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प्रचार खिडकी

रविवार, 23 जुलाई 2017

बहुत गहरी हैं ये आँखें मेरी



चंद बिखरे सिमटे आखर , बेतरतीब ,बेलौस से , बात बेबात कहे लिखे गए , उन्हें यूं ही सहेज दिया है ........




दो दरखत एक शाख के , एक राजा की कुर्सी बनी दूसरी बुढापे की लाठी 







9 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. आहा दादा आपका स्नेह और आशीष यूं ही बना रहे |

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  2. बहुत कमाल का लिखा हुआ है ...

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपका शुक्रिया और आभार दिगंबर जी , स्नेह बनाए रखियेगा

      हटाएं
  3. बेहतरीन बिखरे आखर .... अनाम आदमी कब से हो गए ?

    उत्तर देंहटाएं

टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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