चारों तरफ़ एक अजीब,
हंगामा है बरपा,
मैं हर बार की तरह,
अब भी नहीं समझा,
आख़िर ये कैसा,
किसका चुनाव है ?
कौन साथ है किसके,
कौन किसके ख़िलाफ़ है,
कोई सोच विचार में,
कोई है मंझधार में,
दलदल में धंसा हुआ भी,
ख़ुद को कह रहा पाक साफ़ है॥
अब तो संदेह है , मुझे,
कि हम उन्हें चुनते हैं,
यूँ असलियत कुछ और है,
हर बार मछेरे ,
अलग अलग रंगों की डोरियों से,
उन्हीं मछलियों के लिए,
नए जाल बुनते हैं...
और आप हम सब उस जाल में , कभी अलग अलग, तो कभी एक साथ फंसते रहते हैं, क्यूँ है न ?
प्रचार खिडकी
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शुक्रवार, 20 मार्च 2009
गुरुवार, 30 अक्टूबर 2008
मंजर , यही हर बार रहता है .
माहौल कुछ ऐसा है,
या कि, अपनी,
आदत बन गयी है ये,
अब तो,
हर घड़ी,
इक नए दाह्से का,
इन्तजार रहता है,
हकीकत है ये,
कि बेदिली की इंतहा,
देखते हैं, पहला,
दूसरा पहले से,
तैयार रहता है,
घटना- दुर्घटना ,
हादसे-धमाके,
प्रतिरोध-गतिरोध,
बिलखते लोग,
चीखता मीडिया,
बेबस सरकार,
आंखों में मंजर यही,
हर बार रहता है........
हाँ, शायद आज यही हमारी हकीकत बन चुकी है , कि एक के बाद एक नयी नयी घटनाएं, सामने आती जाती हैं, पिछली हम भूलते जाते हैं, और अगले का इंतज़ार करते हैं, यदि दूसरों पर बीती तो ख़बर, अपने पर बीती तो दर्द....
या कि, अपनी,
आदत बन गयी है ये,
अब तो,
हर घड़ी,
इक नए दाह्से का,
इन्तजार रहता है,
हकीकत है ये,
कि बेदिली की इंतहा,
देखते हैं, पहला,
दूसरा पहले से,
तैयार रहता है,
घटना- दुर्घटना ,
हादसे-धमाके,
प्रतिरोध-गतिरोध,
बिलखते लोग,
चीखता मीडिया,
बेबस सरकार,
आंखों में मंजर यही,
हर बार रहता है........
हाँ, शायद आज यही हमारी हकीकत बन चुकी है , कि एक के बाद एक नयी नयी घटनाएं, सामने आती जाती हैं, पिछली हम भूलते जाते हैं, और अगले का इंतज़ार करते हैं, यदि दूसरों पर बीती तो ख़बर, अपने पर बीती तो दर्द....
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