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प्रचार खिडकी

रविवार, 16 दिसंबर 2007

टिप्पणियों में कंजूसी क्यों ?

जब से ब्लोग लिखना शुरू किया है एक बात समझ आती है की शायद सब मेरी तरह सबसे पहले यही देखते हैं की जो लिखा था उस पर कोई टिप्पणी आयी या नहीं । और यकीन मानिए जब कोई भी टिप्पणी नहीं आती है तो थोडी सी मायूसी तो सबको होती ही होगी। फिर मैंने सोचा की आख़िर इसकी वजह क्या होती है ।

जहाँ तक मुझे लगता है की इकी कुछ खास वजह तो जरूर होती हैं। पहली ये की जो ब्लॉगर मेरे जैसे कैफे में बैठ कर ब्लोग लिखता होगा उसका पहला काम होता होगा कि जल्द se जल्द अपना चिटठा लिख कर उसे पोस्ट कर दे । उसके बाद यदि समय बचे तो फिर दुसरे का ब्लोग पढ़ कर उसमें टिप्पणी करे। मगर जैसा कि मैं भी पहले टिप्पणी कर ही नहीं पाता था । मगर अब उसका हल निकाल लिया इसलिए अब ब्लोग्गिंग से मैं उतना समय जरूर बचा लेता हूँ कि टिप्पणी कर सकूं।

दूसरी बात लगती है कि इतने सरे ब्लोग में से किसे पढा जाये किस पर टिप्पणी की जाये , किसी किसी का ब्लोग तो खुलने में ही बहुत समय ले लेता है। और फिर चिट्ठे भी थाभी तक दिखाई देते हैं जब तक आपके छिट्ठे को रेप्लास करने के लिए नया चिट्ठा ना आ जाये। इसके लिए अग्ग्रेगातोर्स को कोई ऐसे व्यवस्था करनी चाहिए की एक समय की बाद वही सारे ,या उनमें से कुछ खास अलग से दिखाई दें।

एक सबसे जरूरी बात ये भी की हम सबको ये कोशिश करनी चाहिए की जब भी ब्लोग्गिंग करने आयें कुछ ना कुछ टिप्पणियाँ भी जरूर करें । जरूरी नहीं कि टिप्पणी बहुत लम्बी हो .फिर चाहे वो मात्र एक शब्द ही क्यों ना हो ।

मैं तो कम से कम यही करने वाला हूँ

9 टिप्‍पणियां:

  1. चलिए देर आए दुरुस्त आए!!
    ये वर्ड वेरीफिकेशन की बाध्यता भी हटाएं तो बेहतर

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  2. बिलकुल सही फरमाया अजय भाई। ऐसा ही कुछ टिप्पणींकर्ता को भी लगता है कि उसकी दी हुई टिप्पणी को ब्लागकर्ता ने पढ़ा या नही और उसकी प्रतिक्रिया जानने की उत्सुकता उसको भी रहती है। क्यों?

    रमेश

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  3. बिल्कुल मनोवैज्ञानिक चिंतन…।

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  4. हां भाई,ब्लाग पढने के बाद टिप्पणी न करने का मतलब हॆ,नयी दुल्हन का मुंह देखने के बाद शगुन के रुप में कुछ भी न देना.क्या करें,दुनिया में हर तरह के लोगों से पाला पडता हॆ.यहां तो जो दे उसका भला,न दे उसका भी भला.

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  5. हरेक लेखक टिप्पणी चाहता है अत: हरेक को 10 से 20 टिप्पणी प्रति दिन की आदत डाल लेनी चाहिये. इससे लोग आपके चिट्ठे की ओर आकर्षित होंगे. धीरे धीरे उन में से कुछ आपके स्थाई पाठक बन जायेंगे.

    ये वर्ड वेरीफिकेशन की बाध्यता भी हटाएं तो बेहतर!!

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  6. लीजिये आपकी बात को मानते हुए टिप्पणी कर ही देते हैं। :)
    ॥दस्तक॥
    गीतों की महफिल

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  7. baap re baap aap sab to bilkul taiyaar baithe the jaise. bahut badhiyaa sarkaar aap sabkee baat aur anubhav bilkul sachhe hain. aur haan jahan tak ye word verification ki baat hai yaar ye baat to google ke blogger banane wale ko sochni chahiye thee. chaliye ab jab dheere dheere hum sabke man mein ye baat aa rahee hai to kabhi naa kabhi unhey bhee to samajh aa hee jayegi.
    aap sabkaa tahe dil se shukriyaa .

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  8. टिप्पणी की कंजूसी हम नहीं करते , परन्तु बहुत से ऐसे लोग हैं जिनके चिट्ठों पर चाहे जाएँ , टिपियाएँ किन्तु वहाँ से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आती । यह इस हाथ दे उस हाथ ले की बात नहीं है परन्तु कभी कभी अपग्रही लोग भी थक कर बस कर देते हैं ।
    वैसे अपना नाम जरा देवनागिरी में भी लिखें तो समझ आए कि हम किससे बात कर रहे हैं ।
    घुघूती बासूती

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  9. भाई साहब,
    अपने स्वर में एक स्वर मेरा भी मिला लें। अपनी पोस्ट लिखने और दो-चार टिप्पणियाँ देने के बाद मुझे भी घोर प्रतीक्षा रहती है कि कोई बन्दा तो नजरे इनायत करे। लेकिन फिलहाल टोटा लगा रहता है।
    -सत्यार्थमित्र

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टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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