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प्रचार खिडकी

सोमवार, 8 जून 2009

बच्चे कहाँ पढें :देश में,परदेश में ......


जी हाँ आप जो ये तस्वीर देख रहे हैं....ये किसी ट्वेंटी ट्वेंटी मैच के लिए टिकट खरीदने के लिए लगी लम्बी लाइन नहीं है...न ही किसी टैलेंट हंट शो के लिए औदीशन देने के लिए खड़े हैं ये बच्चे...ये सब वे बच्चे हैं जो अब स्कूल से निकल कर.......कॉलेजों में दाखिला लेना चाहते हैं....दिल्ली में जब से पहुंचा हूँ..यहाँ का शैक्षणिक मुहाल देख कर हैरान रहता हूँ...छोटी छोटी क्लासों से सभी माता पिता परेशान...बच्चों के दाखिले के लिए ....भागमभाग..सिफारिशें...डोनेशन..और भी पता नहीं क्या क्या...(हालाँकि मैं भी अगले साल इस दौड़ में शामिल होने वाला हूँ ) ..एक बार दाखिला मिल गया..फिर बच्चों की पढाई..मोटी मोटी किताबें...उनके अजीबोगरीब प्रोजेक्ट...इसके बाद परीक्षाएं...और परीक्षा के दिनों में तो चारों तरफ एक अघोषित कर्फ्युं सा लग जाता है....शादी में नहीं जा सकता...बच्चों की परिक्षा है न...टी वी नहीं देख सकते ..बच्चों की.....न...और भी पता नहीं क्या क्या नहीं कर सकते...परीक्षा का परिणाम आया ..तो लीजिये ..आप खुद ही देख लीजिये......हे भगवान् सिर्फ इक्क्यानवे प्रतिशत (यहाँ सिर्फ ऐसे ही लगाया जाता है .....जैसे बड़े बड़े शो रूम में भारी भरकम दाम के आगे लगा होता है .....सिर्फ....रुपये..)..इसमें क्या होगा....कहीं भी एडमीशन नहीं मिलेगा....(बताइये ..एक हमारा ज़माना था की तैंतीस प्रतिशत को छुआ नहीं की लड्डू बंट जाती थी पूरे मोहल्ले में..और खुदा न करे कभी साठ से ऊपर (अजी हमने कब कहा की गाँधी जी की तरह नक़ल नहीं करते थे ) आ गए तो कमीज फाड़ कर ही घर पहुँचते थे (हमें पता था की पिता श्री नई कमीज सिलवा ही देंगे )....और यहाँ देखिये इक्क्यान्वे वाले को झाड़ पड़ रही है....

मगर जल्दी ही समझ आ गया की क्यूँ पड़ रही है.....अजी अजीब मारा मारी है...कहीं कट ऑफ चल रहा है....कहीं बिलकुल ही शत ऑफ हो गया है..इन..फर्स्ट लिस्ट...सेकंड लिस्ट...और पता नहीं किन किन लिस्टों के चक्कर में बेचारे पिस्ट (पस्त ) हो जाते हैं......पिछले कुछ वर्षों से खाते पीते घरों के बच्चे .....पढने के लिए विदेश जाने लगे....अब वहाँ भी झंझट......
देखा नहीं ...कमबख्त ओरिजनल पेपर और कार्बन (वही गोरे काले का चक्कर )......तो फिर अब बच्चे जाएँ तो कहाँ जाएँ......पढने के लिए......मेरी समझ में ये नहीं आया की आखिर सरकार को पिछले दस बीस वर्षों में नए कॉलेज खोलने की जरूरत क्यूँ नहीं महसूस हुई....जबकि मॉल और मल्टीप्लेक्स तो मेरे आसपास ही पिछले एक साल में दस खुल गए हैं......अच्छा समझा....शायद सरकार सोच रही है की......बच्चे पढ़ के क्या करेंगे...सीधे ही नौकरी पर लग जाएँ ...इन शौपिंग कोम्प्लेक्स में........अब जाकर समझा सरकार की योजना ........

5 टिप्‍पणियां:

  1. ajayji agar aap itane samajhdar ho kar ab samjhe to bhala ham kese bata sakte hain ki bache kahan jaayen aap bhi na bahut hi mazakia hain ha ha ha

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  2. समसामयिक सुन्दर आलेख। आप अपनी बात कहने में सफल रहे। शुभकामना।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  3. चलो, समझ आ गई सरकार की योजना..बधाई..बेहतरीन आलेख.

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  4. बहुत बहुत शुक्रिया आपकी टिपण्णी के लिए!
    बहुत खूब लिखा है आपने और बिल्कुल सही फ़रमाया है!

    उत्तर देंहटाएं

टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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