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प्रचार खिडकी

गुरुवार, 3 जून 2010

आपकी मर्ज़ी , चाहे तो पुस्तकालय बनाएं या कूडाघर



मुझे अक्सर टोका गया कि आपने अपने इस ब्लोग का नाम" रद्दी की टोकरी " क्यों रखा या कि इस ब्लोग का नाम बदलिए । अभी थोडे दिनों पहले ज़ील उर्फ़ दिव्या जी ने कहा कि हर ब्लोग्गर को अपने ब्लोग की इज़्ज़त करनी चाहिए इसलिए आपको भी इस ब्लोग का नाम बदल कर कुछ और रखना चाहिए । बात मार्के की थी और कुछ अलग भी सो बहुत देर तक सोचता रहा । सबसे पहले आपको इस ब्लोग के नामकरण की दास्तान भी बता देता हूं । इस ब्लोग को जब शुरू किया गया था तो नाम रखा गया "कबाडखाना"। वजह सिर्फ़ ये कि अलग सा नाम शायद पाठकों को आकर्षित कर सके । मगर कुछ दिनों बाद ही हिंदुस्तान के "ब्लोग वार्ता "में रवीश जी ने परिचय करवाया एक ब्लोग "कबाडखाना "से । अशोक पांडे जी का ये ब्लोग जो न सिर्फ़ बहुत पहले से बना हुआ था बल्कि हर दृष्तिकोण में हिंदी ब्लोग जगत के बेहतरीन ब्लोग्स में से एक था , और अब भी है । ऐसे में उसी ब्लोग के नाम से मैं अपने इस ब्लोग का नाम रखे रहने की धृष्टता नहीं कर सकता था , सो उसी दिन से इस ब्लोग का नाम रख दिया गया" रद्दी की टोकरी "। मैंने कहीं पढा था कि , लेखन में यदि वाकई दम होगा तो चीथडों में भी साहित्य और भाषा नज़र आ जाएगी और यदि लेखन वाकई कचरा होगा तो फ़िर गुलदस्ते में भी सजाओगे तो सुगंध तो कतई न आ पाएगी । इसलिए रचो और उसे फ़ैल जाने दो पाठकों के बीच वे अपने आप तय कर लेंगे कि उसका हश्र कैसा होने वाला है ।


जहां तक रद्दी की बात है तो , पढने के बाद दैनिक अखबार भी रद्दी हो जाता है , और पढने के बाद उपन्यास भी खासकर वो बीस पच्चीस वाले , साल खत्म होने के बाद कोर्स की किताबें भी रद्दी ही समझी जाती हैं । हिंदी के साहित्यकार , हिंदी पढने लिखने वाले , और हम जैसे हिंदी के ब्लोग्गर भी रद्दी ही माने समझे जाते हैं जी , दूसरी जगह का क्या कहें जब घर में ही हमें रद्दी समझ लिया जाता है । हालांकि हमारे जैसे मूढ उस रद्दी में से भी कुछ कुछ ढूंढने में लगे रहते हैं , मुझे तो अपने आलेखों के लिए आंकडों को इकट्ठा करने के लिए जितनी मदद इस अखबारी रद्दी से मिलती है उतनी और कहीं से नहीं मिल पाती है । तो बेशक मैंने अपने इस चिट्ठे का नाम रद्दी की टोकरी रखा हुआ है , मगर जो कुछ इसमें उडेलता हूं ,वो सब मेरे लिए अनमोल ही हैं । आगे तो पाठक ही तय कर लेते हैं कि क्या है ? वैसे भी टोकरी रद्दी की है न जी , माल तो नहीं डाल रहा न रद्दी , जब माल भी रद्दी डलने लगे तब सोचूंगा कि अब क्या करना है इस टोकरी का ।


वैसे इसी बात पर ध्यान आया कि आजकल कुछ चिट्ठाकार अपने चिट्ठे को वाकई इस रूप में खुले छोडे हुए हैं जैसे कि सरकार मेनहोल के ढक्कन खुले छोड देती है । कि आओ और उडेल दो अपना सब कुछ , गंद बला , कच्चा , पक्का , अधकचरा , बास मारता । ये तो तय है कि चाहे एक शब्द लिखने वाला या पूरा का पूरा ग्रंथ उडेलने वाला अपनी कृति को एक जैसा ही अनमोल मानते हैं , और मानना भी चाहिए । यदि अपने लिखे की खुद ही इज्जत न की तो दूसरों से इसकी अपेक्षा भी नहीं करनी चाहिए , किंतु जाने अनजाने जब कुछ चिट्ठों को नामी बेनामी के नाम पर सिर्फ़ विष वमन के लिए उपयोग करने के लिए छोड दिया जाता है तो वो थोडे ही दिनों में सडांध मारने लगती है । इससे अच्छा लगता है कि आप उसके सामने जाकर खुल्लम खुल्ला जितनी भी भडास हो निकालें । और अब तो ये भी नहीं कहा जा सकता कि भाषा और शब्द मर्यादित हों क्योंकि ये तो सीधे सीधे ही संस्कारों पर निर्भर करता है , जैसे मिलें हों उन्हें वैसे ही आगे की ओर सरकाएं । मगर आप निकालें , वो भी नकाब लगा कर नहीं । और जब उस विषवमन को जानबूझ कर सजा कर रखा जाता है तो कहीं न कहीं तो ये माना ही जा सकता है कि खुद चिट्ठाकार भी कमोबेश यही चाहते थे ।

मुझ से भी शुरूआती दिनों में एक पोस्ट में ये गलती हुई थी , और उसका फ़ायदा कुछ ऐसे ही तत्वों ने उठाया जो इसी ताक में बैठे हुए थे । मगर फ़ौरन ही बात लो भलीभांति , भांप कर मैंने अपनी गलती सुधार ली और भविष्य में फ़िर दोबारा ये मौका नहीं दिया । आगे भी यही प्रयास रहेगा । तो यकीनन ये तो सिर्फ़ एक निजि फ़ैसला है कि आप अपने चिट्ठे को खुद किस तरह उपयोग करते हैं और उससे जरूरी ये कि उसे किस तरह से उपयोग होने करने के लिए छोड देते हैं ।

14 टिप्‍पणियां:

  1. दिव्या जी की बात में दम हैं ..इसका मतलब यह नहीं की आपकी बेदम हैं :) !

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  2. अब नाम तो जो भी चाहे आप रखें....बस लिखते इसी तरह रहिये...

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  3. रद्दी की टोकरी ही सही, अब तो ये नाम प्रतिष्ठा पा गया है।

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  4. सादर !
    आपके विचार तो किसी साहित्यकार कि वसीयत कि तरह लग रहे हैं |
    मैंने कही पढ़ा था कि एक साहित्यकार कि मृत्यु हुयी तो रिश्तेदार बड़े परेसान हुए कि इनका अंतिम संस्कार कैसे होगा | उसके अपने उनके कमरेमें गए तो देखा कि उनकी जीवन भर कि कमाई उनकी साहित्य को उन्होंने सजों कर रखा है, जिससे पूरा कमरा कागजों से भरा था | रिश्तेदारों को बड़ी राहत मिली कि चलो इन्होने अपना इंतजाम खुद ही कर रखा है |
    माफ़ करें इसे बिनोद के रूप में ही लें | क्योंकि इतनी मौलिक सोच किसी अच्छे साहित्यकार कि ही हो सकती है
    रत्नेश त्रिपाठी

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  5. आजकल कुछ चिट्ठाकार अपने चिट्ठे को वाकई इस रूप में खुले छोडे हुए हैं जैसे कि सरकार मेनहोल के ढक्कन खुले छोड देती है । कि आओ और उडेल दो अपना सब कुछ।

    यह गंद भी उनकी ही होती है जो जानबुझकर खुला छोड़ते हैं, लोग समझे की गंद दुसरा डाल गया।

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  6. टोकरी रद्दी की हो या फूल सजी, मैटर डिपेंड करता है
    नाम में क्या रखा है आपकी रद्दी की टोकरी को हम तो खंगालते रहते हैं

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  7. गारबेज बैग में गारबेज भर दो, तो गारबेज और नोटों की गड्डी रख लो, तो सेफ मनी बैग...


    ये रद्दी की टोकरी तो नोटों से भरी है सर जी. हमें तो यही चाहिये. हा हा!

    झा जी का व्यक्तित्व आज कल ज्यादा चिन्तनशील हुआ जा रहा है. :)

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  8. यदि गुलाब का नाम गुलाब ना रखकर कुछ और रख दें तो क्या उसकी खुशबू बदल जायेगी?

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  9. समीर लाल जी सही कह रहे हैं और वैसे भी नाम में क्या रखा है?

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  10. अजी यह भी बहुत सुंदर नाम है,कोई दिक्कत नही... आप के विचार हम पढने आते है, सो सुंदर लगते है ओर वोही आप के ब्लांग को चमकाते है, नाम तो एक पहचान के लिये है ,

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  11. बहुत गहरा संदेश छिपा है इस प्रस्तुति में।

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  12. अरे आपकी ये रद्दी की टोकरी वह रद्दी है जैसे शहद मधुमक्खी का रद्दी है ,लेकिन सारी दुनिया के सेहत के लिए तो बहुत फायदेमंद है ....

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  13. आप नाम के चक्कर में ना जाओ .................सब बढ़िया है .............बस लगे रहो जी !

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टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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