इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

प्रचार खिडकी

रविवार, 23 जुलाई 2017

बहुत गहरी हैं ये आँखें मेरी



चंद बिखरे सिमटे आखर , बेतरतीब ,बेलौस से , बात बेबात कहे लिखे गए , उन्हें यूं ही सहेज दिया है ........




दो दरखत एक शाख के , एक राजा की कुर्सी बनी दूसरी बुढापे की लाठी 







रविवार, 2 जुलाई 2017

घर मेरे भी ,बिटिया किलकने लगी है


अब नर्म धूप,
मेरे आँगन भी,
उतरने लगी है।
टिमटिमाते तारों की रौशनी,
और चाँद की ठंडक,
छत पर,
छिटकने लगी है।
पुरबिया पवनें,
खींच लाई हैं,
जो बदली , वो,
घुमड़ने लगी है।
दर्पर्ण मांज रहा है,
ख़ुद को,
आलमारी भी,
सँवरने लगी है ।
फूलों के खिलने में,
समय है,
कलियों पर ही,
तितलियाँ,
थिरकने लगी हैं।
शायद ख़बर,
हो गयी सबको,
घर मेरे भी, बिटिया,
किलकने लगी है.......
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