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गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

बैंक की परीक्षा और नैनीताल की यात्रा -२ (यात्रा वृत्तांत )



जैसा कि कल की पोस्ट में बताया कि लखनऊ रेलवे स्टेशन पर पहुंचने के बाद सभी साथी अपने अपने रास्ते निकल पडे । मुझे वहां से आगे नैनीताल के लिए निकलना था , समय शाम के चार बज चुके थे और अगले दिन यानि रविवार को मेरी परीक्षा थी । जब वहां पता किया कि आगे नैनीताल कैसे पहुंचा जा सकता है । पूछने पर जो बात पता चली उससे मेरे पांव तले धरती खिसक गई । वहां पर सुरक्षा में तैनात के पुलिस कर्मी ने बताया कि वहां का रास्ता इतना है कि यदि पहुंचने में थोडी सी भी चूक हुई तो फ़िर परीक्षा भी छूट सकती है । उसने पूछा कि परीक्षा कितने बजे से है ,मैं थोडा सा आशंकित और थोडा सा आश्वस्त भी कि हमेशा की तरह परीक्षा तो पहली पाली की ही होगी यानि सुबह साढे नौ बजे से । मगर जब परीक्षा प्रवेश पत्र देखा तो शुक्र मनाया कि दूसरी पाली में परीक्षा थी , यादि दोपहर दो बजे से ।

उस पुलिस कर्मी ने बताया कि , बस फ़ौरन लपक लो , उत्तर प्रदेश परिवहन की कोई भी बस पकड लो जो नैनीताल से ठीक पहले हल्द्वानी तक आपको पहुंचा देगी । अभी ट्रेन के चक्कर में पडे तो मुश्किल हो सकती है । वैसे भी ट्रेन का नाम सुनकर ही मुझे चक्कर आने लगे थे । कम से कम बस में सीट मिलने की गुंजाईश तो थी ही उसमें । भागते हुए बस स्टैंड पहुंचा तो पता चला कि एक बस बिल्कुल तैयार खडी है । और जब भी बसें बिल्कुल तैयार खडी हों तो इसका साफ़ मतलब होता है कि आपको उसमें बैठने के लिए बडी मुश्किल से जगह मिल पाएगी । अंदर पहुंचा तो लगा कि ये क्या पूरी बस परीक्षार्थी बच्चों से भरी हुई थी । ये देख कर ही लग रहा था कि सभी एक ग्रुप के और बाद में पता चला कि सभी एक ही स्कूल या कौलेज के थे । मुझे भी एक सीट मिल गई , मैं भी आराम से दुबक लिया । शाम होने लगी थी और बस नैनीताल की ओर आगे बढी ।

जैसे ही बस लखनऊ शहर को पार करने के बाद बाहर निकली दोनों तरह घिरे लंबे लंबे वृक्षों ने दो बातें का ईशारा कर दिया । एक तो ये कि आगे प्रकृति का वो अनुपम नज़ारा देखने को मिलने वाला है जो उस समय मैं शायद सिनेमा के पर्दे पर देखा करता था ।दूसरी ये कि मौसम के ठंडेपन का बिल्कुल भी अनुमान न होने के कारण कोई भी गर्म कपडा न रखना मेरी एक बडी भूल साबित होने वाली थी । कब आंख लगी पता ही नहीं चला । एक हिचकोले के साथ बस जब किसी स्थान पर रुकी तो आखें अपने आप ही खुल गई । रात में ठंड और बढ चुकी थी । हिम्मत नहीं हो रही थी कि बाहर निकल कर झांकने तक की मगर भूख ने ठंड को मात दी और मैं बस से बाहर निकला । पहली बात जिसने आकर्षित किया वो था साफ़ चमकता आकाश और उसमें से कुछ ज्यादा ही करीब दिखते चकमक करते तारे , एक पल को तो ऐसा लगा जैसे हाथ बढा कर उन्हें छुआ जा सकता है । मगर जल्दी ही एक सिहरन सी हुई और पेट ने फ़िर अलार्म बजा दिया । मैं उस छोटे से ढाबेनुमा होटल पर जाकर ठीक उनके तंदूर के पास जाकर खडा हो गया । वो कालेज का बच्चों का झुंड  भी खूब शोर शराबे के साथ खाने पर टूट पडा था । मैंने भी पहले चाय सुडकी और फ़िर कुछ खाना खाया । खाते समय गर्म गर्म रोटी को खाने से पहले जोर से दोनों हथेलियों के बीच भींचना बडा अच्छा लगा ।

बस में वापस पहुंच कर कुछ ज्यादा ही सिकुड कर बैठने की कोशिश की मगर सिकुड कर यदि ठंड कम की जा सकती तो क्या बात थी । खैर नींद ने फ़िर भी कुछ देर के लिए ध्यान तो भटका ही दिया था । बीच बीच में सोते उठते साथ बैठे बच्चों से बातचीत भी होती रही । उन्हें ये जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि एक उन्नीस बीस साल का लडका घर से अकेले ही इतनी दूर सिर्फ़ परीक्षा देने के लिए आया है । जैसे जैसे पौ फ़टने लगी, आखों की चमक बढने लगी । सुबह बस शायद साढे छ; या सात बजे तक हल्द्वानी पहुंच गई थी । सब बस से उतर गए । चूंकि वो समूह बडा था और शायद उन सबको लाने वाले कुछ शिक्षक या उनके बडे भी उनके साथ थे सो वे सब चल दिए आगे । मैंने पूछा तो पता चला कि वहां से छोटी छोटी मारुति गाडियां भी चलती हैं सवारियां लेकर जो नैनीताल पहुंचा देती हैं , और जल्दी भी । मैं लपक लिया ऐसी ही एक मारुति की ओर ।


मैंने बहुत बार सुना देखा है कि बहुत से लोगों को बस , गाडी आदि में चक्कर मितली वैगेरह आने लगती है । और खासकर तब तो जरूर ही जब रास्ता पहाडी और घुमावदार हो , मगर खुशकिस्मती से हम ऐसी किसी भी परिस्थिति के बिल्कुल ही अनुकूल थे , यदि गाडी पूरे दिन भी गोल गोल घूमती रहती तो भी मुझे तो चक्कर आने से रहा । अपन मजे में बाहर नैन लगा के भिडे रहे , प्रकृति के उस अनुपम सौंदर्य को निहारने में । लग ही नहीं रहा था कि परीक्षा की कोई टैंशन भी बची थी । और फ़िर जब गाडी नैनीताल पहुंची तो बस नजरें जैसे चिपक कर रह गई थीं । सामने नैनी झील में पड रही धूप की चमक से पूरी घाटी ऐसे चमक रही थी जैसे चांदी का वर्क लगा दिया हो प्रकृति ने ।

मैं फ़टाफ़ट बस स्टैंड के पास ही लगे हुए एक सुलभ कौंप्लेक्स में पहुंचा और सभी नित्य क्रिआओं से निवृत हुआ । वहां काम कर रहे मोहन जी ने बात बात में बताया कि नैनीताल में शीतकालीन उत्सव की शुरूआत कल शाम से ही शुरू हुई है । पूरे नैनीताल को खूब सजाया संवारा गया था । समय बारह बज चुके थे । परीक्षा दो बजे से थी , सो कुछ और सोचे किए बगैर हम सीधा चल दिए अपने परीक्षा केंद्र की तरफ़ । मोहन जी ने बता दिया था कि यदि पैदल भी चले तो आधे घंटे में ही उस विद्यालय तक पहुंचा जा सकता है । हम पैदल ही चल दिए । और थोडी ही देर में पता चल गया कि अच्छा ही किया जो पैदल चले । नैनी झील के किनारे किनारे सडक पर चलते हुए , जो रंगा रंग उत्सव के नज़ारे देखने को मिले तो बस आंखों में बसते जा रहे थे । काश उस वक्त मोबाईल वाला कैमरा हुआ करता और हमारे पास हुआ करता ।

परीक्षा दे कर निकले तो सुकून था कि चलो आना सफ़ल रहा । परीक्षा अपेक्षा के अनुरूप ही रही और बाद में जब उसका परिणाम आया तो अंदाज़ा दुरूस्त निकला । परीक्षा देने के बाद फ़िर से पेट पूजा की तरफ़ ध्यान गया । और जो भी सामने गर्मागर्म मिला उसे उदरस्थ किया गया । अब तो ठीक ठीक याद भी नहीं कि पूरी कचौडी पहले खाई थीं या कि आमलेट मगर खाया खूब सारा । शाम होते होते फ़िर से ठंडी हवाओं ने अपना घेरा बढाना शुरू कर दिया था । सबसे पहले वहीं माल रोड पर स्थित एक दुकान से एक गर्म स्वेटर लेकर उसे पहना और दोबारा से घूम कर मोहन जी के पास पहुंच गया । मेरे पास यूं तो अब वक्त ही वक्त था मगर उस समय परीक्षाओं में शामिल होना और वापस आ जाना यही रिवाज था हम लोगों का । मगर मैं तय कर चुका था कि अब तो कल रात की बस ही पकड कर वापस लखनऊ निकलना है । मोहन जी ने पास ही स्थित एक लौज का पता बता दिया और साथ में एक परिचित का नाम भी ।


रात में बिस्तर पर पहुंचने से पहले शाम और देर रात तक पहाडों की चकाचौंध में घूमता रहा । नैनी झील में   उन हजारों बल्बों की रोशनी और ऊपर तारों की अनुपम छटा , कुल मिला कर दृश्य ऐसा मानो स्वर्ग की कल्पना साकार होती दिख रही हो । लौज में ही मुझ पर कुछ खास कृपा करके एक मोटे कंबल की व्यवस्था कर दी थी उन्होंने । अगले दिन सुबह उठ कर एयर बैग कंधे पर लाद कर सबसे पहले मोहन जी के पास पहुंचा और उन्हें स्पष्ट बता दिया कि मैं शाम चार बजे तक जो जो जगह देख सकता हूं आज ही वो बता दें । और उन्हीं के बताए स्थानों पर , जिनका नाम अब मुझे याद भी नहीं है शायद कोई भीमताल या जाने कोई और था , और एक मंदिर , बस यही सब घूमते घामने पुन: बस अड्डे की ओर वापस और वहां से लखनऊ की वापसी हो रही थी ।


इस सफ़र ने कुछ चुनिंदा यादों के साथ एक सीख ये दी कि अब जब भी कहीं जाने के बारे में सोचता हूं तो सबसे पहले वहां के मौसम के बारे में पूरी जानकारी ले लेता हूं और उसीके अनुसार तैयारी करके निकलता हूं । आगे की पोस्टों में , हैदराबाद, दार्जलिंग, डलहौजी, चंडीगढ, भोपाल, जनकपुर(नेपाल ) , कलकत्ता, मुंबई , और जिन जिन शहरों में घूमा हूं वो सब यादें समेटने की कोशिश की जाएगी ।

15 टिप्‍पणियां:

  1. वाह भैया बढ़िया यात्रा वृतांत....ये संस्मरण भी खूब रही...धन्यवाद... आगे देखते है और कहाँ कहाँ घुमाते है..

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  2. इस तरह की फटाफट यात्राएँ उसी उम्र में होती हैं। जब आदमी आगा पीछा कुछ नहीं देखता। बस चल पड़ता है।

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  3. पुरानी यादों को भी इतने बारीकी से प्रस्‍तुत किया है .. कहीं जाने से पहले वहां के मौसम का ख्‍याल तो रखा ही जाना चाहिए .. आपके इस संस्‍मरण को पढना अच्‍छा लगा .. आगे की यात्रा के बारे में भी जानने का इंतजार रहेगा !!

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  4. पुरानी यादों को भी इतने बारीकी से प्रस्‍तुत किया है .. कहीं जाने से पहले वहां के मौसम का ख्‍याल तो रखा ही जाना चाहिए .. आपके इस संस्‍मरण को पढना अच्‍छा लगा .. आगे की यात्रा के बारे में भी जानने का इंतजार रहेगा !!

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  5. बढिया संस्मरण. हमने भी सैर कर ली नैनीताल की. शानदार तस्वीरें. अगले यात्रा-वृतांत का इन्तज़ार रहेगा.

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  6. भाई बहुत सुंदर रही आप की नेनीताल की यात्रा, हम भी गये थे १९८८ मै एक बार नेनी ताल, कुछ भी नही याद रहा, जो याद है वो कभी लिखूंगा, लेकिन आप की यात्रा पढ कर काफ़ी कुछ याद आ गया.
    धन्यवाद

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  7. बहुत सही..
    परीक्षा की परीक्षा...
    घुमाई की घुमाई..
    क्या बात है भाई...

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  8. यात्रा वृत्तांत के दोनो भाग पढ लिए.. लगता नहीं कि पहली बार सस्मरण लिख रहे हैं...सरल और सहज भाषा में सजीव चित्रण किया गया है.

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  9. कुछ ऐसी वैसी घटना तो हुयी नहीं फिर ये कैसे वृत्तांत बन गया (हा हा ) -बढियां लिखा है !

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  10. १८ साल बाद भी कितना याद है...

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  11. बढ़िया यात्रा वृतांत...डायरी मे से और निकालिये. :)

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  12. यह यात्रा वृतांत श्रंखला अच्छी रहेगी
    मजा आ रहा है

    प्रणाम

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  13. बस समझ लो आपको साथ हम भी घूम आये ....खर्चा भी बच गया ...सुन्दर वर्णन

    http://athaah.blogspot.com/

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  14. बहुत बढिया स्मरण रहा झा जी।

    बस अब यात्रा चलने ही दिजिए।

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टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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