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प्रचार खिडकी

बुधवार, 24 मार्च 2010

यही दस्तूर है मकानों का








वो सर बुलंद रहा और खुद्पसंद रहा,
मैं सर झुकाए रहा और खुशामदों में रहा
मेरे अजीजों, यही दस्तूर है मकानों का,
बनाने वाला हमेशा बरामदों में रहा

कहीं  पढ थीं ये पंक्तियां ............याद रह गईं ॥

10 टिप्‍पणियां:

  1. मेरे अजीजों, यही दस्तूर है मकानों का,
    बनाने वाला हमेशा बरामदों में रहा॥
    बहुत खुब जी

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  2. बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

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  3. मेरे अजीजों, यही दस्तूर है मकानों का,
    बनाने वाला हमेशा बरामदों में रहा॥
    Baat bahut gahari hai, lekin ek kasak chod gai dil me....dhanywaad.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बनाने वाला हमेशा बरामदों में रहा॥
    बहुत सच्ची बात है ये अजय जी. आभार इतनी सुन्दर पंक्तियां पढवाने के लिये.

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  5. कितना सच कह रही हैं यह पंक्तियाँ.

    उत्तर देंहटाएं
  6. न जाने कितनी दर्द भरी कहानियां हैं इन चार पंक्तियों के पीछे

    चित्र भी उतना ही प्रभावशाली हैं जितना कि पंक्तियाँ

    उत्तर देंहटाएं
  7. सच कहा भाईजी लेकिन मज़दूर को कंही भी नींद आ जाती है बरामदे में भी और लोगों को मकानों मे नींद के लिये गोली खाना पड़ता है।बहुत खूब कंही कोई और विचारधारा का जन्म तो नही हो रहा?

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  8. सच्चाई बताती हुई पंक्तियाँ...मकान बनाने वालों के पास ही खुद के मकान नहीं होते..

    उत्तर देंहटाएं

टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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