उन्हें शक है कि उजले , चमकीले ,
शहरों में ,शायद कभी कोई नहीं रोता
कह दो है वो, इतना है हर रात ,रोता ,
पता चल गया होता कबका जो ,तुमने चख लिया कहीं होता
शहर में आंसुओं का स्वाद , अब नमकीन नहीं होता
हर दरख्त की जड मिट्टी में होती है ,
हर पेड की मंज़िल आसमां हो बेशक ,
लकडी का कोई टुकडा बनने कुर्सी सियासत की ,
यकायक ही कभी नामचीन नहीं होता ,
शहर में आंसुओं का स्वाद , अब नमकीन नहीं होता
वो जो फ़र्क जानते हैं मान और अपमान का ,
वही तो चापलूसी बेइज़्ज़ती महसूस करते हैं ,
गरीब की बस रोटी ही इक आखिरी औकात है ,
भूखे का किसी दम भी तौहीन नहीं होता ..
शहर में आंसुओं का स्वाद , अब नमकीन नहीं होता
उसूलों कानूनों की एक फ़ौज़ है फ़िर भी ,
हादसों अपराधों के लिए हुआ मशहूर मेरा देश ,
है इक दस्तूर अब यहां बहुत मजबूत सा हो चला ,
काबिल वकील साथ में हो , जुर्म कोई सा भी हो ,संगीन नहीं होता
शहर में आंसुओं का स्वाद , अब नमकीन नहीं होता
खुली बंद हर जोडी आंखो को है , हुक्म कि सपना देखें ,
फ़िर ताउम्र उस सपने को पाने में , न वक्त बेवक्त अपना देखें ,
बेशक शहर भी सपने देखता होगा , मगर स्याह और सफ़ेद ही ,
इतनी चकाचौंध उजियारी रातों में , कोई सपना रंगीन नहीं होता
शहर में आंसुओं का स्वाद , अब नमकीन नहीं होता
दुनिया और दुनियादारी , बेशक , हम दोनों के लिए खराब हो गए , कमबख्त, इतना बिखरे रहे, आखरों के बीच कि किताब हो गए
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बृहस्पतिवार, 28 जून 2012
शहरों में आंसुओं का अब स्वाद नमकीन नहीं होता...
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आंसुओं,
नमकीन,
बिखरे आखर,
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क्या कहें ... सच है कि ... शहर में आंसुओं का स्वाद , अब नमकीन नहीं होता ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंbahut sahi likha hai ..........
प्रत्युत्तर देंहटाएंहै इक दस्तूर अब यहां बहुत मजबूत सा हो चला ,
प्रत्युत्तर देंहटाएंकाबिल वकील साथ में हो , जुर्म कोई सा भी हो ,संगीन नहीं होता
...बहुत सच....हरेक पंक्ति बहुत सटीक और सुन्दर...
बेहतरीन का शाब्दिक चित्रण... सटीक पंक्तिया .
प्रत्युत्तर देंहटाएंहर दरख्त की जड मिट्टी में होती है ,
प्रत्युत्तर देंहटाएंहर पेड की मंज़िल आसमां हो बेशक ,
जड़े तलाशनी ही होंगी. विरोधाभासी है यह देश
लाजवाब
बहुत सुन्दर सृजन , सुन्दर भावाभिव्यक्ति , बधाई .
प्रत्युत्तर देंहटाएं.
यहाँ आँसूं ही क्या ....सब कुछ बेस्वादा सा हों गया हैं
प्रत्युत्तर देंहटाएंआज 16/07/2012 को आपकी यह पोस्ट (दीप्ति शर्मा जी की प्रस्तुति मे ) http://nayi-purani-halchal.blogspot.com पर पर लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!
प्रत्युत्तर देंहटाएंवाह ... बेहतरीन भाव
प्रत्युत्तर देंहटाएंआदरणीय झा साहब बहुत ही उम्दा कविता |ब्लॉग पर उत्साहवर्धन हेतु आभार |
प्रत्युत्तर देंहटाएंmast aak dam dil ki bbat baol di bhai..........bhout hi badya kabhi bhi likna mat chodna ?
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