इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

प्रचार खिडकी

सोमवार, 18 जून 2012

ज़िंदगी के पन्नों पर ,बिखरे आखर .....


चित्र , गूगल इमेज खोज इंजन के परिणाम से , साभार





ये न पूछ मुझसे कि ये आज मुझे हुआ क्या है ,
जो ज़िंदगी ही मर्ज़ है तो बता इसकी दवा क्या है

पत्थर के इस शहर में जाने हर ईंट क्यूं पराई है
धधक रहा है कुछ भीतर , किसने ये आग लगाई है


चल माना दस्तूर अदला बदली का है , द्स्तूर निभाया ही जाए जरूरी तो नहीं
जो देते रहे ताउम्र इस ज़िदगी को ,वही ज़िंदगी से पाया भी जाए जरूरी तो नहीं


कतरों और किश्तों में बंटी जिंदगी ,तकदीर, जो तेरी यही रज़ा है ,
जो जिंदगी आसान ही होती जाए , तो ये मौत भी बेमज़ा है ...

तू अब न मुझे डराया कर जिंदगी,बता क्या नहीं अब तक खोया हूं मैं ,
गीली आंखों को भी रोने दे ज़रा, बहुत हंसती आंखों से रोया हूं मैं


ज़िन्दगी , क्यूं तुझसे कोई शिकायत करूं , इक मुझसे ही तू खफ़ा तो नहीं ,
तेरी वफ़ा पर होते रहे शुबहे , मौत मेहबूबा ही कभी हुई बेवफ़ा तो नहीं

छूटा गांव , बिछडे अपने , पकडी जो , उस रेल को कोसता हूं मैं ,
जीतने की ज़िद थी जिंदगी के खेल की , उस खेल को कोसता हूं मैं ...

जिंदगी को बहुत अच्छे से महसूसता रहा , कि इस देश का अवाम हूं मैं ,
जो यूं करता हूं ज़िक्र जिंदगी मौत का , बस इसलिए कि आदमी आम हूं मैं


जिंदगी यूं न कटेगी , इसे जीने का पहले ,दस्तूर समझ लो ,
सज़ा कबूलने में आसानी होगी ,इक बार अपना कसूर समझ लो

मत रोक मुझे , मत टोक मुझे , आज तो जी की कहने दे ,
कब तलक मुस्कुराती रहेंगी आंखे , आज अश्कों को बहने दे


मुझे नाहक ही दर्द महसूस हुआ , ये शाम ही है कुछ उदास उदास ,
जिंदगी इर्द गिर्द थी होठों के आजकल बसेरा है उसका आंखों के आसपास


दिन काट लेते हैं तपिश में जलाते खुद को ,क्यूं ये रात अच्छी नहीं लगती ,
कैसे मिलने का वादा करूं तुमसे जब खुद से मुलाकात अच्छी नहीं लगती

मुहब्बत से झूठी कोई शै नहीं ,इश्क से बडा और कोई व्यापार नहीं
जिंदगी तो हमेशा से बेवफ़ा रही है , मौत भी अपना यार नहीं ....


हर बार मैं तुझसे मिला के आंखें , मुस्कुरा दूं , ऐसा कोई करार नहीं है ,
जो तुझे मेरी कद्र नहीं , तो जा जिंदगी , मुझे भी तुझसे अब प्यार नहीं है

14 टिप्‍पणियां:

  1. मानना पड़ेगा.. बहुत खूब लिखा है... यह अंदाज़ से मैं अनजान था.. थैंक्स फोर शेयरिंग...

    उत्तर देंहटाएं
  2. छूटा गांव , बिछडे अपने , पकडी जो , उस रेल को कोसता हूं मैं ,
    जीतने की ज़िद थी जिंदगी के खेल की , उस खेल को कोसता हूं मैं .

    सभी पंक्तियाँ जीवन से जुड़ी सी ......

    उत्तर देंहटाएं
  3. आज हवा का झोंका दिल छू कर निकल गया।

    उत्तर देंहटाएं
  4. पत्थर के इस शहर में जाने हर ईंट क्यूं पराई है
    धधक रहा है कुछ भीतर , किसने ये आग लगाई है



    हर बार मैं तुझसे मिला के आंखें , मुस्कुरा दूं , ऐसा कोई करार नहीं है ,
    जो तुझे मेरी कद्र नहीं , तो जा जिंदगी , मुझे भी तुझसे अब प्यार नहीं है

    बहुत खूब .... सभी बहुत बढ़िया

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्दर............
    अति सुन्दर......................

    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  6. अनुपम भाव संयोजित किये हैं आपने ...
    कल 20/06/2012 को आपकी इस पोस्‍ट को नयी पुरानी हलचल पर लिंक किया जा रहा हैं.

    आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


    बहुत मुश्किल सा दौर है ये

    उत्तर देंहटाएं
  7. चल माना दस्तूर अदला बदली का है , द्स्तूर निभाया ही जाए जरूरी तो नहीं
    जो देते रहे ताउम्र इस ज़िदगी को ,वही ज़िंदगी से पाया भी जाए जरूरी तो नहीं
    ....बिल्कुल ज़रूरी नहीं

    उत्तर देंहटाएं
  8. छूटा गांव , बिछडे अपने , पकडी जो , उस रेल को कोसता हूं मैं ,
    जीतने की ज़िद थी जिंदगी के खेल की , उस खेल को कोसता हूं मैं ...

    सब कुछ खो जाने के बाद बस मन मसोस के रह जाता है इंसान ... जब जीतने की जिद्द होती है तो कुछ नज़र नहीं आता ... लाजवाब है हर शेर ...

    उत्तर देंहटाएं
  9. मुहब्बत से झूठी कोई शै नहीं ,इश्क से बडा और कोई व्यापार नहीं
    जिंदगी तो हमेशा से बेवफ़ा रही है , मौत भी अपना यार नहीं ....

    बहुत बढ़िया सर!


    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  10. अलग अंदाज. सुंदर प्रस्तुति.

    बधाई.

    उत्तर देंहटाएं

टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Google+ Followers