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प्रचार खिडकी

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

एक कथा या सच (शीर्षक आप रखें )-ब्लोग की २०० वीं पोस्ट



निर्मला की कराह सुन के विनोद बाबू दौडे आए ," क्या हुआ क्या दर्द फ़िर बढ रहा है , आज ही रोहित को कहता हूं कि जल्दी से तय करके किसी अस्पताल में दाखिल करवा दे । इस तरह से मर्ज़ को देर तक पालने से आगे मुश्किल बढ जाएगी , मोहित भी आता ही होगा उसे भी खबर कर दी है , रास्ता ही कितनी देर का है , तुम चिंता मत करो "।

"नहीं नहीं मुझे चिंता इस बात की नहीं है कि अस्पताल में मुझे कब भर्ती होना है , मैं सोच रही हूं कि दोनों बेटे नाहक मेरे कारण इतना परेशान हो रहे हैं । बडी बहू (रोहित की पत्नी ) भी कितनी परेशान होती है मेरे कारण , मुझे तो डर लग रहा है अब मोहित के आने से फ़िर कोई बखेडा न खडा हो । वैसे भी उसकी प्राईवेट नौकरी है , हमेशा एक तलवार लटकी ही रहती है ।" बीमार निर्मला ने हांफ़ते हुए एक ही सांस में विनोद बाबू से सब कह डाला ॥

"अरे तुम तो खामख्वा चिंता करती हो , ऐसा कुछ नहीं होगा अब मतांतर किन भाईयों के बीच नहीं होता । दोनों समझदार हैं अपने आप सुलट लेंगे । तुम बेफ़िक्र रहो ..जल्दी ही भली चंगी हो जाओगी । " अब चुप हो जाओ और आराम करो , देखो कैसे चेहरा पीला पडता जा रहा है .." विनोद बाबू ने कहा , मगर वे मन ही मन निर्मला की गिरती सेहत को लेकर चिंतित थे और निर्णय ले चुके थे कि आज ही दोनों भाईयों के आने पर निर्मला की बाबत बात करेंगे ॥

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"अरे मोहित आ गया , चल अच्छा हुआ , मैं और तेरी भाभी तो पिछले कुछ दिनों से परेशान हो गए थे । देख मां की हालत दिन पर दिन बिगडती जा रही है ..उन्हें अस्पताल में दिखवाना जरूरी है । तुझे तो पता है कि हम दोनों की नौकरी है , बच्चे भी पीछे से कोई और ही संभालता है , ऐसे में मां की तीमारदारी कौन करेगा । चल अब तू आ गया है , मैं आज ही गाडी बुक करवा देता हूं , तू मां को ले के वहीं चला जा ", रोहित अपने छोटे भाई मोहित से मिलते ही बोला ।

"नहीं भैय्या , मैं मां को ले के नहीं जा सकता, आपको पता नहीं है , रेवती की कभी भी मां से नहीं बनी , वो तो इस हालत में मां को देखेगी तो और भी बिगड जाएगी कि क्यों ले कर आ गया । आप तो मां का इंतजाम यहीं करवाओ, कल किसी अस्पताल में दिखाते हैं चल के फ़िर देखते हैं कि आगे क्या कैसे होगा , वैसे भी आपने इतनी बार बार फ़ोन किया कि मुझे आना पडा , मेरे पास तो छुट्टी भी नहीं है । आप तो खुद ही संभाल सकते थे , " मोहित तल्ख स्वर में बोला ।

इससे पहले कि बात आगे बढती , विनोद बाबू जो अब तक चुप दोनों भाईयों की बात सुन रहे थे , कातर स्वर में बोल पडे , देखो बेटा , अभी इन बातों के लिए ठीक वक्त नहीं है , तुम्हारी मां की तबियत दिन पर दिन खराब होती जा रही हैं मुझे तो डर लगने लगा है कि कहीं कुछ हो न जाए ,और बेटा थोडा धीरे बोलो बगल के कमरे में तुम्हारी मां बीमार पडी है सुनेगी तो दुख होगा "।,

"आप चुप रहिए पिताजी , पहले भी मोहित ऐसे ही बहाने बनाता रहा है जब भी जरूरत पडती है इसकी , हमेशा ही इसकी अपनी समस्या आ जाती है । कोई न कोई बहाना बना देता है ..आखिर ये भी तो आपका बेटा है क्या इसका कोई फ़र्ज़ नहीं बनता , मुझे भी तो थोडा सा आराम चाहिए , शांति चाहिए मैं कुछ कहता नहीं तो ......." रोहित लगभग चीखता हुआ बोला । मैं सुबह तक का इंतज़ार कर रहा हूं , मोहित तू फ़ैसला कर ले क्या करना है , और फ़ैसला क्या , तुझे तो इस बार मां को लेकर जाना ही पडेगा । रोहित झटके से कमरे से बाहर निकल गया । मोहित भी बडबडाता हुआ , अपनी पत्नी को फ़ोन मिलाते हुए बाहर निकल गया ।
विनोद बाबू बुझे मन से अपनी पत्नी के कमरे में पहुंचे ," लो निर्मला, अब तो मोहित भी आ गया, अब चिंता की कोई बात नहीं , अरे सो गई क्या ,,...? " विनोद बाबू ने देखा तो चौंक गए ..निर्मला के आखों के कोर से आंसू की धार बह रही थी । वो मौन की भाषा समझ रहे थे ,और जैसे जैसे पढ रहे थे उनका दिल डूबता जा रहा था ।
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भोर की पहली किरण के साथ ही जब विनोद बाबू की नींद खुली तो वो निर्मला की ओर लपके । एक दम शांति कोई हलचल नहीं , ...धक से रह गए वे । गले से घुटी घुटी सी चीख निकली ....निर्मला....आ...आ...आ..। रोहित ...मोहित .......

पूरा परिवार इकट्ठा हो गया पल भर में और बहूओं का रोना धोना भी । बच्चे भी साथ साथ अवाक रो रहे थे । मोहित अपने मोबाईल से अपनी पत्नी को पहुंचने के निर्देश दे रहा था । रोहित सुबकियों के बीच चुप खडा था । धीरे धीरे ..आस पडोस के लोग भी इकट्ठा होने लगे । बीच में ही थोडी देर के लिए दोनों भाई सबसे पीछे जाकर बातें करने लगे । वहां कोई नहीं था, ॥

"देख मोहित मां तो चली गई , और अब पिताजी बचे हैं उनकी सेवा करनी है हमें , तेरी तो प्राईवेट नौकरी है , और फ़िर पिताजी की कौन ज्यादा देखभाल करनी है वे मेरे पास ही रहेंगे ( रोहित के मन में पिताजी की मोटी पेंशन चमक रही थी ) "

"वाह अभी मां को रखने के लिए तो तुम्हारे पास समय ही नहीं था अब पिताजी के लिए सब ठीक हो गया , ये कहो न कि पेंशन मिलेगी उसी के चक्कर में तैयार हो गए , मैं सब समझ रहा हूं ..पिताजी मेरे साथ ही जाएंगे । मैं खुद बात कर लूंगा पिताजी से । "मोहित तमतमाया हुआ बोला । और चल दिया वहां से ॥

दोनों भाईयों ने ये नहीं देखा कि वहीं ओट में खडे विनोद बाबू ,सब सुन चुके थे । वहां से निकल कर दोनों भाईयों को ईशारे से बुलाया और कहा, "बेटे तुम दोनों भाईयों ने अपनी शक्ति और श्रद्धा के अनुसार हमारी खूब सेवा की , तुम्हारी मां को तो मुक्ति मिल गई , अब संस्कार के बाद मुझे भी मुक्ति दो । मैं भी गांव चला जाऊंगा वहीं रहूंगा , उम्मीद है कि इससे तुम दोनों को आगे कोई कठिनाई नहीं होगी । विनोद बाबू, सख्त और सपाट स्वर में बोले ॥

16 टिप्‍पणियां:

  1. आजकल ज़माना ही ऐसा है मित्र..सेवा कोई नहीं करना चाहता लेकिन मेवा सबको चाहिए ...


    बहुत ही बढिया...रोचक तरीके से लिखी गई कथा

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  2. आप की यह कहानी आज का सच है,बहुत मार्मिक

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  3. कड़वा सच लिख दिया है आपने...कुछ कहते नहीं बन रहा .....बहुत मार्मिक रचना हुई है .

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  4. कितने घरों का सच चौराहे पर ले आये आप! बहुत मार्मिक एवं यथार्थ.!

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  5. दिल छूने वाली मार्मिक कथा.. नहीं-नहीं सच।

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  6. " सत्य का कोई शीर्षक नहीं होता "
    यह इस कथा का शीर्षक है भाई ..।

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  7. जमाने का बेहब कडवा तथा शर्मनाक सच!!
    बेहद मार्मिक!

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  8. बेहद करीबी रचना. सच्चाई है.
    शुरू से आखिर तक कौतूहल बरकरार रहा. अंत भी अत्यंत सुन्दर

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  9. यही है आज का सच!

    आज अपनी सन्तान से अपेक्षा करना बहुत बड़ी मूर्खता बन कर रह गई है।

    कभी कभी तो लगता है कि पशु पक्षी हमसे अच्छे हैं, उन्हें अपनी सन्तान से किसी प्रकार की अपेक्षा नहीं होती।

    200वीं पोस्ट की बधाई!

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  10. आज का सच बयां करती हुई मार्मिक कहानी अंत बहुत अच्छा लगा ।

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  11. इस चक्कर में दूसरे शतक की बधाई देना रह गई.

    बहुत बधाई और अनेक शुभकामनाएँ.

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  12. aaj ke yatharth ko utar ka rrakh diya hai...........bahut hi marmik........sach kaha........satya ka koi shirshak nhi hota.

    200 vi post ki hardik badhayi........nirantar jari rahe aisa hi lekhan.

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  13. दिल छूने वाली मार्मिक कथा.. नहीं-नहीं सच।

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  14. आज का सच बयां करती हुई मार्मिक कहानी अंत बहुत अच्छा लगा ।

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टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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