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प्रचार खिडकी

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2008

हिन्दी भाषी हो , भुगतो सालों

तो एक बार फिर से हिन्दी भाषियों को अपनी खानाबदोशी की कीमत चुकानी पड़ रही है। हिन्दी भाषी क्या , सीधा-सीधा, कहो न बिहारी और यू पी वालों को। देश के सबसे बड़ी जनसंख्या वाले इन दो राज्यों के हम जैसे लोग सच्मुघ आज के खानाबदोश ही तो है। कभी पढाई, कभी रोजगार, तो कभी व्यवसाय के लिए मजबूर होकर दिल्ली, बम्बई ,कलकत्ता जैसे महानगरों का रुख कर लेते हैं। वहाँ अपना खून पसीना , अपना श्रम, अपना समय, अपनी सोच लगाकर उस स्थान विशेष के लिए करते रहने के साथ=साथ अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत रहते हैं। इन महानगरों में अपनी सरलता, सच्चाई, निरक्षरता, के लिए कदम-कदम पर अपमानित होते रहने की नियति के साथ=साथ कभी असम, कभी बंगाल, कभी विदर्भ तो कभी महाराष्ट्र में अचानक ही शरणार्थियों से भी बदतर स्थिति में पहुंच जाते हैं॥


राज ठाकरे के बाद दिल्ली के तेजेंद्र खन्ना ने अपने हिस्से का जहर उगल दिया। भैया कलकत्ता मद्रास वालों आप लोग भी अपना विचार दे ही दो ताकि पता तो चले कि हमारी औकात क्या है। खूब मारो-पीतो, नोचो-, तोड़ो-फोडो, । मगर यार मेरी सकझ में एक बात नहीं आती, रिक्शे वाले, पान वाले, सब्जी वाले, को पीटने से क्या होगा। यार बडे मंत्रियों , अधिकारियों , उद्योगोपतियों, कर्मचारियों को पीट-पात कर भगाओ तो हिम्मत की बात है। मीडिया , सरकार, दफ्तर, बैंक, हस्पताल, कौन सी ऐसी जगह हैं जहाँ ये सो कॉल्ड हिन्दी भाषी नहीं हैं । हालांकि यहाँ राजधानी में भी बिहारी और कहते हैं न कि भैया लोगों के साथ जो व्यवहार होता है वो किसी न किसी दिन भारी पड़ने वाला है मगर गनीमत है कि हिन्दी भाषी होने की कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती है । मुझे कोई ये बात कह कर तो देखे , मगर शायद इसके लिए तुलसी दास ने बहुत पहले ही कह दिया था कि समर्थ को नहीं दोष गोसाईं ॥

इस विवाद का चाहे जो भी अंत हो , चाहे जितना भी खराब परिणाम हो मगर इतना तो पता चल ही चुका है कि आने वाले समय में ये नेता लोग इस देश को कभी भाषा, कभी धर्म, कभी जाति, कभी बिना किसी आधार के ही अंग्रेजों की तरह टुकड़े टुकड़े बाँट कर खुद तमाशा देखेंगे। हम पहले भी गधे थे आज भी गधे हैं, और हमेशा ऐसे ही गधे रहेंगे॥

तो भैया हिन्दी बोलने, पढ़ने, लिखने ,समझने, वालों अब भुगतो सालों.

3 टिप्‍पणियां:

  1. likha to theek hai par gaale ka pryoag apne blog me neahi karen ishse apke blog ki chabi kharab hogi

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  2. mai bhi up kaa he hun ye bahut galat hoo raha hai ye desh ki ekta ko tod rahe hain kahin aaisha naa ho ki sare state aalag aalag country ban jayen

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  3. kunnu jee,
    haan shaayad aapkee baat theek hai magar kya karoon jab sabra chhalaktaa hai to tehjeeb dagmagaa hee jaatee hai. yun aapkee shikaayat sar aakhon par.

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टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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