इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

प्रचार खिडकी

शनिवार, 2 जनवरी 2010

बासी माल : इन द रीठेलमेंट प्रक्रिया

(फ़ोटो गूगल बाबा की फ़ैक्ट्री से , साभार )


जाने कबसे अपने आसपास,
एक छद्म संसार बना रखा है ॥


हरकतों से पकडे जाते हैं, हैवानों ने भी,
इंसान का नकाब लगा रखा है ॥


कोई बेच रहा धर्म तो कोई शर्म और ईमान,
कईयों ने तो जीवन को ही दुकान बना रखा है ॥


बेदिली की ये इंतहा है यारों , माओं ने ,
कोख को बेटियों का शमशान बना रखा है ॥


कितनी बेकसी का दौर है ये , न दिल में जगह है, न घर में,
लोगों ने मां-बाप को भी मेहमान बना रखा है ॥


लपटें सी उठ रही हैं, शहर के हर घर से ,
इसीलिए,गांव में भी इक मकान बना रखा है ॥


अभी तो उंगलियों ने रफ़्तार नहीं पकडी है ,घरवालों की तोहमत
हमने चिट्ठों को ही अपनी संतान बना रखा है ॥



नए साल पर एक रिठेल ही हो जाए तो कोई बुराई तो नहीं , यही सोच कर टोकरी में पडा बासी माल फ़िर से परोस दिया है ..................जाने आपको इसका स्वाद कैसा लगता है ..????????????

14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी रचना।
    आपको नव वर्ष 2010 की हार्दिक शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं
  2. हमारे यहाँ मैथी, चना और अफीम की भाजी को सुखा कर डब्बों में बंद कर लिया जाता है। जिस मौसम में खास तौर पर गर्मी में जब हरी सब्जियाँ गायब हो जाती हैं तब उनकी सब्जी बना कर खाई जाती है। कुछ कुछ वैसा ही स्वाद इस रचना में भी मिला।

    उत्तर देंहटाएं
  3. दिनेश जी की बात ठीक है, हम भी भारत से सरसो का सांग, मेथी सुखे रुप मै ले आते है जिन्हे हमारे घर वाले ओर रिस्ते दार प्यार से देते है, ओर जब उन्हे हम यहां पकाते है तो साथ मै उन का प्यार भी याद आता है, आप की पोस्ट भी वेसी ही स्वाद वाली लगी.

    उत्तर देंहटाएं
  4. "लोगों ने मां-बाप को भी मेहमान बना रखा है"

    सच है! कई ऐसे भी हैं जिन्होंने मेहमान बनाने के बदले घर से ही निकाल रखा है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. आईना दिखाता हुआ हर लफ्ज़...और कवितायें कब से बासी होने लगीं??..पूरी टोकरी ही खाली कर डालिए....जायका बहुत उम्दा है

    उत्तर देंहटाएं
  6. अजय जी,
    पुराने चावल, पुराना गुड़ ज्यादा मजेदार होते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत अच्छी रचना।
    आपको नव वर्ष 2010 की हार्दिक शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं
  8. बेदिली की ये इंतहा है यारों , माओं ने ,
    कोख को बेटियों का शमशान बना रखा है ॥

    कितनी बेकसी का दौर है ये , न दिल में जगह है, न घर में,
    लोगों ने मां-बाप को भी मेहमान बना रखा है ॥

    बहुत खूब......सच्चाई बयां करती रचना.....बधाई

    उत्तर देंहटाएं

टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Google+ Followers