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प्रचार खिडकी

गुरुवार, 13 मार्च 2008

हम लोग गंदगी पसंद लोग हैं या कहूँ की सूअर हैं.

कल किसी मित्र को छोड़ने के लिए स्टेशन जाना पडा, यूं तो स्टेशन की भीड़ भाड़ में सिर्फ़ एक ही बात दिमाग में घूमती रहती है वो ये की किस तरह आप ख़ुद या की जिसके लिए आप वहाँ गए है वो सुरक्षित अपनी गाडी में बैठ जाएँ, किंतु चूँकि गाडी के प्लत्फोर्म पर आने में अभी वक्त था तो अनायास ही नज़र इधर उधर दौड़ने लगी, देखा तो चारों तरफ़ भांति भांति के कुदे और कचरे का अम्बार लगा था तिस पर लोगों ने अपने गुटखे पान के पीक की आधुनिक या पुरातन जो भी आप समझें चित्रकारी कर रखी थी । मेरा ध्यान इसलिए भी आज ज्यादा उस और जा रहा था क्योंकि कुछ देर पहले ही मैं समाचारों में देख पढ़ कर आ रहा था की दिल्ली सरकार ने आज ही ये फैसला लिया था की आने वाले कुछ महीनों में सड़कों पर या कहूँ की खुली जगह पर गंदगी फैलाने वालों पर , थूकने वालों पर , या मल मूत्र करने वालों को वहीं पकड़ कर जुर्माना और दण्डित किया जायेगा। मैं सोचने लगा की क्या ये पहली बार होगा, और क्या इससे कोई फर्क पडेगा, मुझे तो कम से कम ऐसा नहीं लगा। थोड़ी देर बाद पानी भरने के लिए मैं नलके के पास गया वहाँ एक सज्जन मेरे सामने ही उस नलके से पानी ले ले कर मुंह हाथ धोने के अलावा चेहरे और नाक कान गले की सारी सफाई करने लगे, मुझसे रहा नहीं गया और सिर्फ़ मेरे नाराज़ नज़रों को भांप कर फट से उन्होंने कहा, " भइया हिन्दुस्तान में पैदा हुए हो तो gअन्दगी में रहने की aआदत डाल लो " मैं हक्का बका ये सोच रहा था की हम क्या सचमुच गंदगी पसंद लोग बन गए है, या कहूँ की सूअर बन गए है।

एक छोटी सी कहानी आपको सुनाता हूँ । एक बार एक बहुत बड़ा सेठ मरने से पहले अपने चारों बेटों को बुलाता है और कहता है की बेटा मरने के लगभग पाँच वर्षों के बाद मैं अमुक आदमी के यहाँ सूअर के रूप में जन्म लूंगा और मेरे कान के नीचे एक काला दाग होगा , तुम चारों मुझे पहचान कर वहाँ से ले आना और मार देना ताकि पुनः अगला जन्म मैं किसी अच्छे रूप में ले सकूं। जैसा उस सेठ ने कहा था वैसा ही हुआ, लगभग पांच वर्षों बाद जब उसके चारों बेटे उस व्यक्ति के पास पहुंचे और उसे सारी बात बताई तो वह व्यक्ति चकित होकर बोला आप इन्हें ले जा सकते है, जैसे ही वे चारों अपने सूअर बने पिता के पास उसे ले जाने को पहुंचे उस सूअर ने कहा, बेटा मैं तुम चारों को पहचान गया और अपनी कही बात भी मुझे ध्यान है मगर अब मुझे यहीं रहने दो मुझे इस गंदगी की आदत हो गयी है ॥ चारों बेटे वापस लौट गए।

तो ये अब आपको और हमें सोचना है की क्या वाकई हम सूअर बनते जा रहे है, सरकार के नियम और क़ानून किसी भी व्यक्ति किसी भी समाज और किसी भी देश को एक दिशा तो दे सकते है परन्तु संस्कार और व्यवहार तो हमें ख़ुद ही बनाने होंगे.

4 टिप्‍पणियां:

  1. Nice one. Its in our attitude. Law can enforce things but habit won't change unless we carefully think what's wrong and what's not. Unfortunately many ignore the later.

    Everyone, must have seen the homeowners and shopkeepers cleaning their premises and throwing the dirt and garbage on the streets. They understand that we need to live in clean and hygienic place but the bad attitude of these people ignores the fact that very same rule applies to home as well as outside of your home/shop.

    Govt. can't do everything, it needs active participation from the city dwellers.

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  2. aap ki baat se sahmat 100 marks diye ji aap ko.yahi hai blog ka matlab.buraiyan jo hamare aas paas hai samne lana .naa ki apas mai ladna jhagadna.kyun ki mujhe pata hai.mai india se bahar hoon aur bahar wale india ko kis naam se pukarte hain.bas itna hi kahunga

    hum honge kaamyaab ek din han man mai hai vishvas.............

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  3. अजय भाई बहुत सुन्दर लिखा हे, ओर हम पढने वालो मे भी बहुत से ऎसे ही हो गे, बस इस का ईलाज कोई नही हे,यही दुख हे,ऎसी ओर बहुत सी कहनिया हे, लेकिन कया करे,

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  4. aap teeno kaa dhaynyavaad , sach hai ki hamein khud ko hee badalnaa hoga isse pehle kuchh badalne kee ichha rakhnaa vyarth hai.

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टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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