प्रचार खिडकी

शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

आत्मा और आंखों को तृप्त करती ग्राम्य झलकियां ......



जब भी ग्राम प्रवास पर निकलता हूं तो मेरी सबसे बडी कोशिश ये होती है कि पत्थरों के इन जंगल से निकल कर प्रकृति के करीब से होकर गुजरती जिंदगी के एक एक लम्हे को यादों में कैद करके सहेज़ लिया जाए , क्या पता कल होकर जिंदगी रहे न रहे , ये प्रकृति वैसी रहे न रहे ..यादें तो हमेशा ही शाश्वत रहती हैं , इन्हें यहां सहेज़ने के पीछे यही एकमात्र उद्देश्य है और हां फ़ोटो खींचने में आनंद तो आता ही है , आप भी देखें कुछ फ़ोटो ...........




Photo: कुदरत के करिश्मे को जितना निहारा जाए कम ही लगता है .........रेल की खिडकी से खींची गई एक और फ़ोटो ......आप उकता तो नहीं रहे हैं न :) :) :) :)
..

Photo: आज की फ़ोटो ......वही रेल ..वही खिडकी ..वही कैमरा ..वही मैं       ;) ;) ;) ;)



Photo: रेल की खिडकी से .........और हां एक बार फ़िर बताता चलूं कि ये मेरे गांव से दिल्ली वापसी की रेल यात्रा के दौरान खिडकी वाली सीट पर जमे होने के कारण धडाधड खींची जाने वाली फ़ोटो में से एक है .......दूर भट्ठे की चिमनी ............................




 Photo: रेल की खिडकी से .......................दूर बहुत दूर जाते सूरज चचा , बोझिल सी खुमारी में डूबती सी सांझ ..........








मंगलवार, 28 जनवरी 2014

फ़ालतू स्टेटस को हाईड किया जाए


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"पर्सन पॉलिटिक्स" टार्गेट है , तभी वो हो जाते हैं जरा , पर्सनल ,
इतनी भी क्या तंगदिली साहेब, थोडा नज़रिया तो वाईड किया जाए
.
यूं तो "सपोर्ट"  और "सिस्टम" दोनों ही है मर्डर पर उतारू उनके ,
मगर चाहत ये कि मफ़लर गले में लटका के हाकिम खुद "आप" ही सुसाईड किया जाए
.
तू भी गलत और तू भी गलत , सिर्फ़ एक हम ठीक , बांकी सब उलट ही पुलट
छोडा जाए टिकट बेटिकट भाषण/शिगूफ़ा अब थोडा राजनीति को गाईड किया जाए
.
जब पलडा भारी लग ही रहा है तराज़ू का बाट से ज्यादा अपने सामान की तरफ़ ,
तो मारिए गोली सबको , ठेल ठाल के , धकिया मुकिया के साईड किया जाए ,
.
अब तो बता ही डालिए कायाकलप हो जाएगा कैसे यूं अचानक यकायक ,
कब तलक हवा के घोडे पे बैठ के , सनन सनन ,टनन टनन राईड किया जाए
.
और उन मितरों के लिए एक आइडिया है धांसू सा , और इत्तेफ़ाकन उपलब्ध भी है ,
बिन उकताए , बिन झुंझलाए , देखा जाए मुस्कुराकर , फ़ालतू स्टेटस को हाईड किया जाए

रविवार, 24 नवंबर 2013

चलो लगाएं कोई नया सा इल्ज़ाम फ़िर










कभी नहीं चली है ,मुद्दों की सियासत इस देश में ,
चलो इक दूजे पर लगाएं कोई नया सा इल्ज़ाम फ़िर ॥
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क्यूं खिलाफ़ किया जाए किसी को, किसी का अच्छा बोलकर,
देखो जरा ऊंची गर्दन किसी की ,उसे फ़ौरन करो बदनाम फ़िर॥
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उन्हें बंदूक और बारूद की भाषा है मालूम ,बस जिन्हें ,
तुम पता नहीं क्यूं हर बार भेजते हो इश्क के पैगाम फ़िर॥
.

तुम्हें पता है वो डर की ताकत जानते हैं , डराएंगे ही ,
तुम आगाज़ जब तेज़ाब सी करते हो,क्यूं सोचते हो अंजाम फ़िर ॥
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ये मत कहिए कि पहले ऐसा कभी हुआ ही नहीं गुनाह देश में ,
हां ये जरूर है कि जो हुआ पर्दे में ,अबकि हुआ है सरेआम फ़िर ॥
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इस देश में लडाने को बहुत से बहाने हैं सियासतदानों के पास,
देखो उसी धर्म मज़हब के नाम पर लडते हैं ,रहीम और राम फ़िर ॥
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जिस लोकतंत्र की दुहाई देकर तुमने ये रियासत टिका रखी है ,
अगर यही है वो तो अभी के अभी बदल डालो इसका नाम फ़िर॥
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कभी कुहासे और ओस से भीग जाती थीं सांझ की चूनर ,
बदला रूत मगर धुंएं से हुई है धुंधली, शहर की शाम फ़िर ॥
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गुरुवार, 14 नवंबर 2013

बस एक अदद झूठी अफ़वाह की दरकार है .........










उसे नफ़े नुकसान की फ़िक्र नहीं बिल्कुल भी ,
उसका सपने बेचने का ,सालों का कारोबार है ॥
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हम फ़ूंक डालते हैं , खुद बस्तियों को अपनी ,
बस एक अदद झूठी अफ़वाह की दरकार है ॥
.

तुम देश दुनिया मंगल करने के देखते हो सपने ,
अगला बेबस है इतना , टमाटर प्याज़ से भी लाचार है ॥
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राशन, रोज़गार की हालत में पैबंद लगे हों बेशक,
मगर जिसका भी सुनिए , भाषण सबका जोरदार है ॥
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लाशों पर लाशें रखकर , चल रहा है निर्माण इसका ,
नहीं टूटेगी अब ,बहुत हो गई ऊंची ,सरहद की दीवार है॥
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मेरी तेरी मौत की अहमियत अब खत्म हो गई ,
खुद खंजर हाथ में लिए ,सामने सरकार है ॥
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उसे माफ़ है सातों खून का गुनाह भी ,
वो जो राजमाता की बेटी का भतार है ॥
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तुम हंस लो कहकहे लगा के उसकी बेवकूफ़ी पर बेशक,
मगर गैरत बची है उसकी , वो अब तक खुद्दार है ॥
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अब इस देश में गुनाहों की बात करना खुद एक गुनाह है ,
वो कहते हैं तुम्हारे पास , इंज्वाय करने को बलात्कार है ॥
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बहुत मोटी हो गई है चर्बी, बेशर्मी और बेहयाई की बेशक,
काट के उतार देंगे केंचुली उनकी ,हमारी तेज़ बहुत धार है ॥


शनिवार, 10 अगस्त 2013

रेत की तलवार से ...............




मत कर औकात की बात तू हाकिम , जब इत्ता सा सच सुनने का भी ,तुझमें माद्दा नहीं है ,
"रेत की तलवार से" लडने चला है ,अडिग चट्टान से , दिन तेरे पास अब ज्यादा नहीं है ॥
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अबे छोडो हाकिम, साला ,पिद्दी के शोरबे सा पडोसी , तो तुमसे ठोका ना जाए ,
फ़िर ऐसा ही है तुम्हारी हिम्मत तो ,हमें भी खालिस सच कहने से रोका ना जाए
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सच उगलने को यूं उकसाया न करो ,
और उगल ही दूं ,सच को , इतना भी ,दबाया न करो
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नज़रों में कयामत ,होठों पे बगावत ,अपनी तो ,यही पहचान भर है
कभी पूछ बैठना हमसे हमारी हैसियत, तुममें ज़रा भी हिम्मत गर है
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तुम छुप छुप के करो हमले ,हम घर घुस के मारेंगे ,
इन्हें समझाओ दुनिया वालों ,ये साले यूं न मानेंगे
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मैं जानता हूं जंग के हालात बात ,हर वक्त माकूल नहीं है ,
मगर तोड के हर बार जोडते हो रिश्ता , सियासतदानों क्या ये भूल नहीं है ?
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रात सपनों में आई थी जिंदगी तुम ,
सुबह गमलों में ,फ़ूल बनके उग आई हो......
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मत बैठ मेरे सामने यूं ,जिंदगी , बात-बेबात के लिए ,
क्या पता कल तेरे पास वक्त हो न हो ,मुलाकात के लिए ......
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सियासत सत्तानशीनों के कानों में शीशा बन कर यूं ही तुम पिघलते रहना ,
सुनकर खुद मर जाएंगे हाकिम इक दिन , सच को सच की तरह बस उगलते रहना
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बिलख पडते हैं जो , हमारे कहे,लिखे बोले भर से , तो फ़िर जम के इनपर प्रहार कीजीए,
कतरा कतरा कट जाए ,कालिख सारी , कलम को सान चढाकर इतना धार दीजीए
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हम सीने में आग उबालते हैं , छूने भर से वो खाक हो जाएंगे ,
किसमें हिम्मत ,ललकार दे हमें सामने से ,कलेजे चाक हो जाएंगे
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बुधवार, 5 जून 2013

नाम-पता अपना, दीवारों पे दर्ज़ किया है

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जिंदगी !यूं तो हर सुबह किया तेरा इस्तकबाल
और हर शाम तुझको ही आदाब अर्ज़ किया है,
मगर मौत इल्ज़ाम न लगा दे बेवफ़ाई का हमपे ,
नाम-पता अपना ,दीवारों पे इसलिए तो दर्ज़ किया है ,

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पूछ सवाल , तू पूछती जा जिंदगी , बताऊं तो किसके लिए ,
न जिंदगी बचे न सवाल कोई अब , बचाऊं तो किसके लिए

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मुहब्बत तू मान या न मान मगर सच तो यही है ,
तुझ पर कयामत तक यही इल्ज़ाम रहेगा ,
जिंदगी तो रही है हमेशा बेवफ़ा सितमगर ,
मगर मौत से पहले मरना , बस तेरे ही नाम रहेगा

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नादां है दिल तू खुद मेरे तो किसी और से क्या कहना है ,
शीशा-ए-दिल भी अपना और तोडा जिसने वो पत्थर भी अपना है

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पत्थर के शहर , अब जाना , तुझको ये दिल हमने बेकार ही दिया ,
तेरी तो तू ही जाने पत्थर दिल , हमने तो जब भी किया प्यार ही किया

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मत पूछ यार मेरे मुझसे कि तू परेशान क्यूं है ,
जिंदगी पूछे लाख सवाल तो ठीक ,मैं पूछ बैठा एक तो हैरान क्यूं है

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रात को सन्नाटे में चुपके से मुझसे मिलने मेरी तन्हाई आती है ,
दिन में जब शोर करती है दुनिया , मिलने मेरी परछाई आती है

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दिल की अंगीठी सुनगती है रात दिन , आंच ये सीली सीली सी है ,
रहने दो न करो खोलने की कोशिश ,आंखों में गांठ ये गीली गीली सी है

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शनिवार, 20 अप्रैल 2013

छिटके, भटके ,छितरे , बिखरे ....कुछ आखर



















तुम,
उन सपनों के,
कतरों को,
संभाल के रखना यार ,
मुझे यकीन है,
इक दिन ,
बहुत याद आएंगे वे,
खुली आंखों से ...
ताउम्र तुम्हें,
रात भर नींद कहां आएगी ......................................

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ये आखें ,
बडी जीवट होती हैं ,
जागती हैं तो ,
होती है ,
मंज़िलों पर नज़र ,
और सोती हैं तो,
नींद में ,
मंज़िलों से भी,
ऊंचे ख्वाब देख जाती हैं ............

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अच्छा है,
ये कि
मेरा कहा,
अनकहा भी ,
बहुत खूब समझती हो ,
ये और अच्छा है,कि,
मेरी किताबों,
मेरे शब्दों को ,
मेरा मेहबूब समझती हो .............

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अच्छा है ,
ये कि
मेरा किया ,
अनकिया भी ,
तुम खूब समझते हो ,
तुम भी तो ,
मेरी लाली ,
मेरे पाउडर को ,
मेरा मेहबूब समझते हो


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जिंदगी तुम,
बेरहम बहुत हो ,
खुशियों और दर्द का,
बराबर हिसाब रखती हो ,
जो मुद्दतों से ,
सो भी,
नहीं पाई हैं आंखें ,
क्यूं उनमें सुनहरे ख्वाब रखती हो ....

जिंदगी तू निर्मोही बडी ........................

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अब यकीन,
हो चला है ,
कयामत तक ,
हम नहीं बदलेंगे ,
ये समाज नहीं बदलेगा ,
इंसानों की शक्ल में,
कोई हैवान है ,
हमारे भीतर ही ,
जो कल नहीं बदला , आज नहीं बदलेगा ......................

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