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प्रचार खिडकी

गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

कुछ पंक्तियाँ .......बस और क्या



(
)

बेशक मुझे मालूम नहीं,
जवाब इसका,
मगर इतना तो है कि ,
तुम्हारा सवाल अच्छा है॥

कहते
हैं कि रात के बाद,
सवेरा तो आता ही है,
जाने कितनी लंबी होती है वो रात,
जिनके बाद सवेरा आता है,
जो भी हो दिल बहलाने को,
ये ख्याल अच्छा है

नहीं
पता, हां ये तो नहीं पता,
कि आज भरेगा ,
मजदूर का पेट,
या कि किसी ,
गरीब के घर,
पहुचेगा खुशियो का पैकेट,
ये हो हो, मगर,
बाजार में उछाल अच्छा है॥

क्या करूं कि,
गीत तुम्हें मेरे,
अच्छे नहीं लगते,
मेरा सुर ,बेसुरा सही,
मगर तबले पे ,
तुम्हारा ताल अच्छा है

बेशक उस गरीब के,
पास खाली झोली,
और याचक आखें हैं,
मगर मंदिर में जाने का,
पहला हक तुम्हारा है,
तुम्हारी पूजा का थाल अच्छा है



(
)

इबादत को बहुत मिलेंगे,
मगर जिनके नाम पे हो सके सियसत,
चलो आज करें कोशिश,
एक ऐसा भी भगवान तलाशा जाए॥

खालों से सजी दीवारें,
चकाचौंध अट्टालिकाओं के जंगल में
गेंदे की खूशबू और सोंधी महक वाला,
इक मिट्टी का मकान तलाशा जाए॥

टीवी से चिपके चिपके से,
काल्पनिक पात्रों में खोए बच्चे खूब मिले,
तितली के पीछे दौडता, चींटे को पकडता,
आज कोई नादान तलाशा जाए

बडे भारी उपहारों से लदे-फ़दे
और मुस्कान नकली सी ओढे ओढे,
उन अपनों के बीच, साथ फ़ाकाकशी करने वाला,
कोई मेहमान तलाशा जाए॥

16 टिप्‍पणियां:

  1. कभी सुख,कभी दुख
    यही ज़िंदगी है,
    ये पतझड़ का मौसम
    घड़ी दो घड़ी है,
    नए फूल कल फिर
    डगर में खिलेंगे,
    उदासी भरे दिन
    कभी तो हटेंगे...

    जय हिंद...

    उत्तर देंहटाएं
  2. उन अपनों के बीच, साथ फ़ाकाकशी करने वाला,
    कोई मेहमान तलाशा जाए॥
    कविता की व्याप्ति इतनी बड़ी हो कि वे जन समान्य को समेट सकें । यह काम आपकी कविता बखूबी करती है ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. कविता तो सुन्दर है झा साहब मगर खुशदीप भाई की दी हुई तस्सली के जबाब में बस यही कहूंगा " अब अँधेरे में सफ़र करने की आदत डालो, इस सबेगम का सबेरा नहीं होने वाला "

    उत्तर देंहटाएं
  4. तुम्हारी पूजा का थाल अच्छा है ॥
    बेहतरीन

    उत्तर देंहटाएं
  5. दोनों रचनाएँ बहुत महत्व की हैं। दोनों विषमता के विरुद्ध कविताएँ हैं और शिल्प भी अनूठा है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. dono hi rachnayein alag alag sandesh deti huyi.........bahut hi sundar.

    उत्तर देंहटाएं
  7. नहीं पता, हां ये तो नहीं पता,
    कि आज भरेगा ,
    मजदूर का पेट,
    या कि किसी ,
    गरीब के घर,
    पहुचेगा खुशियो का पैकेट,
    ये हो न हो, मगर,
    बाजार में उछाल अच्छा है॥
    वाह बहुत सटीक अभिव्यक्ति है शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपके ब्लाग पर पहली बार आया, तबियत मस्त हो गई..
    सीधे-सरल शब्दों में गंभीर कटाक्ष यही व्यंग्य लेखन की विशेषता है
    खासकर इन पंक्तियों ने मन मोह लिया-
    बेशक उस गरीब के,
    पास खाली झोली,
    और याचक आखें हैं,
    मगर मंदिर में जाने का,
    पहला हक तुम्हारा है,
    तुम्हारी पूजा का थाल अच्छा है ॥
    --और फिर कभी

    उत्तर देंहटाएं
  9. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  10. बड़ी सार्थक बातें..रचना के माध्यम से.


    बडे भारी उपहारों से लदे-फ़दे
    और मुस्कान नकली सी ओढे ओढे,
    उन अपनों के बीच, साथ फ़ाकाकशी करने वाला,
    कोई मेहमान तलाशा जाए॥

    -बहुत बढ़िया!!

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत बढिया रचना.....एक दम सार्थक

    उत्तर देंहटाएं
  12. बेशक उस गरीब के,
    पास खाली झोली,
    और याचक आखें हैं,
    मगर मंदिर में जाने का,
    पहला हक तुम्हारा है,
    तुम्हारी पूजा का थाल अच्छा है ॥

    दोनों ही कवितायें बहुत सुन्दर लगीं।

    उत्तर देंहटाएं
  13. बहुत खूब .जाने क्या क्या कह डाला इन चंद पंक्तियों में

    उत्तर देंहटाएं
  14. वाह बहुत सटीक अभिव्यक्ति है शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं

टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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