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प्रचार खिडकी

शुक्रवार, 24 जून 2011

कुछ टूटे-फ़ूटे बिखरे आखर





जडों से कटकर , जिंदगी ,कुछ ऐसी उलझी शाखों में ,
खूब हंसे उजालों में , और जी भर के रोए रातों में ...



उदासियों को लपेट के , इन पनियाली आंखों से ,
अक्सर कई शामें गुज़ारा करते हैं .....
हमें यकीं है उनकी मौत का , फ़िर भी,
वहीं जाकर , उन्हें रोज़ पुकारा करते हैं ....



आज उन दोस्तों से इक बात तो कह दूं , 
जो उठते हैं जब छतों पर अपने,
         तो सामने हरा खेत दिखता है 
तो देख लो और जुरा लो ,

अपनी आंखें मन भर , 
एक बार निकले तो फ़िर ,

मरूस्थल का बस रेत दिखता है ...



पुरवाइयों को झोंका , अब छत पे मेरी नहीं आता , 
बस लोगों को गुमा है , मैं हाकिम बडा हूं ........



ये आंसू , मेरे मुखौटे का रकीब क्यों है ,
बस ज़रा दूर होतीं ,आखें ,दिल के करीब क्यों है



अक्सर इन हालातों में खुद ही खुद को सताता हूं मैं ,
एक हाथों से लिखता हूं , दूसरे से मिटाता हूं मैं ..


थाम के सिरा यादों का अपनी, दीवारों से लिपट के रोया वो ,
किसी शाम का किस्सा यूं गुजरा , पहले रोया , फ़िर सोया वो



बहुत लंबी फ़ेहरिस्त है ,
जिंदगी के इम्तहानों की ,
आदमी जीता है बहुत है मगर ,
जिंदगी छोटी है इंसानों की ,
इस पत्थर के जंगलों में 
यूं तो बस्तियां ही बस्तियां हैं , 
जहां प्यार मिलता था ,
ताले जडे हैं दरवाज़ों पे ,
खिडकियां बंद है उन मकानों की ..


 कतरा कतरा ,ज़िंदगी ,पिघलती रही,
बिना रुके , बिना थके ,बस यूं ही चलती रही ,
धुंआं देखा तो लोगों ने अंदाज़ा लगाया ,
कभी वो जलता रहा , कभी जिंदगी जलती रही

27 टिप्‍पणियां:

  1. कई मेल की खिचड़ी बनाई है,पर बहुत स्वादिष्ट है.
    कविता में भाव-पक्ष मज़बूत होना चाहिए,और वह भरपूर है !

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  2. कतरा कतरा ,ज़िंदगी ,पिघलती रही,बिना रुके , बिना थके ,बस यूं ही चलती रही ,धुंआं देखा तो लोगों ने अंदाज़ा लगाया ,कभी वो जलता रहा , कभी जिंदगी जलती रही

    dil ko chhoo gayi ye panktiya

    उत्तर देंहटाएं
  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. 'कतरा-कतरा,जिंदगी,पिघलती रही

    बिना रुके,बिना थके,बस यूँ ही चलती रही '

    .........................सुन्दर जीवन दर्शन .........एक साथ कई सार्थक भावों का सफल सम्प्रेषण

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  5. दिल से निकले एहसास ,दिल को छूते हैं...
    खुश रहें |

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  6. बहुत खूब ..सभी बहुत अच्छी लगीं ...


    धुंआं देखा तो लोगों ने अंदाज़ा लगाया ,
    कभी वो जलता रहा , कभी जिंदगी जलती रही

    यह गज़ब की हैं ..

    उत्तर देंहटाएं
  7. अक्सर इन हालातों में खुद ही खुद को सताता हूं मैं,
    एक हाथों से लिखता हूं , दूसरे से मिटाता हूं मैं ..

    bahut khoob likha hai :)

    ___________________________________

    क्या मुझे प्यार का सलीका भी नहीं आया था ?? || मनसा ||

    राजनेता - एक परिभाषा अंतस से (^_^)

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  8. कभी वो जलता रहा , कभी जिंदगी जलती रही

    धुंआं देखा तो लोगों ने अंदाज़ा लगाया.



    वाह झा जी ... बढ़िया रचना लगी....

    उत्तर देंहटाएं
  9. उदासियों को लपेट के , इन पनियाली आंखों से ,

    अक्सर कई शामें गुज़ारा करते हैं .....

    हमें यकीं है उनकी मौत का , फ़िर भी,

    वहीं जाकर , उन्हें रोज़ पुकारा करते हैं ....

    कविराज कमाल कर रहे है आजकल्…………इतना दर्द क्यो पी रहे हैं……………दर्द के सिवा भी बहुत कुछ है ज़िन्दगी मे……………इतना गिला वो भी ज़िन्दगी से……………उसमे ही तलाशिये कुछ सुख की छांव भी जरूर मिलेगी।

    उत्तर देंहटाएं
  10. कतरा कतरा ,ज़िंदगी ,पिघलती रही,बिना रुके , बिना थके ,बस यूं ही चलती रही ,धुंआं देखा तो लोगों ने अंदाज़ा लगाया ,कभी वो जलता रहा , कभी जिंदगी जलती रही

    adbhut ...shandar aapki lekhani ko salam

    उत्तर देंहटाएं
  11. अरे बाप रे भैया....कितना दिन बाद आया आपके ब्लॉग पे..नाम भी बदल गया और ब्लॉग मं तो बस कवितायेँ ही कवितायेँ हैं....मस्त...हर पोस्ट बहुत अच्छा लगा...जो दो तीन पढ़ा अभी :)

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  12. गजब कर रहे हैं झा जी...वाह!

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  13. आपकी कविता के जवाब में सिर्फ इतना कहूँगी की


    आज वो घर कहाँ जहाँ
    इंसान बसते थे
    आज वो दिल कहाँ जहाँ
    प्यार रिसता था
    पत्थर की दीवारे हो गई
    घरो की
    दिल में सिर्फ
    गद्दारी का बसेरा हो गया

    anu

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  14. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 28 - 06 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच-- 52 ..चर्चा मंच

    उत्तर देंहटाएं
  15. जडों से कटकर , जिंदगी ,कुछ ऐसी उलझी शाखों में ,

    खूब हंसे उजालों में , और जी भर के रोए रातों में ...

    waaaaaaaaaah!!!!!!

    bahut khoobsoorat, gahan bhaaw liye.....

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  16. बेहतरीन, पहली बार आपकी कविता पढ़ रहा हूँ।

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  17. अच्छी रचना ,खासकर अंतिम चार पंक्तियां ।

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  18. क्‍या क्‍या रंग दिखाए जिंदगी.

    उत्तर देंहटाएं
  19. कतरा कतरा ,ज़िंदगी ,पिघलती रही,
    बिना रुके , बिना थके ,बस यूं ही चलती रही ,
    धुंआं देखा तो लोगों ने अंदाज़ा लगाया ,
    कभी वो जलता रहा , कभी जिंदगी जलती रही

    बहुत सुन्दर...बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  20. बहुत लंबी फ़ेहरिस्त है ,
    जिंदगी के इम्तहानों की ,
    आदमी जीता है बहुत है मगर ,
    जिंदगी छोटी है इंसानों की .......

    अजय जी बहुत ख़ूब लिखा .......यूँ तो पूरी कविता ही भावपूर्ण है पर ये पंक्तियाँ तो ....बेहतरीन .......

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  21. अजय जी बहुत दिनो बाद आपके ब्लोग पर आयि लेकिन इतना निराशाजनक तो आप नहि लिख्ते थे.

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  22. इस पत्थर के जंगलों में

    यूं तो बस्तियां ही बस्तियां हैं ,

    जहां प्यार मिलता था ,

    ताले जडे हैं दरवाज़ों पे ,

    खिडकियां बंद है उन मकानों की ..
    सचमुच कितना बदल गए हैं हम...मन को छू गयी आपकी भाव युक्त रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  23. अक्सर इन हालातों में खुद ही खुद को सताता हूं मैं ,एक हाथों से लिखता हूं , दूसरे से मिटाता हूं मैं ..

    और फिर शायद जिन्दगी का फलसफा भी तो यही है

    उत्तर देंहटाएं
  24. क्सर कई शामें गुज़ारा करते हैं .....

    हमें यकीं है उनकी मौत का , फ़िर भी,

    वहीं जाकर , उन्हें रोज़ पुकारा करते हैं ....
    gajab ki prastuti hai .badahai

    उत्तर देंहटाएं
  25. अक्सर इन हालातों में खुद ही खुद को सताता हूं मैं ,
    एक हाथों से लिखता हूं , दूसरे से मिटाता हूं मैं ..SUNDAR SRIJAN.

    उत्तर देंहटाएं

टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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