शनिवार, ७ नवम्बर २००९

क्यों खो रहा है बचपन ( दैनिक पंजाब केसरी में प्रकाशित एक आलेख )







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बच्चों के हालातों पर , लिखा गया एक सामयिक आलेख जिसे दैनिक पंजाब केसरी, दिल्ली संस्करण में स्थान मिला ।ये उन दिनों की बात है जब मैं अजय (रमाकांत) ( मेरे पिताजी का नाम ) के उपनाम से लिखा करता था

11 टिप्पणियाँ:

संगीता पुरी ने कहा…

रिपोर्टों को पढकर बहुत अजीब सा लगता है .. अपने बच्‍चों की छोटी सी तकलीफ हमारे आंख में आंसू ले आती है .. फिर इतने मासूमों के साथ होती तकलीफों को देखकर हमारी आंखें कैसे बंद हो जाती है .. आखिर कब सुधार पाएंगे हम सारे देश की स्थिति को .. आखिर कब दे पाएंगे हम सारे बच्‍चों को उनके अधिकार ??

Mishra Pankaj ने कहा…

भाई अजय ..क्या कहे रिपोर्ट भी पढ लिये और रोज ऐसे हालात देखते भी है...क्य करे समाज गन्दा हो चला है ...आप जैसे नौजवान की समाज को जरूरत है भाइ..
नमस्कार

राज भाटिय़ा ने कहा…

अजय भाई मै कई बार लडा भी हुं , लेकिन यहां (भारत) मै यह आम है, किस किस को रोको, तकरीबन बहुत से घरो मै मेने ऎसा देखा, ओर उस पर इन बच्चो से काम भी जानवरो की तरहा लिया जाता है..... आओ अपने आस पास इन बच्चो की मदद करे

Dipak 'Mashal' ने कहा…

bahut bahut badhai Ajay ji, aisi post likhne se pata chalta hai ki aap kitne gahan samvedansheel hriday ke swami hain... aaj sabko isi tarah sochne aur karne ki jarurat hai..
Jai Hind...

Anil Pusadkar ने कहा…

बेहद शर्मनाक स्थिति है,मगर क्या करें,जंहा जाओ चाय कि केतली लेकर भटकता बचपन दिख जाता है,उन अख़्बारो के दफ़्तर मे भी जंहा बचपन को खब्र बनाकर बेचा जाता है।कई बार ऐसे बच्चों से पूछा भी तो पता चला कि वो अपने ही पिता के ठेले की चाय बांट रहा है और उसके पिता से पूछा तो जवाब मिला,काम नही करेगा साब तो खायेंगे क्या?अब इस बात का जवाब तो हम जैसों के पास नही था?

इसके बाद भी सारे बच्चों को उनका बचपन मिलना चाहिये इस बात का पक्षधर हूं,आभार आपका जानकारी बढाने के लिये।

rashmi ravija ने कहा…

आपके आलेख ने फिर से इस शर्मनाक स्थिति की याद दिला दी,जिसे अनदेखा करने का ढोंग हम करते हैं...जबतक दो जून की भरपेट रोटी का जुगाड़ नहीं होता,चाहे लाख कानून बन जाएँ,ये बच्चे मजदूरी करने को विवश रहेंगे और साथ ही अमानुषिक अत्याचारों के शिकार भी.....सोमालिया,उगांडा जैसे देश के बाद हम्मरे देश का नाम है??..शर्म से आँखें झुक जाती

वन्दना ने कहा…

behad sharmnaak halat hain aur jab tak sarkaar aur aam insaan iske baare mein nhi sochega tab tak kuch nhi kiya ja sakta.

शरद कोकास ने कहा…

कब आता है इनका बचपन और कब चला जाता है इन्हे ही नही पता होता ..जिन्हे पता होता है वे ही ज़िम्मेदार है इस शोषण के ।

Harkirat Haqeer ने कहा…

पंजाब केसरी में आलेख छपने की बधाई ....!!

Meenu Khare ने कहा…

मन को उद्द्वेलित करता लेख.आलेख की बधाई ....!!

Nirmla Kapila ने कहा…

मार्मिक वयथित कर देने वाला आलेख । शुभकामनायें