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प्रचार खिडकी

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

बस एक अदद झूठी अफ़वाह की दरकार है .........










उसे नफ़े नुकसान की फ़िक्र नहीं बिल्कुल भी ,
उसका सपने बेचने का ,सालों का कारोबार है ॥
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हम फ़ूंक डालते हैं , खुद बस्तियों को अपनी ,
बस एक अदद झूठी अफ़वाह की दरकार है ॥
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तुम देश दुनिया मंगल करने के देखते हो सपने ,
अगला बेबस है इतना , टमाटर प्याज़ से भी लाचार है ॥
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राशन, रोज़गार की हालत में पैबंद लगे हों बेशक,
मगर जिसका भी सुनिए , भाषण सबका जोरदार है ॥
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लाशों पर लाशें रखकर , चल रहा है निर्माण इसका ,
नहीं टूटेगी अब ,बहुत हो गई ऊंची ,सरहद की दीवार है॥
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मेरी तेरी मौत की अहमियत अब खत्म हो गई ,
खुद खंजर हाथ में लिए ,सामने सरकार है ॥
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उसे माफ़ है सातों खून का गुनाह भी ,
वो जो राजमाता की बेटी का भतार है ॥
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तुम हंस लो कहकहे लगा के उसकी बेवकूफ़ी पर बेशक,
मगर गैरत बची है उसकी , वो अब तक खुद्दार है ॥
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अब इस देश में गुनाहों की बात करना खुद एक गुनाह है ,
वो कहते हैं तुम्हारे पास , इंज्वाय करने को बलात्कार है ॥
.

बहुत मोटी हो गई है चर्बी, बेशर्मी और बेहयाई की बेशक,
काट के उतार देंगे केंचुली उनकी ,हमारी तेज़ बहुत धार है ॥


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