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प्रचार खिडकी

रविवार, 26 दिसंबर 2010

मुद्दत से एक पूरी जिंदगी ढूंढता हूं मैं ....





जीने को जी ही रहा हूं रोज़ कतरा कतरा ,
मुद्दत से एक पूरी जिंदगी ढूंढता हूं मैं ....


आसमां तो चूम लिया कब का ,.................


बुधवार, 22 दिसंबर 2010

नई दुनिया ,में प्रकाशित मेरा एक लघु आलेख ...



आलेख को पढने के लिए उस पर चटका लगा दें । छवि अलग खिडकी में बडी होकर खुलेगी





मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

ओह वो चम्मच भर हॉर्लिक्स पावडर ...अमूल स्प्रे की याद दिला गया




कल . बेटे के दूध में हॉर्लिक्स पावडर मिलाते समय . अचानक ही एक चम्मच अपने मुंह में ले बैठा ....ओह याद आ गई हो बचपन की दुनिया । याद है कैसे पहली पहली बार जब वो दूध का पावडर चलन में आया था ...चाय बनाने के लिए इंस्टैंट दूध .....अजी तब फ़्रिज का जमाना कहां था कि दूध के फ़टने का डर नहीं ..सो जैसे ही ये बाजार में उपलब्ध हुआ ...बहुत जल्दी ही लोकप्रिय हो गया । और शायद इसके साथ ही बच्चों के लिए भी दूध का पावडर आ गया होगा , मगर उस समय वो बिल्कुल भी चलन में नहीं था ।

खैर बडों की चाय के लिए दूध की आवश्यकता के बहाने जो अमूल स्प्रे का डब्बा आता था , वो रसोई में हम बच्चों के लिए उसी तरह का एक आकर्षण का आईटम था जैसे गुड की भेली , या फ़िर पकी हुई इमलियां जिसे नमक लगा के चटखारे के साथ चाटते थे ..और ऐसा ही कुछ कुछ होता था , जब नज़र पडती थी ..कॉम्प्लान , हॉर्लिक्स , और बोर्नवीटा के डब्बे पर ..कब चम्मच निकला और कब गपाक से एक चम्मच वो पावडर ...ओह मुंह में जाते ही तलुवे से , जीभ से और लाख बचाने के बाद भी होठों से भी चिपक जाता था ...क्या बात थी उस अनोखे स्वाद की ..अब तो पता नहीं बच्चे ये करते हैं कि नहीं?????

...आखिर वो स्मार्ट पीढी है ....मैं ये सोच ही रहा था कि ..बेटा आ खडा हुआ ....अच्छा पापा आज आप भी ..वाह कल से दोनों जन उडाएंगे ..एक एक चम्मच हॉर्लिक्स पावडर ......हा हा हा हम देर तक हंसते रहे

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

दैनिक महामेधा दिल्ली में प्रकाशित मेरा एक लघु आलेख .....

आज के दैनिक महामेधा दिल्ली , में प्रकाशित मेरा एक आलेख जिसे आप मेरे ब्लॉग आज का मुद्दा पर एक पोस्ट के रूप में पढ चुके हैं । चित्र को बडा करके पढने के उस पर चटका लगा दें और खुलने वाली छवि को चटका कर बडा करके आराम से पढा जा सकता है

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

मां तेरे जाने के बाद ......फ़िर अगले जनम का इंतज़ार है मुझे ...




मां तेरे जाने के बाद ,
मुझे "मां "कहना भी ,
क्यों अजीब लगता है ?
जैसे ही,
करते हैं कोशिश ,
ये होंठ ,
एक कतरा आसूं का ,
बैठा आखों के करीब लगता है ॥॥
मां ,अब जाता हूं ,
जो घर कभी ,
मुझे मालूम है कि ,
अब मुझे,
हर स्टेशन से फ़ोन करके ,
ये नहीं बताना पडता कि ,
मैं पहुंचा कहां हूं ,
मुझे पता है कि ,
घर पर अब ,
सबको ये मालूम है कि ,
खाना तो मैं ,
सफ़र में ही खा लूंगा ,
और कोई मेरा ,
अब देर रात तक इंतज़ार नहीं करता ॥॥
मां , तेरे जाने के बाद ,
अक्सर ही ,
मुझे अकले बैठे पिताजी ,
याद दिलाते हैं कि ,
कौन सी ,वो जगह थी ,
जो खाली हो गई है ॥
मां , देख न तू ,
हुई कितनी निर्मोही ,
छोड गई ढेर सारे ,
भगवान मेरे लिए ,
मगर एक अकेली ,
तू ही नहीं रही,पास मेरे ॥॥
मां , अब तो मुझे ,
उम्र ये बहुत भारी लगती है ,
अब तो मुझे फ़िर से ,
इक अगले जनम
का इंतज़ार है ...
मां मिलेगी न
अगले जनम भी .
मां बनके .......मिलेगी न ......मिलेगी न ...????????



बुधवार, 17 नवंबर 2010

मेरा कुछ सामान खो गया है ....तलाशने वाले को मेरी तरफ़ से खुशियों का एक कतरा दिया जाएगा ...




आप सोच रहे होंगे कि मैंने ये कौन सी मुनादी करवा दी ?? क्या करूं जब मेरे लाख कोशिश करने के बाद भी मुझे मेरी ये खोई हुई चीजें नहीं मिल पा रही हैं तो फ़िर आप दोस्त किस काम के जी यदि आप मेरी ये चीज़ें मुझे ढूंढ कर न दे सकें तो । आज सुबह सुबह एक कौआ मुंडेर पर आकर बैठ गया हालांकि अब राजधानी में कौव्वे भी आपको राष्ट्रमंडल खेल आदि जैसे बडे आयोजनों की तरह ही कभी कभी दिखाई देते हैं ।मगर यकायक ही मुझे अपनी एक सबसे प्रिय पक्षी का ध्यान आ गया जिसके साथ मैं बचपन में खूब खेला करता था । जी हां वही छोटी सी शैतान सी चंचल सी अपनी गोरैया ...ओह जाने कितने बरस बीत गए अब तो उसे देखे हुए ...मन दुख और वितृष्णा से भर गया ...मैंने सोचा कि चलो कोई बात नहीं मैना को ही तलाशते हैं , मगर अफ़सोस कि वो भी नहीं दिखी कहीं



इसके बाद सोचा घर से बाहर निकला जाए और आसपास के बाग बगीचों में तितली को ही ढूंढा जाए और देखा जाए कि तितली कितनी बदली है । अजी मिलती तो देख भी लेते ........मगर अफ़सोस कि वो भी कहीं नहीं दिखी । हद है यार मैं थक हार कर वापस घर आ गया । फ़िर जेहन में एक ख्याल कौंधा कि देखूं तो सही कि कौन कौन सी वो चीज़ें थीं जिन्हें देखे मुझे एक अरसा हो गया है






पहला ख्याल आया वही पुराने ट्रिन ट्रिन का उसका भारी सा रिसीवर जब बचपन में हम उठाते थे तो अगर कान के पास लगाते थे तो मुंह के नीचे चला था नीचे वाला गोला और मुंह के पास लगाते थे तो फ़िर कान से बहुत ऊपर ही रह जाता था और बारी बारी से ऊपर नीचे करके फ़ोन किया सुना करते थे । नंबर डायल करते समय वो किर्र किर्र की खास आवाज़ ...ओह अरसा हो गया उसे सुने हुए


हा हा हा अशोका ब्लेड को कौन भूल सकता है भला । उस समय का शायद ही कोई युवक होगा जिसने अशोका ब्लेड को पहली बार अपनी ठुड्डी पर फ़ेरते हुए बिल्कुल राजा अशोक की तरह वो गर्व वाली फ़ीलिंग महसूस न की होगी
हाय वो तांगे में बैठ कर पूरे शहर की सवारी का लुत्फ़ । टुन टुन करके बजती घोडे जी की घंटियों की ध्वनि अब इस वातानुकूलित कार के स्टीरियो से कहीं भली लगती थी जी





ओह क्या क्या याद करूं ...और क्या क्या भूलूं ॥तो ला सकते हैं आप ढूंढ कर मेरे लिए मेरी ये चीज़ें ....देखिए ईनाम पक्का है ...

शनिवार, 13 नवंबर 2010

दिल्ली ब्लॉगर सम्मेलन की जैसी प्रेस रिलीज मैंने भेजी ......झा जी रिपोर्टिंग सर ...


आज दिनांक १३ नवंबर ,२०१० को दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित , NATIONAL INSTITUE OF NATIONAL AFFAIRS , प्रवासी टुडे के तत्वाधान में हिंदी संसार एवं नुक्कड ( सामूहिक ब्लॉग ) द्वारा आयोजित हिंदी ब्लॉग विमर्श सफ़लतापूर्वक ,संपन्न हुआ । अपराह्न तीन बजे से लेकर पांच बजे तक आयोजित सम्मेलन के मुख्य अथिति , प्रवासी भारतीय कनाडा निवासी प्रमुख ब्लॉगर व साहित्यकार , श्री समीर लाल उर्फ़ उडनतश्तरी ( इनके ब्लॉग का नाम ) थे और विशिष्ट अथिति के रूप में , प्रख्यात व्यंग्यकार श्री प्रेम जनमेजय और विख्यात तकनीक विशेषज्ञ लेखक श्री बालेन्दु दधीच जी ने अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई । कार्यक्रम के संयोजक की भूमिका जहां विख्यात साहित्यकार अविनाश वाचस्पति ( नुक्कड , सामूहिक ब्लॉग के मॉडरेटर ) ने निभाई तो संचालन का जिम्मा श्री अनिल जोशी जी जो हिंदी संसार एवं अक्षरम से जुडे हैं , ने संभाला । इनके अलावा सुश्री सरोज जी ने भी इस कार्यक्रम के संयोजन में बहुत ही महोत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।इस कार्यक्रम में दिल्ली एवं आसापस के लगभग चालीस ब्लॉगर्स ने शिरकत की तो वहीं विख्यात मीडिया रिसर्च स्कॉलर श्री सुधीर के नेतृत्व में लगभग पच्चीस मीडिया शिक्षार्थियों ने अपनी सक्रिय भागीदारी की । संगोष्ठी में हिस्सा लेने वाले ब्लॉगर्स में , विख्यात कवि एवं साहित्यकार सुश्री सुनीता शानू, डॉ वेद वयथित ,सुरेश यादव , हिंदी अंतर्जाल पर महिलाओं की प्रतिनिधित्व करता नारी सामूहिक ब्लॉग की मॉडरेटर सुश्री रचना , पत्रकार बिरादरी से सुश्री प्रतिभा कुशावाहा और श्री मयंक सक्सेना , के अलावा लगभग चालीस प्रसिद्ध ब्लॉगर्स , जैसे श्री सतीश सक्सेना , डॉ टी एस दराल , श्री अरविंद चतुर्वेदी , श्री एम वर्मा , श्री रतन सिंह शेखावत , श्री पद्म सिंह , श्री नीरज जाट , श्री शाहनवाज सिद्दकी , श्री राजीव एवं संजू तनेजा , श्री तारकेश्वर गिरि , श्री अजय कुमार झा , श्री कनिष्क कश्यप , श्री कौशल मिश्रा , श्री नवीन चंद्र जोशी , श्री मोहिन्द्र कुमार ,, श्री निरमल वैद्य , श्री पंकंज नारायण श्री दीपक बाबा , श्री राम बाबू , श्री अरुण सी रॉय , सुश्री अपूर्वा बजाज के अलावा सुधीर जी की एक शिक्षार्थी सुश्री रिया नागपाल ने जो ब्लॉगिंग पर ही रिसर्च कर रही हैं , ने आभासी परिचय को प्रत्यक्ष अनुभव में बदलते हुए न सिर्फ़ एक दूसरे को जाना बल्कि ब्लॉगजगत के वर्तमान और भविष्य को लेकर आपस में विचार विमर्श भी किया ।


कार्यक्रम का संचालन करते हुए श्री अनिल जोशी ने , पहले तीनों माननीय अतिथियों को पुष्प गुच्छ प्रदान करवाते हुए उनका हार्दिक स्वागत किया । कार्यक्रम के प्रारंभ में , विख्यात मीडियाकर्मी एवं ब्लॉगर श्री खुशदीप सहगल जी के पूज्य पिताजी के हाल हीं हुए निधन पर दुख प्रकट करते हुए एक मिनट का मौन रखा । इसके पश्चात औपचारिक परिचय और संक्षिप्त विचार आदान प्रदान का दौर चला । स्वागत भाषण श्री अविनाश वाचस्पति जी दिया । विशेष रूप से आमंत्रित तकनीक विशेषज्ञ लेखक श्री बालेन्दु दधीच जी ने अपनी बात रखते हुए हिंदी ब्लॉगिंग की वर्तमान स्थिति , रुझान , समस्याएं , संभावानाओं आदि पर खुल कर बोलते हुए न सिर्फ़ ब्लॉगर्स को आंकडों की भाषा में बताया समझाया बल्कि कई बारीकियों को भी साझा किया । माहौल को कवितामय करते हुए उन्होंने ब्लॉगर्स और ब्लॉगिंग पर करारी चुटकी लेते हुए एक कविता सुनाई जिसका रसास्वादन सभी ने उठाया । बीच में बीच में अल्पाहार और चाय कॉफ़ी का दौर भी चलता रहा । प्रख्यात व्यंग्यकार श्री प्रेम जनमेजय ने कहा कि वे इस क्षेत्र में नए हैं इसलिए सबका साथ अपेक्षित है । प्रवासी भारतीय और हिंदी ब्लॉगिंग के सुपर स्टार माने जाने वाले अत्यधिक लोकप्रिय श्री समीर लाल उर्फ़ उडनतश्तरी ने अपने मस्तमौला अंदाज़ में बोलते हुए न सिर्फ़ अपने अनुभव बांटे , बल्कि वहां मौजूद ब्लॉगर्स एवं शिक्षार्थियों के उत्सुक प्रश्नों का उत्तर दिया । सभी इस निष्कर्ष से सहमत थे कि आने वाले समय में हिंदी ब्लॉगिंग एक बडी ताकत के रूप में उभर कर सामने आएगा । इसलिए ब्लॉगिंग करने वाले हर ब्लॉगर को एक जिम्मेदारी का स्वत: एहसास होना चाहिए । लगभग तीन घंटे तक चली इस संगोष्ठी में सौहार्दपूर्ण वातावरण में सभी ने ब्लॉगिंग के विभिन्न आयामों पर चर्चा की । वर्षांत पर और कई संगोष्ठियों के आयोजन की सूचना भी श्री अजय कुमार झा ने दी ।

बुधवार, 10 नवंबर 2010

दैनिक विराट वैभव (दिल्ली ) में प्रकाशित मेरा एक आलेख ...अजय कुमार झा

वर्ष २००७ में ,ये आलेख , मेरे उपनाम , अजय रमाकांत ( उन दिनों मैं अजय रमाकांत के नाम से लिखा करता था ) से प्रकाशित हुआ था । आलेख को पढने के लिए उस पर चटका लगा दें , और छवि को और बडा करने के लिए दोबारा चटका दें ,और फ़िर आराम से उसे पढ सकते हैं ।

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

एक अमवस्या जो अंधेरी नहीं होती थी ...जिसे दीवाली मनाते थे हम







काश अबकि ,फ़िर वही
मनाऊं दीवाली ,
जो कभी मनाते थे हम
दशहरे के बाद से ही
जाने कितनी बार ,
किताब में से
आई दीवाली रे कविता ,को
जोर जोर से पढ जाते थे हम
वो दस दिन पहले से ही
घर के कोने
कोने की सफ़ाई ,
और कैसे मां का हाथ बटाते थे हम ,
फ़िर कुछ इधर उधर
खिसका के टेबल पलंग ,
दीवाली में घर का नया लुक लाते थे हम ,
रंगीन कागज पन्नी
से भी क्या खूब घर को सजाते थे हम ,
और मुझे याद है अब तलक हाय ,
सिर्फ़ दस पैसे में ही,
क्या खूब लंबी
पटाखा लडी लाते थे हम ,
दीवाली के दिन की वो चहल पहल ,
रसोई की खुशबू से
पूरा दिन मदमाते थे हम ,
कहां लेते थे
हर बार नए कपडे भी ,
बहुत बार पुराने में ही
दीवाली मनाते थे हम ,
और फ़िर वो शाम दीवाली की ,
छतो,छत्तियों और
परछत्तियों पर दीप जलाते थे हम ,
सबसे बाद तक
फ़ोडेंगे पटाखे , इसलिए ,
कितने ही जतन से
पटाखों को छुपाते थे हम ...
और फ़िर दीवाली की वो रात तक ही
कहां खत्म होती थी दीवाली भी ,
अगली सुबह अधफ़ूटे बचे
पटाखों भी तो ढूंढ लाते थे हम ...


काश कि फ़िर वो दीवाली मना पाऊं कभी .........काश कि ये मुमकिन हो कभी ....काश काश काश !!!!

दीवाली की बहुत बहुत मुबारकबाद दोस्तों , इस दीपों के पर्व पर हर दीप से निकला उजाला सबके तन मन आंगन , वन उपवन ,नंदन कानन, जीवन, सब प्रकाशमय और ओजपूर्ण हो जाए ..दीवाली की मुबारकबाद कायनात के हर कतरे को और हर कतरे की तरफ़ से सबको दीवाली की मुबारकबाद..........

शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2010

क्या ब्लॉगजगत को वाकई एक एग्रीगेटर की कमी खल रही है ..????




ब्लॉगवाणी के बंद होने के बाद कुछ दिनों तक अफ़रातफ़री का माहौल रहा ....इसके कुछ दिनों बात थक हार कर फ़िर से अटकलों / अफ़वाहों का दौर चला । अब उस समय को बीते काफ़ी समय हो चुका है और यदि लोग ब्लॉगवाणी को नहीं भी भूल सके हैं ( जबकि मुझे विश्वास है कि एक हिंदी ब्लॉगर शायद ही कभी एक एग्रीगेटर के रूप में ब्लॉगवाणी की सेवा को भूल सके ) तो कम से कम उसके लिए मायूस हताश नहीं दिखते । मगर इन सबके बावजूद अक्सर ब्लॉगर्स और पाठकों की एक शिकायत गाहे बेगाहे सुनने को मिल ही जा रही है कि पाठक कम हो गए हैं ..या कम से कम टिप्पणियों के आने पर अंतर पडा है । और कम से कम मेरे से ये दलील आसानी से गले नहीं उतारी जाती कि टिप्पणी का कोई फ़र्क नहीं पडता । पडता तो है जनाब ....क्या और कितना ये तो सबके अपने अपने पैमाने हैं ।

इधर हालफ़िलहाल ..कई नए मित्र एग्रीगेटर्स भी आ गए हैं । हमारीवाणी , इंडली , और ब्लॉगप्रहरी जो नए रूप में सामने आया है । इनके अलावा ढेर सारे निजि और सार्वजनिक फ़ीड एग्रीगेटर्स भी हैं जो अपनी सेवा दे रहे हैं । मगर इन सबके बावजूद एक एग्रीगेटर की कमी तो जरूर खल रही है ..और यकीनन बेहद खल रही है । एक एग्रीगेटर जो ब्लॉगवाणी की तरह तेज़ हो ..ढेर सारी पोस्ट फ़ीड को पहले ही पन्ने पर समेटे हुए हो । फ़िर चाहे अपनी तमाम खूबियों कमियों को वो रखे या हटाए ।

हालांकि वर्तमान में चिट्ठाजगत ही सबका इकलौता प्रिय एग्रीगेटर है और उसकी कई अनोखे और विशिष्ट सुविधाएं हैं मगर कभी कभी ये धीमा लगता है और ऐसा भी महसूस होता है कि इसके कलेवर में भी थोडा बहुत बदलाव किया जाना चाहिए मसलन उसकी कई सूचियां अभी भी अद्यतित नहीं हैं या काफ़ी पुरानी हैं । तो आपको क्या लगता है कि क्या ये कमी मुझे ही महसूस हो रही है या आप सबको भी ..........


मुझे तो इंतज़ार है एक ऐसे ही मनपसंद एग्रीगेटर का .....और आपको ???????

रविवार, 10 अक्तूबर 2010

शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

दबाव में है बचपन : दैनिक आचरण सागर (मध्य प्रदेश ) में प्रकाशित मेरा एक आलेख






आलेख को पढने के लिए बस उस पर चटका लगा दें , आलेख खुद ही अलग खिडकी में खुल कर बडा हो जाएगा और आप उसे आराम से पढ सकते हैं ॥

गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

दैनिक विराट वैभव (दिल्ली ) में प्रकाशित मेरा एक आलेख ...









आलेख को पढने के लिए उस पर चटका लगा दें , छवि बडी होकर अलग खिडकी में खुल जाएगी

बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

दैनिक विराट वैभव , दिल्ली में प्रकाशित मेरा एक आलेख ........






आलेख पर चटका लगाने से ये अलग खिडकी में खुल जाएगा और छवि को आराम से पढा जा सकता है




शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

पोस्ट लिखिए और नोट छापिए ......अरे सच्ची मुच्ची यार .....झा जी लिखिन ..


अब तक हम आपको ..अपने आलेखों की प्रतियां ..यहां छाप छाप के ....जबरिया पढाते रहे हैं न ........चलिए आज आपको ...पोस्ट , प्रैस , और फ़िर पोस्ट के चक्र ...और उस बीच में नोट वर्षा के बारे में बताते हैं । देखिए कित्ता आसान है ...पहले ..आप पोस्ट लिखिए ..। अरे पोस्ट का मतलब पोस्ट ही होना चाहिए ...ये न हो कि ..पोस्ट के बदले ..पोस्टमार्टम ...हो ..। इसके बाद उसकी कॉपी को आप सभी संपादकों ( समाचार पत्रों , साप्ताहिकों , और पत्रिकाओं के ) को मेल कर दें । ध्यान रहे कि साथ में आपका शपथ पत्र अवश्य होना चाहिए कि , साथ संलग्न रचना , मौलिक रूप से आपकी ही है , और इसका कोई भी अंश या पूरा आलेख कहीं अन्यत्र से नहीं लिया गया है । बस आपका काम खत्म , रचना के छपते ही ..एक तो वो लाखों पाठकों के बीच पहुंच जाता है .....छपने के बाद आप उसे पुन: पोस्ट के रूप में अपने ब्लॉग पर लगा सकते हैं , ताकि उससे दूसरे भी प्रेरणा ले सकें ....दूसरा फ़ायदा ये कि ...मीटर डाऊन ...सो मजे से चैक का इंतज़ार करिए ।

अब भईया ..गूगल बाबा का अकाऊंट तो साला पहले ही टैं बोला हुआ है ..कम से कम ..हम हिंदी ब्लॉगर्स के लिए तो जरूर ही ...सो यही सही ..क्यों क्या ख्याल है आपका । लिजिए...फ़ॉर योर रेडी रेफ़रेंस .....एक ठो ताजा ताजा आए चैक का नमूना इहां पेश किए दे रहे हैं ... अभी पिछले महीने जागरण जंक्शन का ग्यारह सौ का चैक वाला ईनाम तो आपको याद ही होगा .....तो बस शुरू हो जाईये ...और कौनो दिक्कत हो ..तो ..हम हूं न .....

बुधवार, 29 सितंबर 2010

दैनिक हरिभूमि में , प्रकाशित मेरा एक आलेख

आलेख को पढने के लिए उस पर चटका लगा दें , खुली हुई छवि को आराम से पढ सकते हैं ।

शनिवार, 25 सितंबर 2010

पितृपक्ष और मां की आत्मा की तृप्ति .........अजय कुमार झा

मेरी मां


"हैलो ! भईया मैं संजय बोल रहा हूं ...सुनिये , पितृ पक्ष चल रहे हैं न , तो तिथि के अनुसार आज मां के लिए तर्पण करना था , ब्राम्हणों को खाना खिलाना था . दान पुण्य करना था । मगर आपको तो कुछ पता ही नहीं होगा न ....आप कौन सा सबके टच में रहते हैं , किसी से बात भी नहीं होती ज्यादा आपकी । वैसे तो ये आपका ही फ़र्ज़ है , मगर छोडिए आप लोग भी न ????" कह कर उसने फ़ोन काट दिया ।

एक सन्नाटा पसर गया था कमरे में , तभी सामने टेबल पर रखी मां की फ़ोटो से आवाज आई , " बेटे , क्या सोच रहा है । मेरे जाने के बाद जिस तरह से तू पिताजी की सेवा कर रहा है , उनका ध्यान रख रहा है ..उसे देख कर मेरी आत्मा तृप्त हो गई है बिल्कुल , तू चिंता मत कर मेरे लाल , बस पिताजी का ख्याल यूं ही रखते रहना ...बहुत बहुत प्यार और आशीर्वाद "

मां और पिताजी की एक तस्वीर , जब पिताजी रिटायर होकर आए थे
मैं अब निश्चिंत था कि , मुझे मां की आत्मा की तृप्ति के लिए ...अब किसी पितृपक्ष का मोहताज नहीं रहना होगा .....

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

शॉपिंग मॉल की हसीन शाम : ( दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित मेरा एक व्यंग्य )




व्यंग्य को पढने के लिए उस पर चटका लगा दें , और मजे से पढें ............






बुधवार, 22 सितंबर 2010

मेरे कॉलम "ब्लॉग हलचल " में , न्यायालीय फ़ैसले का ज़िक्र करती हुई , शब्द - संसद , गपशप का कोना , नेपथ्यलीला ,पंचर टायर और सवाल आपका है...ब्लॉगस की पोस्ट का ज़िक्र



दिल्ली से प्रकाशित साप्ताहिक "अभी तक क्राईम टाईम्स "में मेरे कॉलम में "ब्लॉग हलचल " में , न्यायालीय फ़ैसले का ज़िक्र करती हुई , शब्द - संसद , गपशप का कोना , नेपथ्यलीला ,पंचर टायर और सवाल आपका है...ब्लॉगस की पोस्ट का ज़िक्र । यहां मैं मित्रों/पाठकों को बता दूं कि पिछले कुछ समय से इस कॉलम को स्थगित कर दिया था , कुछ कारणों से , किंतु अब पुन: इसे सक्रिय करने जा रहा हूं । आगामी विषय होंगे "अयोध्या पर फ़ैसला " , कशमीर प्रकरण , और राष्ट्रमंडल खेल आदि ।

पढने के लिए उस पर चटका लगा दें और अलग खुली खिडकी में आराम से पढें ।

सोमवार, 20 सितंबर 2010

हिंदी दिवस पर लिखा गया और हरिभूमि में मेरा एक प्रकाशित लेख, दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित एक व्यंग्य



दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित एक आलेख






दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित एक व्यंग्य


दोनों ही कतरनों को पढने के लिए उस पर चटका लगा दें, छवि बडी होकर अलग खिडकी में खुल जाएगी और आप सुविधानुसार उसे पढ सकते हैं ॥

रविवार, 19 सितंबर 2010

बुजुर्ग : अनुभवी ,अनमोल, मगर उपेक्षित : दैनिक सच कहूं सिरसा में प्रकाशित मेरा एक आलेख


आलेख को पढने के लिए उसे चटकाने पर जो पृष्ठ खुले , उसे चटका कर आराम से पढा जा सकता है .........

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

ओह ! वो श्वेत श्याम फ़ोटो का जमाना ...



यूं तो अपने उस पिछले जमाने की बात ही कुछ और थी .....बेशक आज का जमाना भी आगे शायद इसी तरह याद किया जाए ...हालांकि जितनी तेज ये दुनिया भाग रही है उसमें मुझे शक है कि ....आने वाली दुनिया के पास इतना वक्त भी होगा कि नहीं .....मगर इसमें कोई संदेह नहीं कि ...वो जो जमाना था न रेट्रो वाला ...........आहाहा .......सोच सोच के ही मन आनंदित हो जाता है ...उस जमाने के हर बात में ...एक बात थी ..चलिए छोडिए ...।


आज अचानक अपनी कुछ श्वेत श्याम फ़ोटुएं हाथ लग गईं ...तो ध्यान आया कि ..क्या क्रेज़ हुआ करता था फ़ोटुओं का ..। उस समय फ़ोटुओं से जुडी भी एक अलग ही दुनिया होती थी ...और कुछ भयंकर युनिवर्सल टाईप की प्रथाएं थीं .....जैसे कि विवाह के पश्चात ..स्टूडियो जाकर ..सपत्नीक एक फ़ोटो खिंचवाना ....और हां उसकी तीन कॉपी होना जरूरी था .....एक लडके के घरवालों के लिए , एक लडकी के घर के लिए ....और एक जोडे के लिए भी ....। पासपोर्ट साईज़ की फ़ोटो भी बडे चाव से खींची खिंचाई जाती थी ...। और आजकल का डिजिटल जमाना नहीं कि जब मन किया बार बार क्लिक करके खींचते रहे ..सजा संवार के ........जब तक कि थोबडा ..एकदम हीरो हीरोईन सा न दिखे ..। तब तो एक क्लिक और हो गया ....या तो बोलो राम ....या फ़िर पक्का राम राम ।



उन्हीं दिनों की एक फ़ोटो आपके लिए यहां चेपे जा रहा हूं .....देखिए और बताइए कि मैं इसमें कहां हूं ?????




रविवार, 12 सितंबर 2010

ऑपरेशन वसूली ( पंजाब केसरी में प्रकाशित मेरा एक व्यंग्य )






व्यंग्य को पढने के लिए उस पर चटका लगाने से
जो छवि खुलेगी उसे आप चटका कर आराम से पढ सकते हैं

शनिवार, 11 सितंबर 2010

दैनिक पंजाब केसरी में प्रकाशित मेरा एक फ़ीचर

चित्र पर क्लिक करने पर उसे चटका के बडा करके आप उसे पढ सकते हैं । ये शायद २००७ में प्रकाशित हुआ था

शनिवार, 21 अगस्त 2010

हर वक्त ! इश्कियाने को जी चाहता है......अजय कुमार झा

है मौसम का सुरूर ,या
कि तेरी नज़रों का कसूर,
हर वक्त,
इश्कियाने को जी चाहता है .............

या मैं हो जाऊं फ़ना तुझमें ,
या तू ही कुर्बान हो जा,
कयामत तक इसे ही,
आजमाने को जी चाहता है .........

नहीं मुझे परवाह,
अब दुनिया ए दौर की,
तेरी नज़रों से,
खुद को सजाने को जी चाहता है........

मुझे फ़िक्र है दस्तूरों ,
और, बंदिशों की, मगर ,
करूं क्या कि जी ,
बस यही ,और यही चाहता है ........

मैंने कब कहा कि ,
ये कुफ़्र नहीं है , होगा शायद,
ये तो दिल ही जाने ,
कब गलत, कब सही चाहता है ........

इस कमबख्त दिल की,
फ़ितरत ही कुछ ऐसी है,
जो मिलना हो मुश्किल
अक्सर , ये वही चाहता है ........

तैयार है हर दिल यहां ,
कोई उडने को आसमान,
तो कोई भाग चलने को,
इक ज़मीं चाहता है ..............

हा हा हा ...........ये दिल बेइमान ....ये दिल बेलगाम...........ये दिल .......छोडो यार .........हा हा हा ..


रविवार, 1 अगस्त 2010

अपने ही घर में मुझे सब , मेहमान बना देते हैं............अजय कुमार झा


बस्तियां खाली करवाने को ,
वो अक्सर उनमें ,
आग लगा देते हैं ॥

उतनी तो दुश्मनी नहीं कि ,
कत्ल कर दें मेरा , इसलिए ,
रोज़ , ज़हर ,बस ,
ज़रा ज़रा देते हैं ॥

मैंने कब कहा कि , गुनाह को ,
उकसाया उन्होंने , वे तो बस ,
मेरे पापों को , थोडी सी,
हवा देते हैं ॥

वो जब करते हैं गुजारिश ,
अपने घर आने का,
हर बार जाने क्यों ,
इक नया पता देते हैं ॥

मैं ठान लेता हूं , कई बार ,
अबकि नहीं मानूंगा ,
नई अदा से वो , मुझको,
हर बार लुभा लेते हैं ॥

जख्मों से अब दर्द नहीं होता ,
कोई टीस भी नहीं ,
पर जाने क्यों जखमों के,
निशान रुला देते हैं ॥

जब भी जाता हूं गांव अपने ,
ऐसी होती है , खातिर मेरी ,
अपने ही घर में मुझे सब ,
मेहमान बना देते हैं ॥

सिलसिला टूटता नहीं ,उनपर ,
मेरे विश्वास का , पुरानी को छोड,
रोज़ एक नई ,
कहानी सुना देते हैं ॥

रविवार, 11 जुलाई 2010

ये मन बावरा ...........हा हा हा...



बाहें फ़ैलाए ,
आज तो , ऊपर से ,
आती हरेक बूंद को ,

बाहों ,में,
समेट लेने का मन है ............

इस रुत को,
इन हवाओं और ,

फ़िज़ाओं को ,

इन घने काले बादलों को ,
तन से ,
लपेट लेने का मन है .............

बारिश में धुला हुआ,

इक फ़ूल , या ,
की मेंढक के ,
छोटे बच्चे ही सही ,
बारिश में ,

भीगा अपना रूमाल , पोंछने को ,
उन्हें ,किसी रोज़ ,
भेंट देने का मन है ............

आज नहीं भा रहा है ,

कोई फ़ास्ट फ़ूड ,

कोई स्पेशल डिश भी नहीं ,

मुद्दत हुए जो किए ,
आज वैसे ही ,
घर में,
पकौडों के लिए,
बेसन फ़ेंट , लेने का मन है ................



ओह ............ये मन बावरा ..................हा हा हा हा हा .......ये बारिश की बूंदें ........




शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

तैयारी पूरी है (व्यंग्य) ..........अजय कुमार झा





जैसे ही खबर फ़ैली कि , खेल कुंभ के लिए सारी तैयारी समय से पहले पूरी कर ली गई हैं , समय से पहले , यानि खेलों के शुरू होने से पहले ही तैयारी खत्म हो गई है , वर्ना तो अमूमन तौर पर खेल के खत्म होने तक कई बार तैयारी शुरू भी नहीं होने की नौबत आई रहती है , मगर इस बार मामला जरा बिदेसी था सो ऐसा ही करना पडा । तो जैसे ही खबर फ़ैली , अब ये मत पूछना कि खबर फ़ैली क्यों , अरे आजकल तो एक ही फ़ंडा है कि रायता फ़ैले न फ़ैले , खबर जरूर फ़ैल जाती है , और जो फ़ैलती नहीं , वो खबर नहीं होती । इसलिए जैसे ही खबर फ़ैली वैसेही उसका ज़ायज़ा लेने , विदेश से लपटन साहब दलबल के साथ यहां पहुंच गए ।

आखिरकार आप लोगों ने तैयारी पूरी कर ही ली न , चलिए वर्ना आप लोगों का रिकार्ड देख कर तो हम यही सोच बैठे थे कि जिन जिन खेलों की तैयारी पूरी हो गई होगी वे इस बार करवा लेंगे , बांकी बचे हुए खेलों को अगले आयोजन में डबल बार करवा कर सारा बैक लॉग पूरा कर लिया जाएगा । अच्छा बताईये कि क्या क्या हो गया है ?

सर मेट्रो , दिल्ली तो दिल्ली अब तो हम तो उसे हरियाणा तक घुसेड चुके हैं । देखते जाईये , अगर योजना ठीक इसी तरह से चलती रही ,तो हम जल्दी ही चिकमंगलूर से लेकर झुमरी तलैया तक मेट्रो की पटरियां बिछा देंगे । वो तो आपने खेलों में थोडी जल्दी मचा दी वर्ना तो हमने सोच रखा था कि श्रीलंका और नेपाल के खिलाडी तो सीधा मेट्रो से ही आकर अपनी प्रतियोगिका में भाग लेकर पदक जीत कर मेट्रो से ही वापसी हो लेंगे । खैर कोई बात नहीं , जितना हो रहा है वही क्या कम है भला ?

अच्छा , लपटन जी की पूरी टीम ने लपट कर कहा , और बताओ , और बताओ क्या क्या तैयारी हुई है , विस्तार पूर्वक बताओ जरा ।

और क्या क्या बताएं सर बस ये समझिए कि हमने तो अपना पूरा ध्यान इसी एक बात पर इस तरह से केंद्रित कर दिया है कि अब किसान से लेकर , जवान तक , नेता से लेकर अभिनेता तक
सबको खाली एकही टेंशन है कि कब ये खेल हों ? और इस टेंशन को महसूस करने के लिए हमने इसके साथ ही और भी बहुत सारे टेंशन जोड दिए हैं । अब तो हालात इस तरह के हो गए हो गए हैं कि लोगों को यही टेंशन रहती है कि पता नहीं कब कौन सी नई टेंशन आ जाए ?

ये क्या टेंशन टेंशन लगा रखी है , इससे तो हमें ही टेंशन होने लगी है । सब कुछ साफ़ साफ़ बताओ ..

लो इसमें साफ़ साफ़ समझने वाली कौन सी बात है सर । हम रोज बिना बताए , बिना कोई ईशारा किए और बिना किसी वजह के , कभी पेट्रोल की , तो कभी गैस की , कभी चीनी , कभी टमाटर , आलू, मतलब किसी भी चीज़ का दाम अचानक बढा देते हैं । बस हो जाती है सबको टेंशन , और तो और सरकार और मंत्रियों को भी टेंशन रहती है कि जनता को बताएं क्या , राष्ट्रमंडल खेल का ही एक बहाना आखिर चलेगा कितनी बार , मगर देखिए हम हैं कि किए जा रहे हैं ।

अच्छा अच्छा जगह वैगेरह तो तैयार हैं न सारे ?

हें हें हें , कमाल है सर आप उसकी चिंता क्यों करते हैं हम तो यहां पर , स्कूलों में शादी के पंडाल लगा देते हैं और पंडालों में स्कूल चला लेते हैं , हें हें हें सर इसी से समझ जाईये कि कितने मल्टी टेलेंटेड फ़ैसिलिटी से युक्त हैं सर । और कुछ पूछना हो तो ....

अरे हां चलते चलते ये भी बता दीजीए कि , खिलाडियों की तैयारी तो पूरी है न ....

सर इसके लिए अभी हमने कुछ सोचा नहीं है , और सच कहें तो हम खिलाडियों , खेल के बारे में ज्यादा नहीं सोचते हैं , वे भी खेल शुरू होने तक आ ही जाएंगे अपने आप । अभी हमें ही नहीं पता कि कौन कौन से खिलाडी हैं खेलने वाले , हमेशा की तरह । आपको तो पता है न सर कि वो तो खेलों में पदक जीतने के बाद ही पता चलता है , जैसे राज्यवर्धन सिंह राठौड , अभिनव बिंद्रा , सुशील कुमार , विजेंद्र सिंह ,...उनके बारे में ही हमें कौन सा कुछ पता था , जीते तब जाकर सबको पता लगा । आप चिंता न करें सर , वो भी आ ही जाएंगे अपने आप । बस समझिए कि तैयारी पूरी है ....

रविवार, 20 जून 2010

आई वांट टू बी जस्ट लाईक यू डैड ! ...........अजय कुमार झा




मेरे विवाह के समय खींची गई पिताजी की तस्वीर


मुझे ये तो ठीक ठीक याद नहीं कि पिताजी के प्रति मेरा आकर्षण यकायक मेरे मन में आया था कि शुरू से ही था क्योंकि मेरी स्वर्गवासी माताजी बताया करती थीं कि बचपन में भी जब सो कर उठता था तो आमतौर से अलग मैं मां मां न करके पापा पापा करता हुआ उठता था । पिताजी का भी उन दिनों सबसे प्रिय काम होता था मेरे साथ खेलना कूदना । या शायद मैं उनकी देह पर हरी रंग की चमचमाती फ़ौजी वर्दी को देख कर उन जैसा बनने की चाहत पाल बैठा था , ये भी हो सकता है कि उन दिनों जब देखता था कि पिताजी हर क्षेत्र में हर मोर्चे पर अपने आपको बिल्कुल दृढता से रख देते थे , उनके लिए कोई अपना पराया नहीं था । उनके लिए कोई दिन रात की बंदिश भी नहीं थी , उनके लिए कोई भी काम असंभव नहीं हुआ करता था इसलिए कोशिश करना तो उनकी आदत थी ही ।

उनकी एक खास बात ,फ़ौजी दिनचर्या और उनके कार्यक्षेत्र में कभी कभी अनिवार्यता के अनुरूप मदिरा का सेवन , न सिर्फ़ सेवन बल्कि शायद एक आदत भी ......उससे भी कोसों दूर रहे , कभी लगा ही नहीं कि उन्हें कभी इसकी चाहत भी रही हो । या फ़िर वो फ़ुर्ती जो वो रात में अक्सर मोहल्ले में , कैंपस में आई किसी मुसीबत के समय दिखा जाया करते थी । उनकी जीवटता जो उन्होंने बांग्लादेश में लडाई में बुरी तरह घायल होने के बाद दिखाई और शरीर में चंद खून की बूंदें होने के बाद भी मां को ढांढस बंधाते हुए कहा कि ," जिंदगी जिंदादिली का नाम होता है , मुर्दा दिल क्या खाक जिया करते हैं "। नहीं जानता कि उनकी वो कौन सी बात थी या कौन सी आदतें थीं जो मुझे अक्सर ये कहने पर मजबूर करती थीं कि , "डैड, आई जस्ट वांट टू बी लाईक यू "। जब वे होते थी तो बस वे ही होते थे , उनका अनुशासन , दूसरों में उनका डर , उनकी हिम्मत , और सबसे बढकर रिस्क उठा जाने की आदत , सब कुछ एक आभामंडल जैसा था मेरे लिए ।


कभी कभी तो उनका अनुशासन बहुत ही कोफ़्त में डाल देता था , सोचते थे कि बताओ भला आप खुद फ़ौजी हैं तो हमें भी फ़ौजी बनाए दे रहे हैं । उनकी एक आदत से भी हम दोनों भाई उन दिनों परेशान रहते थे कि दीदी ही उनका बेटा थी असल में । बताओ पूरी दुनिया बेटा बेटा करते मर रही थी और वे अपने मित्रों से हमारी दीदी का परिचय करवाते हुए कहते थे , ये है मेरा सबसे बडा बेटा , बांकी के ये दोनों तो एक नंबर के शैतान हैं । और शायद यही वजह रही कि दीदी का अचानक यूं हमें छोड कर चले जाना उन दोनों से बर्दाश्त नहीं हुआ । मां ने पूरे बीस साल तक इस दुख को अपने भीतर झेला और वो भी चल दीं अपनी बेटी के पास ।

पिताजी यहां भी जीवट निकले , अब भी मेरे पास हैं, मेरे साथ , सोचने समझने की शक्ति अब नहीं रही उनमें । उनकी एक सिमटी हुई दुनिया है उनके पास । बीच बीच मे पत्नी और पुत्री को खोने का गम भी जोर मार देता है । मैं भरसक कोशिश करता हूं कि पिताजी को ये एहसास होता रहे कि अभी भी बहुत सारे बचे हुए हैं जिन्हें उनकी जरूरत है , बहुत जरूरत है । उनके साथ की , उनके स्नेह की , उनकी छाया की । अब मेरा बेटा और बेटी जब उन्हें तोतली जबान में दद्दा कहते हैं तो खुशी से उनकी पलकें कांपने लगती हैं । मैं अब भी कोशिश करता हूं कि उनके आदर्शों पर ही चलता जाऊं । जानता हूं कि उनकी बहुत सी बातें मेरे लिए मुमकिन नहीं , खासकर दूसरों के लिए उनके द्वारा किया गया त्याग और बदले में उनके द्वारा की गई उपेक्षा को देखने के बाद तो कतई नहीं । मगर लगता है कि आज जो भी मैं जैसा भी अपने आपको पाता हूं तो जरूर और नि:संदेह वो पिताजी के कारण ही उनके जीवन के कारण ही ।

जीवन चक्र को घूमते कहां देर लगती है । बेटा भी धीरे धीरे उन्हीं चरणों में पहुंच रहा है जहां मैं खुद को कभी पाता था । मैं लिखता पढता रहता हूं तो वो भी साथ बैठ कर कभी चित्रकारी तो कभी कुछ और पर हाथ आजमाता रहता है । आदतें सारी की सारी कुछ इस कदर उतर गई हैं उसमें कि कभी कभी तो अंदेशा होने लगता है कि मेरी छोटी सी जीरोक्स कौपी मेरे सामने ही घूम फ़िर रही है । और जब साथ बैठा अपनी कौपी में सुंदर अक्षर उकेर कर मुझे गर्व से दिखाता है तो उसकी आखें भी मानो कह रही होती हैं , " डैड , आई वांट टू बी जस्ट लाईक यू डैड !"

शुक्रवार, 4 जून 2010

अभी तक क्राईम टाईम्स , दिल्ली में , "ब्लोग हलचल" में निरूपमा हत्याकांड पर लिखी गई कई पोस्टों की चर्चा

आलेख को पढने के लिए चटका कर , जो भी छवि अलग खिडकी में खुले ,
उसे चटका कर आप आराम से पढ सकते हैं ।
इस अंक में , गपशप का कोना ,एक आलसी का चिट्ठा , घुघुती बासूती, चोखेरबाली, और अखिलेस सिंह आदि का उल्लेख

गुरुवार, 3 जून 2010

आपकी मर्ज़ी , चाहे तो पुस्तकालय बनाएं या कूडाघर



मुझे अक्सर टोका गया कि आपने अपने इस ब्लोग का नाम" रद्दी की टोकरी " क्यों रखा या कि इस ब्लोग का नाम बदलिए । अभी थोडे दिनों पहले ज़ील उर्फ़ दिव्या जी ने कहा कि हर ब्लोग्गर को अपने ब्लोग की इज़्ज़त करनी चाहिए इसलिए आपको भी इस ब्लोग का नाम बदल कर कुछ और रखना चाहिए । बात मार्के की थी और कुछ अलग भी सो बहुत देर तक सोचता रहा । सबसे पहले आपको इस ब्लोग के नामकरण की दास्तान भी बता देता हूं । इस ब्लोग को जब शुरू किया गया था तो नाम रखा गया "कबाडखाना"। वजह सिर्फ़ ये कि अलग सा नाम शायद पाठकों को आकर्षित कर सके । मगर कुछ दिनों बाद ही हिंदुस्तान के "ब्लोग वार्ता "में रवीश जी ने परिचय करवाया एक ब्लोग "कबाडखाना "से । अशोक पांडे जी का ये ब्लोग जो न सिर्फ़ बहुत पहले से बना हुआ था बल्कि हर दृष्तिकोण में हिंदी ब्लोग जगत के बेहतरीन ब्लोग्स में से एक था , और अब भी है । ऐसे में उसी ब्लोग के नाम से मैं अपने इस ब्लोग का नाम रखे रहने की धृष्टता नहीं कर सकता था , सो उसी दिन से इस ब्लोग का नाम रख दिया गया" रद्दी की टोकरी "। मैंने कहीं पढा था कि , लेखन में यदि वाकई दम होगा तो चीथडों में भी साहित्य और भाषा नज़र आ जाएगी और यदि लेखन वाकई कचरा होगा तो फ़िर गुलदस्ते में भी सजाओगे तो सुगंध तो कतई न आ पाएगी । इसलिए रचो और उसे फ़ैल जाने दो पाठकों के बीच वे अपने आप तय कर लेंगे कि उसका हश्र कैसा होने वाला है ।


जहां तक रद्दी की बात है तो , पढने के बाद दैनिक अखबार भी रद्दी हो जाता है , और पढने के बाद उपन्यास भी खासकर वो बीस पच्चीस वाले , साल खत्म होने के बाद कोर्स की किताबें भी रद्दी ही समझी जाती हैं । हिंदी के साहित्यकार , हिंदी पढने लिखने वाले , और हम जैसे हिंदी के ब्लोग्गर भी रद्दी ही माने समझे जाते हैं जी , दूसरी जगह का क्या कहें जब घर में ही हमें रद्दी समझ लिया जाता है । हालांकि हमारे जैसे मूढ उस रद्दी में से भी कुछ कुछ ढूंढने में लगे रहते हैं , मुझे तो अपने आलेखों के लिए आंकडों को इकट्ठा करने के लिए जितनी मदद इस अखबारी रद्दी से मिलती है उतनी और कहीं से नहीं मिल पाती है । तो बेशक मैंने अपने इस चिट्ठे का नाम रद्दी की टोकरी रखा हुआ है , मगर जो कुछ इसमें उडेलता हूं ,वो सब मेरे लिए अनमोल ही हैं । आगे तो पाठक ही तय कर लेते हैं कि क्या है ? वैसे भी टोकरी रद्दी की है न जी , माल तो नहीं डाल रहा न रद्दी , जब माल भी रद्दी डलने लगे तब सोचूंगा कि अब क्या करना है इस टोकरी का ।


वैसे इसी बात पर ध्यान आया कि आजकल कुछ चिट्ठाकार अपने चिट्ठे को वाकई इस रूप में खुले छोडे हुए हैं जैसे कि सरकार मेनहोल के ढक्कन खुले छोड देती है । कि आओ और उडेल दो अपना सब कुछ , गंद बला , कच्चा , पक्का , अधकचरा , बास मारता । ये तो तय है कि चाहे एक शब्द लिखने वाला या पूरा का पूरा ग्रंथ उडेलने वाला अपनी कृति को एक जैसा ही अनमोल मानते हैं , और मानना भी चाहिए । यदि अपने लिखे की खुद ही इज्जत न की तो दूसरों से इसकी अपेक्षा भी नहीं करनी चाहिए , किंतु जाने अनजाने जब कुछ चिट्ठों को नामी बेनामी के नाम पर सिर्फ़ विष वमन के लिए उपयोग करने के लिए छोड दिया जाता है तो वो थोडे ही दिनों में सडांध मारने लगती है । इससे अच्छा लगता है कि आप उसके सामने जाकर खुल्लम खुल्ला जितनी भी भडास हो निकालें । और अब तो ये भी नहीं कहा जा सकता कि भाषा और शब्द मर्यादित हों क्योंकि ये तो सीधे सीधे ही संस्कारों पर निर्भर करता है , जैसे मिलें हों उन्हें वैसे ही आगे की ओर सरकाएं । मगर आप निकालें , वो भी नकाब लगा कर नहीं । और जब उस विषवमन को जानबूझ कर सजा कर रखा जाता है तो कहीं न कहीं तो ये माना ही जा सकता है कि खुद चिट्ठाकार भी कमोबेश यही चाहते थे ।

मुझ से भी शुरूआती दिनों में एक पोस्ट में ये गलती हुई थी , और उसका फ़ायदा कुछ ऐसे ही तत्वों ने उठाया जो इसी ताक में बैठे हुए थे । मगर फ़ौरन ही बात लो भलीभांति , भांप कर मैंने अपनी गलती सुधार ली और भविष्य में फ़िर दोबारा ये मौका नहीं दिया । आगे भी यही प्रयास रहेगा । तो यकीनन ये तो सिर्फ़ एक निजि फ़ैसला है कि आप अपने चिट्ठे को खुद किस तरह उपयोग करते हैं और उससे जरूरी ये कि उसे किस तरह से उपयोग होने करने के लिए छोड देते हैं ।

बुधवार, 2 जून 2010

आज के "डेली हिन्द मिलाप" , (हैदराबाद ),तथा "सच कहूं" सिरसा, में में प्रकाशित मेरा एक आलेख

दैनिक सच कहूं सिरसा में प्रकाशित



आज के दैनिक डेली हिन्द मिलाप , हैदराबाद में प्रकाशित

(आलेख को पढने के लिए उसे चटकाएं, और अलग से खुली खिडकी में,
दिखने वाली छवि को चटका कर आराम से पढा जा सकता है ) , इस आलेख
को आप ब्लोग पोस्ट के रूप में पहले भी पढ चुके हैं ।

मंगलवार, 1 जून 2010

दैनिक महामेधा में , "ब्लोग हलचल ", में कसाब मामले का ज़िक्र करती कई ब्लोग पोस्टों का उल्लेख



आलेख को पढने के लिए उस पर चटका लगाने पर अलग खिडकी में खुलने वाली
छवि को चटका लगा कर आप उसे आराम से पढ सकते हैं ।

रविवार, 30 मई 2010

फ़ितरत छुपाने को, कोई ,नकाब तो लगाओ यारों......अजय कुमार झा


मुहब्बत कर न सको तो , नफ़रत की ही ,
कम से कम ,इंतहा तो दिखाओ यारों ,॥

कर देना पैवस्त खंजर ,मेरी पीठ पर ही सही,
चलो इसी बहाने इक बार ,गले तो लगाओ यारों ,॥

मैं समझ लूंगा तुमको, आईना , या अपने जैसा ,
फ़ितरत छुपाने को, कोई ,नकाब तो लगाओ यारों ,॥

माना कि चलना मुझे नहीं आता ,गिरता हूं संभलता हूं अक्सर,
मगर मुझे गिराने को , यूं ,खुद को तो न गिराओ यारों ,॥

कितना ज़ाया किया , मुझे सोच कर कर वक्त -बेवक्त तुमने अपना ,
थोडा सा तो अपने साथ , खुद के लिए भी वक्त बिताओ यारों ॥

सुना है कि ,उन रास्तों की मंजिल नहीं है , फ़िक्र होती है ,
कहीं इतनी दूर न निकल जाओ,कि लौट के आ न पाओ यारों ॥

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