जब भी ग्राम प्रवास पर निकलता हूं तो मेरी सबसे बडी कोशिश ये होती है कि पत्थरों के इन जंगल से निकल कर प्रकृति के करीब से होकर गुजरती जिंदगी के एक एक लम्हे को यादों में कैद करके सहेज़ लिया जाए , क्या पता कल होकर जिंदगी रहे न रहे , ये प्रकृति वैसी रहे न रहे ..यादें तो हमेशा ही शाश्वत रहती हैं , इन्हें यहां सहेज़ने के पीछे यही एकमात्र उद्देश्य है और हां फ़ोटो खींचने में आनंद तो आता ही है , आप भी देखें कुछ फ़ोटो ...........




अच्छा शौक..अच्छे चित्र।
जवाब देंहटाएंअनाडी का खेल राम , खेल का सत्यानाश .......अभी तो बस क्लिक करना भर आता है सर जी , आपको चित्र अच्छे लगे हमें जानकर आनंद आया
हटाएंप्रकृति का खुला आँगन -चित्र बोल रहे हैं !
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत शुक्रिया प्रतिभा जी , स्नेह बनाए रखिएगा
हटाएंएक अजीब अपनापन है इन तस्वीरों में!!
जवाब देंहटाएंहां सलिल दादा ये बात तो है ..
हटाएंब्लॉग बुलेटिन टीम का आभार और शुक्रिया ,पोस्ट को स्थान व मान देने के लिए
जवाब देंहटाएंगाँव अभी तक राह तके हैं,
जवाब देंहटाएंनगर खिलौने नहीं थके हैं।
खूबसूरती को बहुत सुन्दर कैद किया है
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