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प्रचार खिडकी

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

मुद्दाहीन चुनाव :दिशाहीन लोकतंत्र

अभी कुछ माह पूर्व ही जब अमेरिकी जनता ने लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे अद्भुत प्रयोग करते हुए एक मुस्लिम अश्वेत को विश्व के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र की बागडोर सौंपी थी तो वैश्विक शाशन प्रणालियों में लोकतंत्र धाक व श्रेष्ठता पुनः साबित हो गयी थी. उस समय लोकतांत्रिक प्रणाली के स्वर्णिम सफलता ने सबके मन में, कम से कम जहाँ लोक्तान्त्रैक प्रणालियाँ हैं, में कहीं एक आस जगह दी थी की अब शायद उन देशों में भी सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलें. यदि अमेरीका सबसे पुराना लोकतंत्र है तो भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र. लेकिन चरिता, उपलब्धि , विकास, और अस्तित्व के लिहाज से आज भारतीय लोकतंत्र बिल्कुल विपरीत परिस्थितियों से गुजर रहा है. अब जबकि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र विश्व की सबसे बड़ी चुनाव प्रक्रिया से गुजरने वाला है तो लोकतंत्र की सभी प्रचलित खामियां जैसे उभर कर सामने आ गयी हैं,

यदि आंकडों पर नजर डालें तो स्थिति की भयावहता स्पष्ट दिख जाती है. अभी कुछ समय पूर्व ही विश्व प्रिसिद्ध हिन्दी रेडियो प्रसारण सेवा द्वारा करवाए गए एक सर्वेक्षण में ६७ प्रतिशत लोगों ने कहा की उन्हें अपने जन प्रतिनिदियों पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं है. एक अन्य सर्वेक्षण में पाया गया की बेशक हर जाज्नितिक दल अपराध और राजनीति की संथ गाँठ का विरोध करंता दिखता हो मगर हकीकत यही है की सभी राजनितिक दल इसे अपनाए हुए हैं. पिछले संसद में भी दागी सांसदों की फेहरिस्त काफी लम्बी थी, और इस बार अब तक जो हालत दिख रहे हैं उस से तो लगता है की ये सूची इस बार और भी लम्बी हो जायेगी. सबसे बड़े दुःख और अफ़सोस की बात यही है की आज जब भारत के मेधावी लोग अपनी क्षमता, और ज्ञान का झंडा विश्व पटल पैर फेहरा रहे हैं तो ऐसे में भी ख़ुद अपने देश के प्रतिनिधियों में उनकी कोई क़द्र नहीं है. हालत का अंदाजा सिर्फ़ इस बात से ही लगाया जा सकता है की आज संसद में पढ़े ल्लिखों, काबिल व्यक्तियों, डॉक्टर्स, इन्गीनीएयर्स, विद्वान्, साहित्यकार, तथा बड़े उद्योगपतियों की भागीदारी लगभग नगण्य है. कलाकारों के नाम पर कोई शिरकत कर बी रहा है तो वो हैं अभिनेता जो बदकिस्मती से राजनीती में भी संजीदा न होकर महज दिखावटी ही लगते हैं.

भारतीय राजनीति में शीर्ष से लेकर निचले स्टार तक जब ऐसे गैर जिम्मेदार , मौकापरस्त, अनुभवहीन और गैर संजीदा लोगों की भागीदारी रहेगी तो फ़िर तो पूरा परिदृश्य स्वाभाविक रू से ऐसा ही होगा. इसी का परिणाम ये हुआ है की इतने बड़े लोकतांत्रिक राज्य के राष्ट्रीय चुनाव के मुद्दे यूँ निकल कर सामने आए हैं. हरेक राजनीतिज्ञ जो स्वयमेव घोषित या प्रायोजी प्रधानमंत्री है वे राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर अपना अपने दल का विचार रखने के बजाय व्यक्तिगत आक्षेप, आरोप-प्रत्यारोप में लगे हुए हैं और इसके लिए एक दूर्स की उपलब्धियों में श्रेष्ठता में होड़ के बजाय उनकी कमजोरियों गिनाने में लगे हैं. जो इससे इतर हैं वे कहीं किसी मन्दिर निर्माण का वादा कर किसी विशेष सम्प्रदाय को रिझाने में लगे हैं, या बिना सोचे समझे कहीं बिजली, पानी मुफ्त बांटने का वादा कर रहे हैं या दो तीन रुपैये की डर से चावल गेंहू बांटने का सब्जबाग दिखा रहा है. देश का सबसे बड़ा और सबसे पुराना राष्ट्रीय दल कोंग्रेस जहाँ दशकों पहले की उप्लाब्धियी ओं को गिना कर ओनी दावेदारी पेश करती है तो दूसरी सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी एक बेहतर विकल्प के रूप में उभरने के बावजूद जनता का बहुतमत और विश्वास हासिल नहीं कर सके जिसके एक से अधिक कई कारण थे. भारतीय राजनीति के बदलते परिवेश और नए समीकरोनो ने तृतीय मोर्चे के रूप में बहुत से क्षेत्रीय दलों के संगठन का विकल्प खोला किंतु ये भी सिर्फ़ सत्ताप्राप्ति के लिए की जा रही मौकापरस्त राजनीति भर बन कर रह गयी. हालांकि इसी कारण से जनता ने इस तथाकथित तीसरे मोर्चे को कभी एक संगठित शक्ति के रूप में नहीं देखा.

यदि भारतीय लोकतंत्र में आम लोगों की , हुमिका, भागीदारी और उसके कारण परिणामों का विश्लेषण किया जाए तो कई बातें स्पष्ट उभर कर आती हैं. अशिक्षा एवं अज्ञानता के कारण देश की एक बड़ी आबादी आज भी मताधिकार के प्रयोग का महत्व नहीं समझती है. इसका एक परिणाम ये होता है की ग्रामीण क्षेत्रों के कभी किसी जाती विशेष, किस धर्म विशेष, भाषा और कई बार तो चाँद रुपयों, कपड़े, कम्बल आदि बाँट कर ही लोगों का मत हासिल कर लिया जाता है. शिक्षित आबादी की स्थिति भे कुछ ख़ास आछे नहीं है, अलबत्ता कारण जरोर अलग हैं. शहरी लोग जब देखते हैं की अव्वल तो कोई उपयुक्त उम्मेदवार ही नहीं मिलता किसी राजनितिक दल का कोई चरित्र नहीं, कोई सिद्धांत नहीं और सबसे ज्यादा ये की किसी को भी ये निश्चित नहीं होता की कौन कब किसके साथ है और किसके ख़िलाफ़ है. इसका परिणाम ये हुआ की शहरी मतदाता राजनीति से पुर्न्ताया उदासीन हो गया है, और इसीका लाभ या हनी पूरे राजनितिक परिद्रिह्स्य पड़ पड़ता है.

अब जबकि भारतीय लोकतंत्र आधी शताब्दी से ज्यादा का सफर तय कर चुका है तो ये आवश्यक हो जाता है की इसके गुन दोषों का विश्लेषण किया जाए. समाज के चारित्रिक विघटन का प्रभाव राजनीति पर भी पड़ा और इस कदर पड़ा की देश की संचालक संस्था ही पतन के रास्ते पर चल पडी है. देश को चलाने में जिन स्तंभों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है उनमें सबसे अहन विधायिका ही है. सबसे बड़ी विडम्बना भी यही है की इसमें आयी कमियों को दूर करने के उपाय व प्रयास भी स्वयं विधायिका को ही करने होंगे , और समय समय पर इसकी कोशिश भी की जाती रही है, जिसका उदाहरण है दल-बदल क़ानून. इसके अलावा न्यायपालिका ने भी अपने आदेशों से विधायिका को भटकने से रोका है. किंतु इन प्रयासों के बावजूद स्थिति बाद से बदतर होती जा रही है.

भारतीय लोकतंत्र का अध्ययन विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञों का मानना है की यदि इतने कानूनों-उपायों के बावजूद स्थिति में कोई बड़ा सकारात्मक बदलाव नहीं आ रहा है तो फ़िर एक ही क़ानून बचता है जिसके प्रयोग से परिवर्तन की उम्मीद की जा सकती है, वो है जनप्रतिनिधि वापस बुलाने का अधिकार. वर्तमान में प्रतिनिधियों को यही लगता है की यदि एक बार जीत गए तो कम से कम अगले पाँच वर्षों तक निश्चिंतता. नए क़ानून से उन्हें आम लोगों के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया जा सकता है. जो भी हो फिलहाल इतना तो किया ही जा सकता है की आम मतदाताओं को अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया जा सके..

1 टिप्पणी:

  1. आपने इतना सुंदर कमेन्ट दिया है मेरी हर एक शायरी पे मेरे लिखने का उत्साह दुकना कर दिया है!
    बहुत ही बढ़िया लिखा है आपने! मेरा तो ये मानना है की आप एक बहुत बड़े लेखक है और ये मेरा सौभाग्य है की आप जैसे लेखक का स्पर्श पाया है!

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टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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