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प्रचार खिडकी

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

बिक रही हैं बेटियाँ

आज इस ,
आर्यावर्त की,
पहली नागरिक,
एक औरत है,
फ़िर भी ,
जाने कैसे ,
बिक रही हैं बेटियाँ......

कहीं दिखाने को ,
सजाने को, जलाने को,
कुचलने को, दबाने को,
कहीं जिस्म की,
भूख मिटाने को,
हर समय, हर जरूरत को,
हर रूप में, हर हाल में,
मिल रही हैं बेटियाँ......

दिख रही है,
हैवानियत हर,
इंसान की आँख में,
माँओं को भी,
देखने हैं, बस,
बेटे, पोते, और नाती,
इसलिए तो , नहीं,
दिख रही हैं बेटियाँ....

ख़त्म हो रहा है,
वजूद,
धरा का, हवा का,
सुधा का, सुता का,
मिट रहा है,
शाश्वत भी, और,
मिट रही हैं बेतिया.....

यही हकीकत है जिसे कोई समझ नहीं रहा है और जब तक समझेगा तब तक.............

6 टिप्‍पणियां:

  1. मुद्दा सनातन और सर्भोमिक है, फिर भी कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आ रहा है, यही तो सामाजिक विद्रूपता है.. जिसे हम और आप भोग रहे हैं..

    उत्तर देंहटाएं
  2. kaha to aapne atal satya hai magar samajhta kaun hai......har taraf bete ki chah ne betiyon ka ye hashra kiya hai.

    उत्तर देंहटाएं
  3. आर्यावर्त की,
    पहली नागरिक,
    एक औरत है,

    --कितनी बड़ी आशा लगा बैठे आप???

    स्थितियाँ यूँ न बदलेंगी...हर सोच को बदलना होगा!!

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपने मेरी हर एक शायरी पे इतना सुन्दर कमेन्ट दिया उसके लिये मै आपका आभारी हू !
    बहुत शानदार लिखा है आपने !

    उत्तर देंहटाएं
  5. स्थितियाँ यूँ न बदलेंगी...हर सोच को बदलना होगा!!

    उत्तर देंहटाएं

टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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