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बुधवार, 28 अप्रैल 2010

बैंकिंग परीक्षा और नैनीताल का सफ़र (यात्रा संस्मरण )


बहुत दिनों से सोच रहा था कि अभी तक जीवन के सफ़र में की गई सारी यात्राएं अपने आप में एक कहानी , एक फ़साने से कम नहीं हैं । और ये भी तय है कि समय के साथ साथ उनमें से यदि सभी को भूल न भी जाऊं तो कुछ तो वो यादें होंगी ही जो धीरे धीरे मेरा साथ न दें । तो ऐसे में उन्हें हमेशा के लिए अपने लिए और भविष्य के लिए भी सहेजने के लिए इससे बेहतर और क्या हो सकता था कि उन्हें ब्लोग पोस्टों के रूप में दर्ज़ कर दिया जाए । मैंने कभी यात्रा संस्मरण नहीं लिखा , पढा भी बहुत ज्यादा नहीं है । इसलिए जो जितना याद है उसे बिल्कुल ठीक वैसा ही शब्दों के रूप में रखता जाऊंगा ।

ये शायद साल १९९२ का रहा होगा , महीना सितंबर का । ये वो साल था जब अचानक ही स्नातक करते करते ही हमारे पूरे ग्रुप पर अलग अलग प्रतियोगिता परीक्षाओं में भाग लेने का शौक चर्रा गया था । शौक इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उस समय हम सब न तो उन परीक्षाओं के लिए शायद उतने गंभीर थे न ही उस स्तर की हमारी तैयारी थी कि हम उन परीक्षाओं को पास कर पाते , मगर जैसा कि हमारे सीनीयर बताया करते थे कि ऐसी परीक्षाओं में भाग लेते रहने का अनुभव ही आगे काम आएगा । हम भी अनुभव बटोरने में जुट गए जो आगे जाकर सचमुच ही बहुत काम आया । उन दिनों बैंकिंग में अवसरों  की भरमार थी और उनके लिए परीक्षाओं में भाग लेना हमारे लिए देशाटन के अवसर से कम नहीं था । खैर तो मैं बात कर रहा है उत्तर प्रदेश बैंकिंग सर्विसेज़ द्वारा ली जाने वाली बैंकिंग परीक्षा में भाग लेने की ।

 मेरे सभी मित्र और सहपाठी अक्सर ये ध्यान रखते थे कि परीक्षा केंद्र वो होना चाहिए जो , घर के नजदीक हो , ऐसा करने के पीछे सिर्फ़ और सिर्फ़ एक तर्क रहता था । नजदीक परीक्षा केंद्र होने से आने जाने का कम किराया और शायद वहां पहले पहुंच कर रुकने की मजबूरी भी खत्म हो जाती थी । मगर मैं जाने किन कारणों से हमेशा ऐसा नहीं कर पाता था , सो मैंने परीक्षा केंद्र भर दिया था नैनीताल । प्रवेश पत्र जब हाथों में पहुंचा तो सिर्फ़ इतना समय मिला कि , जो भी धुले हुए कपडे थे उनमें से दो जोडी कपडे, और ढेर सारी टिप्स और प्रतियोगिता परीक्षा वाली किताबें एक एयर बैग में ठूंस कर , नकद नारायण ले कर घर से निकल जाना होता था । हर सफ़र की शुरूआत मधुबनी से निकलने वाली बस से हुआ करती थी चाहे उससे दरभंगा के लिए निकलना हो या फ़िर पटना के लिए । पटना से आगे की यात्रा रेल द्वारा । मधुबनी में जो कुछ सुविधाएं दुविधाओं जैसी स्थिति में हमेशा से रहे हैं उनमें से एक मधुबनी का बस स्टैंड भी है । बस थोडे से स्थान किसी तरह ठूंस ठास कर दस बसों को खडा करने की जगह थी उसमें । बरसात के दिनों में तो नीचे कीचड की लथपथ के बीच चमकती बसें किसी भी आधुनिक कलाकार को प्रेरित कर सकती थीं नई तरह की चित्रकारी के लिए । अब शायद सुना है कि ये किसी नई जगह पर बनाया जाने वाला है । सरकारी बस स्टैंड और उसकी बसें देखे तो एक युग बीत चुका था लोगों को ।


मधुबनी से बस ली , उन दिनों शाही तिरुपति ट्रैवेल्स की धूम थी जिसका नाम एक इस बात के लिए भी था कि उसकी बसें पटना का कह कर बीच रास्ते यानि मुज्फ़्फ़रपुर या दरभंगा में नहीं उतार देती थीं । सो सुबह सुबह ही पटना वाली टू बाई टू , नहीं शायद टू बाई थ्री थी , में बैठ कर निकल लिए पटना की ओर । सितंबर में पडने और महसूस होने वाली चिपचिपी गर्मी अपने उफ़ान पर थी । मधुबनी से निकल कर पटना जाने वाली बसों का एक प्रचलित रिवाज था । सवारी के लिए दरभंगा में दस मिनट रुकना , मुजफ़्फ़रपुर के किसी लाईन होटल पर खाने पीने के लिए रुकना , सो इस परंपरा को निभाते हुए हम भी बस में लदे हुए पटना पहुंच गए । उन दिनों का रेल का सफ़र भी कम रोमांचक नहीं होता था । सब कुछ रोमांच ही था , न ये पता होता था कि किस रेल से निकलना है न ये पता होता था कि बैठ कर जाना या खडे होकर ।

सीधा पटना से लखनऊ तक का जेनरल टिकट खरीदा गया । स्टेशन पर पहुंचे सैकडों परीक्षार्थियों के आने से से ये दुविधा तो समाप्त हो गई थी कि अब आगे कैसे निकलना है , किस ट्रेन से जाना है । जो भी ट्रेन मिली पहली लखनऊ की सब के सब उसी में लद गए । ऐसा लगा जैसे किसी टिड्डी या मधुमक्खी दल ने ट्रेन पर चिपक मार दी हो । ट्रेन में पटना से लखनऊ तक का वो सफ़र जिंदगी भर नहीं भुलाया जा सकता । पूरी ट्रेन में रत्ती भर भी जगह नहीं थी । बस पांव जमाने की जगह मिल गई तो बस वो अंगद का पांव बन गई जैसे , अजी चाह कर भी उसे हिलने हिलाने की जुर्रत नहीं की जा सकती थी । मगर उससे आगे निकलने वाला अपने साथियों में मैं शायद  अकेला ही था । लखनऊ पहुंच कर सबसे विदा लेकर आगे बढा ॥


    वहां पूछने पर पता चला कि , एक गलती कर चुका था, शनिवार की शाम तक वहां पहुंचा था और अगले दिन यानि रविवार को मेरी परीक्षा थी , तो यदि अब जरा भी देर किसी भी वजह से मुझे होती नैनीताल पहुंचने में तो निश्चित रूप से उस परीक्षा से मैं वंचित रह सकता था । अब उलटी गिनती शुरू हो गई थी .............

यदि आज ही पूरी पोस्ट लिख दी तो आप बोर हो जाएंगे ..इसलिए इसका अगला भाग कल । और अभी इस ब्लोग पर आगे कुछ दिनों तक यात्रा संस्मरण ही लिखने की कोशिश करूंगा , मेरा मतलब बस यही जो अभी लिख रहा हूं ॥

10 टिप्‍पणियां:

  1. कई बार ऐसा भी हुआ है कि छात्र परीक्षाओं के क्रम में जितना घूम लेते हैं,नौकरी के बाद फिर मुश्किल ही होता है। वैसे,नैनीताल जाने का प्रयोजन कुछ भी हो,बेहद खूबसूरत जगह है। फिर-फिर आने का निमंत्रण देता हुआ।

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  2. लगता हैं आगे के सफ़र में मजा आयेगा
    कहानी कोई नया ट्विस्ट लेगी

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  3. बहुत रोचक लगा अभी तक का सफ़र, चलिये आगे देखे क्या होता है. धन्यवाद

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  4. रोचक है ,भाई । अगले भाग का इंतजार

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  5. अरे वाह!
    यह एक मज़ेदार शुरूआत है
    जारी रखें

    बी एस पाबला

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  6. चलिए आप की मौजें पढने के लिए एक दम तैयार बैठा हूँ।

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  7. बहुत रोचक कल हे पोस्ट कर दीजिये अगला भाग.

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  8. नैनीताल का सफर है तो आगे पढना अच्‍छा ही लगेगा !!

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टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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