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रविवार, 30 मई 2010

फ़ितरत छुपाने को, कोई ,नकाब तो लगाओ यारों......अजय कुमार झा


मुहब्बत कर न सको तो , नफ़रत की ही ,
कम से कम ,इंतहा तो दिखाओ यारों ,॥

कर देना पैवस्त खंजर ,मेरी पीठ पर ही सही,
चलो इसी बहाने इक बार ,गले तो लगाओ यारों ,॥

मैं समझ लूंगा तुमको, आईना , या अपने जैसा ,
फ़ितरत छुपाने को, कोई ,नकाब तो लगाओ यारों ,॥

माना कि चलना मुझे नहीं आता ,गिरता हूं संभलता हूं अक्सर,
मगर मुझे गिराने को , यूं ,खुद को तो न गिराओ यारों ,॥

कितना ज़ाया किया , मुझे सोच कर कर वक्त -बेवक्त तुमने अपना ,
थोडा सा तो अपने साथ , खुद के लिए भी वक्त बिताओ यारों ॥

सुना है कि ,उन रास्तों की मंजिल नहीं है , फ़िक्र होती है ,
कहीं इतनी दूर न निकल जाओ,कि लौट के आ न पाओ यारों ॥

21 टिप्‍पणियां:

  1. मैं समझ लूंगा तुमको, आईना , या अपने जैसा ,
    फ़ितरत छुपाने को, कोई ,नकाब तो लगाओ यारों ,॥
    बहुत खूब. तो अब गज़ल पर भी हाथ साफ़ किया जा रहा है भाई? अच्छा है.बहुत अच्छा.

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  2. माना कि चलना मुझे नहीं आता ,गिरता हूं संभलता हूं अक्सर,
    मगर मुझे गिराने को , यूं ,खुद को तो न गिराओ यारों ,॥

    मन की कसक को बहुत खूबसूरती से लिखा है...

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  3. माना कि चलना मुझे नहीं आता ,गिरता हूं संभलता हूं अक्सर,
    मगर मुझे गिराने को , यूं ,खुद को तो न गिराओ यारों ,॥
    कास इस भावना को थाली में छेद करने वाले समझ पाते!
    और सारे मतभेद भूलकर इंसानियत के लिए एक हो जाते!!

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  4. मुहब्बत कर न सको तो , नफ़रत की ही ,
    कम से कम ,इंतहा तो दिखाओ यारों ॥

    बहुत ही खूबसूरत, बेहतरीन रचना. बहुत खूब!

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  5. कोई हाथ भी न मिलाएगा,
    जो गले मिलोगे तपाक से,
    ये नए मिज़ाज का शहर है,
    ज़रा फ़ासले से मिला करो...
    -बशीर बद्र

    जय हिंद...

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  6. कितना ज़ाया किया , मुझे सोच कर कर वक्त -बेवक्त तुमने अपना ,
    थोडा सा तो अपने साथ , खुद के लिए भी वक्त बिताओ यारों ॥ गज़ल के लहज़े मे भावनात्मक सुन्दर प्रस्तुति।

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  7. बहुत बढ़िया अजय भाई एकदम सटीक चोट करी है ................तिलमिला गए होगे सब !!

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  8. मैं समझ लूंगा तुमको, आईना , या अपने जैसा ,
    फ़ितरत छुपाने को, कोई ,नकाब तो लगाओ यारों ,॥

    -बहुत खूब झा जी...क्या बात है!!

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  9. मैं समझ लूंगा तुमको, आईना , या अपने जैसा ,
    फ़ितरत छुपाने को, कोई ,नकाब तो लगाओ यारों ,॥
    बहुत गहरी बात कह दी आप ने , बहुत अच्छी लगी आप की यह गजल... आदाब जनाब

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  10. बेनामी का नकाब क्या कम है?? क्या खूब लिखा है भैया..

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  11. आज के ज़माने की सच्चाई को बयाँ करती सुन्दर रचना

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  12. पुरुष की आंख कपड़ा माफिक है मेरे जिस्‍म पर http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/05/blog-post_9338.html मेरी नई पोस्‍ट प्रकाशित हो चुकी है। स्‍वागत है उनका भी जो मेरे तेवर से खफा हैं

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  13. कर देना पैवस्त खंजर ,मेरी पीठ पर ही सही,
    चलो इसी बहाने इक बार ,गले तो लगाओ यारों ,॥

    जो गले मिले हैं या मिलने को आतुर हैं

    अर्ज है कि उन्हें तो बेवजह झूठलाओ यारों

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  14. @ पूर्व टिप्पणी
    संशोधन
    जो गले मिले हैं या मिलने को आतुर हैं
    अर्ज है कि उन्हें तो बेवजह न झूठलाओ यारों

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  15. कहीं इतनी दूर न निकल जाओ,कि लौट के आ न पाओ यारों ॥

    Very nice !

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टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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