी न हो ...इसके बावजूद इतना तो है की ...वे कल को ..ये न कहें...अपने दोस्तों के बीच...यार आज कुछ है न .....वो कहते हैं ......हैपी जन्माष्टमी ...

इससे इतर मैं सोचता हूँ की आज हमें कृष्ण याद हैं....कृष्ण की लीलाएं याद हैं...राधा, मीरा, ....सब याद हैं...उनके भजन कीर्तन से हम ....मंदिर में समां बाँध देते हैं....मंदिर में आज ...खूब देर तक पूजा ..अर्चना चलती रहेगी ....और फिर वो धनिये वाल विशेष प्रसाद ....क्या कहने ..उसकी खुशबू ...और उसका स्वाद .....मगर जो चीज़ नहीं याद है ...और न जाने कबका उसे भूल चुके हैं ..वो है कृष्ण का गीता उपदेश....गीता में कृष्ण द्वारा समझाया गया जीवन दर्शन ....चिंतामुक्त होकर ...सिर्फ कर्म करने का चरित्र निर्माण....और भी सब कुछ....आज तो वो दर्शन ... साधू संतों के प्रवचन में भी नहीं दिखाई देता ...वहाँ भी न जाने कौन सा दर्शन बघारा जाता है....कर्म के लिए तो कोई प्रेरित ही नहीं कर रहा है ...

काश कि ..इस जन्माष्टमी के शुभ मौके पर कृष्ण के साथ साथ सब ..गीता सार को भी याद कर लेते...

आप सबको जन्माष्टमी के शुभ अवसर की शुभकामनायें

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

आवाजें ....क्यूँ बेआवाज हो जाती हैं ..?







सुना है कि,
दिल्ली देश का दिल है ,
यानि पूरे देश
रूपी शरीर के ,
बिलकुल मध्य में स्थित ,

ये भी सुना है है कि,
उस दिल्ली के
बीचों बीच एक ,
बहुत बड़ा केंद्र
बना हुआ है,

सभी तकनीकों ,
और ,तरकीबों से लैस,
वहाँ कुछ लोग
बैठे हैं ,इसलिए ताकि
उस गोल इमारत में
सभी दिशाओं से ,
आवाजें पहुँच सकें ,

आवाजें पहुँचती भी ,
होंगी शायद ,
या कभी पहुंचाई जाती होंगी,
मगर हमेशा वो ,
डूब जाती हैं ,
उस गोल इमारत के ,
अन्दर घूम घूम कर ,
भंवर में फंस कर ..

मैं आज तक ,
नहीं जान पाया ,
जाने वे आवाजें ,
वहाँ तक पहुँच कर ,
बेअवाज क्यूँ हो जाती हैं .....?

रविवार, 26 जुलाई 2009

जाने क्यूँ , हर बार वो, इक नया पता देते हैं......





बस्तियां खाली करवाने को,वो,
अक्सर उनमें आग लगा देते हैं.....

उतनी तो दुश्मनी नहीं कि ,कत्ल कर दें मेरा ,
इसलिए वो रोज़ , जहर, बस जरा जरा देते हैं ......

मैंने कब कहा कि, गुनाह को उकसाया उसने ,
वे तो बस मेरे पापों को, थोडी सी हवा देते हैं....

वो जब करते हैं गुजारिश , घर अपने आने की,
जाने क्यूँ, हर बार, इक नया ही पता देते हैं......

मैं ठान लेता हूँ कई बार, अबके नहीं मानूंगा,
नयी अदा से वो, हर बार लुभा लेते हैं.......

जख्मों से अब दर्द नहीं होता, कोई टीस भी नहीं,
पर जाने क्यूँ जख्मों के निशाँ, रुला देते हैं......

जब भी जाता हूँ गाँव अपने, ऐसी होती है खातिर मेरी,
अपने ही घर में , मुझे, मेहमान बना देते हैं......

सिलसिला टूटता नहीं उनपर मेरे विश्वास का,
पुरानी को छोड़ , रोज़ इक नयी कहानी सुना देते हैं....

शनिवार, 4 जुलाई 2009

तो क्या टिप्न्नियाँ भी बंद कर दूं...?




जब ब्लॉग्गिंग शुरू की थी ..तभी से एक प्रबल इच्छा मन में उठती थी ....खूब सारे ब्लोग्स को पढने की..और खूब जम कर टिपियाने की..मगर कैफे के निर्धारित एक घंटे के समय में अक्सर एक पोस्ट नहीं लिखी जा पाती थी ..तो पढता क्या और टिपियाता क्या..इसके बाद ..आईडिया निकला ..एक दिन लिखने का ..और दूसरे दिन सिर्फ पढने और टीपने का...मगर फिर भी मन को तसल्ली नहीं होती थी..मन में हमेशा एक आस होती थी की चलो किसी न किसी दिन तो अपना भी कंप्यूटर होगा ..और तब हम भी नजर आयेंगे तिप्प्न्निकारों की सूची में...दरअसल किसी भी नए ब्लॉगर की तरह मैं भी उड़नतश्तरी जी से बेहद प्रभावित हुआ...

तिप्पन्नीकारी में दूसरी आदत जो आयी वो थी किसी भी पोस्ट को यदि पढ़ लिया तो बिना टिपियाते वहाँ से नहीं निकलना..वर्ड वेरिफिकेशन हो..या टिप्प्न्नी बक्सा देर से खुलता है..मगर नियम बन गया की जब घर में घुसे हैं तो खातिरदारी करवाके ही निकलेंगे...इसके बाद समय आया नए ब्लोगों में घूम घूम कर टिप्प्न्नी करने का...वहाँ कई बार लगभग न के बराबर लिखी गयी पोस्ट पर भी टिप्प्न्नी की..इसी दौर में ..बहुत से नए मित्रों ..ने अपनी प्रारम्भिक कठिनाइयाँ ..भी बाँटीं...जितना आता था बताया ..और खुद भी पूछते रहे ..सभी अग्रगामियों से ...

तिप्प्न्नियों में ये आदत भी स्वाभाविक रूप से आ गयी...की सीधे सीधे क्या लिख दें ....सपाट दीवार की तरह..तो जिसने शेर लिखे.....हमने भी एक बकरी बाँध दी उसके पीछे......जिसकी कविता पढ़ी .....उसके पीछे अपनी सविता (हमारी फटी चिटी पंक्तियाँ ) ..छोड़ दी..और गंभीर विषय पर ..गंभीर हो कर लिखा....हरयान्वी को हरयान्वी में...और भोजपुरिया को भोजपुरी में.....यदि विचारों से असहमति है ...तो खुल कर कहा ..क्यूँ ..किस बात पर ..सब कुछ ....और भाषा की मर्यादा का हमेशा ध्यान रखा....
मगर यही से शुरुआत हुई, लोगों ने तिप्पन्नियाँ ..उडानी शुरू कर दी ..इसके बाद धमकाने का आज कल प्रचलित अस्त्र का प्रयोग किया गया ...और अब तो ईमेल फीमेल ..सबसे प्यारे प्यारे सन्देश आ रहे हैं...भैया क्या करूँ ...बताओ क्या अब टिप्प्न्नी करना ..भी अपराध हो गया क्या......? मगर भैया चाहे जो हो ......यदि अपराध है तो यही सही...जिन्हें ऐसा लगे की मुझे उनकी पोस्ट पर टिप्प्न्नी नहीं करनी चाहिए ..बता दें.....हम आदेश मान लेंगे....क्यूंकि बहुत हैं प्यार बांटने-प्यार देने वाले.......

गुरुवार, 2 जुलाई 2009

लिब्रहान आयोग : सत्रह साल ज्यादा तो नहीं हैं....



तो आखिरकार ..लिब्रहान आयोग ने अपनी रिपोर्ट दे ही दी...वो तो देनी ही थी कभी न कभी...और इससे अनुकूल समय और हो भी नहीं सकता था....मुझे ये समझ में नहीं आ रहा कि ..राजनितिक दल तो खैर आदतन ..जो करती हैं उससे अलग कुछ और करेंगे..इसकी न तो किसी को अपेक्षा है ना ही शायद जरूरत. मगर मुझे हैरानी तो इस बार पर हो रही है की आखिर आम लोग क्यों अपनी तीखी प्रतिक्रया दे रहे हैं...क्या इसलिए की आयोग के रिपोर्ट देने में इतना लंबा समय लगा...क्या इसलिए की उस पर इतना सारा पैसा खर्च किया गया..क्या इसलिए की उसे अब... जानबूझकर अब पेश किया गया है...मेरे विचार से तो सभी प्रश् बेमानी हैं.

दरअसल भारत में आयोगों के गठन , उनकी रिपोर्टों, उनमें अनुशंषित तथ्यों, और सबसे बड़ी राजनितिक दलों, सरकार द्वारा उसके प्रति संजीदगी या उपेक्षा का जो इतिहास रहा है , उसे देख कर तो स्पष्टतः यही लगता है कि सिर्फ कुछ आयोगों को छोड़ दिया जाए तो ..जहां इन आयोगों का गठन ..भी राजनीति प्रेरित होता है..और रिपोर्ट भी ..परिणामतः उसका प्रभाव भी..चाहे वो गोधरा काण्ड के बाद गठित हुए आयोग हों...या चौरासी के सिक्ख दंगों के बाद गठित आयोग ..सबका एक ही हश्र हुआ है..कुछ दिनों तक आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति..भविष्य के लिए सरकार के कई वाडे..और कुछ दिनों बार सबको भुला बैठना...और यदि मामला/विषय राजनितिक हो तो ..फिर तो इसकी पूरी कार्यवाही और रिपोर्ट ..दोनों ही महज एक खानापूर्ती से बन कर रह जाते हैं...आखिर इन आयोगों का गठन..और फिर उनका असीमित समय तक स्थगन पर स्थगन होता ही क्यूँ है..मुझे इस विषय में किसी संवैधानिक उपबंध के बारे में ज्ञान नहीं है..मगर एक आम आदमी की तरह सोचूं तो यही लगता है ..किसी भी आयोग के गठन के समय ही इस बात का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए कि ...इसकी अधिकतम जांच सीमा..इतनी समय तक होगी....उसके बाद उसे औचित्यहीन मान लेना ही श्रेयस्कर ...यदि इस आयोग की रिपोर्ट आज से दस साल पहले भी आ जाती तो क्या हो जाता..क्या जिन लोगों को दोषी बताया जाता ..वे इस बात को मान लेते और क्या ..सरकार इतनी हिम्मत दिखा पाती कि उन्हें सजा दे पाती..हाँ कुछ राजनितिक समीकरण...कुर्छ सांठ-गाँठ ..शायद अलग होते.....

किन्तु इस आयोग और अन्य आयोगों के विलंब से ..या उनके लगभग पचास बार स्थगन ..करने की प्रवृत्ति उन्हें अपने आप तो नहीं लगी है ..संविधान में ..आरक्षण की व्यवस्ता सिर्फ दस वर्षों के लिए की गयी थी...आज पता नहीं कितनी बार उसे स्थगन दे दे कर आगे बढाया जा चुका है..और निकट भविष्य में कोई सरकार इसे समाप्त कर पायेगी ऐसा नहीं लगता......संविधान में ये भी व्यवस्था रखी गयी थी..कि सरकार जल्दी ही राजकाज की भाषा को पूर्णतया हिंदी कर लेगी..और तब तक अंगरेजी का प्रयोग किया जा सकता है..ये भी शुरू के दस वर्षों के लिए था..आज हालत आपके सामने हैं..और ऐसे कितने ही कानून..कितनी ही समस्याएं हैं...जिनके लिए बार बार समय सीमा तय होने के बावजूद ..हर बार उन्हें समय मिल जाता है..और तो और एक सड़क निर्माण से पहले भी ..हम ये नहीं पूछ सकते ..कि इसकी समय सीमा ..आखिर कुछ तो न्यूनतम हो..जिससे पहले उसकी खुदाई न हो ...तो फिर बेचारे इस आयोग पर ही सारा गुस्सा क्यूँ..आखिर बालिग़ होने (अट्ठारह वर्ष ) से पहले ही आ तो गया सामने......

सोमवार, 29 जून 2009

बारिश और बिजली (व्यंग्य)





उस दिन आसमान में छाये काले बादलों के झुंड को चातक पक्षी की तरह निहारते हुए बोले, यार अब तो इन बादलों को देखकर लगता है जैसे शहर की सारी गाड़ियों का काला धुंआ चिमनी से ऊपर जाकर इकठ्ठा हो जाता है. सिर्फ काला काला ही दिखता है..कभी गीला गीला होता नहीं

अच्छा तो बारिश का इन्तजार हो रहा है.., लपटन बोले,

नहीं नहीं बिजली का...हमने जवाब दिया..

उन्होंने हमें कुछ इस तरह के भाव के साथ देखा जैसे भाव गणित की पुस्तक का कवर देखते ही हमारी चेहरे पर आ जाते थे.बारिश और बिजली ..कैसी पहेली है..यही सोच रहे हैं न मियाँ लपटन , आरे आइये हम विस्तार से समझाते हैं..आपको...

महानगरों में गर्मी का एहसास होते ही बिजली ऐसे बिदक जाती है जैसे कोई प्रमिका शौपिंग के लिए मन करने पर बिदकती है. ओ सरकारी और व्यापारी दोनों के बूते से बाहर हो जाता है शहर को रात में गाँव बनाने से बचाना. ऐसे में एक ही दलील होती है की मांग अधिक हो रही है . अब इन्हें कौन समझाए की जनसँख्या का पेट फटने से भी जहां बच्चों की मांग नहीं घाट रही है वहाँ बिजली की मांग क्या ख़ाक घटेगी और जो घट ही जाए तो मांग कैसी...ऐसे में बस एक ही आसरा होता है बारिश का. बारिश से गर्मी की तपिश कम हो जाए तो शायद कूलर वैगेरह कम चलें. ऐसी का इससे कोई लेना देना नहीं है, क्यूंकि उसका रिश्ता गर्मी से नहीं बल्कि स्टेटस से ज्यादा है.समझे लपटन मियां,,अब आगे सुनो

पहले तो बारिश की चार बूँदें पड़ते ही बिजली गुल हो जाती है, मगर बारिश बंद होते ही waapas नहीं आती. तो हुई न पहली बचत, हमने समझाया. न, न, इस कटौती से लोगों को कोई शिकायत नहीं होती हो भी क्यूँ भाई ये तो सुरक्षा के दृष्टिकोण वाली कटौती होती है न. लोगों की सुरक्षा के प्रति vidyutkarmiyon की भावना के आगे लोगों के क्रोध की भावना शांत हो जाती है. इसके बाद नंबर आता है शहर की ट्रैफिक लाईटों में खपत होने वाली बिजली की बचत का. बारिश में शहर की आधी सड़कें तो जल यातायात के उपयुक्त हो जाती हैं ऐसे में सड़क यातायात निर्देशों की क्या आवश्यकता..

हालांकि दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में पिछली बरसातों के बाद जैसा पानी इकठ्ठा हुआ था उसके बाद से ऍम एक विचार जोर पकड़ता जा रहा है . यदि जहग जहग बाँध बना कर बारिश के इस इक्केट्ठे पानी द्वारा भी हम सड़क पर ही विद्युत उत्पादन कर लें तो क्या ख़ाक कम पड़ेगी बिजली...यानि आम के आम गुठलियों के दाम बारिश का एक बड़ा फायदा बिजली बचत परिप्रेक्ष्य में ये होता है की लोग न तो शौपिंग के लिए मॉल में जा पाते हैं न ही सिनेमा देखने के लियेपिक्चार हॉल में . इससे मॉल और सिनेमा ठीयातारों में चलने वाले ऐसी नियोन लाईट्स वैगेरह भी कम जलती हैं..और तो और लोग घरों में भी अक्सर टी वी वाले कमरे में ही बैठकर चाय-पकौडे खाते हैं. बांकी कमरों की बिजली बंद..हेई न बचत

एक और बचत जो शायद सबसे बड़ी बचत होती है ,,झुग्गी बस्तियों वालों द्वारा तार न डालने से होने वाली बचत. आधी झुग्गी आबादी तो अपनी टपकती झुग्गी में बूंदों के नीचे ग्लास कटोरे लेकर वर्षा जल संचयन में लगी रहती है . बांक्यों को ये डर होता है की तार के साथ करंट मुफ्त की स्कीम के चपेट में न आ जाएँ. बारिश और बिजली की आपसी निर्भरता के गूढ़ शास्त्र को समझाने के उपरांत लपटन जी कहने लगे ...मियाँ ये शोध तो पेटेंट कराने लायक है. कम से कम सरकार तथा विद्युत कंपनियों को तो ये थ्योरी समझाई ही जानी चाहए. इसका मतलब महानगरों में बढ़ते बिजली संकट के लिए कहीं न कहीं इन्द्र देवता भी अवश्य ही जिम्मेदार हैं,,लपटन जी ने फरमाया .

हमने अपने बच्चे को कागज़ की नाव बनाकर दे दी है कह दिया है की जिस दिन ये नाव चलाने लायक पानी गली में इकठ्ठा हो जाए समझ लेना तेरा वीडीयो गेम बीच में नहीं रुकेगा. पुत्तर भी कागज़ की नाव और वीडीयो गेम के बीच का गणितीय सूत्र नहीं समझ प् रहा है.....

रविवार, 28 जून 2009

बलात्कार : एक सामाजिक अभिशाप

पिछले दिनों एक के बाद एक जिस तरह से देश और विदेश के अलग लगा भागों से बलात्कार की घटना की खबरें आयी हैं उसने न सिर्फ इस अपराध की बढ़ती दर की तरफ ध्यान खींचा है, बल्कि समाज के सामने बहुत से प्रश्न खड़े कर दिए हैं. बलात्कार की घटनाएं पिछले एक दशक में बहुत तेजी से बढ़ी हैं.ये न सिर्फ भारत जैसे अर्धशिक्षित एवं अविकसित देशों में कुछ सबसे ज्यादा होने वाले अपराधों में से एक है , बल्कि पूर्ण विकसित पश्चिमी देशों में भी बलात्कार, पांच बड़े घट रहे अपराधों में से एक है. सामाजिक विश्लेषक इस बात पर चिंतित हैं कि ऐसा तब हो रहा है जब वैश्विक समाज का शिक्षा और विकास का स्तर अब पहले से कहीं अधिक है. महिलाएं अपने अधिकार, अपनी सुरक्षा के प्रति होने वाले अपराध के लिए कठोर से कठोर कानून बनाए जा रहे हैं. इन सबके बावजूद महिलाओं के प्रति किये जा रहे अपराधों , शारीरिक शोषण तथा बलात्कार आदि की दर में हो रही विर्द्धि कहीं न कही यही दर्शा रही है कि समस्या को गंभीरता से लेकर सही दिशा में उसके समाधान की तरफ नहीं बढ़ा जा रहा है.

महिलाओं की स्थिति, उनके विकास, सामाजिक स्तर, उनके विरुद्ध किये जाने वाले अपराध आदि पर अध्ययन करने वाली कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने समय समय पर कई रिपोर्टें प्रकाशित की हैं. ऐसी ही एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व में प्रति मिनट २६ घटनाएं महिलाओं के शारीरिक शोषान की, लगन्भाग ७६ घटनाएं छेड़छाड़ की, २८ घटनाएं उनके कत्ल और बलात्कार की, ५२ घटनाएं घरेलू हिंसा की और न जाने कितनी ही घटनाएं कन्या भ्रूण ह्त्या की हो रही हैं.रिपोर्ट के अनुसार विकसित देशों में जहां कम उम्र में ही यौन संपर्क तथा गर्भपात, दैहिक शोषण एवं घरेलू हिंसा की घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है. वहीं अशिक्षित ,पिछडे एवं विकासशील देशों में कन्या भ्रूण हत्या के कारण, अंधविश्वास के घरेलू हिंसा और दहेज़ हत्या के साथ साथ बलात्कार के कारण भी प्रतिदिन हजारों महिलाएं मौत को गले लगा रही हैं. महिला समाज के शाश्क्तिकरण और सामान आधिकारिता की पक्षधर संस्थायें इसका स्पष्ट कारण मानती हैं पुरुष प्रधान समाज, नारी के बढ़ते वर्चस्व और सफलता को हतोत्साहित करने के उद्देश्य से ही प्रतिकार स्वरुप ऐसा कर रहा है.

सामाजिक परिवर्तनों पर गहरी नज़र रखने वाले विश्लेषक ऐसा नहीं मानते. वे इसकी कई अलग सी वजहें मानते हैं. सामाजिक विश्लेषकों का कहना है कि अंधविश्वास से ग्रस्त होकर दायाँ, और चुडैल के नाम पर महिलाओं को नग्न करके घुमाने , मारने वाले जलाने वाले, तथा शराब के नशे में चूर होकर अपनी ही पुत्री , बहन का शारीरिक शोषण करने वाले तो किसी महिला पुरुष वर्चस्व से कोई मतलब नहीं होता ये सब परिवेश से प्रभावित अपराध है. इस विषय पर शोधरत अंतर्राष्ट्रीय संस्था ,"वुमेन :टारगेट ऑफ़ शोशल क्राईसिस " ने अपने अध्ययन एवं सर्वेक्षण से महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों तथा बलात्कार जैसी घटनाओं के कई कारणों पर प्रकाश डाला है.

महिलाओं के प्रति जो अपराध नगरीय क्षेत्र में हो रहे हैं उसके लिए सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है सामाजिक-सांस्कृतिक प्रदूषण, यौन उन्मुक्त्तता तथा उपभोगी प्रवृत्ति के प्रसार को . पश्चिमी देशों में जहां बच्चे एवं युवा ,रोमांच और उत्सुकतावश कभी बहकावे में तो कभी स्वेच्छापूर्वक ही शोषण के सुश्चक्र में फंस जाते हैं. संस्था ने बताया कि पिछले एक दशक में अवयस्क युवतियों द्वारा गर्भपात की घटनाओं में लगभग ३४ प्रतिशत के वृद्धि हुई है. वैश्वीकरण के इस प्रवाह में एशियाई
युवा आधुनकीकरण के आंधी में पश्चिमी संभ्यता का अन्धानुकरण करने लगे. इसी बीच टेलीविजन, मोबाइल,केबल ,,डिश, इन्टरनेट,फैशन, ने भी एक के बाद एक भारतीय बाजार के रास्ते , भारत के घरों में पैठ बनाई. ऐसा अनाहीं है कि इन उपकरणों व माध्यमों ने ही सारा माहौल बिगाड़ दिया, मगर भारत की जनता जो न तो पूर्णतया शिक्षित है और परिणामतः न ही मानसिक रूप से परिपक्व इसलिए इनके द्वारा जो भी बुराइयां आ सकती थी पूरे वेग से आयें. आज इpन्टरनेट कैफे, कॉल सेंटर, आदि के नाम का जहां भी जो भी दुरूपयोग महिला अधिकारों के विरुद्ध किया जा रहा है वो इसी का परिणाम है.

पिछले एक दशक में हुई बलात्कार की घटनाओं में आश्चर्यजनक रूप से २७ प्रतिशत ऐसे थे जिनमें अपराधी पीडिता का कोई अपना था. बहुत सी ऐसी घटनाएं भी थी जिनमें अपराधी पिता , भाई और पुत्र तक थे . संस्था के अनुसार इन सभी घटनाओं में जो एक बात सामान थी , वो थी शराब. मद्यपान , बहुत ज्यादा सेवन करने के कारण ये अपराधी आवेश और उत्तेजना के चरम पर पहुँच जाते हैं, ऐसी स्थिति में ही वे ये पाशविक कृत्य कर बैठते हैं. सर्वेक्षण की रिपोर्ट यही साबित करती है कि बलात्कार के कुल मामलों में सिर्फ १३ प्रतिशत मामले में ही ऐसे होते हैं जिनमें अपराधी किसी निजी दुश्मनी से, किसी से बदला लेने के लिए या किसी अन्य कारण की वजह की वजह से होते हैं. एनी सभी पूर्व नियोजित नहीं होते हैं.

बलात्कार की घटना पर रोक न लग पाने का का एक एक मुख्या कारण है, इसके अपराधियों में सजा के दर का ख़त्म हो जाना. पश्चिमी देशों में बलात्कार के अपराध से मुक़दमे की सारी प्रक्रिया और कार्यवाही इतनी नियोजित , गूप्नीय व तकनीक आधारित (डी एनन ए ) होती है कि गलती की गुंजाइश न के बराबर होती है जबकि भारत में तो बलात्कार की घटना के बाद से मुक़दमे की समाप्ति और उसके बाद तक पीडिता का सारा जीवन ही किसी बलात्कार से कम नहीं होता. धीमी न्यायिक प्रक्रिया एवं साक्ष्य तथा वैज्ञानिक सबूतों के अभाव में अक्सर हे एमुज्रिम बच निकलते हैं. भारतीय कानून व्यवस्था में ऐसे अपराधों में पीडिता के लिए किसी भी तरह की कोई आर्थिक , मानसिक या सामाजिक सहायता की कोई व्यवस्ता नहीं है.ये इस मुद्दे का सबसे अफसोसजनक पहलु है.

भारत में बलात्कार की घटनाओं में मीडिया का गैर संवेदनशील और गैर जिम्मेदार रवैया भी काफी अहम् भूमिका निभाता है ,किसी मुक़दमे को दिशा देने में. कई बार तो तो मीडिया. विशेषकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया..अति उत्साह में और खोजी पत्रकारिता के नाम पर जाने अनजाने वो सब भी कर जाता है है जो कि कानूनन गलत है ,,,और बाद में इसके कारण कई बार अदालतों से फटकार खाने की सजा भी पता है. एक और बात जो अक्सर मीडिया , इस तरह की तमाम घटनाओं की तीपोर्तिंग में करती है वो है ...किसी भी घटना के घटते ही उसके संभावित आरोपियों..उसके मुजरिम..सजा आदि के नतीजे पर झट से पहुँच जाना..आरुशी ह्त्या काण्ड में मीडिया ने अपनी रिपोर्टिंग से आरुशी के पिता को ही उसका कातिल करार दे दिया था...ऐसी रिपोर्टिंग भले ही न्यायिक प्रक्रियाओं पर किसी तरह का कोई प्रभाव न डालती हों..मगर एक अनिश्चित माहौल तो जरूर ही तैयार कर देती हैं.

जो भी हो इतना तो निश्चित है कि ये घत्नाह्यें समाज के लिए एक चेतावनी की तरह हैं...और साथ ही आत्मावलोकन करने का इशारे भी..अन्यथा जिस दिन आधी दुनिया ने आपने हक़ के लिए वही किया जो पिछले दिनों पुणे की एक अदालत में ,,क्रुद्ध महिलाओं की भीड़ ने एक मुजरिम के साथ किया था ..उस दिन सचमुच ही एक अलग समाधान निकलेगा...



मंगलवार, 16 जून 2009

आखिरकार मुझे भी मिली अलेक्सा की रैंकिंग



अभी पिछले दिनों जब पढ़ा की कुछ चिट्ठों को अलेक्सा की सर्वोच्च रैंकिंग मिली है ...मन खुशी से बाग़ बाग़ हो गया..कमाल है इतनी इज्ज़त मिल रही है हमारी हिंदी ब्लॉग्गिंग को....ये अलग बात है की इसके बावजूद हम लोग आपस में राजनेताओं की तरह पता नहीं कौन कौन सा गुमान पाले एक दुसरे से भीड़ जाते हैं...लगते हैं अपनी खुन्नस निकालने...खैर....ये तो ब्लॉग्गिंग का पैदायशी चरित्र है......तो जैसे ही हिंदी ब्लोग्स को अलेक्सा की रैंकिंग की खबर मिली हमने उसी वक्त तय कर लिया ..की अब तो चाहे जो हो...हम भी अलेक्सा से ये रैंकिंग ले कर रहेंगे....मगर ये होता कैसे....अजी दो साल तो हमें ये पता करने में लग गए की ये हिंदी में टिप्प्न्नी कैसे करते हैं...इतनी काबलियत में तो अलेक्सा की रैंकिंग मिलने से रही ..क्या करें..

अरे अनुभवी मित्र चिटठा सिंग कब काम आते..सो सोचा उन्ही से कोई उपाय पूछा जाए......यार तुम अलेक्सा के बारे में कुछ जानते हो..मैं उसकी रैंकिंग लेना चाहता हूँ..
चिटठा थोडा हैरान परेशान था ," यार नाम से तो कोई अंग्रेज महिला मालूम पड़ती है...पर तू क्यूँ पूछ रहा है..क्या भाभी को पता है ....अबे क्या करने जा रहा है...........?

अरे नहीं नहीं यार चिट्ठे..धीरे बोल वैसा कुछ नहीं है.....मैं जो ब्लॉग्गिंग करता हूँ न ...सुना है की उसमें ये अल्सा कोई रैंकिंग वैगेरह देती है....यदि दे दे तो समझो जी आप तो छा गए......."

बेटा कहीं इस छाने के चक्कर में ऐसा न हो भाभी तुझे खा जाए,..भाई तेरी मर्जी..अच्छा तू एक काम कर चाणक्य पूरी वाले इलाके में ढूंढ उसे...कई सारी एम्बैसी हैं वहाँ ..और बहुत से अंग्रेज देखें हैं मैंने घुमते हुए.

मैंने समय खोटी करना ठीक नहीं समझा ..बड़ी ही मशक्कत के बाद पता चला की तुम्बकतु की एम्बसी में एक अलेक्सा दिकोस्ता नाम की युवती काम करती हैं..मैं उससे मिलने के लिए जाते हुए सोच रहा था ...कमाल है यार तुम्बक्तु की किसी महिला को हमारे चिट्ठों में इतनी दिलचस्पी और उसकी रैंकिंग को लेकर इतना बवाल ...इतना उछाल ..कमाल है.

जी मैं भी रैंकिंग लेने आया हूँ ..देखिये इससे पहले की आप हाँ या न करें....मैं आपको अपनी काबिलियत के बारे में बताता हूँ.मैं पिछले अब वर्षों से इस मगजमारी के काम में बेरोजगार हूँ........(ये नहीं बताया की कितनी पोस्टें लिखी हैं..क्या पता रैंकिंग ही न मिलती ) जी अब तो तिप्प्न्नियाँ भी करने लगा हूँ.......कभी कभी किसी गंभीर मुद्दे पर भी लिखता हूँ.....पहले मोहल्ले से जुडा था अब वहाँ से निकला हूँ तो नुक्कड़ पर खडा हो गया हूँ.....और सुनिए...इसी हफ्ते मुझे ताऊ जी की मेरिट लिस्ट में भी स्थान मिला है ..देखिये मैं कोई बड़ी रैंकिंग नहीं मांग रहा हूँ ..कोई भी छोटी मोटी ....सस्ती सी.......

मुझे नहीं पता की अलेक्सा ने क्या समझा क्या नहीं समझा ..मगर थोड़ी देर बाद उसने मुझे बड़ा ही अजीब सा नंबर दिया

नम्बर .?@#$%^७६५४३*&($#@!?><+९८०००७६५ ..मैं घबरा गया..जवाब मिला ये चाईनीज़ नंबर है आजकल चाईनीज से सस्ता कुछ भी नहीं है..और हाँ तुम्हारे ब्लॉग्गिंग शोलिग्गिंग का पता नहीं ये हमारे यहाँ खुल रहे लेस्बियन क्लब की माम्बर्शिप का नम्बर है....रख लो इससे भी तुम्हारी रैंकिंग मिलेगी...

मैं सर पर पाँव रख कर भाग लिया........

शनिवार, 13 जून 2009

वे एहसानों का हिसाब रखते हैं..


डरते हैं अब तो,
पास जाते उनके,
सुना है की,
वे एहसानों का हिसाब रखते हैं.......

बालों की सफेदी से,
मौत भुलावे में,
कहीं भेज न दे बुलावा,
बोतलों में नहीं ,
वे मटकों में खिजाब रखते हैं.....

कत्ल करने से गुरेज नहीं,
सजा का भी खौफ नहीं,
एक हाथ में खंज़र,
दूसरे में कानून की किताब रखते हैं....


ये अलग बात है की देखते नहीं,
नजर भर में पलट दें , तख्त-ताज,
लफ्जों में क़यामत,
आँखों में सैलाब रखते हैं....

आदमियों की भीड़ में,
इंसानों की तलाश हुई मुश्किल,
इंसान की सूरत सा ,लोग,
चेहरे पर नकाब रखते हैं..



गुरुवार, 11 जून 2009

मैं, चिट्ठासिंग ,और महिला आरक्षण



जब भी किसी गंभीर मुद्दे पर बाबा रामदेव की कपाल भारती वाली मुद्रा में ध्यान लगा कर सोच रहा होता हूँ. ये चिट्ठासिंग (अरे वही पाजी जिसकी हर्बल जूतों की दूकान है मेरी गली में ) कमबख्त पता नहीं कहाँ से आ जाता है..और मुझे मंझधार वाली स्थिति से सीधे बंटाधार वाली स्थिति तक ले जाता है .

आते ही चीखा ," हाँ भाई ..चिट्ठोरे,( कहता है जो लुच्चे होते हैं उन्हें मैं छीछोरे कहता हैं और जो टुच्चे होते हैं और लिखते भी हैं ..उन्हें चिट्ठोरे ) क्यूँ ऐसे मुतमईन बैठा है ...न तो तेरे से पहेली बूझी जाती ...न कोई इनाम जीता जाता..तो फिर ये चिंतन मनन क्यों कुछ भी ठेल ठाल. दे...वैसे भी पढ़ कौन रहा है....

अबे जा चिट्ठे..तुझे क्या पता...इन दिनों महिला आरक्षण पर बड़ी ही तीखी बहस चल रही है...

अच्छा अच्छा तो तुम लोग भी लग गए इस ड्रामे में ...रुको इससे पहले की कुछ और कहो सुनो मेरे कुछ सवालों का जवाब दो ...बिलकुल सीधे सीधे ..स्पष्ट ..

अच्छा बताओ इस वक्त देश के सबसे बड़े पद...राष्ट्रपति ..पर कौन है ..पुरुष या महिला...?

मुझे पता था ,,तुम यही कहोगे..महिला...मगर ..तुम्हें याद दिला दूं की इस पद पर कोई महिला पहली बार ही बैठी है...

चुप चुप....ये पहली बार वाला राग मत गा...अबे कोई दलित बना तो पहला दलित..कोई महिला बनी तो पहली महिला..कोई वैज्ञानिक बना तो पहला वैज्ञानिक...अमा कोई भी बने तुम लोग ये पहले वाला एंगल जरूर घुसेड दोगे...अब चुपचाप मेरे सवालों का जवाब दे.......

अच्छा ये बता लोक सभा के अध्यक्ष के रूप में किसे चुना गया है ..पुरुष या महिला को...

महिला को ..मीरा कुमार..मगर ये पहली....मैं सिटपिटा कर चुप हो गया..

अच्छा ये बता ये जो दो बार से तुम प्रधानमंत्री बना रहे हो ..आज जिस राजनितिक दल के हाथ में देश की बागडोर है ..उस पार्टी की बागडोर किसके हाथ में है..पुरुष या महिला...

मैं गुस्से से घूर कर रह गया.........

चल छोड़ ...तू ये बता...देश की राजधानी दिल्ली ..की सरकार का मुखिया कौन है..पुरुष या महिला...?

नहीं बता रहा ..और सुन ,... उत्तर प्रदेश. राजस्थान...और भी कई राज्यों जिनका नाम अभी मुझे याद नहीं है का मुख्या मंत्री कौन है..पुरुष या महिला..

अबे सबसे धाँसू मंत्रालय..रेल मंत्रालय किसके पास है..पुरुष या महिला...के..

अबे घोंचू..आज जहां देख ..वहाँ महिला राजनीतिज्ञों की धाक पहले से ही है..क्या आरक्षण से कुछ अलग हो जाएगा...
बेटा ..सब कुछ ढोंग है...कूटनीति है...जैसे हिंदी कमजोर ..कमजोर है..का धंधा फल फूल रहा है न ..वैसे ही ये दूकान भी चल रही है..ताकि सब को कहने का मौका मिलता रहे की ..देखो महिला कमजोर है ..उन्हें आरक्षण देंगे तभी उनका कल्याण होगा...और ये तेरी महिलाएं भी कम नहीं है ...इस आरक्षण के लिए क्यूँ नहीं सारी महिला राजनीतिज्ञ एक साथ हो लेती...और छोड़ ये कभी एक साथ होती ही नहीं...तू ही बता इस पोस्ट के लिए गूगल बाबा का कितना सर खाया तब जाके ये तस्वीर मिली है....सब दिखावा है ...कुछ दिनों तक इसी बहाने देश को भटकाया जाएगा ताकि ..बाजार में आलू प्याज के दाम सुनते समय भी उसके दिमाग में यही गूंजे ..महिला आरक्षण....समझा ..यार ..

जा जा तो जा..तू मुझे पथ भ्रष्ट कर देता है...मैं फिर कपाल भारती की मुद्रा में बैठ रहा हूँ....

सोमवार, 8 जून 2009

बच्चे कहाँ पढें :देश में,परदेश में ......


जी हाँ आप जो ये तस्वीर देख रहे हैं....ये किसी ट्वेंटी ट्वेंटी मैच के लिए टिकट खरीदने के लिए लगी लम्बी लाइन नहीं है...न ही किसी टैलेंट हंट शो के लिए औदीशन देने के लिए खड़े हैं ये बच्चे...ये सब वे बच्चे हैं जो अब स्कूल से निकल कर.......कॉलेजों में दाखिला लेना चाहते हैं....दिल्ली में जब से पहुंचा हूँ..यहाँ का शैक्षणिक मुहाल देख कर हैरान रहता हूँ...छोटी छोटी क्लासों से सभी माता पिता परेशान...बच्चों के दाखिले के लिए ....भागमभाग..सिफारिशें...डोनेशन..और भी पता नहीं क्या क्या...(हालाँकि मैं भी अगले साल इस दौड़ में शामिल होने वाला हूँ ) ..एक बार दाखिला मिल गया..फिर बच्चों की पढाई..मोटी मोटी किताबें...उनके अजीबोगरीब प्रोजेक्ट...इसके बाद परीक्षाएं...और परीक्षा के दिनों में तो चारों तरफ एक अघोषित कर्फ्युं सा लग जाता है....शादी में नहीं जा सकता...बच्चों की परिक्षा है न...टी वी नहीं देख सकते ..बच्चों की.....न...और भी पता नहीं क्या क्या नहीं कर सकते...परीक्षा का परिणाम आया ..तो लीजिये ..आप खुद ही देख लीजिये......हे भगवान् सिर्फ इक्क्यानवे प्रतिशत (यहाँ सिर्फ ऐसे ही लगाया जाता है .....जैसे बड़े बड़े शो रूम में भारी भरकम दाम के आगे लगा होता है .....सिर्फ....रुपये..)..इसमें क्या होगा....कहीं भी एडमीशन नहीं मिलेगा....(बताइये ..एक हमारा ज़माना था की तैंतीस प्रतिशत को छुआ नहीं की लड्डू बंट जाती थी पूरे मोहल्ले में..और खुदा न करे कभी साठ से ऊपर (अजी हमने कब कहा की गाँधी जी की तरह नक़ल नहीं करते थे ) आ गए तो कमीज फाड़ कर ही घर पहुँचते थे (हमें पता था की पिता श्री नई कमीज सिलवा ही देंगे )....और यहाँ देखिये इक्क्यान्वे वाले को झाड़ पड़ रही है....

मगर जल्दी ही समझ आ गया की क्यूँ पड़ रही है.....अजी अजीब मारा मारी है...कहीं कट ऑफ चल रहा है....कहीं बिलकुल ही शत ऑफ हो गया है..इन..फर्स्ट लिस्ट...सेकंड लिस्ट...और पता नहीं किन किन लिस्टों के चक्कर में बेचारे पिस्ट (पस्त ) हो जाते हैं......पिछले कुछ वर्षों से खाते पीते घरों के बच्चे .....पढने के लिए विदेश जाने लगे....अब वहाँ भी झंझट......
देखा नहीं ...कमबख्त ओरिजनल पेपर और कार्बन (वही गोरे काले का चक्कर )......तो फिर अब बच्चे जाएँ तो कहाँ जाएँ......पढने के लिए......मेरी समझ में ये नहीं आया की आखिर सरकार को पिछले दस बीस वर्षों में नए कॉलेज खोलने की जरूरत क्यूँ नहीं महसूस हुई....जबकि मॉल और मल्टीप्लेक्स तो मेरे आसपास ही पिछले एक साल में दस खुल गए हैं......अच्छा समझा....शायद सरकार सोच रही है की......बच्चे पढ़ के क्या करेंगे...सीधे ही नौकरी पर लग जाएँ ...इन शौपिंग कोम्प्लेक्स में........अब जाकर समझा सरकार की योजना ........

शुक्रवार, 5 जून 2009

किस किस के दर्द का करें हिसाब ?


इतने निष्ठुर ,
इतने निर्मम,
ये अपने से,
नहीं लगते,
फिर किसने,
ये नस्लें ,
बोई हैं,

किस किस के,
दर्द का,
करें हिसाब,
लगता है,
पिछले रात,
शहर की,
हर आँख,
रोई है......

सपनो का,
पता नहीं,
मगर नींद तो,
उन्हें भी,
आती है,
जो ओढ़ते हैं,
चीथरे ,या
जिनके तन पर,
रेशम की,
लोई है.....

क्या क्या,
तलाशूँ ,इस,
शहर में अपना,
मेरी मासूमियत,
मेरी फुर्सत,
मेरी आदत,
सपने तो सपने,
मेरी नींद भी,
इसी शहर ,
में खोई है.....

ये तो,
अपना-अपना,
मुकद्दर है,यारों,
उन्होंने संभाला है,
हर हथियार ,अपना,
हमने ,उनकी,
दी, हर चोट,
संजोई है...

पर्यावर दिवस पर........

नदियाँ ,
लगती हैं,
नाले जैसी,
पानी बना,
जहर सामान,
लगता है ,
दुनिया ने,
अपने पाप ,
की गठरी,
धोई है...........

गुरुवार, 4 जून 2009

युवा हुई संसद

इस बार जो जनादेश निकल कर सामने आया है उसने न सिर्फ खिचडी सरकार बनने की मजबूरी वाले हालातों से राजनितिक परिदृश्य को बाहर निकाला है बल्कि इस बार सबसे ज्यादा युवा सांसदों को अपने प्रतिनिधि के रूप में चुन कर देश के संचालन की जिम्मेदारी युवा कन्धों पर डाल दी है. ऐसे में जबकि देश की लगभग आधी आबादी युवाओं की श्रेणी में ही आती है तो ये तो स्वाभाविक है और बहुत सकारात्मक भी. एक तरफ जहाँ इन जीते हुए प्रतिनिधियों में अपनी नई सोच , नए विचार और अपनी नयी ऊर्जा के अनुरूप उत्साह और जोश देखने को मिलेगा, वहीँ चूँकि ये सब किसी न किसी राजनतिक घराने से सम्बंधित हैं इसलिए विरासत में मिला राजनितिक अनुभव भी उनकी कुशलता में इजाफा करेगा. जनता इस बार अपने इन युवा जनप्रतिनिधियों से कम से कम इस बात की उम्मीद तो लगा ही सकती है कि इस बार संसद सत्र में समय और पैसे की बर्बादी नहीं होगी..
इससे बढ़कर एक और अच्छी बात ये रही है कि इन नए सांसदों पर पूरा भरोसा जताते हुए इन्हें पहली बार में ही मंत्री पद का भार दे कर जहां जनता की भावना का सम्मान किया गया है वहीं काफी पहले से चली आ रही एक शिकायत , कि मंत्रीमंडल में उम्र के हिसाब से असंतुलन रहता है, भी थोड़ी दूर हो जायेगी..अब ये सांसदों का नया और युवा कुनबा भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कितना प्रभावकारी साबित होगा ये तो वक्त ही बताएगा....मगर लोग ummeed तो nischit ही कर रहे हैं ......
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रविवार, 31 मई 2009

कुछ पंक्तियाँ







काफी समय पहले बी आर विप्लवी जी की कुछ पंक्तियाँ पढी थी ....मुझे पसंद आईं .....आप भी गौर फ़रमाएँ

पूछकर जात -घराने मेरे,
सब लगे ऐब गिनाने मेरे,

छेड़ मत गम के फ़साने मेरे,
दर्द उभरेंगे पुराने मेरे,

जात फिर इल्म से बड़ी निकली,
काम ना आये बहाने मेरे,

चंद लम्हों की मुलाकातों में,
कैद लाखों हैं जमाने मेरे,

छाँव आँचल की जब मिली माँ की,
भर दिए जख्म, दुआ ने मेरे,

अश्क बरसे तो सब गुमान बहे,
घुल गए मैल ,पुराने मेरे,

इक सिफर आखिरात का हासिल था ,
रह गए , जोड़-घटाने मेरे,

जब से तू बस गया निगाहों में,
चूक जाते हैं निशाने मेरे,

शहर में घर , न गाँव में खेती,
है कहाँ ठौर, ठिकाने मेरे,

विप्लवी खोजते हुए खुशियाँ,
सब लुटे ख्वाब सुहाने मेरे

उम्मीद है आप पसंद करेंगे........

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