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प्रचार खिडकी

बुधवार, 6 जुलाई 2011

मन हाथ से कहता है , कलम बूझता जाता है .... बिखरे आखर




कवि जी आपके जाने पहचाने से हैं 




यूं ही सिलसिला चलता है,यूं ही बनते हैं अफ़साने अक्सर 
मन हाथ से कहता है   , कलम बूझता जाता है ....


अब तोतों के झुंडों का , मुझे इंतज़ार नहीं रहता ,
गनीमत है कि कबूतरों का , जोडा दिख तो जाता है ....


बेशक तुम्हारे दौर के गीत अलग और बोल अलग , 
शुक्र है कि अब भी हर रेडियों , पुराने गाने बजाता है ...


दुश्मन मोहब्बत का लाख हो जाए ये जमाना तो क्या ,
हर गली में किसी लडकी लडके को प्यार हो ही जाता है ...


है गरीब की किस्मत , एक नियति बस एक सी ,
कभी कुदरत सताती है , तो कभी इंसान सताता है ..


गया वो दौर , छुप कर एहसान निभाने का ,
अब जो जितना भी करता है , वो उतना जताता है ...


आज नशे में चूर हैं जो , मतवाले बौराए बेशर्म से ,
एक मौसम आता है ,हाथ जोडे वो दर दर पे जाता है ....

12 टिप्‍पणियां:

  1. एहसान जताये जाते हैं,
    हर बात सुनाये जाते हैं,
    इसके पहले वे मुँह खोलें,
    हम आँख बचा छिप जाते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  2. अजय जी , में टिप्पणी के काबिल नही ...
    ये ज्ञानी जाने !
    पर मैंने हर लाइन के एहसास को महसूस किया है
    क्यों कि सरल शब्दों में गहरी बातें ...

    बेशक तुम्हारे दौर के गीत अलग और बोल अलग ,
    शुक्र है कि अब भी हर रेडियों , पुराने गाने बजाता है..आह!और वाह!
    शुभकामनायें !

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही सुन्दर अफ़साना बुना है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेशक तुम्हारे दौर के गीत अलग और बोल अलग ,
    शुक्र है कि अब भी हर रेडियों , पुराने गाने बजाता है ...

    सही कहा आपने ....शुक्र है अभी भी हम पुरानो की सुनवाई होती है
    अपनी ही लेखनी हमको सुनती और समझती है

    उत्तर देंहटाएं
  5. सचमुच वक़्त कब बदल जाता है
    पता ही नहीं चलता है,
    हम न जाने क्यों आगे बढ़कर भी,
    पुरानी यादों में खोये रहते है,
    जानते हैं कि सब बदल गया है,
    फिर भी एक आस है,
    थोड़े से ही सही,
    पर अब भी एहसास बाकी है.

    बहुत खुबसूरत और सहेजने योग्य पंक्तियाँ हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  6. kalam bujhta hi jata hai... very very nice.... poetry....

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाह कितना सुन्दर लिखा है आपने, बहुत सुन्दर जवाब नहीं इस रचना का........ बहुत खूबसूरत.......

    उत्तर देंहटाएं
  8. अस्वस्थता के कारण करीब 25 दिनों से ब्लॉगजगत से दूर था
    आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,

    उत्तर देंहटाएं
  9. है गरीब की किस्मत , एक नियति बस एक सी ,कभी कुदरत सताती है , तो कभी इंसान सताता है ..
    waah bahut accha likha satik likha hai aur sathak bhi

    उत्तर देंहटाएं

टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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