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प्रचार खिडकी

रविवार, 31 मई 2009

कुछ पंक्तियाँ







काफी समय पहले बी आर विप्लवी जी की कुछ पंक्तियाँ पढी थी ....मुझे पसंद आईं .....आप भी गौर फ़रमाएँ

पूछकर जात -घराने मेरे,
सब लगे ऐब गिनाने मेरे,

छेड़ मत गम के फ़साने मेरे,
दर्द उभरेंगे पुराने मेरे,

जात फिर इल्म से बड़ी निकली,
काम ना आये बहाने मेरे,

चंद लम्हों की मुलाकातों में,
कैद लाखों हैं जमाने मेरे,

छाँव आँचल की जब मिली माँ की,
भर दिए जख्म, दुआ ने मेरे,

अश्क बरसे तो सब गुमान बहे,
घुल गए मैल ,पुराने मेरे,

इक सिफर आखिरात का हासिल था ,
रह गए , जोड़-घटाने मेरे,

जब से तू बस गया निगाहों में,
चूक जाते हैं निशाने मेरे,

शहर में घर , न गाँव में खेती,
है कहाँ ठौर, ठिकाने मेरे,

विप्लवी खोजते हुए खुशियाँ,
सब लुटे ख्वाब सुहाने मेरे

उम्मीद है आप पसंद करेंगे........

--

5 टिप्‍पणियां:

  1. ajay jee aaj to aap chha gaye hain jab bhi blogs ko dekho apki rachna samne hoti hai kese itana likh lete hain aapki kalam ko slam bahut sundar kavita hai aabhaar

    उत्तर देंहटाएं
  2. इक सिफर आखिरात का हासिल था ,
    रह गए , जोड़-घटाने मेरे,
    आप की रचना ने मुझे बहुत प्रभावित किया है .....बहुत अच्चा लिखा है

    उत्तर देंहटाएं
  3. aap logon ne shaayad meri pehlee pankti par dhyaan nahin diya...ye maine likhaa nahin tha albatta padhaa jaroor tha..iske lekhak hain b r viplav jee..

    उत्तर देंहटाएं
  4. bahut hi badhiya rachna hai , bahut prabhavit kiya.

    उत्तर देंहटाएं

टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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