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प्रचार खिडकी

रविवार, 24 जनवरी 2010

वो आखिरी रात


कहीं पढ़ा सुना था कि, जिंदगी बहुत छोटी है, मोहब्बत के लिए भी और नफरत के लिए भी और शायद इसीलिए किसी ने कहा भी है कि ,

दुश्मनी करना भी तो इतनी जगह जरूर रखना कि सामने पड़ो तो नज़रें चुरानी न पडें।

मगर शायद ये बात समझते समझते बहुत देर हो गयी या यूं कहूँ कि उम्र के उस पड़ाव पर बहुत कम लोग ये बातें समझ पाते हैं और मैं उन में से नहीं था। बात उन दिनों की है जब मैं अपनी दसवीं की परीक्षाओं के बाद खेल कूद में लगा हुआ था। हम सब दोस्त एक जगह इकठ्ठा होते और फ़िर आगे का कार्यक्रम तय होता और वो एक जगह हम पहले ही तय कर लेते थे। तब जाहिर सी बात है कि आज की तरह न तो कोई शौपिंग मॉल होता था न कोई सायबर कैफे न ही कोई कौफ़ी हाऊस इसलिए किसी न किसी दोस्त का घर ही हमारा मिलन स्थल बन जाता था और वहाँ थोडा सा उस दोस्त के मम्मी पापा को तंग करके हम आगे निकल जाते थे। उन दिनों खेल कूद का दौर था, अजी नहीं सिर्फ़ क्रिकेट की मगजमारी नहीं थी, नहीं ये नहीं कहता कि नहीं थी मगर दूसरे खेल भी हम मजे में खेला करते थे, सर्दियों की रातों में बैडमिंटन खेलना अब तक याद आता है। मगर कुछ दिनों से हमारे बीच में वोलीबाल खेलने का एक क्रेज़ सा बन गया था। सभी लोग दो टीमों में बाँट कर खूब खेलते थे और पसीने में तर होकर शाम के गहराने तक घर वापस लौट जाते थे।

अक्सर खेल ख़त्म होने के बाद , थोड़ी देर सुस्ताने के लिए जब बैठते थे तो पहला काम तो ये होता था कि ये तय करें कि कल किसके घर मिलना है , दूसरा ये कि आज कौन एकदम बकवास खेला फ़िर थोड़ी गपशप । यहाँ ये बता दूँ कि हम लोगों के बीच कभी अपने परीक्षा परिणामों की चर्चा नहीं होती थी ,शायद उसका कारण ये था कि तब आज के जैसा तनावग्रस्त कर्फ़्यू जैसा माहौल नहीं बनता था। अमर ,मेरे दोस्तों में थोडा ज्यादा करीब था और सबसे ज्यादा मेरी उसीसे पटती थी। उसका कारण एक ये भी था कि हम दोनों के घर एक ही गली में थे। अक्सर खेल के बाद जब हम दोनों घर लौटते थे तो एक ही साथ और हमेशा उसके साइकल पर लौटते थे । उस दिन अचानक अमर कोई बात कहते कहते बोल पड़ा कि , यार तुने, कैलाश की छोटी बहन को देखा है , कितनी सुंदर है "

मुझे नहीं पता कि ऐसा उसने क्यों कहा , मगर मैं उसके ये कहने से बिल्कुल अवाक् था। क्योंकि कैलाश हमारे साथ पड़ने वाला हमारा दोस्त था और उन दिनों दोस्त की बहन , सिर्फ़ बहन ही होती थी और हम समझते भी थे। अपने घर आने पर मैं चुपचाप घर की ओर चल दिया। अगले दिन से उसकी मेरी बातचीत बंद हो गयी। दोस्तों ने लाख पूछा , उससे भी और मुझसे भी मगर बात वहीं की वहीं रही। लगभग एक या सवा साल तक हम सभी दोस्तों की बीच रहते हुए भी कभी आमने सामने नहीं हुए । इस बात का मुझे कोई मलाल भी नहीं था ।

एक दिन अचानक मुझे पता चला कि कैलाश की उसी बहन की शादी , अमर के फुफेरे भैया से हो रही है और चूँकि कैलाश के पिताजी नहीं थे इसीलिए उसके घर के हालत को देखते हुए अमर ने ही ये रिश्ता करवाया था। मेरा दिल बुरी तरह बैचैन था अमर से मिल कर माफी मांगने के लिए भी और अपनी किए पर शर्मिन्दा होने के कारण भी। मैं अमर के घर गया उसकी मम्मी मुझे इतने दिनों बाद अचानक देख कर पहले चौंकी फ़िर खुशी से आने को कहा। उन्होंने बताया कि अमर उसी रिश्ते के सिलसिले में बाहर गया हुआ है और देर रात तक घर लौटेगा। मैंने उन्हें कहा कि अमर के लौटने पर उसे जरूर बता दें कि मैं आया था, वैसे मैं सुबह आकर मिल जाऊँगा। मुझे उससे कुछ जरूरी बात कहनी है।

उन दिनों फोन का चलन नहीं था तो मोबाईल का कौन कहे। अगली सुबह उठता तो गली में अफरा तफरी का आलम था । हर कोई बदहवास सा भागा जा रहा था। मैंने साथ वाले छोटे लड़के से पूछा कि अबे क्या हुआ कोई चोरी वोरी हुई है क्या , या कहीं झगडा हुआ है ।

नहीं भैया, वो शर्मा जी का बेटा था न अमर , अरे जिससे कभी आपकी दोस्ती थी। सुबह नहाते समय बाथरूम में गिर गया । सर की सारी नसें फट गयी, मर गया बेचारा।

आज तक उस रात की दूरी मुझे सालती है और शायद ता उम्र सालेगी। इश्वर से दुआ करता हूँ कि अगले जन्म में किसी भी रूप में अमर को मुझसे जरूर मिलाना ताकि एक बार माफी मांग सकूं.और अब इस जन्म के लिए किसी से क्षमा मांगने के लिए रात का इंतज़ार नहीं करूंगा , ये सोच लिया है ..............

9 टिप्‍पणियां:

  1. अजय भाई, कभी कभी हम भी गलत हो सकते हैं और दूसरे की भावनाओं को नहीं समझने के कारण अपने को ग्लानि में पाते है, दूसरा कहता कुछ है और हम समझते कुछ और हैं, अगर ज्यादा घनिष्ठता है तो बात बंद करना कोई हल नहीं है, अपितु लड़ झगड़ के मामला सुलझा लेना चाहिये।

    अपनी ग्लानि छोड़िये ये तो जिंदगी है सब चलता रहता है।

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  2. भाई, कहानी बहुत अच्छी है और सीख भी अच्छी दे रही है। आशा है यह आप का संस्मरण नहीं होगा।

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  3. अफ़सोस कि मेरा ही है द्विवेदी जी , और विवेक भाई इस वाकये को बीते बीस बरस से ज्यादा हो चुके हैं मगर , अब भी भूल नहीं पाया हूं अलबत्ता बहुत कुछ सीख तो गया ही

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  4. आपमे यह ग्लानि बोध क्यों हो ?

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  5. जीवन्त मानवीय द़ष्टिकोण के संवेदनशील पहलुओं को दिखाते इस संस्मरण में निहित रिश्तों की पाक़ीज़गी का अहसास मन को गहरे भिंगो देता है।

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  6. ajay ji

    bahut hi bhayanak sach.........agar ye aapki zindagi ka sach hai to samajh sakti hun kitna athah dukh samaya hoga jise hum mein se shayad koi bhi na samajh sake kyunki jis par bitati hai wo hi janta hai .........magar aaj aapki post padhkar sabko ek sikh to jaroor hi mili hogi ki galti karne par prashchit ke liye koi waqt nhi hota jab jago tabi savera.

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  7. haan ajay jee,padh kar antar man ko chhu gaya,ye koi kahani to nahi,aapne likha hai ye sachchi ghatna hai fir is par tippani kaise karun,bus ek afsos hai ki aapka ghanisht mitra is tarah se aapse door ho gaya aur aap ek wishad liye jee rahe hain.

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टोकरी में जो भी होता है...उसे उडेलता रहता हूँ..मगर उसे यहाँ उडेलने के बाद उम्मीद रहती है कि....आपकी अनमोल टिप्पणियों से उसे भर ही लूँगा...मेरी उम्मीद ठीक है न.....

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