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प्रचार खिडकी

रविवार, 1 नवंबर 2009

तुम्हारी हसरतों का फ़साना कह जाती हैं अंगडाईयां..

















भीड के साथ होता हूं
पर भीड साथ नहीं देती,
अक्सर
मेरा साथ देती हैं मेरी तन्हाईयां ॥



बेशक न कहो होठो से,
और पलकों से इशारे न करो,
तुम्हारी हसरतों का
फ़साना कह जाती हैं अंगडाईयां ॥



सबके मुकदमे
सालों साल नहीं चला करते,
हाकिम हुक्कामो की
होती हैं चंद सुनवाईयां ॥



कई करते हैं कत्ल पे कत्ल तो
कहीं जिक्र भी नहीं होता,
कई खुद का कत्ल कर लेते हैं
तो भी होती हैं रुस्वाईयां ॥




15 टिप्‍पणियां:

  1. भीड के साथ होता हूं पर भीड साथ नहीं देती, अक्सर मेरा साथ देती हैं मेरी तन्हाईयां ॥
    भीड कब किसी का साथ देती है.

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  2. अंगड़ाइयाँ सुंदर भी हैं और बहुत कुछ कहती हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेशक न कहो होठो से,
    और पलकों से इशारे न करो,
    तुम्हारी हसरतों का
    फ़साना कह जाती हैं अंगडाईयां ॥


    angdai ko bahut hi khoobsoorti se pesh kiya hai aapne....

    poori kavita bahut hi behtareen aur shabdon se paripoorn hai....

    bahutachchi lagi........

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत खूब झा जी ..खूब फरमाएँ..झलकियाँ बेहद सुंदर गयी भाई गुनगुना रहा हूँ..

    उत्तर देंहटाएं
  5. भाई आप इसे रद्दी की टोकरी कहते हैं जहाँ पर इतने नायाब खजाने रखते है....स्टाइल है ये भी आपका...एक शानदार स्टाइल.

    उत्तर देंहटाएं

  6. तुम्हारी हसरतों का
    फ़साना कह जाती हैं अंगडाईयां ॥


    बहुत कुछ कह गए हैं आप

    बी एस पाबला

    उत्तर देंहटाएं
  7. कई करते हैं कत्ल पे कत्ल तो
    कहीं जिक्र भी नहीं होता,
    कई खुद का कत्ल कर लेते हैं
    तो भी होती हैं रुस्वाईयां ॥

    बहुत भावपूर्ण रचना ..

    उत्तर देंहटाएं
  8. भीड़ के साथ होना भी नही चाहिये भीड से अलग चलने मे ही पहचान है ।

    उत्तर देंहटाएं
  9. दुनिया की भीड़ के बीच अपना वजूद तलाशता और तराशता एक आम आदमी जिसकी इंसान बनने की कोशिश जारी है..जिन्दगी के बहुत सारे उतार चढावों को देखते हुए कब बचपना छूटा और वयस्कता की देहलीज़ पर कदम रखा पता ही नहीं चला, अंगरेजी साहित्य में प्रतिष्ठा के बाद पत्रकारिता में डिप्लोमा..फिर विधि की शिक्षा...न्यायमंदिर ..तीस हजारी में फिलहाल कार्यरत...सफ़र जारी है...लिखना , पढ़ना शौक था..कब आदत बनी पता नहीं चला..अब हालात जूनून की हद तक पहुँचते जा रहे हैं....

    पहले कभी आपको इतने विस्तार से नहीं पढ़ा था ...आज पढ़ा ...आपकी दी गई टिप्पणी की वजह से ...ये जूनून ही सफलता की सीढ़ी होता है ....इतने सरे ब्लॉग और फिर ये कोर्ट-कचहरी और अब ये टिप्पणी चर्चा का नया ब्लॉग सब कैसे करते हैं एक साथ ....नमन है आपको .....!!

    ये कविताओं का ब्लॉग पहले नहीं देख पाई थी ....नज़्म बहुत ही अच्छी बन पड़ी है .....

    भीड़ के साथ होता हूँ
    पर भीड़ साथ नहीं देती
    अक्सर मेरा साथ देती हैं मेरी तनहइयां .....

    बहुत सुंदर......!!

    सबके मुकदमें सालों साल नहीं चला करते ......ये भी बहुत बढिया लगीं .....!!

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत खूब झा जी ..खूब फरमाएँ..झलकियाँ बेहद सुंदर गयी भाई गुनगुना रहा हूँ..

    उत्तर देंहटाएं

टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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