इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

प्रचार खिडकी

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2008

दर्द संभालता हूँ मैं ( एक कविता )

हर पल,
इक नया ,
वक़्त ,
तलाशता हूँ मैं॥

जो मुझ संग,
हँसे रोये,
वो बुत,
तराश्ता हूँ मैं॥

मेरी फितरत ,
ही ऐसी है कि,
रोज़ नए दर्द,
संभालता हूँ मैं॥

परवरिश हुई है,
कुछ इस तरह से कि,
कभी जख्म मुझे, कभी,
जख्मों को पालता हूँ मैं॥

सुना है कि, हर ख़ुशी के बाद,
एक गम आता है, तो,
जब भी देती है, ख़ुशी दस्तक,
आगे को टालता हूँ मैं॥

वो कहते हैं कि,
धधकती हैं मेरी आखें,
क्या करूं कि सीने में,
इक आग उबालता हूँ मैं॥


क्या करूं , ऐसा ही हूँ मैं....

2 टिप्‍पणियां:

टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Google+ Followers