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प्रचार खिडकी

बुधवार, 11 जून 2008

बेटी और माँ, दोनों का बलातकार , माँ की ह्त्या और बेटी ने खुद्खुशी की

यूं तो अब इस समाज में ऐसी ऐसी खबरें नित्य ही पढने को मिल जाती हैं की किसी भी बात पर आश्चर्य नहीं होता और न ही अब ऐसा लगता है की यार यहाँ , अपने देश में ऐसा कैसा हो सकता है। चाहे मैं निठारी काण्ड की चर्चा न भी करूं, चाहे मैं हाल फिलहाल चर्चित आरूशी काण्ड की भी न चर्चा करूं , मगर फ़िर भी ऐसी अनेकों घटनाएं इस देश , इस राज्य और इस समाज में घाट रही हैं की मन अवाक और दुखी होकर यही सोचता है की यार ये हो क्या रहा है।

कल ही पंजाब के एक शहर में घटी एक ऐसी ही घटना ने अन्दर तक हिला कर रख दिया है। एक महिला अपने पाती और दो बेटियों के साथ किसी बड़े अधिकारी के पास पहुँची और उसे बताया की वो घर से जहर पी कर आयी है, जब तक उसे अस्पताल ले जाया गया वो मर चुकी थी। दरअसल हुआ ये था की , उस अभागन के पाती को पुलिस ने किसी भी झूठे या सच्चे अपराध के आरोप में थाने में बंद कर दिया था, जब वो महिला इस बारे में थाने में पता करने गयी तो वहाँ तैनात दो पुलिसकर्मियों ने उसे दारा धमका कर या शायद मार पीट कर उसके साथ बलात्कार किया। महिला वहाँ से बाहर जान बचा कर निकली और काफी भागदौड़ करने के बाद उन पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज करवा पायी। मगर मुकदमा दर्ज होने के बाद वही पुलिस वाले उसे और उसके पति को और भी धमकाने लगे। उनका किसी भी कानून ने कुछ नहीं बिगाडा और उस क़ानून पर विश्वास उत्थ जाने के बाद थक हार कर उस अभागन ने अपना जीवन समाप्त कर लिया। उसके पिटा ने बताया की कुछ वर्षों पहले इस अभागी महिला की माँ की भी बलात्कार के बाद ह्त्या कर दी गयी थी। मैं पूरी घटना के बारे में जानकर सन् रह गया। मेरे दिमाग में बहुत सी बातें अभी भी कौंध रही हैं।

अब जो उसकी दो बेटियाँ हैं, उनके लिए इस दुनिया का क्या मतलब रह जायेगा। जब उन्हें पता चलेगा की उनकी पिछली दो पीधीयाँ इस बहुत सभ्य , आधुनिक , तेज़ , समाज के हवास का शिकार हो गया। क्या वे भी इस बात का इंतज़ार नहीं करेंगी की कल को कोई ऐसा ही इंसानी भेदिया उन्हें अपना शिकार बना कर उनका जन्म सार्थक नहीं करेगा। पता नहीं सोचता हूँ तो दिमाग फट जाता है।

दरअसल बलात्कार के मामलों में जितने अलग अलग पहलू और बातें मेरे सामने आती रही हैं, उसमें मैं ख़ुद भी समझ नहीं पा रहा हूँ की आख़िर गलती कहाँ और क्या हो रही है। किसे दोष दें, किसे अपराधी माने , और कौन कौन दोषी नहीं है। यहाँ तो आलम ये बन चुका है की हर इंसान कब हैवान बन जाए , वो भी अकल्पनीय स्तर तक, कहा नहीं जा सकता। मैं जिस अदालत में कार्यरत हूँ सिर उसमें ही दस से अधिक मुक़दमे ऐसे चल रहे हैं जिनमें नाबालिग़ पुत्रियों ने अपने पिटा पर ही बलात्कार का आरोप लगा रखा है। फ़िर मैं उन महिलाओं और औरतों के बारे मैं भी सोचता हूँ जो खुले आम ढिंढोरा पीट पीट कर कहती हैं की " मुझे तो आक्रामक मर्द ही पसंद हैं, उका हर अंदाज़ दीवाना बना देता है "। उनसे कौन पूछता है की उनके ये आक्रामक मर्द कितने आक्रामक हो गए हैं और समाज ही आक्रामक हो गया है। मुझे नफरत है उनसे भी जो महिला अधिकारों का ढिंढोरा पीट पीट कर अपना प्रचार , नाम और दाम बनाने में लगे रहते हैं और ऐसे किसी भी मासूम की रक्षा कर नहीं पाते।


असलियत तो ये है की हम सब उस सभ्य युग में जी रहे हैं जहाँ हम सब जानवरों से भी अधिक जंगली और हिंसक हो गए हैं.

1 टिप्पणी:

  1. असलियत तो ये है की हम सब उस सभ्य युग में जी रहे हैं जहाँ हम सब जानवरों से भी अधिक जंगली और हिंसक हो गए हैं.
    sach kaha hai... aaj apno par hi vishwas karna bahut mushkil ho gaya hai.

    shubhkamnayen

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टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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