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प्रचार खिडकी

शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2008

खुशियों की खुरचन ही मिली

कोशिश तो,
हमने भी की,
अपनी झोलियाँ,
भरने की,
किस्मत अपनी,
की हर बार,
खुशियों की,
खुरचन ही मिली।

जब कर लिए,
सारे प्रयास,
और ढूंढ लिए,
कई प्रश्नों के,
उत्तर भी,
हर जवाब से,
इक नयी,
उलझन ही मिली॥

चाहा की तुम्हें,
रुसवा करके,
सिला दूँ, तुम्हें,
तुम्हारी बेवफाई का,
तुम्हें दी ,
हर चोट से,
अपने भीतर इक,
तड़पन सी मिली॥

मैं मानता था,
अपने अन्दर,
तुम्हारे वजूद को,
मगर न जाने क्यों,
हर बार , बहुत,
दूर तुम्हारी,
धड़कन ही मिली...

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टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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