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प्रचार खिडकी

सोमवार, 2 जून 2008

हमने चिट्ठों को अपनी संतान बना रखा है (कविता )

जाने कब से,
अपने आसपास,
एक छद्म,
संसार बसा रखा है॥

हरकतों से,
पकड़े जाते हैं,
हैवानों ने भी,
इंसान का,
नकाब लगा रखा है॥

कोई बेच रहा,
धर्म, तो कोई ,
शर्म, और इमान,
कईयों ने तो जीवन को ही,
दूकान बना रखा है॥

बेदिली की ये,
इंतहा है यारों,
माओं ने कोख को,
बेटियों का,
शमशान बना रखा है॥

कितनी बेकसी,
का दौर है ये,
न दिल में जगह है,
न घर में,
लोगों ने मान-बाप को भी,
मेहमान बना रखा है॥

लपटें सी ,
उठ रही हैं,
शहर के हर घर से,
हमने इसीलिए,
गाओं में भी एक,
मकान बना रखा है॥

एक हम हैं, जो,
चेहरे पे नाम लिखा है,
कई मशहूर हैं इतने की,
गुमनामी को ही,
पहचान बना रखा है॥

अभी तो उँगलियों ने,
रफ़्तार नहीं पकडी है,
घरवालों की तोहमत है,
हमने चिट्ठों को अपनी,
संतान बना रखा है॥

अजय कुमार झा
9871205767

4 टिप्‍पणियां:

  1. अभी तो उँगलियों ने,
    रफ़्तार नहीं पकडी है,
    घरवालों की तोहमत है,
    हमने चिट्ठों को अपनी,
    संतान बना रखा है॥
    nice way to express

    उत्तर देंहटाएं
  2. हमने चिट्ठों को अपनी,
    संतान बना रखा है॥

    -अब तो तोहमत लग ही चुकी है. अब पालिये, पोसिये और बड़ा किजिये. शुभकामनाऐं.

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह झा साहब, बेहतरीन रचना । हम भी शामिल हैं आपकी कविता में । शुक्रिया ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. aap teeno kaa dhanyavaad. udantashtaree jee sahee kahaa apne ab to paalnaa hee padegaa, waise mujhe ummeed hai ki ek din yahee mujhe palega.

    उत्तर देंहटाएं

टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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