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प्रचार खिडकी

मंगलवार, 2 मार्च 2010

दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित मेरा एक व्यंग्य (नए गरीबों की खोज )

( व्यंग्य को पढने के लिए उस पर चटका लगाएं और अपनी सुविधानुसार बडा करने के लिए ctrl ++ का प्रयोग करें )

8 टिप्‍पणियां:

  1. पॉसीबल नहीं है स्‍कैन इमेज को पढ़ना। टाइप किया हुआ ही लगा दीजिए अजय भाई। अथवा प्रीव्‍यू करके स्‍कैन इमेज जमाया कीजिए। पाबला जी ने बतलाई थी युक्ति। बहुत जानदार है।

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  2. बधाई हो जी, क्या यह समाचार पत्र वाले कुछ मेहनाता भी देते है? जिस पर आप का हक बनता है.

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  3. वाह जी.बहुत बढ़िया..अखबार पर दिनांक २००८ की है क्या?

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  4. अविनाश भाई चटका लगाने के बाद छवि काफ़ी बडी खुल रही है और धुंधले प्रिंट होने के बावजूद पढी जा रही है ..बांकी उस कतरन का ही कसूर है पुरानी थी ...

    हां राज भाई , समाचार पत्र में छपे हुए आलेख/रचनाओं का पारिश्रमिक तो मिलता ही है ...

    अजय कुमार झा

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  5. व्यंग्य बढ़िया है .. हम भी गरीब है भाई ।

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टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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