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प्रचार खिडकी

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

किसका दु:ख , सबसे बडा ?????



पिछले साल जब अचानक मां की मृत्यु हुई तो मुझे लगा कि इससे बडा दुख कोई नहीं हो सकता । और सच भी है जीवन मां का चले जाने से बडा शायद कोई दुख होता भी नहीं है ॥

कुछ दिनों बाद जब पिताजी को लेकर यहां चला आया तो अक्सर उन्हें दुखी पाता था ये कहते हुए कि तुम लोगों के साथ ईश्वर ने अच्छा नहीं किया , अभी तुम लोगों को मां की बहुत जरूरत थी । हम भी गमगीन हो जाया करते थे ।

कुछ ही दिनों बाद पता चला कि गांव में साथ में रह रहे चचेरे भाई का इकलौता जवान पुत्र अचानक ही चल बसा । आघात इतना जबर्दस्त था कि सहसा तो विश्वास ही नहीं हुआ क्योंकि गांव में पूरी पूरी रात अपने उस भतीजे से बातें करते हुए बिताई थी मैंने । अब उस दुख को देखकर पिताजी भी मौन और स्तब्ध थे । शायद उन्हें लग गया था कि इससे बडा दुख और कोई नहीं होगा ॥

थोडे दिन भी नहीं बीते होंगे कि , एक खबर सुनने को मिली , पास में ही रह रहे एक मोहल्ले में एक परिवार रहता था । एक दिन पहले किसी सडक दुर्घटना में सिर्फ़ एक मासूम बच्चे को अकेला छोड कर उसके मां बाप दोनों की ही मृत्यु हो गई । अब वो बिन मां बाप का बच्चा और उसके सामने पडा हुआ पूरा जीवन । मैं और पिताजी फ़िर सोच रहे थे कि दुख इसका ही सबसे बडा है निश्चित रूप से ।

और कुछ समय बाद ही समाचार पत्र में एक दिल दहला देने वाला समाचार देखने पढने को मिला । पश्चिमी दिल्ली के एक परिवार के कुछ लोग किसी शादी समारोह में भाग लेने के हरियाणा , शायद सोनीपत या पानीपत गए थे । वापसी में एक ट्रक से हुई दुर्घटना में कार में बैठे सारे लोग मारे गए । अगले दिन अखबार में तस्वीर छपी थी , सात विधवा महिलाओं की । एक परिवार की मुखिया की पत्नी , दो थी उसकी बहुएं और दो थी उसकी बेटियां । और साथ खडे दर्जन भर बिलखते बच्चे । पिताजी , मैं , पत्नी और जिस जिस ने भी ये खबर सुनी पढी सब अवाक रह गए थे । उस दिन के बाद पिताजी कभी नहीं कहते कि मेरा दुख सबसे बडा है ।

ये तो सिर्फ़ वो चंद घटनाएं थीं सो मैंने अपने आसपास घटते हुए महसूस की थीं , तब से सोच रहा हूं कि शायद सबको अपना दुख तभी तक बहुत बडा लगता है जब तक उसे सामने वाले का उससे भी कहीं बडा दुख न दिख जाए ।

ये तस्वीर प्रतीक मात्र है ,असल नहीं , गूगल से साभार

14 टिप्‍पणियां:

  1. सच कहा ....पर इसके लिए भी संवेदना का होना ज़रूरी है....

    यदि आपको याद हो तो राम चन्द्र शुक्ल जी कि एक कहानी याद आती है..." दुःख का अधिकार " अवसर मिले तो पढियेगा...आप उसमें से ज़रूर कुछ नया सोच कर ले आयेंगे...

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  2. सच है हमारा दु:ख दूसरों से छोता ही निकलता है अगर हम निकलें देखने तो

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  3. Itne dukh ek saath suna diye aapne.. kuchh der ko laga ki bas abhi dhadkanen rukne wali hain.

    kitna sahi likha gaya hai ki- ''dunia me kitna gum hai... mera gum kitna kam hai''

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  4. सही कह रहे हैं..नजर घुमाओ तो दुखों के ऐसे ऐसे मंजर दिखते हैं कि अपना दुख तो कुछ लगता ही नहीं.

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  5. सच ही है । ङमें अपना दुख तभी तक बडा लगता है जब तक उससे बडा किसी का दुख सामने नही आ जाता । आपका संस्मरण एक सीख दे जाता है ।

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  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  7. समय के सापेक्ष ही दुख और सुख बड़ा या छोटा है. बड़े से बड़ा दुख भी समय अंतराल के बाद उतना बड़ा नहीं रहता, क्योकि प्रत्येक दिन दुखो का एक सिलसिला (शायद सुखो का भी) चलता रहता है. सम्वेदना का भी रोल तो है ही.

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  8. जीवन ऐसे ही चलता रहता है ......औरमहात्मा बुद्ध ने जीवन को दुखमय ही माना है! हमारे ऋषियों मुनियों ने इसलिए ही सुख दुःख से निर्लिप्त रहने की दीक्षाएं दी हैं ...हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ ...आप कर ही क्या सकते हैं ?

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  9. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  10. बिल्कुल सही कहा आपने………………और दीपक जी ने जो बचा था वो कह दिया।
    दुख- बडा या छोटा, हमारी सोच और सहन करने की शक्ति से होता है।

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  11. दुनियाँ मैं कितना गम है, मेरा गम कितना कम है

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टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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