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प्रचार खिडकी

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

खामोशियों से, बतियाता हूँ मैं........


अब तनहाइयों को ,
सुनता हूँ,
और कभी खामोशियों से,
बतियाता हूँ मैं॥

जो लगता है असंभव,
खुली आंखों से,
बंद कर आँखें , उन्हें सच,
बनाता हूँ मैं॥

छाँव में छलनी,
होता है मन,
अक्सर धूप में,
सुस्ताता हूँ मैं॥

बारिश की मीठी बूँदें,
मुझे तृप्त नहीं करतीं,
इसलिए समुन्दर से ही,
प्यास बुझाता हूँ मैं॥

उसको जिताने की ख़ुशी,
बहुत भाती है मुझे,
इसलिए हमेशा उससे,
हार जाता हूँ मैं॥

दर्द से बन गया है,
इक करीबी रिश्ता,
जब भी मिलता है सुकून,
बहुत घबराता हूँ मैं॥

मैं जानता हूँ कि,
मेरे शब्द कुछ नहीं बदल सकते,
फिर भी जाने क्यों ,
इतना चिचयाता हूँ मैं॥

12 टिप्‍पणियां:

  1. अब तनहाइयों को ,
    सुनता हूँ,
    और कभी खामोशियों से,
    बतियाता हूँ मैं॥

    इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....

    उत्तर देंहटाएं
  2. छाँव में छलनी,
    होता है मन,
    अक्सर धूप में,
    सुस्ताता हूँ मैं॥

    बारिश की मीठी बूँदें,
    मुझे तृप्त नहीं करतीं,
    इसलिए समुन्दर से ही,
    प्यास बुझाता हूँ मैं॥

    yun to poori kavita hi bejod hai magar in panktiyon ne to man moh liya.

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह!! कितनी सुन्दर कविता. मै तो आज पहली बार आई हूं आपके इस ब्लॉग पर. मुझे तो मालूम ही नहीं था कि एक व्यंग्यकार के अन्दर इतना कोमल कवि भी है...
    जो लगता है असंभव,
    खुली आंखों से,
    बंद कर आँखें , उन्हें सच,
    बनाता हूँ मैं॥
    बहुत सुन्दर.

    उत्तर देंहटाएं
  4. व्यंग्यकार और कवि ....ये दोनों कौन हैं जी ...हम तो निरे कंप्यूटर पीटने वाले हैं बस ...एक ब्लोग्गर ....
    अजय कुमार झा

    उत्तर देंहटाएं
  5. छाँव में छलनी,
    होता है मन,
    अक्सर धूप में,
    सुस्ताता हूँ मैं॥
    धूप में सुस्ताने वाले ही छाव का आनन्द ले पाते हैं.
    रद्दी की टोकरी में आप तो हीरा सजा रहे हैं

    उत्तर देंहटाएं
  6. शानदार कविता कही बन्धु !

    वाह ! बहुत अच्छा लगा बाँच कर.........

    उत्तर देंहटाएं
  7. मैं जानता हूँ कि,
    मेरे शब्द कुछ नहीं बदल सकते,
    फिर भी जाने क्यों ,
    इतना चिचयाता हूँ मैं॥

    ऐसा क्‍यूं सोंच लेते हैं !!

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुन्दर कवितायें बार-बार पढने पर मजबूर कर देती हैं.
    आपकी कवितायें उन्ही सुन्दर कविताओं में हैं.

    उत्तर देंहटाएं

टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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